NCERT पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग 2 के अध्याय 4 बनारस / दिशा के प्रश्न-अभ्यास (दोनों कविताओं के 10 प्रश्न) और योग्यता-विस्तार (3 प्रश्न) के सभी तेरह प्रश्नों के पूर्ण उत्तर, पाठ्यपुस्तक के आधार पर। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 बनारस
प्र. बनारस में वसंत का आगमन कैसे होता है और उसका क्या प्रभाव इस शहर पर पड़ता है?
उत्तर: वसंत इस शहर में अचानक आता है, लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से धूल का एक बवंडर उठता है, जिससे इस पुराने शहर की जीभ किरकिराने लगती है। इसका प्रभाव पूरे शहर पर पड़ता है, जो चीज़ पहले से जीवित है वह और सुगबुगाने लगती है और जो नहीं है वह भी फेंकने लगती है पचखियाँ। आदमी दशाश्वमेध घाट पर जाता है और पाता है कि घाट का आखिरी पत्थर कुछ और मुलायम हो गया है, सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में नमी और भिखारियों के खाली कटोरों में भी एक अजीब सी चमक भर उठती है। इस तरह वसंत का प्रभाव घाट के पत्थर से लेकर भिखारियों के कटोरों तक, शहर के कोने-कोने में दिखता है।
प्र. ‘खाली कटोरों में वसंत का उतरना’ से क्या आशय है?
उत्तर: भिखारियों के कटोरे सामान्यतः खाली और निचाट रहते हैं, फिर भी वसंत ऋतु आने पर उन्हीं खाली कटोरों में भी एक अजीब सी चमक भर उठती है। इसका आशय है कि वसंत का उल्लास और नवजीवन का संचार भिखारियों के खाली कटोरों तक भी पहुँचता है; उनका “निचाट खालीपन” भी “एक अजीब सी चमक से भर उठा है”।
प्र. बनारस की पूर्णता और रिक्तता को कवि ने किस प्रकार दिखाया है?
उत्तर: कवि पूरी कविता में विरोधाभास अलंकार के माध्यम से बनारस की पूर्णता (जो है) और रिक्तता (जो नहीं है) को साथ-साथ दिखाते हैं, “जो है वह सुगबुगाता है, जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ।” आगे कहा गया है कि यह शहर आधा जल में है, आधा मंत्र में; आधा फूल में है, आधा शव में; आधा नींद में है, आधा शंख में, और ध्यान से देखने पर यह आधा है और आधा नहीं भी है। अंत में, जो है वह बिना किसी स्तंभ के खड़ा है, जबकि जो नहीं है उसे राख और रोशनी के ऊँचे-ऊँचे स्तंभ थामे हैं। इस तरह कवि बनारस में होने और न होने, पूर्णता और रिक्तता, दोनों को साथ-साथ दिखाते हैं; “यह शहर इसी तरह खुलता है / इसी तरह भरता / और खाली होता है यह शहर”।
प्र. बनारस में धीरे-धीरे क्या-क्या होता है। ‘धीरे-धीरे’ से कवि इस शहर के बारे में क्या कहना चाहता है?
उत्तर: बनारस में धूल धीरे-धीरे उड़ती है, लोग धीरे-धीरे चलते हैं, घंटे धीरे-धीरे बजते हैं और शाम भी धीरे-धीरे होती है। ‘धीरे-धीरे’ शब्द की यह बार-बार आवृत्ति कवि की इस बात को उभारती है कि बनारस की गति मंथर है, और इस मंथरता को शहर की स्थिरता के रूप में पढ़ा जा सकता है। कवि यह कहना चाहते हैं कि यहाँ हर चीज़ अपनी सहज, सदियों पुरानी लय (अपनी “रौ”) में चलती है, और “धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय / दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को”, इतना कि जो चीज़ जहाँ थी, वहीं पर रखी है।
प्र. धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय में क्या-क्या बँधा है?
उत्तर: धीरे-धीरे होने की यह सामूहिक लय समूचे शहर को इतनी दृढ़ता से बाँधे है कि यहाँ कुछ भी गिरता नहीं है और कुछ भी हिलता नहीं है। जो चीज़ जहाँ थी, वह वहीं पर रखी है, गंगा वहीं है, नाव वहीं बँधी है, और तुलसीदास की खड़ाऊँ भी सैकड़ों बरस से वहीं की वहीं रखी हुई हैं।
प्र. ‘सई साँझ’ में घुसने पर बनारस की किन-किन विशेषताओं का पता चलता है?
उत्तर: कवि कहते हैं कि बिना किसी सूचना के शाम की शुरुआत (सई-साँझ) में इस शहर में घुस जाओ, या कभी आरती के आलोक में इसे अचानक देखो, तो पता चलता है कि इसकी बनावट अद्भुत है, यह शहर आधा जल में है, आधा मंत्र में; आधा फूल में है, आधा शव में; आधा नींद में है, आधा शंख में। ध्यान से देखने पर यह आधा है और आधा नहीं भी है। इस तरह सई-साँझ में बनारस का यह विरोधाभासी, रहस्यमय और अद्भुत रूप उजागर होता है।
प्र. बनारस शहर के लिए जो मानवीय क्रियाएँ इस कविता में आई हैं, उनका व्यंजनार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: कवि ने बनारस को मनुष्य की तरह चित्रित किया है, शहर की “जीभ किरकिराने लगती है”, “जो है वह सुगबुगाता है”, शहर “अपनी एक टाँग पर खड़ा है” और “अपनी दूसरी टाँग से बिलकुल बेखबर” है। इन मानवीय क्रियाओं का व्यंजनार्थ (गूढ़ अर्थ) यह है कि बनारस कोई निर्जीव, यांत्रिक शहर नहीं बल्कि एक जीवंत, साँस लेता हुआ चरित्र है, जिसकी अपनी चेतना, अपनी लय और अपना स्वभाव है, एक टाँग पर खड़े, दूसरी टाँग से बेखबर शहर को इस तरह भी पढ़ा जा सकता है कि वह परंपरा और आधुनिकता, दोनों में एक साथ रहता है (पाठ्यपुस्तक की भूमिका में “आधुनिकता का समाहार” आता है), पर अपने एक हिस्से से बेख़बर अपनी सदियों पुरानी लय में खड़ा है।
प्र. शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए:
(क) ‘यह धीरे-धीरे होना ———– समूचे शहर को’
(ख) ‘अगर ध्यान से देखो ———– और आधा नहीं है’
(ग) ‘अपनी एक टाँग पर ———– बेखबर’
उत्तर (क): पूरी पंक्ति है, “यह धीरे-धीरे होना, धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय, दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को।” यहाँ ‘धीरे-धीरे’ की आवृत्ति (पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार) शहर की मंथर, अटूट लय को महसूस कराती है, भाषा बोलचाल जैसी सहज है फिर भी भाव गहरे हैं।
उत्तर (ख): पूरी पंक्ति है, “अगर ध्यान से देखो तो यह आधा है और आधा नहीं है।” यहाँ विरोधाभास अलंकार है, एक ही शहर के लिए “आधा है” और “आधा नहीं है” दोनों बातें एक साथ कही गई हैं, इसे बनारस के भौतिक और आध्यात्मिक, दृश्य और अदृश्य रूपों के एक साथ होने के रूप में पढ़ा जा सकता है।
उत्तर (ग): पूरी पंक्ति है, “अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर, अपनी दूसरी टाँग से बिलकुल बेखबर।” यहाँ मानवीकरण अलंकार है, शहर को मनुष्य की तरह एक टाँग पर खड़ा दिखाया गया है, जिसे उसकी सदियों पुरानी परंपरा में दृढ़ता से खड़े रहने का प्रतीक माना जा सकता है, जबकि “दूसरी टाँग से बेखबर” होने को आधुनिकता में भी साथ-साथ जीने, पर उसका पूरा एहसास न होने के रूप में पढ़ा जा सकता है।
2 दिशा
प्र. बच्चे का उधर-उधर कहना क्या प्रकट करता है?
उत्तर: बच्चे का “उधर-उधर” कहना यह प्रकट करता है कि बच्चों के लिए दिशा या यथार्थ किसी स्थिर, भौगोलिक तथ्य से नहीं बल्कि अपने प्रत्यक्ष अनुभव और खेल से जुड़ा होता है, बच्चे के लिए हिमालय वही दिशा है जिधर उसकी पतंग भागी जा रही थी। यह बाल-सुलभ, निश्छल दृष्टिकोण दिखाता है कि हर व्यक्ति का अपना यथार्थ होता है, और पाठ के अनुसार “बच्चे यथार्थ को अपने ढंग से देखते हैं।”
प्र. ‘मैं स्वीकार करूँ, मैंने पहली बार जाना हिमालय किधर है’: प्रस्तुत पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इन पंक्तियों में कवि यह स्वीकार करते हैं कि बच्चे के सहज, अनुभव-आधारित उत्तर (“उधर-उधर”, जिधर उसकी पतंग भागी जा रही थी) ने उन्हें हिमालय की दिशा का बोध एक बिलकुल नए ढंग से कराया, मानो उन्होंने यह पहली बार जाना हो। पाठ के अनुसार “कवि को यह बाल सुलभ संज्ञान मोह लेता है।” भाव यह है कि हर व्यक्ति का अपना यथार्थ होता है, और बच्चों के सीधे अनुभव से ऐसा जीवंत ज्ञान मिल सकता है जो कवि को भी पहली बार मिला; कविता यह कहती है कि “हम बच्चों से कुछ-न-कुछ सीख सकते हैं।”
3 योग्यता-विस्तार
प्र. आप बनारस के बारे में क्या जानते हैं? लिखिए।
उत्तर: (यह एक लेखन-गतिविधि है, विद्यार्थी अपने अनुभव और जानकारी से लिखें।) पाठ्यपुस्तक के आधार पर इतनी बातें लिखी जा सकती हैं: बनारस (काशी) प्राचीनतम शहर है, शिव की नगरी है और गंगा के साथ विशिष्ट आस्था का केंद्र है; काशी और गंगा के सान्निध्य से मोक्ष की अवधारणा जुड़ी है; यहाँ दशाश्वमेध जैसे घाट हैं जहाँ पूजा, स्नान आदि होता है, और लहरतारा, मडुवाडीह जैसे मोहल्ले हैं। यहाँ मंदिरों-घाटों पर दीप जलते हैं, दूसरी तरफ़ कभी न बुझने वाली चिताग्नि है, और हर कार्य अपनी ‘रौ’ में होता है। इनके साथ अपनी देखी-सुनी बातें (जैसे गंगा आरती, बनारसी साड़ी, संगीत) भी जोड़ें।
प्र. बनारस के चित्र इकट्ठे कीजिए।
उत्तर: (यह एक संकलन-गतिविधि है।) विद्यार्थी पत्र-पत्रिकाओं या पुराने कैलेंडरों से बनारस के घाटों, गंगा आरती, मंदिरों, गलियों और नावों के चित्र इकट्ठे करें और हर चित्र के नीचे कविता की कोई मिलती-जुलती पंक्ति लिखें, जैसे नाव के चित्र के नीचे ‘कि वहीं पर बँधी है नाव’ और आरती के चित्र के नीचे ‘कभी आरती के आलोक में इसे अचानक देखो’।
प्र. बनारस शहर की विशेषताएँ जानिए।
उत्तर: (यह खोज-आधारित गतिविधि है।) कविता और पाठ्यपुस्तक की भूमिका से ये विशेषताएँ मिलती हैं: आस्था, श्रद्धा, विरक्ति, विश्वास, आश्चर्य और भक्ति का मिला-जुला रूप; अति प्राचीनता, आध्यात्मिकता और भव्यता के साथ आधुनिकता का समाहार; ‘धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय’ जो पूरे शहर को बाँधे है; और जीवन-मृत्यु का एक साथ दिखना (‘आधा फूल में है, आधा शव में’)। अध्यापक या पुस्तकालय की सहायता से इसकी और विशेषताएँ जानकर सूची बनाइए।