कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 अध्याय 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. नेहरू के उस भाषण का नाम बताइए जो उन्होंने आज़ादी की रात संविधान सभा के विशेष सत्र में दिया।

उत्तर: ‘भाग्यवधू से चिर-प्रतीक्षित भेंट’, जिसे ‘ट्रिस्ट विद् डेस्टिनी’ भी कहा जाता है।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ क्या था?

उत्तर: मुस्लिम लीग का यह सिद्धांत कि भारत किसी एक कौम का नहीं बल्कि ‘हिंदू’ और ‘मुसलमान’ नाम की दो कौमों का देश है, और इसी आधार पर लीग ने मुसलमानों के लिए अलग देश पाकिस्तान की माँग की।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. ‘सीमांत गाँधी’ किसे कहा जाता था और वे किस बात के खिलाफ़ थे?

उत्तर: खान अब्दुल गफ़्फार खान को, जो पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत के निर्विवाद नेता थे और द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के एकदम खिलाफ़ थे।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन’ क्या है?

उत्तर: वह सहमति-पत्र जिस पर हस्ताक्षर करने का अर्थ था कि रजवाड़ा भारतीय संघ का अंग बनने के लिए सहमत है।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. ‘रज़ाकार’ कौन थे?

उत्तर: हैदराबाद के निज़ाम का वह अर्द्ध-सैनिक बल जिसे उसने आंदोलन को देखकर लोगों के खिलाफ़ रवाना किया। ये अव्वल दर्जे के सांप्रदायिक और अत्याचारी थे और इन्होंने गैर-मुसलमानों को खासतौर पर निशाना बनाया।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. मणिपुर भारत के इतिहास में किस बात के लिए पहला है?

उत्तर: मणिपुर भारत का पहला भाग है जहाँ सार्वभौम वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को अपनाकर चुनाव हुए, 1948 के जून में।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. ‘विशाल आंध्र आंदोलन’ किस माँग को लेकर चला?

उत्तर: इस माँग को लेकर कि पुराने मद्रास प्रांत के तेलुगु-भाषी इलाकों को अलग करके आंध्र प्रदेश नाम का एक नया राज्य बनाया जाए।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. राज्य पुनर्गठन आयोग कब बना और उसका काम क्या था?

उत्तर: 1953 में। इसका काम राज्यों के सीमांकन के मामले पर गौर करना था।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. आज़ादी के बाद भारत के सामने कौन-सी तीन चुनौतियाँ थीं? केवल नाम लिखिए।

उत्तर: पहली, एकता के सूत्र में बँधे ऐसे भारत को गढ़ने की चुनौती जिसमें सारी विविधताओं के लिए जगह हो। दूसरी, लोकतंत्र को कायम करने की चुनौती। तीसरी, ऐसे विकास की चुनौती जिससे समूचे समाज का भला हो, न कि कुछ एक तबकों का।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. पाकिस्तान दो अलग-अलग हिस्सों में क्यों बना?

उत्तर: ब्रिटिश इंडिया में कोई एक ऐसा इलाका नहीं था जहाँ मुसलमान बहुसंख्यक हों। मुसलमानों की ज़्यादा आबादी वाले दो इलाके थे, एक पश्चिम में और एक पूर्व में, और इन्हें जोड़कर एक जगह करने का कोई तरीका न था। इसलिए तय हुआ कि पाकिस्तान में पश्चिमी और पूर्वी दो इलाके शामिल होंगे और इनके बीच भारतीय भू-भाग का एक बड़ा विस्तार रहेगा।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. पंजाब और बंगाल का बँटवारा विभाजन की सबसे बड़ी त्रासदी क्यों साबित हुआ?

उत्तर: इन दोनों मुस्लिम-बहुल प्रांतों में अनेक हिस्से बहुसंख्यक गैर-मुस्लिम आबादी वाले थे, इसलिए इनके भीतर भी धार्मिक बहुसंख्या के आधार पर जिला या उससे निचले स्तर के प्रशासनिक हलके तक बँटवारा करना पड़ा। यह फ़ैसला 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि तक नहीं हो पाया था, इसलिए आज़ादी के दिन तक अनेक लोगों को यह पता ही नहीं था कि वे भारत में हैं या पाकिस्तान में।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. विभाजन में केवल संपत्ति का बँटवारा नहीं हुआ। और क्या-क्या बँटा?

उत्तर: वित्तीय संपदा के साथ-साथ टेबुल, कुर्सी, टाईपराइटर और पुलिस के वाद्ययंत्रों तक का बँटवारा हुआ। सरकारी और रेलवे के कर्मचारियों का भी बँटवारा हुआ। इससे भी गहरी बात यह थी कि अब तक पड़ोसियों की तरह रहते आए दो समुदाय हिंसक अलगाव का शिकार हुए।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. आज़ादी के तुरंत पहले रजवाड़ों को लेकर अंग्रेजी-शासन ने क्या घोषणा की, और वह गंभीर समस्या क्यों थी?

उत्तर: घोषणा यह थी कि ब्रिटिश-प्रभुत्व की समाप्ति के साथ ही सभी 565 रजवाड़े कानूनी तौर पर आज़ाद हो जाएँगे और वे चाहें तो भारत या पाकिस्तान में शामिल हों या अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखें। यह इसलिए गंभीर था कि यह फ़ैसला रजवाड़ों की प्रजा को नहीं, राजाओं को करना था, और इससे अखंड भारत के अस्तित्व पर ही खतरा मँडरा रहा था।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. मणिपुर की विधानसभा में विलय के सवाल पर क्या मतभेद थे?

उत्तर: मणिपुर की कांग्रेस चाहती थी कि इस रियासत को भारत में मिला दिया जाए, जबकि दूसरी राजनीतिक पार्टियाँ इसके खिलाफ़ थीं। आखिरकार भारत सरकार ने महाराजा को विलय के समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए राजी किया और 1949 के सितंबर में उसे सफलता मिली।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. औपनिवेशिक शासन में प्रांतों की सीमाएँ किस आधार पर तय होती थीं, और राष्ट्रीय सरकार ने उन्हें क्यों खारिज किया?

उत्तर: सीमाएँ प्रशासनिक सुविधा के लिहाज़ से तय की गई थीं, या ब्रिटिश सरकार ने जितना क्षेत्र जीत लिया उतने को एक अलग प्रांत मान लिया जाता था; कहीं-कहीं यह इस बात से भी तय होता था कि किसी रजवाड़े के अंतर्गत कितना इलाका है। हमारी राष्ट्रीय सरकार ने ऐसे सीमांकन को बनावटी मानकर खारिज कर दिया और भाषा के आधार पर पुनर्गठन का वायदा किया।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. पोट्टी श्रीरामुलु के आंदोलन का क्या नतीजा निकला?

उत्तर: 56 दिनों की भूख-हड़ताल के बाद उनकी मृत्यु हो गई। इससे बड़ी अव्यवस्था फैली, आंध्र प्रदेश में जगह-जगह हिंसक घटनाएँ हुईं, पुलिस फायरिंग में अनेक लोग घायल हुए या मारे गए और मद्रास में अनेक विधायकों ने विरोध जताते हुए इस्तीफ़ा दे दिया। आखिरकार 1952 के दिसंबर में प्रधानमंत्री ने आंध्र प्रदेश नाम से अलग राज्य बनाने की घोषणा की।

प्रश्न 9 (2 अंक)

प्र. भाषा के अलावा किस आधार पर बाद में नए राज्य बने? दो उदाहरण दीजिए।

उत्तर: बाद के वर्षों में अनेक उप-क्षेत्रों ने अलग क्षेत्रीय संस्कृति या विकास के मामले में क्षेत्रीय असंतुलन का सवाल उठाकर अलग राज्य की माँग की। ऐसे तीन राज्य छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड सन् 2000 में बने, और 2 जून 2014 को तेलंगाना भी नए राज्य के रूप में जुड़ा।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. विभाजन को अमल में लाने में कौन-कौन सी कठिनाइयाँ आईं? किन्हीं चार का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: 1. जुड़ा हुआ मुस्लिम-बहुल इलाका न होना। ब्रिटिश इंडिया में कोई एक भी ऐसा इलाका नहीं था जहाँ मुसलमान बहुसंख्यक हों; ऐसे दो इलाके थे, एक पश्चिम में और एक पूर्व में, जिन्हें जोड़ा नहीं जा सकता था। इसलिए पाकिस्तान दो हिस्सों में बना।
2. हर मुस्लिम-बहुल इलाके का राजी न होना। खान अब्दुल गफ़्फार खान, ‘सीमांत गाँधी’, द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के एकदम खिलाफ़ थे; फिर भी उनकी आवाज़ की अनदेखी करके पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत को पाकिस्तान में शामिल मान लिया गया।
3. पंजाब और बंगाल का भीतरी बँटवारा। इन मुस्लिम-बहुल प्रांतों के अनेक हिस्सों में गैर-मुस्लिम बहुसंख्यक थे, इसलिए जिला या उससे निचले स्तर तक बँटवारा करना पड़ा, और यह मध्यरात्रि तक तय नहीं हो पाया।
4. अल्पसंख्यकों का सवाल। सीमा के दोनों तरफ़ लाखों की संख्या में अल्पसंख्यक थे। वे अपने ही घर में विदेशी बन गए और उन्हें अकसर कुछ घंटों की सूचना पर घर छोड़ना पड़ा। इस कठिनाई से उबरने की किसी के पास कोई योजना नहीं थी।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. विभाजन के परिणामों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: स्थानांतरण। सन् 1947 में बड़े पैमाने पर आबादी को एक जगह से दूसरी जगह जाना पड़ा। यह स्थानांतरण आकस्मिक, अनियोजित और त्रासदी से भरा था और मानव-इतिहास के अब तक ज्ञात सबसे बड़े स्थानांतरणों में से एक था। अनुमान है कि 80 लाख लोगों को घर-बार छोड़कर सीमा-पार जाना पड़ा।
हिंसा। धर्म के नाम पर एक समुदाय के लोगों ने दूसरे समुदाय के लोगों को बेरहमी से मारा। लाहौर, अमृतसर और कलकत्ता जैसे शहर सांप्रदायिक अखाड़े में तब्दील हो गए। विभाजन की हिंसा में तकरीबन पाँच से दस लाख लोगों ने जान गँवाई।
औरतों और बच्चों पर असर। हज़ारों औरतों को अगवा कर लिया गया, उन्हें जबरन शादी करनी पड़ी और अगवा करने वाले का धर्म अपनाना पड़ा। कई मामलों में परिवार के लोगों ने ‘कुल की इज़्ज़त’ बचाने के नाम पर घर की बहू-बेटियों को मार डाला। बहुत-से बच्चे अपने माँ-बाप से बिछड़ गए।
शरणार्थी और बँटवारा। लाखों शरणार्थियों के लिए आज़ादी का मतलब महीनों और कभी-कभी सालों तक शिविर में ज़िंदगी काटना रहा। वित्तीय संपदा के साथ टेबुल, कुर्सी, टाईपराइटर और पुलिस के वाद्ययंत्रों तक का, और सरकारी तथा रेलवे कर्मचारियों तक का बँटवारा हुआ।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था। फिर भी भारत हिंदू राष्ट्र क्यों नहीं बना?

उत्तर: अल्पसंख्यकों की बड़ी आबादी। विभाजन के दौरान बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी पाकिस्तान चली गई, फिर भी 1951 के वक्त भारत की कुल आबादी में 10-12 फ़ीसदी मुसलमान थे; इनके अलावा सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी और यहूदी भी थे।
नेताओं का विश्वास। भारत के नेता द्वि-राष्ट्र सिद्धांत में यकीन नहीं करते थे। कौमी सरकार के अधिकतर नेता सभी नागरिकों को समान दर्ज़ा देने के हामी थे, चाहे नागरिक किसी भी धर्म का हो।
नागरिकता की कसौटी। वे भारत को ऐसे राष्ट्र के रूप में नहीं देखना चाहते थे जहाँ किसी एक धर्म के अनुयायियों को दूसरों पर वरीयता मिले। उनका मानना था कि नागरिकता की कसौटी धर्म को नहीं बनाया जाना चाहिए।
संविधान में अभिव्यक्ति। हमारे नेतागण धर्मनिरपेक्ष राज्य के आदर्श के हिमायती थे और उनके इस आदर्श की अभिव्यक्ति भारतीय संविधान में हुई।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. आज़ादी के बाद के महीनों में महात्मा गाँधी ने क्या किया, और उनकी हत्या कैसे हुई?

उत्तर: कोलकाता। गाँधी ने 15 अगस्त 1947 के जश्न में भाग नहीं लिया। वे कोलकाता के उन इलाकों में डेरा डाले थे जहाँ भयंकर दंगे हुए थे। उनकी मौजूदगी से हालात बड़ी हद तक सुधरे और आज़ादी का जश्न सांप्रदायिक सद्भाव के जज़्बे से मनाया गया। दंगे फिर भड़के तो वे अमन के लिए उपवास पर बैठ गए।
दिल्ली। अगले महीने वे दिल्ली पहुँचे, जहाँ भी बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी। वे चाहते थे कि मुसलमानों को भारत में गरिमापूर्ण जीवन मिले और उन्हें बराबर का नागरिक माना जाए। उन्हें यह भी लग रहा था कि भारत सरकार पाकिस्तान के प्रति अपनी वित्तीय वचनबद्धताएँ पूरी नहीं कर रही।
अंतिम उपवास। इन बातों को सोचकर उन्होंने 1948 की जनवरी में फिर उपवास रखा, जो उनका अंतिम उपवास साबित हुआ। इसका जादुई असर हुआ: सांप्रदायिक तनाव घटा, मुसलमान सुरक्षित अपने घरों को लौटे और भारत सरकार पाकिस्तान को उसका देय चुकाने पर राजी हो गई।
हत्या। दोनों समुदायों के अतिवादी गाँधीजी पर दोष मढ़ रहे थे, फिर भी उन्होंने सशस्त्र सुरक्षा लेने से मना कर दिया। 30 जनवरी 1948 को हिंदू अतिवादी नाथूराम विनायक गोडसे ने संध्याकालीन प्रार्थना के समय उन पर तीन गोलियाँ चलाईं और उन्हें तत्क्षण मार दिया।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. हैदराबाद का भारत में विलय कैसे हुआ?

उत्तर: निज़ाम की मंशा। हैदराबाद बहुत बड़ी रियासत थी और चारों तरफ़ से हिंदुस्तानी इलाके से घिरी थी। शासक ‘निज़ाम’ दुनिया के सबसे दौलतमंद लोगों में शुमार था और चाहता था कि हैदराबाद को आज़ाद रियासत का दर्जा मिले। उसने सन् 1947 के नवंबर में भारत के साथ यथास्थिति बहाल रखने का एक साल का समझौता किया और बातचीत जारी रही।
जनता का आंदोलन। इसी दौरान निज़ाम के शासन के खिलाफ़ आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा। तेलंगाना इलाके के किसान उसके दमनकारी शासन से खासतौर पर दुखी थे। महिलाएँ सबसे ज़्यादा जुल्म की शिकार हुई थीं और बड़ी संख्या में आंदोलन से जुड़ीं। हैदराबाद शहर आंदोलन का गढ़ बना और कम्युनिस्ट तथा हैदराबाद कांग्रेस अग्रिम पंक्ति में थे।
रज़ाकार। निज़ाम ने लोगों के खिलाफ़ एक अर्द्ध-सैनिक बल रवाना किया, जिसे रज़ाकार कहा जाता था। ये अव्वल दर्जे के सांप्रदायिक और अत्याचारी थे, इन्होंने गैर-मुसलमानों को निशाना बनाया, लूटपाट मचाई और हत्या तथा बलात्कार पर उतारू हो गए।
विलय। 1948 के सितंबर में भारतीय सेना निज़ाम के सैनिकों पर काबू पाने हैदराबाद पहुँची। कुछ रोज़ रुक-रुक कर लड़ाई चली, फिर निज़ाम ने आत्मसमर्पण कर दिया और हैदराबाद का भारत में विलय हो गया।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. देसी रजवाड़ों की चर्चा से कौन-सी तीन बातें सामने आती हैं?

उत्तर: पहली। अधिकतर रजवाड़ों के लोग भारतीय संघ में शामिल होना चाहते थे। यानी विलय केवल ऊपर से थोपा गया फ़ैसला नहीं था, उसके पीछे जनता की इच्छा थी।
दूसरी। भारत सरकार का रुख लचीला था और वह कुछ इलाकों को स्वायत्तता देने के लिए तैयार थी, जैसा कि जम्मू-कश्मीर में हुआ। यह रुख सरकार ने विभिन्नताओं को सम्मान देने और विभिन्न क्षेत्रों की माँगों को संतुष्ट करने के लिए अपनाया था।
तीसरी। विभाजन की पृष्ठभूमि में विभिन्न इलाकों के सीमांकन के सवाल पर खींचतान ज़ोर पकड़ रही थी, और ऐसे में देश की क्षेत्रीय अखंडता तथा एकता का सवाल सबसे ज़्यादा अहम हो उठा था।
इन तीनों बातों को जोड़कर देखें तो विलय का काम बलप्रयोग भर नहीं था; इसमें जनता की इच्छा, सरकार का लचीलापन और एकता की तात्कालिक ज़रूरत, तीनों की भूमिका थी।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. भाषावार राज्यों के पुनर्गठन के क्या नतीजे निकले?

उत्तर: आशंका ग़लत निकली। आशंका थी कि नए भाषाई राज्यों में अलगाववाद की भावना पनपेगी और नव-निर्मित भारतीय राष्ट्र पर दबाव बढ़ेगा। बहुतों की इस आशंका के विपरीत इससे देश नहीं टूटा, बल्कि देश की एकता और ज़्यादा मज़बूत हुई।
लोकतांत्रिक राजनीति बदली। भाषाई राज्य और इनके गठन के लिए चले आंदोलनों ने लोकतांत्रिक राजनीति तथा नेतृत्व की प्रकृति को बुनियादी रूपों में बदल दिया।
भागीदारी का दायरा बढ़ा। राजनीति और सत्ता में भागीदारी का रास्ता अब एक छोटे-से अंग्रेजीभाषी अभिजात तबके के लिए ही नहीं, बाकियों के लिए भी खुल गया। सीमांकन के लिए एक समरूप आधार भी मिला।
विभिन्नता को स्वीकृति। सबसे बड़ी बात यह कि पुनर्गठन से विभिन्नता के सिद्धांत को स्वीकृति मिली। भारत के लोकतांत्रिक होने का अर्थ केवल संविधान और चुनाव नहीं, बल्कि विभिन्नताओं को पहचानना और स्वीकार करना भी है।
बहुलता की धारणा। किताब के शब्दों में, भारत में लोकतंत्र की धारणा विचारों और जीवन-पद्धतियों की बहुलता की धारणा से जुड़ी हुई थी, यह मानकर चलते हुए कि विभिन्नताओं में आपसी विरोध भी हो सकते हैं।

प्रश्न 8 (4 अंक)

प्र. 1956 के बाद बने नए राज्यों का ब्योरा दीजिए।

उत्तर: पश्चिम। द्विभाषी राज्य बंबई का प्रयोग किया गया, जिसमें गुजराती और मराठी भाषा बोलने वाले लोग थे। एक जन-आंदोलन के बाद सन् 1960 में महाराष्ट्र और गुजरात राज्य बनाए गए।
उत्तर। पंजाब में हिन्दी-भाषी और पंजाबी-भाषी दो समुदाय थे। पंजाबी-भाषी लोगों की अलग राज्य की माँग 1956 में नहीं मानी गई; दस साल बाद 1966 में पंजाबी-भाषी इलाके को पंजाब राज्य का दर्ज़ा मिला और वृहत्तर पंजाब से अलग करके हरियाणा तथा हिमाचल प्रदेश बने।
पूर्वोत्तर। 1972 में असम से अलग करके मेघालय बनाया गया और उसी साल मणिपुर तथा त्रिपुरा भी अलग राज्य बने। मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश 1987 में वजूद में आए, जबकि नगालैंड इससे कहीं पहले 1963 में ही राज्य बन गया था।
बाद के राज्य। क्षेत्रीय संस्कृति और क्षेत्रीय असंतुलन के आधार पर छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड सन् 2000 में बने और 2 जून 2014 को तेलंगाना जुड़ा। महाराष्ट्र में विदर्भ, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हरित प्रदेश और पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग में ऐसे आंदोलन अब भी चल रहे हैं।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. आज़ादी के समय भारत के सामने खड़ी तीन चुनौतियों की विस्तार से व्याख्या कीजिए।

उत्तर: 1. एकता और विविधता की चुनौती
यह पहली और तात्कालिक चुनौती थी: एकता के सूत्र में बँधे ऐसे भारत को गढ़ना जिसमें भारतीय समाज की सारी विविधताओं के लिए जगह हो। भारत अपने आकार और विविधता में किसी महादेश के बराबर था; यहाँ अलग-अलग बोली बोलने वाले, अलग संस्कृति और अलग-अलग धर्मों के अनुयायी लोग थे। उस वक्त आमतौर पर यही माना जा रहा था कि इतनी विविधताओं से भरा कोई देश ज़्यादा दिनों तक एकजुट नहीं रह सकता, और विभाजन ने इस आशंका को एक तरह से सच साबित कर दिया था। सवाल तीखे थे: क्या भारत एक रह पाएगा? क्या इसके लिए बाकी उद्देश्यों को तिलांजलि देनी होगी? क्या हर क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय पहचान खारिज कर दी जाएगी? सबसे चुभता सवाल यह था कि भारत की क्षेत्रीय अखंडता कैसे हासिल की जाए।
2. लोकतंत्र कायम करने की चुनौती
संविधान में मौलिक अधिकारों की गारंटी दी गई और हर नागरिक को मतदान का अधिकार दिया गया। भारत ने संसदीय शासन पर आधारित प्रतिनिधित्वमूलक लोकतंत्र अपनाया। इन विशेषताओं से यह तय हो गया कि राजनीतिक मुकाबले लोकतांत्रिक ढाँचे के भीतर होंगे। लेकिन किताब यह भी कहती है कि लोकतंत्र कायम करने के लिए लोकतांत्रिक संविधान ज़रूरी तो है, इतना भर काफ़ी नहीं होता। असली चुनौती यह भी थी कि संविधान से मेल खाते लोकतांत्रिक व्यवहार-बरताव चलन में आएँ।
3. सबके भले वाले विकास की चुनौती
तीसरी चुनौती ऐसे विकास की थी जिससे समूचे समाज का भला होता हो, न कि कुछ एक तबकों का। संविधान ने साफ़ कर दिया था कि सबके साथ समानता का बरताव किया जाए और सामाजिक रूप से वंचित तबकों तथा धार्मिक-सांस्कृतिक अल्पसंख्यक समुदायों को विशेष सुरक्षा दी जाए। ‘राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों’ के अंतर्गत लोक-कल्याण के लक्ष्य भी स्पष्ट कर दिए गए थे। इसके आगे असली चुनौती आर्थिक विकास तथा गरीबी के खात्मे के लिए कारगर नीतियाँ तैयार करने की थी।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. रजवाड़ों के विलय की समस्या क्या थी और सरकार ने उससे कैसे निपटा?

उत्तर: दो हिस्सों वाला ब्रिटिश इंडिया
एक हिस्से में ब्रिटिश प्रभुत्व वाले भारतीय प्रांत थे, जिन पर अंग्रेजी सरकार का सीधा नियंत्रण था; दूसरे हिस्से में देसी रजवाड़े थे, जिन पर राजाओं का शासन था और जिन्होंने ब्रिटिश-राज की सर्वोच्च सत्ता स्वीकार कर रखी थी। भारतीय साम्राज्य के एक-तिहाई हिस्से में रजवाड़े कायम थे और प्रत्येक चार भारतीयों में से एक किसी न किसी रजवाड़े की प्रजा था।
समस्या
आज़ादी के तुरंत पहले अंग्रेजी-शासन ने घोषणा की कि ब्रिटिश-प्रभुत्व की समाप्ति के साथ ही सभी 565 रजवाड़े कानूनी तौर पर आज़ाद हो जाएँगे और वे चाहें तो भारत या पाकिस्तान में शामिल हों, या अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखें। यह फ़ैसला प्रजा को नहीं, राजाओं को करना था। समस्या ने जल्दी ही तेवर दिखाए: सबसे पहले त्रावणकोर के राजा ने और अगले दिन हैदराबाद के निज़ाम ने आज़ाद रहने की घोषणा की, और भोपाल के नवाब जैसे कुछ शासक संविधान-सभा में शामिल नहीं होना चाहते थे। साफ़ था कि हिंदुस्तान कई छोटे-छोटे देशों में बँट सकता है। ऊपर से अधिकतर रजवाड़ों में शासन अलोकतांत्रिक रीति से चलता था और शासक प्रजा को लोकतांत्रिक अधिकार देने को तैयार नहीं थे।
सरकार का नज़रिया
अंतरिम सरकार ने इसके विरुद्ध कड़ा रुख अपनाया। माउंटबेटन योजना के तहत रियासतें भारत या पाकिस्तान में शामिल होने के लिए स्वतंत्र थीं। रजवाड़ों के शासकों को मनाने-समझाने में सरदार पटेल ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई और अधिकतर रजवाड़ों को भारतीय संघ में शामिल होने के लिए राजी कर लिया। काम कितना जटिल था, यह उदाहरण से समझा जा सकता है: आज के उड़ीसा में तब 26 और छत्तीसगढ़ में 15 छोटे-छोटे रजवाड़े थे, और सौराष्ट्र में 14 बड़े तथा 119 छोटे रजवाड़े थे।
नतीजा
शांतिपूर्ण बातचीत के ज़रिए लगभग सभी रजवाड़े, जिनकी सीमाएँ आज़ाद हिंदुस्तान की नयी सीमाओं से मिलती थीं, 15 अगस्त 1947 से पहले ही भारतीय संघ में शामिल हो गए। अधिकतर शासकों ने ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन’ नाम के सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए। जूनागढ़, हैदराबाद, कश्मीर और मणिपुर का विलय बाकियों की तुलना में थोड़ा कठिन साबित हुआ।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की कहानी 1920 से 1956 तक कैसे आगे बढ़ी?

उत्तर: सिद्धांत की स्वीकृति (1920)
सन् 1920 में कांग्रेस का नागपुर अधिवेशन हुआ और इसके बाद से ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने यह सिद्धांत मान लिया था कि राज्यों का पुनर्गठन भाषा के आधार पर होगा। अनेक प्रांतीय कांग्रेस-समितियाँ भाषाई इलाके के आधार पर बनी थीं और वे ब्रिटिश इंडिया के प्रशासनिक विभाजन को अपने कामकाज में नहीं बरतती थीं।
आज़ादी के बाद झिझक
आज़ादी और बँटवारे के बाद स्थितियाँ बदलीं। नेताओं को चिंता हुई कि भाषा के आधार पर प्रांत बने तो अव्यवस्था फैल सकती है और देश टूटने का खतरा पैदा हो सकता है; यह भी लगा कि इससे दूसरी सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से ध्यान भटक सकता है। रजवाड़ों का मसला अभी हल नहीं हुआ था और बँटवारे की यादें ताज़ा थीं। इसलिए केंद्रीय नेतृत्व ने मसले को स्थगित करने का फ़ैसला किया।
चुनौती और आंदोलन
इस फ़ैसले को स्थानीय नेताओं और लोगों ने चुनौती दी। पुराने मद्रास प्रांत के तेलुगु-भाषी क्षेत्रों में विरोध भड़क उठा। विशाल आंध्र आंदोलन ने माँग की कि मद्रास प्रांत के तेलुगुभाषी इलाकों को अलग करके आंध्र प्रदेश बनाया जाए, और तेलुगु-भाषी क्षेत्र की लगभग सारी राजनीतिक शक्तियाँ इसके पक्ष में थीं।
पोट्टी श्रीरामुलु
केंद्र सरकार की दुविधा से आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा। कांग्रेस के नेता और दिग्गज गाँधीवादी पोट्टी श्रीरामुलु अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल पर बैठे और 56 दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई। बड़ी अव्यवस्था फैली, हिंसक घटनाएँ हुईं, पुलिस फायरिंग में लोग हताहत हुए और मद्रास में अनेक विधायकों ने इस्तीफ़ा दे दिया। आखिरकार 1952 के दिसंबर में प्रधानमंत्री ने आंध्र प्रदेश की घोषणा की।
आयोग और अधिनियम
आंध्र के गठन के साथ देश के दूसरे हिस्सों में भी यही संघर्ष चल पड़ा। इनसे बाध्य होकर केंद्र सरकार ने 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया, जिसका काम राज्यों के सीमांकन के मामले पर गौर करना था। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया कि राज्यों की सीमाओं का निर्धारण वहाँ बोली जाने वाली भाषा के आधार पर होना चाहिए। इसी रिपोर्ट के आधार पर 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम पास हुआ, जिससे 14 राज्य और 6 केंद्र-शासित प्रदेश बनाए गए।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. ‘विभाजन सिर्फ़ ज़मीन का बँटवारा नहीं था।’ इस कथन की व्याख्या कीजिए।

उत्तर: जो बँटा, वह ज़मीन से कहीं ज़्यादा था
वित्तीय संपदा के साथ-साथ टेबुल, कुर्सी, टाईपराइटर और पुलिस के वाद्ययंत्रों तक का बँटवारा हुआ। सरकारी और रेलवे के कर्मचारियों का भी बँटवारा हुआ। इस तरह ‘विभाजन’ में सिर्फ़ संपदा, देनदारी और परिसंपत्तियों का ही बँटवारा नहीं हुआ।
समुदायों का हिंसक अलगाव
इस विभाजन में दो समुदाय, जो अब तक पड़ोसियों की तरह रहते आ रहे थे, हिंसक अलगाव का शिकार हुए। जिन इलाकों में ज़्यादातर हिंदू या सिख आबादी थी वहाँ मुसलमानों ने जाना छोड़ दिया, और मुस्लिम-बहुल इलाकों से हिंदू तथा सिख नहीं गुजरते थे।
लोगों के भीतर का बँटवारा
विभाजन की विपदा का जिक्र करते हुए रचनाकारों ने अकसर वही जुमला इस्तेमाल किया जो इसे झेलने वालों ने किया: उन सबके लिए बँटवारे का मतलब था ‘दिल के दो टुकड़े हो जाना’।
अपने ही घर में विदेशी
सीमा के दोनों तरफ़ अल्पसंख्यकों ने पाया कि वे अपने ही घर में विदेशी बन गए हैं। जिस ज़मीन पर वे और उनके पुरखे सदियों से आबाद रहे, उसी पर वे ‘विदेशी’ कहलाए। उन्हें अकसर कुछ घंटों की सूचना पर घर छोड़ना पड़ा।
एक विचार पर चोट
सबसे गहरा मुद्दा यह था कि विभाजन धर्म के आधार पर हुआ, जबकि भारत के नेता द्वि-राष्ट्र सिद्धांत में यकीन नहीं करते थे। इससे सवाल उठा कि भारत अपने मुसलमान नागरिकों तथा सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी और यहूदी अल्पसंख्यकों के साथ क्या बरताव करे। इसी सवाल का उत्तर धर्मनिरपेक्ष राज्य के आदर्श में खोजा गया, जिसकी अभिव्यक्ति भारतीय संविधान में हुई।
साहित्य और सिनेमा की गवाही
भारत और पाकिस्तान के लेखकों, कवियों और फ़िल्म-निर्माताओं ने इस मार-काट की नृशंसता का जिक्र किया: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की ‘सुब्ह-ए-आज़ादी’, अमृता प्रीतम की ‘वारिस शाह से!’, सआदत हसन मंटो की कहानियाँ और एम.एस. सथ्यु की फ़िल्म ‘गर्म हवा’ इसी अनुभव को दर्ज करती हैं।

प्रश्न 5 (6 अंक)

प्र. ‘राष्ट्र एक कल्पित समुदाय होता है।’ इस कसौटी पर भारत एक राष्ट्र क्यों है? अध्याय के आधार पर उत्तर दीजिए।

उत्तर: साझा इतिहास और साझी नियति
अध्याय कहता है कि भारत ने एक राष्ट्र के रूप में अपने को एक साझे इतिहास तथा साझी नियति के फ़लक पर गढ़ा। आज़ादी की लंबी लड़ाई का अनुभव पूरे देश का साझा अनुभव था।
साझी राजनीतिक आकांक्षा
आज़ादी की लड़ाई में कई आवाज़ें थीं, पर दो बातों पर सबकी सहमति थी: आज़ादी के बाद देश का शासन लोकतांत्रिक सरकार के जरिए चलेगा, और सरकार सबके भले के लिए काम करेगी, जिसमें गरीबों और कमज़ोरों का खास खयाल रखा जाएगा।
साझा संविधान और समान नागरिकता
संविधान ने मौलिक अधिकारों की गारंटी दी, हर नागरिक को मतदान का अधिकार दिया और संसदीय शासन पर आधारित प्रतिनिधित्वमूलक लोकतंत्र अपनाया। नागरिकता की कसौटी धर्म को नहीं बनाया गया, और नेतागण धर्मनिरपेक्ष राज्य के आदर्श के हिमायती थे।
विविधता को जगह देने वाली एकता
भारत आकार और विविधता में किसी महादेश के बराबर था, इसलिए एकता का मतलब एकरूपता नहीं हो सकता था। भाषावार राज्यों के पुनर्गठन ने यही स्वीकार किया, और उससे विभिन्नता के सिद्धांत को स्वीकृति मिली। लोकतंत्र को चुनने का अर्थ था विभिन्नताओं को पहचानना और स्वीकार करना, यह मानकर चलते हुए कि विभिन्नताओं में आपसी विरोध भी हो सकते हैं।
साझा भू-भाग और क्षेत्रीय अखंडता
रजवाड़ों के विलय ने बिखरे हुए भू-भाग को एक संघ में जोड़ा। जनता की इच्छा, सरकार का लचीलापन और क्षेत्रीय अखंडता का सवाल, तीनों ने मिलकर इस काम को पूरा किया।
नतीजा
बहुतों की आशंका के विपरीत देश टूटा नहीं, एकता और मज़बूत हुई। यही अध्याय का निष्कर्ष है कि भारत की एकता विविधता को खारिज करके नहीं, उसे स्वीकार करके बनी है।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
किताब रजवाड़ों की समस्या इन शब्दों में रखती है: ‘‘आज़ादी के तुरंत पहले अंग्रेजी-शासन ने घोषणा की कि भारत पर ब्रिटिश-प्रभुत्व के साथ ही रजवाड़े भी ब्रिटिश-अधीनता से आज़ाद हो जाएँगे। इसका मतलब यह था कि सभी रजवाड़े (रजवाड़ों की संख्या 565 थी) ब्रिटिश-राज की समाप्ति के साथ ही कानूनी तौर पर आज़ाद हो जाएँगे। अंग्रेजी-राज का नज़रिया यह था कि रजवाड़े अपनी मर्जी से चाहें तो भारत या पाकिस्तान में शामिल हो जाएँ या फिर अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाएँ रखें। भारत अथवा पाकिस्तान में शामिल होने या स्वतंत्र हैसियत बनाए रखने का फ़ैसला रजवाड़ों की प्रजा को नहीं करना था। यह फ़ैसला लेने का अधिकार राजाओं को दिया गया था।’’ इसी के साथ किताब बताती है कि सबसे पहले त्रावणकोर के राजा ने और अगले दिन हैदराबाद के निज़ाम ने अपने राज्य को आज़ाद रखने की घोषणा की।

(क) 1 अंक गद्यांश के अनुसार रजवाड़ों की संख्या कितनी थी?
उत्तर: 565।

(ख) 2 अंक गद्यांश के अनुसार विलय का फ़ैसला किसे करना था, और यह बात क्यों गंभीर थी?
उत्तर: यह फ़ैसला रजवाड़ों की प्रजा को नहीं करना था; यह अधिकार राजाओं को दिया गया था। यह इसलिए गंभीर था कि अधिकतर रजवाड़ों में शासन अलोकतांत्रिक रीति से चलता था और शासक अपनी प्रजा को लोकतांत्रिक अधिकार देने को तैयार नहीं थे, इसलिए राजाओं के फ़ैसले पर छोड़ने से अखंड भारत के अस्तित्व पर ही खतरा मँडराने लगा।

(ग) 3 अंक इस समस्या से भारत सरकार ने कैसे निपटा? तीन बिंदुओं में लिखिए।
उत्तर: पहला, अंतरिम सरकार ने देश के छोटे-बड़े टुकड़ों में बँट जाने की संभावना के विरुद्ध कड़ा रुख अपनाया; माउंटबेटन योजना के तहत रियासतें भारत या पाकिस्तान में शामिल होने के लिए स्वतंत्र थीं।
दूसरा, सरदार पटेल ने रजवाड़ों के शासकों को मनाने-समझाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई और अधिकतर रजवाड़ों को भारतीय संघ में शामिल होने के लिए राजी कर लिया; इसके लिए बड़ी चतुराई और युक्तिपूर्ण पहलकदमी की ज़रूरत थी।
तीसरा, सरकार का रुख लचीला रहा और वह कुछ इलाकों को स्वायत्तता देने के लिए तैयार थी, जैसा जम्मू-कश्मीर में हुआ। नतीजा यह कि शांतिपूर्ण बातचीत के ज़रिए लगभग सभी रजवाड़े, जिनकी सीमाएँ आज़ाद हिंदुस्तान की नयी सीमाओं से मिलती थीं, 15 अगस्त 1947 से पहले ही ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन’ पर हस्ताक्षर करके भारतीय संघ में शामिल हो गए।

केस स्टडी
किताब मणिपुर के विलय की कथा इस तरह बताती है: आज़ादी के चंद रोज़ पहले मणिपुर के महाराजा बोधचंद्र सिंह ने भारत सरकार के साथ भारतीय संघ में अपनी रियासत के विलय के एक सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। इसकी एवज में उन्हें यह आश्वासन दिया गया था कि मणिपुर की आंतरिक स्वायत्तता बरकरार रहेगी। जनमत के दबाव में महाराजा ने 1948 के जून में चुनाव करवाया और इस चुनाव के फलस्वरूप मणिपुर की रियासत में संवैधानिक राजतंत्र कायम हुआ। ‘‘मणिपुर भारत का पहला भाग है जहाँ सार्वभौम वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को अपनाकर चुनाव हुए।’’ मणिपुर की विधानसभा में भारत में विलय के सवाल पर गहरे मतभेद थे: मणिपुर की कांग्रेस चाहती थी कि रियासत को भारत में मिला दिया जाए, जबकि दूसरी राजनीतिक पार्टियाँ इसके खिलाफ थीं।

(क) 1 अंक महाराजा बोधचंद्र सिंह को हस्ताक्षर की एवज में क्या आश्वासन मिला था?
उत्तर: कि मणिपुर की आंतरिक स्वायत्तता बरकरार रहेगी।

(ख) 2 अंक 1948 के जून का चुनाव मणिपुर के लिए और भारत के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर: मणिपुर के लिए इसलिए कि इस चुनाव के फलस्वरूप रियासत में संवैधानिक राजतंत्र कायम हुआ। भारत के लिए इसलिए कि मणिपुर भारत का पहला भाग है जहाँ सार्वभौम वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को अपनाकर चुनाव हुए।

(ग) 3 अंक मणिपुर का विलय ‘बाकियों की तुलना में थोड़ा कठिन’ क्यों साबित हुआ? विलय आखिर कैसे हुआ?
उत्तर: कठिन इसलिए कि मणिपुर की विधानसभा में विलय के सवाल पर गहरे मतभेद थे। मणिपुर की कांग्रेस विलय के पक्ष में थी, जबकि दूसरी राजनीतिक पार्टियाँ इसके खिलाफ थीं। साथ ही महाराजा को पहले ही आंतरिक स्वायत्तता का आश्वासन दिया जा चुका था और अब वहाँ एक निर्वाचित विधानसभा मौजूद थी, इसलिए फ़ैसला अकेले महाराजा का नहीं रह गया था।
विलय इस तरह हुआ कि भारत सरकार ने महाराजा को राजी किया कि वे भारतीय संघ में शामिल होने के समझौते पर हस्ताक्षर कर दें, और 1949 के सितंबर में भारत सरकार को इसमें सफलता मिली। किताब जूनागढ़, हैदराबाद, कश्मीर और मणिपुर को ही वे चार रियासतें बताती है जिनका विलय बाकियों की तुलना में थोड़ा कठिन साबित हुआ।