कक्षा 12 हिंदी अध्याय 3 अतीत में दबे पाँव महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. अतीत में दबे पाँव पाठ के लेखक कौन हैं?

उत्तर: ओम थानवी।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. मुअनजो-दड़ो का शाब्दिक अर्थ क्या है?

उत्तर: मुर्दों का टीला।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. मुअनजो-दड़ो को वर्तमान में किस नाम से जाना जाता है?

उत्तर: मोहनजोदड़ो।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. 1922 में स्तूप की खुदाई किसने शुरू की?

उत्तर: राखालदास बनर्जी ने।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. व्यापक खुदाई अभियान किनके निर्देशन में शुरू हुआ?

उत्तर: भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के महानिदेशक जॉन मार्शल के निर्देशन में।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. मुअनजो-दड़ो के जिस सबसे खास हिस्से के एक सिरे पर स्तूप वाला चबूतरा है, उसे पुरातत्त्व के विद्वान क्या कहते हैं?

उत्तर: गढ़।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. डीके हलका किसके नाम पर है?

उत्तर: पुरातत्त्वशास्त्री काशीनाथ दीक्षित के नाम पर।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. नर्तकी की मूर्ति आज कहाँ रखी है?

उत्तर: दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में।

प्रश्न 9 (1 अंक)

प्र. मुअनजो-दड़ो में अनुमानतः कितने कुएँ थे?

उत्तर: करीब सात सौ कुएँ।

प्रश्न 10 (1 अंक)

प्र. लेखक सिंधु घाटी सभ्यता को किस विशेषण से पुकारते हैं?

उत्तर: लो-प्रोफ़ाइल सभ्यता।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. हड़प्पा के अधिकांश साक्ष्य क्यों नष्ट हो गए?

उत्तर: हड़प्पा के ज़्यादातर साक्ष्य रेललाइन बिछने के दौरान नष्ट हो गए। लेखक इसे ‘विकास की भेंट चढ़ गए’ लिखते हैं।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. मुअनजो-दड़ो का बौद्ध स्तूप सिंधु सभ्यता से जुड़ा है या नहीं? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: नहीं, बौद्ध स्तूप सिंधु सभ्यता के बिखरने के बहुत बाद, एक जीर्ण-शीर्ण टीले पर बना था; यह छब्बीस सदी पहले की, यानी सिंधु सभ्यता से हज़ारों साल बाद की रचना है।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. मुअनजो-दड़ो में आधुनिक ‘ग्रिड प्लान’ किसे कहा गया है और लेखक की इस पर क्या टिप्पणी है?

उत्तर: सीधी-आड़ी सड़कों वाली नियोजित बनावट को आज के वास्तुकार ‘ग्रिड प्लान’ कहते हैं। लेखक के अनुसार आज की सेक्टर-मार्का कॉलोनियों का आड़ा-सीधा नियोजन रहन-सहन को नीरस बनाता है; ब्रासीलिया, चंडीगढ़ और इस्लामाबाद जैसे ग्रिड शैली के शहरों की बसावट शहर के खुद विकसने का कितना अवकाश छोड़ती है, इस पर बहुत शंका प्रकट की जाती है।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. नयी खोज ने सिंधु घाटी की कृषि के बारे में कौन-सी पुरानी धारणा ग़लत साबित की?

उत्तर: पुरानी धारणा थी कि सिंधु घाटी के लोग अन्न उपजाते नहीं थे, उसका आयात करते थे। नयी खोज ने इसे निर्मूल साबित किया; अब कुछ विद्वान मानते हैं कि यह मूलतः खेतिहर और पशुपालक सभ्यता ही थी।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. चंडीगढ़ के साथ लेखक क्या तुलना करते हैं?

उत्तर: मुअनजो-दड़ो में सड़क की ओर घरों की सिर्फ़ पीठ दिखाई देती है और दरवाज़े अंदर गलियों में हैं। चंडीगढ़ में ठीक यही शैली पचास साल पहले कार्बूजिए ने इस्तेमाल की; वहाँ भी कोई घर मुख्य सड़क पर नहीं खुलता। लेखक पूछते हैं: क्या कार्बूजिए ने यह सीख मुअनजो-दड़ो से ली?

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. शीरीन रत्नागर के अनुसार सिंधु-वासी सिंचाई कैसे करते थे, और लेखक सभ्यता के उजड़ने के बारे में क्या प्रश्न उठाते हैं?

उत्तर: पुरातत्त्वी शीरीन रत्नागर का मानना है कि सिंधु-वासी कुओं से सिंचाई कर लेते थे। लेखक स्वयं प्रश्न उठाते हैं: क्या बारिश घटने और कुओं के अत्यधिक इस्तेमाल से भू-तल जल भी पहुँच से दूर चला गया, और क्या पानी के अभाव में यह इलाका और उसके साथ सिंधु घाटी की सभ्यता उजड़ी? ये लेखक के प्रश्न हैं, निष्कर्ष नहीं।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. राजस्थान के कुलधरा गाँव की कहानी संक्षेप में लिखिए।

उत्तर: जैसलमेर के मुहाने पर बसे कुलधरा गाँव का हर बाशिंदा कोई डेढ़ सौ साल पहले राजा से तकरार पर रातोंरात अपना घर छोड़ चला गया। घर खंडहर हो गए पर ढहे नहीं; दीवारें, प्रवेश और खिड़कियाँ ऐसी हैं जैसे कल की बात हो।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. अजायबघर के सोने के गहनों का क्या हुआ?

उत्तर: अजायबघर में सोने के गहने भी थे, पर वे चोरी हो गए; यह जानकारी अजायबघर में तैनात कर्मचारी अली नवाज़ ने दी।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. महाकुंड की बनावट का विस्तार से वर्णन कीजिए।

उत्तर: महाकुंड करीब चालीस फ़ुट लंबा, पच्चीस फ़ुट चौड़ा और सात फ़ुट गहरा है। कुंड में उत्तर और दक्षिण से सीढ़ियाँ उतरती हैं। तीन तरफ़ साधुओं के कक्ष बने हैं; उत्तर में दो पाँत में आठ स्नानघर हैं, और किसी का द्वार दूसरे के सामने नहीं खुलता। कुंड में खास बात पक्की ईंटों का जमाव है: पानी रिस न सके और बाहर का अशुद्ध पानी अंदर न आए, इसके लिए कुंड के तल में और दीवारों पर ईंटों के बीच चूने और चिरोड़ी का गारा लगाया गया; पार्श्व की दीवारों के साथ बनी दूसरी दीवार में सफ़ेद डामर का प्रयोग है। कुंड के पानी के बंदोबस्त के लिए एक तरफ़ कुआँ है, जो दोहरे घेरे वाला अकेला कुआँ है और कुंड के पवित्र या अनुष्ठानिक होने का प्रमाण माना गया है। पानी बाहर बहाने के लिए पक्की ईंटों से बनी और ईंटों से ढकी नालियाँ हैं।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. मुअनजो-दड़ो में मिले उत्खनन क्षेत्रों (डीके, एचआर, वीएस हलकों) का परिचय दीजिए।

उत्तर: डीके हलका पुरातत्त्वशास्त्री काशीनाथ दीक्षित के नाम पर है और दोनों बस्तियों में सबसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है; यहीं शहर की मुख्य सड़क (फ़र्स्ट स्ट्रीट) है। एचआर हलका हेरल्ड हरग्रीव्ज़ के नाम पर है, जिन्होंने 1924-25 में खुदाई करवाई; यहीं प्रसिद्ध नर्तकी की मूर्ति और कुछ कंकाल मिले। वीएस हलका माधोस्वरूप वत्स के नाम पर है, जहाँ एक रंगाई का छोटा कारखाना मिला।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. मुअनजो-दड़ो की खोज की कहानी क्रमबद्ध रूप से लिखिए।

उत्तर: 1922 में राखालदास बनर्जी बौद्ध स्तूप की खोजबीन करते हुए खुदाई शुरू करते हैं। इस दौरान उन्हें ईसा-पूर्व काल के निशान मिलते हैं, जो स्तूप से भी बहुत पुरानी सभ्यता के होने का संकेत देते हैं। इसके बाद भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के महानिदेशक जॉन मार्शल के निर्देश पर एक व्यापक खुदाई अभियान शुरू होता है। इस खोज ने भारत को मिस्र और मेसोपोटामिया की प्राचीन सभ्यताओं के समकक्ष ला खड़ा किया।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. मुअनजो-दड़ो में सूत, कपास और रंगाई उद्योग के बारे में लेखक क्या बताते हैं?

उत्तर: मुअनजो-दड़ो से मिला सूती कपड़ा दुनिया में सूत के दो सबसे पुराने नमूनों में एक है; दूसरा जॉर्डन में मिला, जो तीन हज़ार ईसा-पूर्व का है। यहाँ सूत की कताई-बुनाई के साथ रंगाई भी होती थी। माधोस्वरूप वत्स को खुदाई में रंगाई का एक छोटा कारखाना मिला; वहाँ ज़मीन में ईंटों के गोल गड्ढे उभरे हुए हैं, और अनुमान है कि इनमें रंगाई के बड़े बर्तन रखे जाते थे। छालटी (लिनन) और ऊन, कहते हैं, सुमेर से आयात होते थे; शायद सूत उनको निर्यात होता हो। मेसोपोटामिया के शिलालेखों में मुअनजो-दड़ो के लिए ‘मेलुहा’ शब्द का संभावित प्रयोग मिलता है।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. अजायबघर में प्रदर्शित वस्तुओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर: अजायबघर छोटा है, पर उसमें काला पड़ा गेहूँ, ताँबे-काँसे के बर्तन, मुहरें, वाद्य, मृद्-भांड (जिन पर काले-भूरे चित्र बने हैं), चौपड़ की गोटियाँ, दीये, माप-तौल पत्थर, ताँबे का आईना, मिट्टी की बैलगाड़ी और खिलौने, दो पाटन वाली चक्की, कंघी, मिट्टी के कंगन और पत्थर के मनकों वाला हार प्रदर्शित हैं। काशीनाथ दीक्षित को सोने की तीन सुइयाँ भी मिली थीं, जिनका उपयोग बारीक कशीदाकारी में होने का अनुमान है। अकेले मुअनजो-दड़ो की खुदाई में निकली पंजीकृत चीज़ों की संख्या पचास हज़ार से ज़्यादा है; अजायबघर में उनमें से मुट्ठी भर चीज़ें प्रदर्शित हैं। कुछ सोने के गहने भी यहाँ हुआ करते थे, जो चोरी हो गए।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. सिंधु घाटी सभ्यता को अन्य प्राचीन सभ्यताओं से अलग करने वाली विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: पूरी सिंधु सभ्यता में हथियार उस तरह कहीं नहीं मिले जैसे किसी राजतंत्र में होते हैं; अजायबघर में औज़ार हैं, हथियार नहीं। लेखक जिस “दूसरी बात” को सिंधु सभ्यता को दूसरी सभ्यताओं से अलग करने वाला बताते हैं, वह है प्रभुत्व या दिखावे के तेवर का नदारद होना: दूसरी जगहों पर राजतंत्र या धर्मतंत्र की ताकत दिखाने वाले महल, उपासना-स्थल, मूर्तियाँ और पिरामिड आदि मिलते हैं, जबकि यहाँ न भव्य राजप्रसाद मिले, न मंदिर, न राजाओं-महंतों की समाधियाँ। यहाँ के मूर्तिशिल्प और औज़ार छोटे हैं, और नावें मिस्र की नावों जैसी बनावट की होकर भी आकार में छोटी रहीं। इसीलिए लेखक कहते हैं कि यह ‘लो-प्रोफ़ाइल’ सभ्यता थी, “लघुता में भी महत्ता अनुभव करने वाली संस्कृति”।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. ‘सिंधु-सभ्यता साधन-संपन्न थी, पर उसमें भव्यता का आडंबर नहीं था।’ इस कथन को पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: सिंधु घाटी सभ्यता के पास साधनों की कमी नहीं थी: सुनियोजित नगर, महाकुंड, विशाल कोठार, उन्नत खेती और व्यापार, सूत की कताई-बुनाई और रंगाई, ढकी नालियाँ, और इतिहासकारों के अनुसार कुएँ खोदकर भू-जल तक पहुँचने वाली पहली ज्ञात संस्कृति। इसीलिए मुअनजो-दड़ो को साधनों और व्यवस्थाओं को देखते हुए सबसे समृद्ध भी माना गया है। फिर भी यहाँ न भव्य राजप्रसाद मिले, न मंदिर, न राजाओं-महंतों की समाधियाँ, और हथियार भी उस तरह कहीं नहीं मिले जैसे किसी राजतंत्र में होते हैं। मूर्तिशिल्प भी छोटे आकार के हैं; नरेश के मुकुट से छोटे सिरपेंच की कल्पना भी नहीं की जा सकती, और नावें भी आकार में छोटी रहीं। लेखक के अनुसार इसकी संपन्नता की बात कम हुई है तो शायद इसलिए कि उसमें भव्यता का आडंबर नहीं है। यानी यह ‘लो-प्रोफ़ाइल’ और साथ ही समृद्ध सभ्यता थी।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. ‘पुरातत्त्व के किन चिह्नों के आधार पर आप यह कह सकते हैं कि सिंधु-सभ्यता ताकत से शासित होने की अपेक्षा समझ से अनुशासित सभ्यता थी।’ विवेचना कीजिए।

उत्तर: मुअनजो-दड़ो क्या, हड़प्पा से हरियाणा तक समूची सिंधु सभ्यता में हथियार उस तरह कहीं नहीं मिले जैसे किसी राजतंत्र में होते हैं; इसी आधार पर विद्वान मानते हैं कि यहाँ कोई सैन्य सत्ता शायद न रही हो। फिर भी कोई अनुशासन ज़रूर था जो नगर योजना, वास्तुशिल्प, मुहर-ठप्पों, पानी या साफ़-सफ़ाई जैसी व्यवस्थाओं में एकरूपता तक को कायम रखे हुए था। जैसे: सीधी-आड़ी सड़कों वाला नियोजन; मुअनजो-दड़ो के घरों में एक ही आकार की, 1:2:4 अनुपात की, भट्टी में पकी ईंटें; घरों की कमोबेश एक-सी वास्तु शैली (सामने की दीवार में केवल प्रवेश-द्वार, दरवाज़े अंदर गलियों में); हर घर में स्नानघर, ढकी नालियाँ और कुओं की भरमार। पाठ के शब्दों में, वहाँ अनुशासन ज़रूर था, पर ताकत के बल पर नहीं; यही समझ से अनुशासित होने का संकेत है।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. शीर्षक ‘अतीत में दबे पाँव’ की सार्थकता पर विस्तार से प्रकाश डालिए।

उत्तर: पाठ शीर्षक का अर्थ स्वयं नहीं बताता; इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है। एक पाठ: मुअनजो-दड़ो की हज़ारों साल पुरानी सभ्यता टीलों और मिट्टी में दबी रही, और खुदाई ने उसके अवशेष फिर सामने ला दिए; शीर्षक के ‘पाँव’ को इन अवशेषों के रूपक के रूप में पढ़ा जा सकता है। दूसरा पाठ लेखक के अपने वर्णन से जुड़ता है: खंडहरों में “हममें कमोबेश हर कोई पाँव आहिस्ता उठाते हुए एक घर से दूसरे घर में बेहद धीमी गति से दाखिल होता था”, मानो अतीत को निहारने की जिज्ञासा के साथ किसी अजनबी घर में अनधिकार चहल-कदमी का अपराध-बोध भी हो। यह आहिस्ता चलने का भाव शीर्षक के ‘दबे पाँव’ से मेल खाता है। लेखक यह भी कहते हैं कि यह आपकी सभ्यता परंपरा है, मगर घर आपका नहीं है। यह पाठक की व्याख्या है, पाठ का सीधा कथन नहीं।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
गढ़ की चारदीवारी लाँघ कर हम बस्तियों की तरफ़ बढ़े। ये गढ़ के मुकाबले छोटे टीलों पर बनी हैं, इसलिए इन्हें नीचा नगर कहकर भी पुकारा जाता है। खुदाई की प्रक्रिया में टीलों का आकार घट गया है। पूरब की बस्ती रईसों की बस्ती है। हालाँकि आज के युग में पूरब की बस्तियाँ गरीबों की बस्तियाँ मानी जाती हैं, मुअनजो-दड़ो इसका उलट था, यानी बड़े घर, चौड़ी सड़कें, ज़्यादा कुएँ।

(क) 1 अंक गढ़ से छोटी टीलों पर बसी बस्तियों को क्या कहा जाता है?
उत्तर: नीचा नगर।

(ख) 2 अंक गद्यांश के अनुसार पूरब की बस्ती की क्या विशेषता बताई गई है?
उत्तर: पूरब की बस्ती को ‘रईसों की बस्ती’ कहा जाता है; यहाँ बड़े घर, चौड़ी सड़कें और ज़्यादा कुएँ थे।

(ग) 3 अंक लेखक आज के युग और मुअनजो-दड़ो के युग की पूरब दिशा की बस्तियों में क्या अंतर बताते हैं, और इससे क्या पता चलता है?
उत्तर: आज के युग में पूरब की बस्तियाँ अक्सर गरीबों की मानी जाती हैं, पर मुअनजो-दड़ो में इसका उलट था; पूरब में बड़े घर, चौड़ी सड़कें और ज़्यादा कुएँ वाली संपन्न बस्ती थी। यानी पूरब की बस्तियों के बारे में आज की धारणा और मुअनजो-दड़ो की स्थिति एक-दूसरे से उलट थीं।

केस स्टडी
अजायबघर में प्रदर्शित चीज़ों में औज़ार तो हैं, पर हथियार कोई नहीं है। मुअनजो-दड़ो क्या, हड़प्पा से लेकर हरियाणा तक समूची सिंधु सभ्यता में हथियार उस तरह कहीं नहीं मिले हैं जैसे किसी राजतंत्र में होते हैं। दूसरी बात, जो सांस्कृतिक धरातल पर सिंधु घाटी सभ्यता को दूसरी सभ्यताओं से अलग ला खड़ा करती है, वह है प्रभुत्व या दिखावे के तेवर का नदारद होना। दूसरी जगहों पर राजतंत्र या धर्मतंत्र की ताकत का प्रदर्शन करने वाले महल, उपासना-स्थल, मूर्तियाँ और पिरामिड आदि मिलते हैं। हड़प्पा संस्कृति में न भव्य राजप्रसाद मिले हैं, न मंदिर।

(क) 1 अंक अजायबघर में प्रदर्शित सामान में क्या नहीं मिलता?
उत्तर: हथियार।

(ख) 2 अंक गद्यांश के अनुसार सिंधु घाटी सभ्यता दूसरी सभ्यताओं से सांस्कृतिक रूप से किस बात में अलग है?
उत्तर: सिंधु घाटी सभ्यता में प्रभुत्व या दिखावे का कोई तेवर नहीं है, जबकि दूसरी जगहों पर राजतंत्र या धर्मतंत्र की ताकत दिखाने वाले महल, उपासना-स्थल, मूर्तियाँ और पिरामिड आदि मिलते हैं; सिंधु सभ्यता में ऐसा कुछ नहीं मिलता।

(ग) 3 अंक गद्यांश में वर्णित तथ्यों के आधार पर सिंधु घाटी सभ्यता के शासन-प्रबंध की प्रकृति का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर: हथियार उस तरह नहीं मिले जैसे किसी राजतंत्र में होते हैं, और न भव्य राजप्रसाद मिले, न मंदिर; इससे लगता है कि सिंधु घाटी सभ्यता का प्रबंध सैन्य ताकत या राजसी दिखावे पर आधारित नहीं था। इसके बजाय नगर-नियोजन, मुहर-ठप्पों और स्वच्छता-व्यवस्था में दिखने वाली एकरूपता बताती है कि यहाँ एक साझा, समझ-आधारित अनुशासन काम कर रहा था। लेखक इसी को वह “दूसरी बात” कहते हैं जो इसे दूसरी सभ्यताओं से अलग ला खड़ा करती है।