कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 अध्याय 3 नियोजित विकास की राजनीति शॉर्ट नोट्स (Short Notes) हिंदी में

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परीक्षा से ठीक पहले के दोहराव के लिए इस अध्याय का निचोड़: उड़ीसा और पोस्को वाला उदाहरण, वामपंथ-दक्षिणपंथ, विकास की धारणाएँ और दो मॉडल, योजना आयोग तथा नीति आयोग, बॉम्बे प्लान, पहली और दूसरी पंचवर्षीय योजना, ‘केरल मॉडल’, और महालनोबिस तथा कुमारप्पा। हर तारीख़, हर नाम और हर बक्से की बात एक जगह। विस्तार से पढ़ने के लिए पूरे नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।

1 परिभाषाएँ और मुख्य शब्द

याद कर लेंपरिभाषा 1

नियोजन: विकास का एक खाका अथवा योजना, जिसे सरकार तैयार करती है। अध्याय के अनुसार मतभेदों के बावजूद एक बिंदु पर सभी सहमत थे कि विकास का काम निजी हाथों में नहीं सौंपा जा सकता।

याद कर लेंपरिभाषा 2

पंचवर्षीय योजना: वह दस्तावेज़ जिसमें भारत सरकार अगले पाँच सालों के लिए अपनी आमदनी और खर्च की योजना रखती थी। सोवियत संघ की तरह भारत के योजना आयोग ने भी यही विकल्प चुना।

याद कर लेंपरिभाषा 3

गैरयोजना-व्यय: बजट का वह हिस्सा जिसके अंतर्गत सालाना आधार पर दैनंदिन मदों पर खर्च करना था।

याद कर लेंपरिभाषा 4

योजना-व्यय: बजट का वह हिस्सा जिसे योजना में तय की गई प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए पाँच साल की अवधि में खर्च करना था।

याद कर लेंपरिभाषा 5

वामपंथ: वे लोग जो अर्थव्यवस्था के राज्य नियंत्रण के पक्ष में हैं और मुक्त प्रतिस्पर्धा पर राज्य विनियमन को प्राथमिकता देते हैं।

याद कर लेंपरिभाषा 6

दक्षिणपंथ: वे लोग जो मानते हैं कि खुली प्रतिस्पर्धा और बाज़ारमूलक अर्थव्यवस्था के ज़रिए ही प्रगति हो सकती है, यानी सरकार को अर्थव्यवस्था में गैरज़रूरी हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

याद कर लेंपरिभाषा 7

आधुनिकीकरण: वह प्रक्रिया जिसमें पुरानी सामाजिक संरचना टूटती है और पूँजीवाद तथा उदारवाद का उदय होता है। इसे संवृद्धि, भौतिक प्रगति और वैज्ञानिक तर्कबुद्धि का पर्यायवाची माना जाता था।

याद कर लेंपरिभाषा 8

सहमति-पत्र: दो पक्षों के बीच हुआ वह समझौता जिस पर उड़ीसा सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय-स्तर के इस्पात-निर्माताओं के साथ हस्ताक्षर किए। प्रदर्शनकारियों की माँग इसी को रद्द करने की थी।

याद कर लेंपरिभाषा 9

विराम: 1966 में पंचवर्षीय योजना को थोड़ी देर के लिए रोक देने का फ़ैसला, क्योंकि नियोजन का नयापन मंद पड़ चुका था और भारत गहन आर्थिक संकट में था।

याद कर लेंपरिभाषा 10

विकेंद्रित नियोजन: वह नियोजन जो न केंद्रीकृत हो, न बड़े उद्योगों और बड़ी परियोजनाओं पर टिका हो। अध्याय इसका उदाहरण ‘केरल मॉडल’ को बताता है।

2 तारीख़ें जिनका घालमेल नहीं होना चाहिए

तारीख़ किस चीज़ की
1944 उद्योगपतियों का एकजुट होकर ‘बॉम्बे प्लान’ तैयार करना
मार्च 1950 योजना आयोग की स्थापना, एक सीधे-सादे प्रस्ताव के ज़रिए
1951 प्रथम पंचवर्षीय योजना का प्रारूप जारी
नवंबर 1951 प्रथम पंचवर्षीय योजना का वास्तविक दस्तावेज़ जारी (हिंदी संस्करण नवंबर कहता है)
1951-1956 प्रथम पंचवर्षीय योजना की अवधि
1956 दूसरी पंचवर्षीय योजना चालू; नियोजन की गहमागहमी अपने चरम पर
1961 तीसरी पंचवर्षीय योजना
1966 चौथी योजना चालू होनी थी; इसके बजाय विराम
1930 और 1940 के दशक सोवियत संघ की भारी कठिनाइयों के बीच शानदार आर्थिक प्रगति
1940 और 1950 के दशक नियोजन के विचार को पूरे विश्व में जनसमर्थन
1960 का दशक से 1970 के दशक के शुरुआती साल बचत की मात्रा में लगातार कमी
1987 से 1991 केरल का ‘नव लोकतांत्रिक पहल’ अभियान
1 जनवरी 2015 नीति आयोग का अस्तित्व में आना
1931 भारतीय सांख्यिकी संस्थान की स्थापना (महालनोबिस)
1893-1972 / 1892-1960 पी.सी. महालनोबिस / जे.सी. कुमारप्पा
23 जून, 2006 ‘द हिंदू’ में छपी पोस्को विरोध की ख़बर

3 उड़ीसा का उदाहरण: चार हित, एक टकराव

अध्याय की शुरुआत इसी से होती है। इस्पात की विश्वव्यापी माँग बढ़ी तो उड़ीसा निवेश के लिहाज़ से एक महत्त्वपूर्ण जगह के रूप में उभरा, क्योंकि वहाँ लौह-अयस्क का विशाल भंडार था और उसका दोहन बाकी था। राज्य सरकार ने इस माँग को भुनाने के लिए सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए। लेकिन भंडार राज्य के सर्वाधिक अविकसित और आदिवासी-बहुल इलाकों में हैं।

पक्ष उसका हित या डर
उड़ीसा की राज्य सरकार ज़रूरी पूँजी-निवेश और बड़ी संख्या में रोज़गार के अवसर
आदिवासी घर-बार से विस्थापन और आजीविका छिन जाने का डर
पर्यावरणविद् खनन और उद्योग से पर्यावरण के प्रदूषित होने का भय
केंद्र सरकार अनुमति न देने से बुरी मिसाल कायम होगी और देश में पूँजी निवेश को बाधा पहुँचेगी

अध्याय का असली सवाल: उड़ीसा में किस तरह के विकास की ज़रूरत है, और किसकी ज़रूरतों को उड़ीसा की ज़रूरत कहा जाए?

बक्सा: ‘द हिंदू’ की ख़बर, 23 जून 2006

भुवनेश्वर से कार्यालय संवाददाता की रिपोर्ट। जगतसिंहपुर जिले में प्रस्तावित पोस्को-इंडिया इस्पात संयंत्र से विस्थापन का शिकार हुए लोगों ने इस कोरियाई कंपनी के दफ़्तर के सामने गुरुवार को विरोध प्रदर्शन किया। माँग यह थी कि एक साल पहले कंपनी और उड़ीसा सरकार के बीच हुए सहमति पत्र को रद्द किया जाए। धिंकिया, नुआंगाँव और गढ़कुजंगा ग्राम पंचायत के एक सौ से भी ज़्यादा स्त्री-पुरुषों ने दफ़्तर में घुसने की कोशिश की, पुलिस ने रोक दिया। नारा यह था कि हमारी जीविका और जीवन की कीमत पर कंपनी को संयंत्र लगाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। आयोजन राष्ट्रीय युवा संगठन और नवनिर्माण समिति ने किया था।

परीक्षा-संकेत: जगतसिंहपुर जिला है, ग्राम पंचायत नहीं। तीन ग्राम पंचायतों के नाम अलग हैं।

4 राजनीतिक टकराव: फ़ैसला विशेषज्ञ का नहीं, जनता का

  • इन सवालों के जवाब कोई विशेषज्ञ नहीं दे सकता।
  • ऐसे फ़ैसलों में एक सामाजिक-समूह के हितों को दूसरे सामाजिक-समूह के हितों की तुलना में तौला जाता है।
  • साथ ही मौजूदा पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी के हितों को भी लाभ-हानि की तुला पर मापना पड़ता है।
  • किसी भी लोकतंत्र में ऐसे फ़ैसले जनता द्वारा लिए जाने चाहिए, या कम-से-कम उन पर विशेषज्ञों की स्वीकृति की मुहर ज़रूर होनी चाहिए।
  • खनन, पर्यावरण और अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों की राय जानना महत्त्वपूर्ण है, लेकिन अंतिम निर्णय राजनीतिक निर्णय होना चाहिए, जो जन-प्रतिनिधि लें, क्योंकि वे जनता की भावनाओं को समझते हैं।
बक्सा: क्या है वामपंथ और क्या है दक्षिणपंथ?

ये शब्द बताते हैं कि कोई दल या समूह सामाजिक बदलाव को लेकर कौन-सा पक्ष लेगा और आर्थिक पुनर्वितरण में राज्य की भूमिका पर उसकी क्या राय होगी। ‘वामपंथ’ अर्थव्यवस्था के राज्य नियंत्रण के पक्ष में है; ‘दक्षिणपंथ’ खुली प्रतिस्पर्धा और बाज़ारमूलक अर्थव्यवस्था के। बक्सा विद्यार्थी से यह भी पूछता है कि 1960 के दशक में कौन-से दल वामपंथी और कौन-से दक्षिणपंथी थे, और उस दौर की कांग्रेस पार्टी को वह किस तरफ़ रखेगा।

5 विकास की धारणाएँ और दो मॉडल

  • यह कह देने भर से बात नहीं बनती कि हर कोई विकास चाहता है। ‘विकास’ के अर्थ अलग-अलग तबकों के लिए अलग-अलग होते हैं: इस्पात-संयंत्र लगाने वाले उद्योगपति, इस्पात के शहरी उपभोक्ता और प्रस्तावित इलाके के आदिवासी के लिए।
  • इसी कारण ‘विकास’ से जुड़ी कोई भी चर्चा विवादों से परे नहीं होती।
  • पहले दशक में ‘पश्चिम’ को विकास का पैमाना माना जाता था। विकास = आधुनिक होना, और आधुनिक = पश्चिमी औद्योगिक देशों की तरह होना।
  • माना जाता था कि हर देश को आधुनिकीकरण की उसी प्रक्रिया से गुज़रना होगा जिसमें पुरानी सामाजिक संरचना टूटी और पूँजीवाद तथा उदारवाद का उदय हुआ।
  • इसी धारणा से देशों को विकसित, विकासशील अथवा अविकसित बताने का चलन आया।
मॉडल कहाँ अपनाया गया भारत में कौन प्रभावित
उदारवादी-पूँजीवादी यूरोप के अधिकतर हिस्से और संयुक्त राज्य अमरीका अमरीकी तर्ज़ के पैरोकार बहुत कम थे
समाजवादी सोवियत संघ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी, और कांग्रेस में नेहरू तक
आज़ादी के आंदोलन से चली आई सहमति

आज़ाद भारत की सरकार के आर्थिक सरोकार अंग्रेजी हुकूमत के संकुचित व्यापारिक हितों से एकदम अलग होंगे, और गरीबी मिटाने तथा सामाजिक-आर्थिक पुनर्वितरण का मुख्य जिम्मा सरकार का होगा। बहस सिर्फ़ इस पर थी कि रास्ता औद्योगीकरण हो या कृषि का विकास और ग्रामीण गरीबी दूर करना।

हाशिये के सवाल जो किताब खुद पूछती है

‘क्या आप यह कह रहे हैं कि ‘आधुनिक’ बनने के लिए ‘पश्चिमी’ होना ज़रूरी नहीं है? क्या यह संभव है?’ और योजना आयोग वाले पन्ने पर: ‘क्या योजना आयोग ने इन उद्देश्यों पर अमल किया है?’ ये दोनों सवाल परीक्षा में मत-आधारित प्रश्न के रूप में आ सकते हैं।

6 तीन सवाल जिन पर सहमति नहीं बनी

सहमति यह थी कि विकास का अर्थ आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक-सामाजिक न्याय दोनों है, कि यह मामला व्यवसायी, उद्योगपति और किसानों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, और कि सरकार को प्रमुख भूमिका निभानी है। मतभेद इन तीन सवालों पर था:

  1. क्या कोई ऐसा केंद्रीय संगठन ज़रूरी है जो पूरे देश के लिए योजना बनाए?
  2. क्या सरकार को कुछ महत्त्वपूर्ण उद्योग और व्यवसाय खुद चलाने चाहिए?
  3. अगर सामाजिक न्याय आर्थिक संवृद्धि की ज़रूरतों के आड़े आता हो, तो सामाजिक न्याय पर कितना ज़ोर देना उचित होगा?

किताब का अपना निष्कर्ष: इनमें से प्रत्येक सवाल पर टकराव हुए जो आज तक जारी हैं।

7 योजना आयोग और नीति आयोग

बक्सा: योजना आयोग

पिछले साल की किताब ‘भारतीय संविधान: सिद्धांत और व्यवहार’ में योजना आयोग का ज़िक्र कहीं नहीं है, क्योंकि यह संविधान द्वारा स्थापित बाकी आयोगों या निकायों की तरह नहीं है। स्थापना मार्च 1950 में, भारत सरकार के एक सीधे-सादे प्रस्ताव से। यह सलाहकार की भूमिका निभाता है और इसकी सिफारिशें तभी प्रभावकारी होती हैं जब मंत्रिमंडल उन्हें मंजूर करे। प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष बने।

प्रस्ताव में मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक तत्वों का हवाला देकर तीन बातें गिनाई गईं, कि राज्य अपनी नीतियाँ इस तरह बनाएगा कि:

(क) स्त्री और पुरुष, सभी नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधनों का बराबर-बराबर अधिकार हो;
(ख) समुदाय के भौतिक संसाधनों की मिल्कियत और नियंत्रण को इस तरह बाँटा जाएगा कि उससे सर्वसामान्य की भलाई हो; और
(ग) अर्थव्यवस्था का संचालन इस तरह नहीं किया जाएगा कि धन अथवा उत्पादन के साधन एकाध जगह केंद्रित हो जाएँ और जनसामान्य की भलाई बाधित हो।

बक्सा: कुछ आगे की… नीति आयोग

भारत सरकार ने योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था) की स्थापना की। यह 1 जनवरी 2015 को अस्तित्व में आई। किताब इसके उद्देश्य और संरचना जानने के लिए वेबसाइट http://niti.gov.in देखने को कहती है।

8 नियोजन कहाँ से आया: बॉम्बे प्लान और दुनिया के तीन सबक

1940 और 1950 के दशक में नियोजन के विचार को पूरे विश्व में जनसमर्थन मिला। किताब तीन कारण गिनाती है:

  1. यूरोप ‘महामंदी’ का शिकार होकर कुछ सबक सीख चुका था;
  2. जापान और जर्मनी ने युद्ध की विभीषिका झेलने के बाद अपनी अर्थव्यवस्था फिर खड़ी कर ली थी;
  3. सोवियत संघ ने 1930 तथा 1940 के दशक में भारी कठिनाइयों के बीच शानदार आर्थिक प्रगति की थी।
बॉम्बे प्लान का उलटफेर

आमतौर पर माना जाता है कि निजी निवेशक नियोजन के पक्ष में नहीं होते और खुली अर्थव्यवस्था चाहते हैं। भारत में ऐसा नहीं हुआ। 1944 में उद्योगपतियों का एक तबका एकजुट हुआ और उसने नियोजित अर्थव्यवस्था चलाने का संयुक्त प्रस्ताव तैयार किया, जिसे ‘बॉम्बे प्लान’ कहते हैं। इसकी मंशा थी कि सरकार औद्योगिक तथा अन्य आर्थिक निवेश के क्षेत्र में बड़े कदम उठाए। इसीलिए किताब कहती है कि चाहे दक्षिणपंथी हों अथवा वामपंथी, उस वक्त सभी चाहते थे कि देश नियोजित अर्थव्यवस्था की राह पर चले। यानी योजना आयोग कोई आकस्मिक आविष्कार नहीं था।

9 पहली और दूसरी पंचवर्षीय योजना

पहलू प्रथम योजना (1951-1956) दूसरी योजना (1956 से)
मूलमंत्र धीरज तेज़ गति से संरचनात्मक बदलाव
मुख्य ज़ोर कृषि-क्षेत्र, बाँध और सिंचाई भारी उद्योग
प्रमुख नाम के.एन. राज पी.सी. महालनोबिस
परियोजना भाखड़ा-नांगल जैसी विशाल परियोजनाएँ बिजली, रेलवे, इस्पात, मशीनरी, संचार
व्यापार-नीति अलग से नहीं देसी उद्योगों के संरक्षण को आयात पर भारी शुल्क
बुनियादी मान्यता भूमि-सुधार देश के विकास की बुनियादी चीज़ औद्योगीकरण ने विकास को नया आयाम दिया
  • क्यों कृषि पर ज़ोर: विभाजन के कारण कृषि-क्षेत्र को गहरी मार लगी थी और उस पर तुरंत ध्यान देना ज़रूरी था। योजना ने माना कि भूमि के वितरण का मौजूदा ढर्रा कृषि के विकास की सबसे बड़ी बाधा है।
  • के.एन. राज की दलील: दो दशक तक चाल ‘धीमी’ रखनी चाहिए, क्योंकि तेज़ रफ़्तार विकास से अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचेगा।
  • बचत का हिसाब: लक्ष्य राष्ट्रीय आय बढ़ाना था, जो तभी संभव था जब बचत खर्च से ज़्यादा हो। खर्च का स्तर पहले ही बहुत नीचे था और पूँजी-भंडार रोज़गार के काबिल लोगों की तुलना में कम था। बचत तीसरी योजना तक बढ़ी पर उम्मीद से कम, और 1960 से 1970 के दशक के शुरुआती सालों तक लगातार घटी।

10 दूसरी योजना की क़ीमत और तीन आलोचनाएँ

  • भारत प्रौद्योगिकी के लिहाज़ से पिछड़ा था, इसलिए विश्व बाज़ार से प्रौद्योगिकी खरीदने में बहुमूल्य विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ी।
  • उद्योगों ने कृषि की अपेक्षा निवेश को ज़्यादा आकर्षित किया, इसलिए खाद्यान्न-संकट की आशंका बनी रही।
  • योजनाकारों को उद्योग और कृषि के बीच संतुलन साधने में भारी कठिनाई आई। तीसरी योजना दूसरी से कुछ खास अलग नहीं थी।
तीन आलोचनाएँ, अलग-अलग लोगों की

1. इस समय से योजना की रणनीतियों में सीधे-सीधे ‘शहरों’ की तरफ़दारी नज़र आती है।
2. कृषि की जगह उद्योग को प्राथमिकता देकर गलती की गई।
3. भारी उद्योगों की जगह कृषि-आधारित उद्योगों पर ज़ोर दिया जाना चाहिए था।

फिर भी किताब जोड़ती है कि विराम के वक्त तक भारत के आर्थिक विकास की बुनियाद पड़ चुकी थी।

11 ‘केरल मॉडल’: नियोजन का दूसरा रास्ता

बक्सा: विकेंद्रित नियोजन (यह बक्सा सिर्फ़ हिंदी संस्करण में है)

ज़रूरी नहीं कि हर नियोजन केंद्रीकृत ही हो, न ही नियोजन का मतलब हमेशा उद्योगों और बड़ी-बड़ी परियोजनाओं से लगाया जाए।

ज़ोर किन पाँच बातों पर: शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि-सुधार, कारगर खाद्य-वितरण और गरीबी-उन्मूलन।

विरोधाभास: केरल में प्रति व्यक्ति आय अपेक्षाकृत कम है और औद्योगिक-आधार तुलनात्मक रूप से कमज़ोर रहा है। इसके बावजूद वहाँ साक्षरता शत-प्रतिशत है, आयु प्रत्याशा बढ़ी है, तथा शिशु मृत्यु-दर, मातृ मृत्यु-दर और जन्म-दर कम है, और लोगों को कहीं ज़्यादा चिकित्सा-सुविधा मुहैया है।

‘नव लोकतांत्रिक पहल’: 1987 से 1991 के बीच चला अभियान, जिसके अंतर्गत विकास के अभियान चले, जिनमें विज्ञान और पर्यावरण के मामले में शत-प्रतिशत साक्षरता का अभियान शामिल है। रूपरेखा ऐसी थी कि लोग स्वयंसेवी नागरिक संगठनों के माध्यम से विकास की गतिविधियों में सीधे शामिल हो सकें। केरल में यह प्रयास भी हुआ कि लोग पंचायत, प्रखंड और जिला स्तर की योजनाओं को तैयार करने में शामिल हों।

12 दो जीवनियाँ, जो सीधे पूछी जा सकती हैं

पी.सी. महालनोबिस (1893-1972)

अंतरराष्ट्रीय स्तर के विख्यात वैज्ञानिक एवं सांख्यिकीविद्; भारतीय सांख्यिकी संस्थान (1931) के संस्थापक; दूसरी पंचवर्षीय योजना के योजनाकार; तीव्र औद्योगीकरण और सार्वजनिक क्षेत्र की सक्रिय भूमिका के समर्थक।

जे.सी. कुमारप्पा (1892-1960): यह बक्सा भी सिर्फ़ हिंदी संस्करण में है

असली नाम जे.सी. कॉर्नेलियस; अर्थशास्त्री एवं चार्टर्ड अकाउंटेंट; शिक्षा इंग्लैंड एवं अमेरिका में; महात्मा गाँधी के अनुयायी; गाँधीवादी आर्थिक नीतियों को लागू करने की कोशिश; ‘इकॉनोमी ऑफ परमानेंस’ के लेखक; योजना आयोग के सदस्य के रूप में योजना प्रक्रिया में हिस्सेदारी।

13 चित्र, कार्टून और आरेख जो किताब में हैं

  • डाक-टिकट वाला पहला पन्ना: आज़ादी के बाद के शुरुआती दो दशकों में आधुनिक भारत के निर्माण के प्रयास हुए और इसमें सार्वजनिक क्षेत्र की विकास परियोजनाओं की भूमिका मुख्य रही; ऐसे डाक-टिकट इसी की झलक हैं। किताब पूछती है: आजकल ऐसे डाक-टिकट कुछ खास देखने में नहीं आते, क्या आप सोच सकते हैं क्यों?
  • नेहरू की तस्वीर: ‘योजना आयोग के सदस्यों को संबोधित करते हुए नेहरू’, साभार हिंदुस्तान टाइम्स।
  • नैनन का कार्टून: ‘बड़े खुशकिस्मत हैं ये लोग कि हम जैसे लोग इनके लिए विकास योजना बना रहे हैं।’ यह उन योजनाकारों पर व्यंग्य है जो जनता से दूर बैठकर उसके लिए योजनाएँ बनाते हैं, यानी उसी बात पर जिसका जवाब विकेंद्रित नियोजन देता है।
  • दूसरा कार्टून: साभार सुधीर दर / यूएनडीपी एवं योजना आयोग।
  • दो दस्तावेज़ों की तस्वीरें: ‘प्रथम पंचवर्षीय योजना का प्रारूप’ और ‘दसवीं पंचवर्षीय योजना का दस्तावेज़’।
  • आरेख: ‘पहली और दूसरी पंचवर्षीय योजना में आबंटन (प्रतिशत में)’। इसके सात मद हैं: कृषि और सामुदायिक विकास; सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण; उद्योग और खनन; परिवहन और संचार; ऊर्जा; सामाजिक सेवाएँ (शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि); और अन्य। नीचे लिखा है ‘विकास के प्रमुख मद’।

14 प्रश्नावली के वे नाम जो अध्याय में नहीं हैं

यह जानना ज़रूरी है, वरना आप पन्ने ढूँढ़ते रह जाएँगे

यह 2022 में तर्कसंगत किया गया संस्करण है और अध्याय अब कुल 10 पृष्ठों का है। प्रश्नावली तब बदली नहीं गई, इसलिए उसमें ऐसे नाम रह गए जिनका ब्योरा अब पाठ में नहीं छपता:

प्रश्न 2 का विकल्प ‘सहकारी खेती’, और प्रश्न 4 के चरण सिंह, बिहार का अकाल, जोनिंग और वर्गीज कूरियन। इनमें से सिर्फ़ पी.सी. महालनोबिस और औद्योगीकरण वाला जोड़ा अध्याय के पाठ से निकलता है।

प्रश्न 4 का उत्तर याद कर लीजिए: चरण सिंह: किसान; पी.सी. महालनोबिस: औद्योगीकरण; बिहार का अकाल: जोनिंग; वर्गीज कूरियन: सहकारी डेयरी।

15 आख़िरी जाँच

अगर सिर्फ़ दस बातें याद रहें

1. तीसरी चुनौती आर्थिक विकास की थी, और इसमें सफलता एक सीमा तक ही मिली।
2. उड़ीसा का उदाहरण: चार हित आमने-सामने, और असली सवाल यह कि किसकी ज़रूरत को उड़ीसा की ज़रूरत कहा जाए।
3. अंतिम निर्णय राजनीतिक होना चाहिए, विशेषज्ञ की राय ज़रूरी है पर काफ़ी नहीं।
4. दो मॉडल: उदारवादी-पूँजीवादी और समाजवादी; भारत में सोवियत मॉडल के प्रशंसक ज़्यादा थे।
5. बॉम्बे प्लान 1944, उद्योगपतियों का ही प्रस्ताव, इसलिए नियोजन पर दक्षिणपंथी और वामपंथी दोनों सहमत।
6. योजना आयोग मार्च 1950, संविधान से नहीं बना, सलाहकार, अध्यक्ष प्रधानमंत्री; नीति आयोग 1 जनवरी 2015।
7. पहली योजना (1951-1956): धीरज, कृषि, भाखड़ा-नांगल, भूमि-सुधार, के.एन. राज।
8. दूसरी योजना (1956): भारी उद्योग, महालनोबिस, आयात पर भारी शुल्क, पाँच उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र में।
9. क़ीमत: विदेशी मुद्रा, खाद्यान्न-संकट की आशंका, और ‘शहरों’ की तरफ़दारी वाली आलोचना; 1966 में विराम।
10. ‘केरल मॉडल’ दिखाता है कि नियोजन विकेंद्रित भी हो सकता है, और कुमारप्पा का बक्सा गाँधीवादी अर्थनीति का रास्ता।

एक लाइन में पूरा अध्याय

आज़ादी के बाद भारत ने विकास का रास्ता नियोजन में खोजा, जिस पर दक्षिणपंथी से लेकर वामपंथी तक सहमत थे, और पहली योजना ने कृषि तथा दूसरी ने भारी उद्योग को चुना; पर विकास किसके लिए और किस कीमत पर हो, यह सवाल कभी हल नहीं हुआ, इसलिए विकास का हर बड़ा फ़ैसला आख़िरकार एक राजनीतिक फ़ैसला ही रहा।

प्रश्नावली के लिए दो चेतावनियाँ

1. प्रश्न 3 का उत्तर-अक्षर हिंदी में (ख) है। हिंदी और अंग्रेज़ी संस्करणों में विकल्पों का क्रम अलग छपा है, इसलिए अंग्रेज़ी की कुंजी देखकर (iii) या (ग) लिख देना सीधा नुकसान है। सही बात दोनों में एक ही है: बॉम्बे प्लान से और सोवियत खेमे के देशों के अनुभवों से।

2. प्रश्न 4 में हिंदी किताब सूची II को (i), (ii), (iii), (iv) से गिनाती है और सूची I को (क)(ख)(ग)(घ) से। उत्तर इन्हीं चिह्नों में लिखिए: क-(iii), ख-(i), ग-(ii), घ-(iv)।

16 CBSE 2026-27 संदर्भ सामग्री: नीति आयोग और राष्ट्रीय विकास परिषद

स्थिति: CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 में यह अतिरिक्त संदर्भ सामग्री के रूप में दिया गया है। पाठ्यक्रम के परिशिष्ट के अनुसार यह सामग्री कक्षा में पढ़ाने-समझाने के लिए है और बोर्ड परीक्षा में इसका मूल्यांकन नहीं होगा। इसे समझ के लिए पढ़ें; यह NCERT पुस्तक का भाग नहीं है।

नीति आयोग और राष्ट्रीय विकास परिषद
  • नीति आयोग: 15 अगस्त 2014 के स्वतंत्रता दिवस भाषण में प्रधानमंत्री ने योजना आयोग समाप्त करने की बात कही; 1 जनवरी 2015 को नीति आयोग बना।
  • प्रधानमंत्री पदेन अध्यक्ष, वही उपाध्यक्ष नियुक्त करते हैं; पहले उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया, पाठ्यक्रम के अनुसार वर्तमान उपाध्यक्ष सुमन बेरी।
  • केंद्र सरकार का थिंक टैंक; ‘नीचे से ऊपर’ (Bottom-Up) दृष्टिकोण, सहकारी संघवाद।
  • राष्ट्रीय विकास परिषद: विकास के विषयों की सर्वोच्च संस्था, अध्यक्षता प्रधानमंत्री; स्थापना 6 अगस्त 1952, नेहरू की अध्यक्षता में, पंचवर्षीय योजनाओं के समर्थन के लिए।
  • सदस्य: प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रिमंडल के मंत्री, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, केंद्रशासित प्रदेशों के प्रतिनिधि, नीति आयोग के सदस्य। उद्देश्य: राज्यों का सहयोग, संसाधन जुटाना, साझा आर्थिक नीतियाँ, संतुलित और तीव्र विकास।