इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. नेहरू की मृत्यु कब हुई और उनके बाद कौन प्रधानमंत्री बना?
उत्तर: 1964 के मई में नेहरू की मृत्यु हुई और उनके बाद लालबहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने।
प्र. ‘जय जवान-जय किसान’ का नारा किसने दिया और यह किस बात का संकेत था?
उत्तर: यह नारा लालबहादुर शास्त्री ने दिया। इससे युद्ध और खाद्यान्न संकट, इन दोनों चुनौतियों से निपटने के उनके दृढ़ संकल्प का पता चलता है।
प्र. 1960 के दशक को ‘खतरनाक दशक’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि उस दौर में गरीबी, गैर-बराबरी, सांप्रदायिक और क्षेत्रीय विभाजन जैसे सवाल अभी अनसुलझे थे और डर था कि इनसे लोकतंत्र की परियोजना असफल हो जाएगी या देश ही बिखर जाएगा।
प्र. ‘गैर-कांग्रेसवाद’ नाम किसने दिया और इसका क्या अर्थ था?
उत्तर: समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने। इसका अर्थ था कि कांग्रेस और उसकी नीतियों का विरोध करने के लिए अलग-अलग विचारधाराओं वाली पार्टियाँ एकजुट हो जाएँ।
प्र. ‘आया राम-गया राम’ का जुमला कैसे बना?
उत्तर: 1967 के चुनावों के बाद हरियाणा के विधायक गया लाल ने एक पखवाड़े में तीन दफ़ा पार्टी बदली। इसी पर कांग्रेस नेता राव वीरेन्द्र सिंह की चंडीगढ़ में की गई टिप्पणी से यह जुमला मशहूर हुआ।
प्र. ‘सिंडिकेट’ किसे कहा जाता था?
उत्तर: कांग्रेस के भीतर ताकतवर और प्रभावशाली नेताओं के उस समूह को, जिसका पार्टी के संगठन पर नियंत्रण था। इसे अनौपचारिक तौर पर ‘सिंडिकेट’ कहा जाता था।
प्र. 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस का आधिकारिक उम्मीदवार कौन था और जीता कौन?
उत्तर: कांग्रेस का आधिकारिक उम्मीदवार तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष एन. संजीव रेड्डी था, पर जीत स्वतंत्र उम्मीदवार वी.वी. गिरि की हुई।
प्र. ‘प्रिवी पर्स’ क्या थी?
उत्तर: रियासतों के विलय के समय की गई वह व्यवस्था, जिसके तहत भूतपूर्व शासक परिवार को निश्चित मात्रा में निजी संपदा रखने का अधिकार और सरकार की तरफ़ से कुछ विशेष भत्ते मिलते थे।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. नेहरू के बाद प्रधानमंत्री का सवाल किस तरह हल हुआ?
उत्तर: नेहरू की मृत्यु के बाद कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज ने पार्टी के नेताओं और सांसदों से सलाह-मशविरा किया और पाया कि सभी लालबहादुर शास्त्री के पक्ष में हैं। शास्त्री कांग्रेस संसदीय दल के निर्विरोध नेता चुने गए और इस तरह प्रधानमंत्री बने। यह सवाल इतनी आसानी से हल हुआ कि आलोचक ठगे-से रह गए।
प्र. 1966 में इंदिरा गाँधी किस तरह प्रधानमंत्री बनीं?
उत्तर: शास्त्री की मृत्यु के बाद मोरारजी देसाई और इंदिरा गाँधी के बीच कड़ा मुकाबला हुआ। पार्टी के बड़े नेताओं ने इंदिरा गाँधी को समर्थन देने का मन बनाया, पर उनके नाम पर सर्वसम्मति नहीं बन सकी। इसलिए कांग्रेस के सांसदों ने गुप्त मतदान किया, जिसमें दो-तिहाई से अधिक सांसदों का मत पाकर इंदिरा गाँधी ने मोरारजी देसाई को हरा दिया।
प्र. रुपये के अवमूल्यन के बारे में अध्याय क्या बताता है?
उत्तर: इंदिरा गाँधी की सरकार के शुरुआती फ़ैसलों में एक रुपये का अवमूल्यन करना था। माना गया कि यह अमरीका के दबाव में किया गया। पहले 1 अमरीकी डॉलर की कीमत 5 रुपये थी, जो बढ़कर 7 रुपये हो गई।
प्र. 1967 के चुनाव-परिणामों को ‘राजनीतिक भूकंप’ क्यों कहा गया?
उत्तर: क्योंकि कांग्रेस को जैसे-तैसे लोकसभा में बहुमत तो मिला, पर उसे प्राप्त मतों के प्रतिशत और सीटों की संख्या में भारी गिरावट आई। इससे पहले कांग्रेस को कभी न इतने कम वोट मिले थे, न इतनी कम सीटें। इंदिरा गाँधी के मंत्रिमंडल के आधे मंत्री तक चुनाव हार गए थे।
प्र. संयुक्त विधायक दल की सरकार क्या थी? दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर: 1967 में किसी पार्टी को बहुमत न मिलने पर अनेक गैर-कांग्रेसी पार्टियों ने एकजुट होकर संयुक्त विधायक दल बनाया और गैर-कांग्रेसी सरकारों को समर्थन दिया, इसलिए इन्हें संयुक्त विधायक दल की सरकार कहा गया। बिहार की सरकार में एसएसपी, पीएसपी, सीपीआई और जनसंघ शामिल थे। पंजाब की सरकार ‘पॉपुलर यूनाइटेड फ्रंट’ कहलाई, जिसमें अकाली दल के संत ग्रुप और मास्टर ग्रुप के साथ सीपीआई, सीपीआई (एम), एसएसपी, रिपब्लिकन पार्टी और भारतीय जनसंघ थे।
प्र. दल-बदल किसे कहते हैं और 1967 के बाद इसकी क्या भूमिका रही?
उत्तर: कोई जनप्रतिनिधि किसी खास दल के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़े और जीतने के बाद उस दल को छोड़कर दूसरे दल में शामिल हो जाए, तो इसे दल-बदल कहते हैं। 1967 के आम चुनावों के बाद कांग्रेस छोड़ने वाले विधायकों ने हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में गैर-कांग्रेसी सरकारों को बहाल करने में अहम भूमिका निभाई।
प्र. 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में ‘अंतरात्मा की आवाज़’ पर वोट डालने के आह्वान का क्या मतलब था?
उत्तर: इसका मतलब था कि कांग्रेस के सांसद और विधायक अपनी मनमर्ज़ी से किसी भी उम्मीदवार को वोट डाल सकते हैं। यह आह्वान इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस अध्यक्ष निजलिंगप्पा के उस ‘व्हिप’ के जवाब में किया, जिसमें सबको आधिकारिक उम्मीदवार संजीव रेड्डी को वोट डालने को कहा गया था।
प्र. मई 1967 के दस-सूत्री कार्यक्रम के कोई चार प्रावधान लिखिए।
उत्तर: बैंकों पर सामाजिक नियंत्रण, आम बीमा का राष्ट्रीयकरण, शहरी संपदा और आय का परिसीमन, तथा खाद्यान्न का सरकारी वितरण। इसके अलावा भूमि सुधार और ग्रामीण गरीबों को आवासीय भूखंड देने के प्रावधान भी इसमें थे।
प्र. कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (आर) में क्या अंतर था?
उत्तर: 1969 के नवंबर तक सिंडिकेट की अगुवाई वाले खेमे को कांग्रेस (ऑर्गनाइजेशन) यानी ‘पुरानी कांग्रेस’ कहा जाने लगा और इंदिरा गाँधी की अगुवाई वाले खेमे को कांग्रेस (रिक्विजिनिस्ट) यानी ‘नयी कांग्रेस’। सिंडिकेट के नेता और उनके प्रति निष्ठावान कांग्रेसी कांग्रेस (ओ) में रहे, जबकि लोकप्रियता की कसौटी पर कांग्रेस (आर) सफल रही।
प्र. 1971 का ‘ग्रैंड अलायंस’ क्या था और उसमें कौन-कौन से दल शामिल थे?
उत्तर: यह सभी बड़ी गैर-साम्यवादी और गैर-कांग्रेसी विपक्षी पार्टियों का चुनावी गठबंधन था। इसमें संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और भारतीय क्रांतिदल शामिल थे। इसके पास कोई सुसंगत राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. नेहरू की मृत्यु के समय भारत के सामने कौन-से अंदेशे खड़े थे?
उत्तर: पहला सवाल था ‘नेहरू के बाद कौन?’, यानी राजनीतिक उत्तराधिकारी कौन होगा।
दूसरा और ज़्यादा गंभीर सवाल था ‘नेहरू के बाद आखिर इस देश में होगा क्या?’
भारत से बाहर के बहुत लोगों को संदेह था कि यहाँ नेहरू के बाद लोकतंत्र कायम भी रह पाएगा या नहीं।
आशंका थी कि बाकी बहुत से नव-स्वतंत्र देशों की तरह भारत भी उत्तराधिकार का सवाल लोकतांत्रिक ढंग से हल नहीं कर पाएगा, और असफल रहने पर सेना राजनीतिक भूमिका में उतर आएगी।
यह भी संदेह था कि देश के सामने खड़ी बहुविध कठिनाइयों का समाधान नया नेतृत्व खोज पाएगा या नहीं। 1960 के दशक को इसीलिए ‘खतरनाक दशक’ कहा गया।
प्र. 1967 के चौथे आम चुनाव का आर्थिक और सामाजिक संदर्भ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: दो प्रधानमंत्रियों का जल्दी-जल्दी देहावसान हुआ था और नए प्रधानमंत्री को पद सँभाले एक साल भी नहीं हुआ था।
देश गंभीर आर्थिक संकट में था: मानसून की असफलता, व्यापक सूखा, खेती की पैदावार में गिरावट, गंभीर खाद्य संकट, विदेशी मुद्रा-भंडार में कमी, औद्योगिक उत्पादन और निर्यात में गिरावट, और सैन्य खर्चे में भारी बढ़ोतरी।
नियोजन और आर्थिक विकास के संसाधन सैन्य-मद में लगाने पड़े। रुपये का अवमूल्यन हुआ और 1 डॉलर की कीमत 5 रुपये से 7 रुपये हो गई।
कीमतों में तेज़ी से इजाफा हुआ, लोग बढ़ती बेरोजगारी और खाद्यान्न की कमी के खिलाफ़ विरोध पर उतर आए, और ‘बंद’ तथा ‘हड़ताल’ आम हो गए। सरकार ने इसे कानून-व्यवस्था की समस्या माना, जनता की बदहाली की अभिव्यक्ति नहीं, जिससे जन विरोध और उग्र हुआ।
साम्यवादी और समाजवादी पार्टियों ने व्यापक समानता के लिए संघर्ष छेड़ा, मार्क्सवादी-लेनिनवादी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने सशस्त्र कृषक-विद्रोह का नेतृत्व किया, और आज़ादी के बाद के सबसे गंभीर हिन्दू-मुस्लिम दंगे भी इसी अवधि में हुए।
प्र. गैर-कांग्रेसवाद की रणनीति क्या थी और राममनोहर लोहिया ने इसके पक्ष में क्या तर्क दिया?
उत्तर: कांग्रेस की विरोधी पार्टियों ने महसूस किया कि उनके वोट बँट जाने के कारण ही कांग्रेस सत्तासीन रहती है।
इसलिए कार्यक्रम और विचारधारा के धरातल पर एकदम अलग दल भी एकजुट हुए। कुछ राज्यों में उन्होंने कांग्रेस विरोधी मोर्चा बनाया और अन्य राज्यों में सीटों के मामले में चुनावी तालमेल किया।
इन दलों को लगा कि इंदिरा गाँधी की अनुभवहीनता और कांग्रेस की अंदरूनी उठापटक से उन्हें कांग्रेस को सत्ता से हटाने का अवसर हाथ लगा है।
समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने इस रणनीति को ‘गैर-कांग्रेसवाद’ का नाम दिया। उनका सैद्धांतिक तर्क था कि कांग्रेस का शासन अलोकतांत्रिक और गरीब लोगों के हितों के खिलाफ़ है, इसलिए गैर-कांग्रेसी दलों का एक साथ आना जरूरी है, ताकि गरीबों के हक में लोकतंत्र को वापस लाया जा सके।
प्र. 1967 के चुनाव-नतीजों ने राज्यों की राजनीति में क्या नाटकीय बदलाव लाया?
उत्तर: कांग्रेस को सात राज्यों में बहुमत नहीं मिला और दो अन्य राज्यों में दलबदल के कारण वह सरकार नहीं बना सकी, यानी कुल नौ राज्यों में उसके हाथ से सत्ता निकल गई।
ये राज्य देश के किसी एक भाग में नहीं थे: पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मद्रास और केरल।
मद्रास में क्षेत्रीय पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई। चुनावी इतिहास में यह पहली घटना थी जब किसी गैर-कांग्रेसी दल को किसी राज्य में पूर्ण बहुमत मिला। डीएमके हिंदी-विरोधी आंदोलन का नेतृत्व करके सत्ता में आई थी।
अन्य आठ राज्यों में गैर-कांग्रेसी दलों की गठबंधन सरकारें बनीं। उस समय कहा जाता था कि दिल्ली से हावड़ा जाने वाली ट्रेन अपने पूरे रास्ते में एक भी कांग्रेस-शासित राज्य से होकर नहीं गुज़रेगी।
प्र. इंदिरा गाँधी और सिंडिकेट के बीच टकराव किस तरह बढ़ा?
उत्तर: सिंडिकेट ने ही इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और उसे उम्मीद थी कि वे उसकी सलाहों पर अमल करेंगी।
पर इंदिरा गाँधी ने सरकार और पार्टी के भीतर खुद का मुकाम बनाना शुरू किया। उन्होंने अपने सलाहकारों और विश्वस्तों के समूह में पार्टी से बाहर के लोगों को रखा और धीरे-धीरे तथा बड़ी सावधानी से सिंडिकेट को हाशिए पर ला खड़ा किया।
उनके सामने दो चुनौतियाँ थीं: सिंडिकेट के प्रभाव से स्वतंत्र अपना मुकाम बनाना, और 1967 में खोयी ज़मीन वापस हासिल करना।
उन्होंने एक साधारण से सत्ता-संघर्ष को विचारधारात्मक संघर्ष में बदल दिया और सरकार की नीतियों को वामपंथी रंग देने के कदम उठाए। मई 1967 में कांग्रेस कार्यसमिति ने उनके प्रभाव से दस-सूत्री कार्यक्रम अपनाया। सिंडिकेट के नेताओं ने इसे औपचारिक स्वीकृति तो दी, पर उनके मन में गहरे संदेह थे।
प्र. ‘प्रिवी पर्स’ की समाप्ति किस तरह हुई?
उत्तर: रियासतों के विलय से पहले सरकार ने आश्वासन दिया था कि शासक परिवार को निश्चित निजी संपदा रखने का अधिकार और कुछ विशेष भत्ते मिलेंगे, जो विलय किए जाने वाले राज्य के विस्तार, राजस्व और क्षमता के आधार पर तय होंगे। इसी को ‘प्रिवी पर्स’ कहा गया।
ये वंशानुगत विशेषाधिकार संविधान में वर्णित समानता और सामाजिक-आर्थिक न्याय के सिद्धांतों से मेल नहीं खाते थे और नेहरू ने कई दफ़े इस पर असंतोष जताया था।
1967 के चुनावों के बाद इंदिरा गाँधी ने इसे खत्म करने की माँग का समर्थन किया, जबकि मोरारजी देसाई इसे नैतिक रूप से गलत और ‘रियासतों के साथ विश्वासघात’ के बराबर मानते थे।
1970 में संविधान संशोधन का प्रयास राज्यसभा में मंजूरी नहीं पा सका। फिर सरकार ने अध्यादेश जारी किया, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया। इंदिरा गाँधी ने इसे 1971 के चुनावों में बड़ा मुद्दा बनाया और भारी जीत के बाद संविधान में संशोधन होने से कानूनी अड़चनें खत्म हो गईं।
प्र. 1971 के चुनाव में इंदिरा गाँधी की रणनीति क्या थी?
उत्तर: चुनावी मुकाबला ऊपर से कांग्रेस (आर) के विपरीत लग रहा था, क्योंकि असली सांगठनिक ताकत कांग्रेस (ओ) के पास मानी जाती थी और विपक्ष ने ‘ग्रैंड अलायंस’ बना लिया था।
पर नयी कांग्रेस के पास एक मुद्दा, एक अजेंडा और कार्यक्रम था, जबकि ‘ग्रैंड अलायंस’ के पास कोई सुसंगत राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था।
इंदिरा गाँधी ने देश भर में घूमकर कहा कि विपक्षी गठबंधन के पास बस एक ही कार्यक्रम है, इंदिरा हटाओ। इसके विपरीत उन्होंने ‘गरीबी हटाओ’ का सकारात्मक कार्यक्रम रखा।
अभियान में उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र की संवृद्धि, ग्रामीण भू-स्वामित्व और शहरी संपदा के परिसीमन, आय तथा अवसरों की असमानता की समाप्ति और ‘प्रिवी पर्स’ की समाप्ति पर ज़ोर दिया।
इस नारे के सहारे उन्होंने भूमिहीन किसान, दलित और आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिला तथा बेरोज़गार नौजवानों के बीच अपने समर्थन का देशव्यापी आधार तैयार करने की कोशिश की। शासक दल ने सीपीआई के साथ गठजोड़ भी किया।
प्र. शास्त्री के प्रधानमंत्रित्व काल की चुनौतियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: शास्त्री 1964 से 1966 तक प्रधानमंत्री रहे, यानी बड़े कम दिनों तक, पर इसी छोटी अवधि में देश ने दो बड़ी चुनौतियों का सामना किया।
पहली, भारत-चीन युद्ध के कारण पैदा हुई आर्थिक कठिनाइयाँ, जिनसे उबरने की कोशिश देश कर रहा था।
दूसरी, मानसून की असफलता से पैदा हुआ सूखा, जिससे कई जगहों पर खाद्यान्न का गंभीर संकट आन पड़ा।
इनके ऊपर 1965 में पाकिस्तान के साथ भी युद्ध करना पड़ा। शास्त्री ने ‘जय जवान-जय किसान’ का नारा दिया, जिससे इन दोनों चुनौतियों से निपटने के उनके दृढ़ संकल्प का पता चलता है।
11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनका अचानक देहान्त हो गया। वे युद्ध की समाप्ति के सिलसिले में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद अयूब खान से बातचीत करने और समझौते पर हस्ताक्षर करने वहाँ गए थे।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. 1969 में कांग्रेस पार्टी किन मसलों को लेकर टूटी और इस टूट के क्या परिणाम रहे?
उत्तर: टकराव की जड़: इंदिरा गाँधी को असली चुनौती विपक्ष से नहीं, बल्कि खुद अपनी पार्टी के ‘सिंडिकेट’ से मिली। सिंडिकेट ने उन्हें प्रधानमंत्री बनवाया था और उम्मीद करता था कि वे उसकी सलाह मानेंगी, पर उन्होंने उसे धीरे-धीरे हाशिए पर ला खड़ा किया।
विचारधारा का मोड़: उन्होंने सत्ता-संघर्ष को विचारधारात्मक संघर्ष में बदला। मई 1967 में कार्यसमिति ने दस-सूत्री कार्यक्रम अपनाया, जिसे सिंडिकेट ने स्वीकृति तो दी पर गहरे संदेह के साथ।
राष्ट्रपति पद का चुनाव: ज़ाकिर हुसैन की मृत्यु से पद खाली हुआ। सिंडिकेट ने इंदिरा गाँधी की असहमति के बावजूद एन. संजीव रेड्डी को आधिकारिक उम्मीदवार बनवाया। इंदिरा गाँधी ने उपराष्ट्रपति वी.वी. गिरि को स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में खड़ा होने का बढ़ावा दिया।
दो और मुद्दे: उन्होंने चौदह अग्रणी बैंकों के राष्ट्रीयकरण और ‘प्रिवी पर्स’ की समाप्ति की घोषणा की। इन्हीं पर उपप्रधानमंत्री तथा वित्तमंत्री मोरारजी देसाई से गहरे मतभेद उभरे और उन्होंने सरकार से किनारा कर लिया।
व्हिप बनाम अंतरात्मा: कांग्रेस अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा ने ‘व्हिप’ जारी किया कि सभी सांसद और विधायक संजीव रेड्डी को वोट डालें। इंदिरा गाँधी ने खुलेआम ‘अंतरात्मा की आवाज़’ पर वोट डालने को कहा। आखिरकार वी.वी. गिरि जीते।
परिणाम: आधिकारिक उम्मीदवार की हार से पार्टी का टूटना तय हो गया। कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को पार्टी से निष्कासित कर दिया और इंदिरा गाँधी ने कहा कि उनकी पार्टी ही असली कांग्रेस है। 1969 के नवंबर तक सिंडिकेट का खेमा कांग्रेस (ऑर्गनाइजेशन) यानी ‘पुरानी कांग्रेस’ और इंदिरा गाँधी का खेमा कांग्रेस (रिक्विजिनिस्ट) यानी ‘नयी कांग्रेस’ कहा जाने लगा। इंदिरा गाँधी ने इस टूट को ‘समाजवादी’ और ‘पुरातनपंथी’ तथा गरीबों के हिमायती और अमीरों के तरफ़दार के बीच की लड़ाई करार दिया।
प्र. 1971 के चुनाव-परिणामों और उसके बाद की घटनाओं ने कांग्रेस के प्रभुत्व को किस तरह पुनर्स्थापित किया?
उत्तर: चुनाव तक की पृष्ठभूमि: टूट से इंदिरा गाँधी की सरकार अल्पमत में आ गई थी, पर डीएमके और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी समेत कुछ दलों के मुद्दा आधारित समर्थन से टिकी रही। इस दौर में सरकार ने अपनी छवि को सचेत रूप से समाजवादी रंग दिया, भूमि सुधार कानूनों के क्रियान्वयन का ज़बरदस्त अभियान चलाया और कुछ और भू-परिसीमन कानून बनवाए।
साहसिक कदम: दूसरे दलों पर निर्भरता खत्म करने और अपने कार्यक्रमों के पक्ष में जनादेश लेने के लिए सरकार ने 1970 के दिसंबर में लोकसभा भंग करने की सिफ़ारिश की। पाँचवें आम चुनाव 1971 के फ़रवरी में हुए।
नतीजे: कांग्रेस (आर) और सीपीआई के गठबंधन को लोकसभा की 375 सीटें और कुल 48.4 प्रतिशत वोट मिले, जो पिछले चार आम चुनावों में कांग्रेस को कभी नहीं मिले थे। अकेले कांग्रेस (आर) ने 352 सीटें और 44 प्रतिशत वोट पाए।
विपक्ष का हाल: कांग्रेस (ओ) को इंदिरा गाँधी की पार्टी के एक-चौथाई वोट और महज़ 16 सीटें मिलीं। ‘ग्रैंड अलायंस’ धराशायी हो गया और उसे 60 से भी कम सीटें मिलीं।
बांग्लादेश का असर: चुनावों के तुरंत बाद पूर्वी पाकिस्तान में राजनीतिक और सैन्य संकट उठा, भारत-पाक युद्ध हुआ और बांग्लादेश बना। इससे इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता में चार चाँद लग गए और विपक्ष के नेताओं तक ने उनके राज्यकौशल की प्रशंसा की।
दोहरी जीत: 1972 के राज्य विधानसभा चुनावों में भी पार्टी को व्यापक सफलता मिली। उन्हें गरीबों और वंचितों के रक्षक तथा मज़बूत राष्ट्रवादी नेता के रूप में देखा गया। इन दो लगातार जीतों के साथ कांग्रेस का दबदबा फिर कायम हुआ और वह लगभग सभी राज्यों में सत्ता में थी। महज चार साल में इंदिरा गाँधी ने अपने नेतृत्व और पार्टी के प्रभुत्व के सामने खड़ी चुनौतियों को धूल चटा दी।
प्र. “इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस प्रणाली को पुनर्स्थापित ज़रूर किया, लेकिन कांग्रेस-प्रणाली की प्रकृति को बदलकर।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: पुनर्जीवन नहीं, नयी रचना: इंदिरा गाँधी ने जो किया वह पुरानी कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का काम नहीं था। कई मामलों में यह पार्टी उनके हाथों नयी तर्ज़ पर बनी थी।
लोकप्रियता वही, किस्म अलग: इस पार्टी को लोकप्रियता के लिहाज़ से वही स्थान प्राप्त था जो उसे शुरुआती दौर में हासिल था, लेकिन यह अलग किस्म की पार्टी थी।
नेता पर निर्भरता: यह पार्टी पूर्णतया अपने सर्वोच्च नेता की लोकप्रियता पर आश्रित थी।
कमज़ोर संगठन: इसका सांगठनिक ढाँचा भी अपेक्षाकृत कमज़ोर था।
गुटों का अभाव: इस पार्टी के भीतर कई गुट नहीं थे, यानी अब वह विभिन्न मतों और हितों को एक साथ लेकर चलने वाली पार्टी नहीं थी।
सामाजिक आधार में बदलाव: इसने चुनाव जीते, पर इस जीत के लिए वह गरीब, महिला, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक जैसे कुछ सामाजिक वर्गों पर ज़्यादा निर्भर थी।
जो क्षमता खो गई: पुरानी कांग्रेस प्रणाली के भीतर हर तनाव और संघर्ष को पचा लेने की क्षमता थी और वह इसी खासियत के लिए जानी जाती थी। नयी कांग्रेस ज़्यादा लोकप्रिय होने के बावजूद इस क्षमता से हीन थी।
आगे का संकेत: कांग्रेस की पकड़ मज़बूत हुई और इंदिरा गाँधी की हैसियत अप्रत्याशित रूप से बढ़ी, पर जनता की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति की लोकतांत्रिक ज़मीन छोटी पड़ती गई। विकास और आर्थिक बदहाली के मुद्दों पर जनाक्रोश तथा लामबंदी लगातार बढ़ती रही, जिससे आगे चलकर एक राजनीतिक संकट उठ खड़ा हुआ।
प्र. 1967 के चुनावों को भारत के राजनीतिक और चुनावी इतिहास का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पड़ाव क्यों माना जाता है?
उत्तर: नेहरू के बिना पहला चुनाव: कांग्रेस पहली बार नेहरू के बिना मतदाताओं का सामना कर रही थी, और वह भी एक कम अनुभवी मानी जाने वाली प्रधानमंत्री के नेतृत्व में।
‘राजनीतिक भूकंप’: नतीजों से कांग्रेस को राष्ट्रीय और प्रांतीय, दोनों स्तरों पर गहरा धक्का लगा। लोकसभा में बहुमत जैसे-तैसे मिला, पर मत-प्रतिशत और सीटों में अब तक की सबसे बड़ी गिरावट आई और आधे मंत्री चुनाव हार गए। कामराज, एस.के. पाटिल, अतुल्य घोष और के.बी. सहाय जैसे दिग्गजों को मुँह की खानी पड़ी।
राज्यों में सत्ता-परिवर्तन: नौ राज्यों में कांग्रेस के हाथ से सत्ता निकल गई और ये राज्य देश के अलग-अलग हिस्सों में थे।
क्षेत्रीय दल का उभार: मद्रास में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम को पूर्ण बहुमत मिला। यह पहली बार था जब किसी गैर-कांग्रेसी दल को किसी राज्य में पूर्ण बहुमत मिला।
गठबंधन की परिघटना: 1967 से ही संयुक्त विधायक दल की सरकारों के रूप में गठबंधन की राजनीति सामने आई, जिसमें विचारधारा के लिहाज़ से एक-दूसरे से बहुत भिन्न दल साथ आए।
दल-बदल का दौर: राज्यों में सरकारों के बनने-बिगड़ने में दल-बदल की बड़ी भूमिका रही और ‘आया राम-गया राम’ का जुमला मशहूर हुआ। बाद में इसे रोकने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ा।
सबसे बड़ी बात: नतीजों ने साबित कर दिया कि कांग्रेस को चुनावों में हराया जा सकता है, हालाँकि उस वक्त भी कांग्रेस का कोई विकल्प मौजूद नहीं था।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक यह प्रसंग किस चुनाव का है और चोमू निर्वाचन क्षेत्र में कौन-से दो दल आमने-सामने थे?
उत्तर: यह 1967 के विधानसभा चुनावों का प्रसंग है और चोमू निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस तथा स्वतंत्र पार्टी आमने-सामने थे।
(ख) 2 अंक भीम सिंह ने गाँव में कौन-सा नया राजनीतिक समीकरण तैयार किया?
उत्तर: पंचायत का प्रधान बनने के बाद उसने अपनी जाति से आगे बढ़कर अन्य समुदायों के बीच भी जगह बना ली और राजपूतों के अलावा गैर-राजपूत समुदायों को जोड़कर एक नया समीकरण खड़ा किया। आस-पास के गाँवों में ग्राम प्रधान पद के कई उम्मीदवारों को समर्थन देने की घोषणा करके उसने एक गठबंधन-सा भी तैयार कर लिया था।
(ग) 2 अंक भीम सिंह मुख्यमंत्री सुखाड़िया के सुझाए उम्मीदवार के लिए काम करने को क्यों तैयार हो गया?
उत्तर: क्योंकि वह भलीभाँति जानता था कि अगर कांग्रेसी उम्मीदवार जीत जाता है तो उसका मंत्री बनना तय है, और उसके मंत्री बनने का अर्थ है कि भीम सिंह मंत्री से सीधे संपर्क स्थापित कर सकता है।
(घ) 4 अंक यह कथा स्थानीय राजनीति और दलगत राजनीति के रिश्ते के बारे में क्या बताती है?
उत्तर: यह बताती है कि राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर की दलगत प्रतिस्पर्धा गाँव की अपनी प्रतिस्पर्धा से अलग-थलग नहीं रहती। देवीसर में स्थानीय राजनीति का समीकरण कांग्रेस और स्वतंत्र पार्टी के चुनावी गणित से जा उलझा, और अंततः विधानसभा चुनाव चाचा-भतीजे की खेमेबाजी में बदल गया। दल अपने उम्मीदवार के लिए स्थानीय नेताओं का सहारा लेते हैं और स्थानीय नेता दलों के ज़रिए सत्ता तक अपनी पहुँच बनाते हैं।
(क) 2 अंक गद्यांश के अनुसार नयी कांग्रेस किन तीन बातों में पुरानी कांग्रेस से अलग थी?
उत्तर: पहली, वह पूर्णतया अपने सर्वोच्च नेता की लोकप्रियता पर आश्रित थी। दूसरी, उसका सांगठनिक ढाँचा अपेक्षाकृत कमज़ोर था। तीसरी, उसके भीतर कई गुट नहीं थे, यानी वह विभिन्न मतों और हितों को एक साथ लेकर चलने वाली पार्टी नहीं रह गई थी।
(ख) 2 अंक ‘हर तनाव और संघर्ष को पचा लेने की क्षमता’ से क्या आशय है और यह क्यों महत्त्वपूर्ण थी?
उत्तर: आशय यह है कि पुरानी कांग्रेस प्रणाली अपने भीतर अलग-अलग मतों, गुटों और हितों के टकराव को जगह देती थी और उन्हें पार्टी के भीतर ही सुलझा लेती थी। कांग्रेस प्रणाली इसी खासियत के लिए जानी जाती थी, क्योंकि इससे असहमति को बाहर सड़क पर जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। नयी कांग्रेस ज़्यादा लोकप्रिय होकर भी इस क्षमता से हीन थी।
(ग) 1 अंक गद्यांश के अनुसार नयी कांग्रेस अपनी जीत के लिए किन सामाजिक वर्गों पर निर्भर थी?
उत्तर: गरीब, महिला, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक वर्गों पर।
(घ) 4 अंक इस बदलाव का आगे चलकर क्या नतीजा निकला?
उत्तर: कांग्रेस ने अपनी पकड़ मज़बूत की और इंदिरा गाँधी की राजनीतिक हैसियत अप्रत्याशित रूप से बढ़ी, लेकिन जनता की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति की लोकतांत्रिक ज़मीन छोटी पड़ती गई। विकास और आर्थिक बदहाली के मुद्दों पर जनाक्रोश तथा लामबंदी लगातार बढ़ती रही, और इन्हीं बातों से आगे चलकर एक राजनीतिक संकट उठ खड़ा हुआ जिससे देश के संवैधानिक लोकतंत्र के अस्तित्व पर ही खतरा मँडराने लगा।