इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. नेल्सन मंडेला की आत्मकथा का नाम बताइए।
उत्तर: “लॉन्ग वॉक टू फ़्रीडम”।
प्र. आँग सान सू की की पुस्तक का शीर्षक क्या है?
उत्तर: “फ़्रीडम फ़्रॉम फ़ीयर” (भय से मुक्ति)।
प्र. “स्वराज” शब्द किन दो शब्दों से मिलकर बना है?
उत्तर: “स्व” (स्वयं) और “राज” (शासन)।
प्र. हानि सिद्धांत किस निबंध में प्रस्तुत किया गया?
उत्तर: जे.एस. मिल के निबंध “ऑन लिबर्टी” में।
प्र. नकारात्मक स्वतंत्रता का तर्क किस बात को स्पष्ट करता है?
उत्तर: यह कि व्यक्ति क्या करने से मुक्त है (अहस्तक्षेप का क्षेत्र)।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. स्वतंत्रता के दो पहलू संक्षेप में बताइए।
उत्तर: (1) व्यक्ति पर बाहरी प्रतिबंधों, नियंत्रण या दबाव का अभाव। (2) आत्म-अभिव्यक्ति और क्षमता-विकास के अवसरों का विस्तार।
प्र. तिलक और गांधी के स्वराज संबंधी कथन बताइए।
उत्तर: तिलक: “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।” गांधी: “जब हम स्वयं पर शासन करना सीखते हैं तभी स्वराज है।”
प्र. प्रतिबंधों के दो मुख्य स्रोत क्या हैं?
उत्तर: (1) प्रभुत्व और बाहरी नियंत्रण, जैसे औपनिवेशिक शासन या रंगभेद। (2) सामाजिक असमानता, जैसे जाति व्यवस्था या अत्यधिक आर्थिक असमानता।
प्र. स्वसंबद्ध और परसंबद्ध कार्यों में अंतर बताइए।
उत्तर: स्वसंबद्ध कार्यों का असर केवल कर्ता पर पड़ता है, राज्य को हस्तक्षेप की ज़रूरत नहीं। परसंबद्ध कार्यों का असर दूसरों पर भी पड़ता है, गंभीर हानि होने पर राज्य रोक सकता है।
प्र. “औचित्यपूर्ण प्रतिबंध” से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: ऐसा प्रतिबंध जो तर्कसंगत हो, अत्यधिक न हो, और जिस कार्य पर रोक लगाई जा रही है उसके अनुपात में हो। भारत में संवैधानिक चर्चाओं में ऐसी न्यायोचित सीमाओं के लिए इसी अर्थ में यह पद इस्तेमाल किया गया है।
प्र. उदारवाद की दो मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर: (1) सहनशीलता को मूल्य के रूप में महत्व। (2) व्यक्ति को केंद्र बिंदु मानना, परिवार-समुदाय का महत्व तभी जब व्यक्ति उन्हें महत्व दे।
प्र. छोटी और गंभीर हानि में मिल के अनुसार क्या अंतर है, उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर: छोटी हानि, जैसे ऊँची आवाज़ में संगीत बजाना, के लिए केवल सामाजिक असहमति काफ़ी है। गंभीर हानि, जैसे घृणा फैलाने वाला अभियान, पर क़ानूनी प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
प्र. परिधान संबंधी बहस के कोई दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर: माओ के शासनकाल में चीन में सभी को “माओ सूट” पहनना पड़ता था। सानिया मिर्ज़ा के विरुद्ध पहनावे को लेकर एक मौलवी द्वारा फ़तवा जारी किया गया।
प्र. नकारात्मक और सकारात्मक स्वतंत्रता के प्रश्न क्रमशः क्या हैं?
उत्तर: नकारात्मक स्वतंत्रता पूछती है, किस क्षेत्र का स्वामी मैं हूँ। सकारात्मक स्वतंत्रता पूछती है, मुझ पर शासन कौन करता है, जिसका आदर्श उत्तर है, मैं स्वयं पर शासन करता हूँ।
प्र. सकारात्मक स्वतंत्रता के लिए ज़रूरी तीन प्रकार की परिस्थितियाँ बताइए।
उत्तर: भौतिक, ग़रीबी-बेरोज़गारी से मुक्ति और ज़रूरी संसाधन। राजनीतिक, निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर। सामाजिक, शिक्षा व अन्य अवसरों तक पहुँच।
प्र. प्रतिबंधित की गई किन्हीं दो रचनाओं (पुस्तक, फ़िल्म या नाटक) के नाम बताइए।
उत्तर: सलमान रुश्दी की “द सेटानिक वर्सेस”, और औब्रे मेनन की “रामायण रिटोल्ड” (या “द लास्ट टेम्पटेशन ऑफ़ क्राइस्ट” फ़िल्म, अथवा “मी नाथूराम बोलते” नाटक)।
प्र. वाल्तेयर का प्रसिद्ध कथन क्या है, और वह किस संदर्भ में उद्धृत किया गया है?
उत्तर: “तुम जो कहते हो मैं उसका समर्थन नहीं करता, लेकिन मैं मरते दम तक तुम्हारे कहने के अधिकार का बचाव करूँगा।” यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के संदर्भ में उद्धृत किया गया है।
प्र. इंग्लैंड के राजपरिवार के उदाहरण से क्या प्रश्न उठता है?
उत्तर: राजपरिवार के लिए काम करने वाला व्यक्ति अनुबंध से बँधा होता है कि वह राजमहल की आंतरिक बातों पर न लिखे, नौकरी छोड़ने के बाद भी। प्रश्न उठता है कि क्या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अन्यायपूर्ण प्रतिबंध है, या स्वेच्छा से स्वीकृत शर्त होने के कारण यह स्वतंत्रता की कटौती नहीं मानी जाएगी।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. नेल्सन मंडेला और आँग सान सू की के संघर्षों की तुलना कीजिए और बताइए कि उनसे स्वतंत्रता के आदर्श के बारे में क्या पता चलता है।
उत्तर: नेल्सन मंडेला ने दक्षिण अफ़्रीका के रंगभेदी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया, जिसमें काले नागरिकों की मुक्त आवागमन और विवाह की स्वतंत्र पसंद जैसी बुनियादी स्वतंत्रताओं पर भी रोक थी, इसके लिए उन्होंने अपने जीवन के 27 वर्ष जेल में बिताए। आँग सान सू की म्यांमार में वर्षों तक नज़रबंद रहीं, अपने बच्चों से अलग; कैंसर से जूझ रहे पति से मिलने भी नहीं जा सकीं, क्योंकि सैनिक शासकों को डर था कि यदि वह पति से मिलने इंग्लैंड गईं तो उन्हें वापस म्यांमार लाना संभव नहीं होगा। दोनों ही उदाहरण दिखाते हैं कि स्वतंत्रता के लिए संघर्ष अक्सर भारी व्यक्तिगत क़ीमत माँगता है, और यह भी कि दोनों अपनी निजी स्वतंत्रता को अपने पूरे देश या समुदाय की स्वतंत्रता से अभिन्न रूप से जुड़ा मानते थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि स्वतंत्रता का आदर्श व्यक्तिगत होते हुए भी सामूहिक चरित्र रखता है, यही आदर्श भारत के राष्ट्रीय संघर्ष के केंद्र में भी रहा।
प्र. जे.एस. मिल के हानि सिद्धांत को स्पष्ट कीजिए। स्वसंबद्ध और परसंबद्ध कार्यों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर: जे.एस. मिल का हानि सिद्धांत कहता है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप का इकलौता औचित्यपूर्ण लक्ष्य आत्म-रक्षा है, यानी किसी अन्य को हानि से बचाना। इसके लिए मिल स्वसंबद्ध कार्यों, जिनका असर केवल कर्ता पर पड़ता है, जैसे अपने लिए कौन-से कपड़े पहनने हैं यह चुनना, और परसंबद्ध कार्यों, जिनका असर दूसरों पर भी पड़ता है, जैसे बहुमंज़िले भवन में इतनी ऊँची आवाज़ में संगीत बजाना कि पड़ोसी सो न पाएँ, में भेद करते हैं। स्वसंबद्ध कार्यों में राज्य या किसी बाहरी सत्ता को हस्तक्षेप की कोई ज़रूरत नहीं, जबकि परसंबद्ध कार्य पर तभी क़ानूनी रोक लगाई जानी चाहिए जब वह किसी निश्चित व्यक्ति को गंभीर हानि पहुँचाए, छोटी-मोटी असुविधा के लिए केवल सामाजिक असहमति काफ़ी है।
प्र. नकारात्मक और सकारात्मक स्वतंत्रता में अंतर स्पष्ट करते हुए बताइए कि ये कैसे एक-दूसरे का समर्थन करती हैं और कैसे इनका दुरुपयोग भी हो सकता है।
उत्तर: नकारात्मक स्वतंत्रता व्यक्ति के लिए एक अनुल्लंघनीय क्षेत्र परिभाषित करने का प्रयास करती है जिसमें कोई बाहरी सत्ता हस्तक्षेप न करे, यह पूछती है किस क्षेत्र का स्वामी मैं हूँ। सकारात्मक स्वतंत्रता व्यक्ति के विकास के लिए अनुकूल भौतिक, राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ बनाने से जुड़ी है, यह पूछती है मुझ पर शासन कौन करता है, जिसका आदर्श उत्तर है मैं स्वयं पर। सामान्यतः दोनों साथ चलती और एक-दूसरे का समर्थन करती हैं, क्योंकि व्यक्ति के विकास के लिए अहस्तक्षेप का क्षेत्र और अनुकूल परिस्थितियाँ दोनों चाहिए। पर कभी-कभी निरंकुश शासक सकारात्मक स्वतंत्रता के तर्क का दुरुपयोग करते हुए यह दावा करते हैं कि वे लोगों के असली हित में शासन कर रहे हैं, और इस बहाने व्यक्ति की नकारात्मक स्वतंत्रता, यानी अहस्तक्षेप का क्षेत्र, ही छीन लेते हैं।
प्र. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में जे.एस. मिल के चार तर्क समझाइए।
उत्तर: जे.एस. मिल के अनुसार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में चार तर्क हैं। पहला, कोई भी विचार पूरी तरह ग़लत नहीं होता, उसमें भी सच्चाई का कोई अंश होता है, प्रतिबंध लगाने पर वह अंश भी खो जाएगा। दूसरा, सत्य विरोधी विचारों के टकराव से ही पैदा होता है, आज जो ग़लत लगे वह भविष्य के सही विचार के उदय में सहायक हो सकता है। तीसरा, यह टकराव सिर्फ़ अतीत में नहीं बल्कि हर समय मूल्यवान है, अन्यथा सत्य एक विचारहीन रूढ़ उक्ति बनकर रह जाता है। चौथा, हम कभी पूरी तरह निश्चित नहीं हो सकते कि आज जो सत्य लगता है वही अंतिम सत्य है, क्योंकि इतिहास में कई बार जिन विचारों को समाज ने ग़लत मानकर दबाया, वे बाद में सत्य साबित हुए।
प्र. स्वराज की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। यह केवल स्वतंत्रता से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर: स्वराज “स्व” (स्वयं) और “राज” (शासन) से मिलकर बना है, इसके दो अर्थ हैं, स्वयं का शासन, और स्वयं पर शासन। भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में यह एक संवैधानिक-राजनीतिक माँग भी था, जैसा तिलक के कथन में झलकता है, और एक सामाजिक-सामूहिक मूल्य भी। गांधी जी ने विशेष रूप से स्वयं पर शासन वाले अर्थ पर बल दिया, उनके अनुसार स्वराज केवल बाहरी, जैसे ब्रिटिश, शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि मनुष्य को अमानवीय बनाने वाली संस्थाओं से मुक्ति भी है, जिसमें आत्मसम्मान, दायित्वबोध और आत्म-साक्षात्कार शामिल हैं। इस तरह स्वराज केवल बाहरी प्रतिबंधों के अभाव, यानी स्वतंत्रता के नकारात्मक पहलू, से आगे जाकर आत्म-अनुशासन और नैतिक विकास, यानी स्वतंत्रता के सकारात्मक पहलू, को भी शामिल करता है।
प्र. परिधान पर प्रतिबंध के उदाहरणों के आधार पर चर्चा कीजिए कि कब कोई प्रतिबंध न्यायोचित माना जा सकता है।
उत्तर: परिधान संबंधी उदाहरण दिखाते हैं कि प्रतिबंध की न्यायोचितता प्रसंग पर निर्भर करती है। माओ के चीन में सभी को माओ सूट पहनने के लिए बाध्य करना समानता के नाम पर व्यक्तिगत पसंद पर पूर्ण नियंत्रण था, जो अन्यायपूर्ण लगता है। सानिया मिर्ज़ा के विरुद्ध पहनावे को लेकर फ़तवा भी व्यक्तिगत चयन पर बाहरी, ग़ैर-राजकीय हस्तक्षेप था। इसके विपरीत, क्रिकेट में सफ़ेद कपड़े या स्कूल में वर्दी की शर्त स्वेच्छा से स्वीकृत भूमिका, यानी खिलाड़ी या छात्र बनने, से जुड़ी है, इसलिए इसे उतना अन्यायपूर्ण नहीं माना जाता। इस तरह प्रश्न यह नहीं कि प्रतिबंध है या नहीं, बल्कि यह कि किसने, किस अधिकार से, और किस उद्देश्य से यह प्रतिबंध लगाया है।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. “स्वतंत्रता पर प्रतिबंध कभी-कभी आवश्यक भी होते हैं और कभी-कभी अन्यायपूर्ण भी।” इस कथन की व्याख्या हानि सिद्धांत, औचित्यपूर्ण प्रतिबंध, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उदाहरणों के आधार पर कीजिए।
उत्तर: स्वतंत्रता पर प्रतिबंध कभी आवश्यक और कभी अन्यायपूर्ण दोनों हो सकते हैं, यह हानि सिद्धांत की कसौटी से तय होता है। जे.एस. मिल के अनुसार स्वसंबद्ध कार्यों, जिनका असर केवल कर्ता पर पड़े, में किसी बाहरी हस्तक्षेप की ज़रूरत नहीं, जबकि परसंबद्ध कार्यों, जो दूसरों को भी प्रभावित करते हैं, पर तभी क़ानूनी प्रतिबंध उचित है जब वे किसी निश्चित व्यक्ति को गंभीर हानि पहुँचाएँ, जैसे घृणा फैलाने वाले अभियान। छोटी-मोटी असुविधा, जैसे ऊँची आवाज़ में संगीत, के लिए केवल सामाजिक असहमति ही काफ़ी है, क़ानून की ताक़त नहीं। भारत में संवैधानिक चर्चाओं में ऐसी न्यायोचित सीमाओं के लिए औचित्यपूर्ण प्रतिबंध पद का इस्तेमाल किया गया है, प्रतिबंध तर्कसंगत और कार्य के अनुपात में होना चाहिए, न कि अत्यधिक। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामलों में, जैसे सलमान रुश्दी की द सेटानिक वर्सेस या औब्रे मेनन की रामायण रिटोल्ड पर प्रतिबंध, अक्सर यह प्रतिबंध केवल किसी वर्ग की नाराज़गी शांत करने के लिए लगाया जाता है, हानि सिद्धांत की गंभीर-हानि की शर्त पूरी किए बिना, ऐसे प्रतिबंध अन्यायपूर्ण माने जाते हैं क्योंकि इनसे प्रतिबंध लगाने की आदत विकसित होती है जो दीर्घकाल में स्वयं स्वतंत्रता के लिए ख़तरा बन जाती है। इसलिए किसी भी प्रतिबंध को उचित मानने से पहले यह जाँचना ज़रूरी है कि वह वास्तविक, गंभीर और निश्चित हानि रोकने के लिए है, या केवल असहमति दबाने के लिए।
प्र. नकारात्मक एवं सकारात्मक स्वतंत्रता के सिद्धांतों की विस्तार से व्याख्या कीजिए, उदाहरण और विचारकों के नाम सहित।
उत्तर: राजनीतिक सिद्धांत में स्वतंत्रता के दो आयामों को नकारात्मक और सकारात्मक स्वतंत्रता कहा जाता है। नकारात्मक स्वतंत्रता व्यक्ति के लिए एक न्यूनतम, अनुल्लंघनीय क्षेत्र परिभाषित और सुरक्षित करने का प्रयास करती है, जिसमें व्यक्ति जो होना, बनना या करना चाहे वह कर सके, और कोई बाहरी सत्ता उसमें हस्तक्षेप न करे, यह “किस क्षेत्र का स्वामी मैं हूँ” के सवाल का जवाब है, और यह तर्क स्पष्ट करता है कि व्यक्ति क्या करने से मुक्त है। इसके विपरीत सकारात्मक स्वतंत्रता का सरोकार मुझ पर शासन कौन करता है के सवाल से है, जिसका आदर्श उत्तर है “मैं स्वयं पर शासन करता हूँ”; ये तर्क “कुछ करने की स्वतंत्रता” के विचार की व्याख्या से जुड़े हैं। इस विचार-परंपरा को रूसो, हेगेल, मार्क्स, गांधी और अरविंद जैसे विचारकों से जोड़ा जाता है, जो मानते हैं कि व्यक्ति समाज में ही, समाज से बाहर नहीं, स्वतंत्र हो सकता है, इसलिए समाज को इस तरह बदलना चाहिए कि वह व्यक्ति के विकास का रास्ता साफ़ करे। इसके लिए व्यक्ति को भौतिक, ग़रीबी-बेरोज़गारी से मुक्ति, राजनीतिक, निर्णय-निर्माण में भागीदारी, और सामाजिक, शिक्षा तक पहुँच, परिस्थितियाँ चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे किसी पुष्प को खिलने के लिए उपजाऊ मिट्टी, धूप, पानी और देखभाल चाहिए। सामान्यतः दोनों तरह की स्वतंत्रताएँ साथ चलती और एक-दूसरे का समर्थन करती हैं, पर कभी-कभी निरंकुश शासक सकारात्मक स्वतंत्रता के नाम पर व्यक्ति की नकारात्मक स्वतंत्रता का हनन करके भी अपने शासन को न्यायोचित ठहराने की कोशिश करते हैं, इसलिए दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना ज़रूरी है।
प्र. “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक बुनियादी मूल्य है, पर इस पर कब और कैसे प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए” इस विषय पर एक निबंधात्मक उत्तर लिखिए, चर्चित उदाहरणों (जैसे प्रतिबंधित पुस्तकों/फ़िल्मों) का हवाला देते हुए।
उत्तर: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अहस्तक्षेप के उस न्यूनतम क्षेत्र का हिस्सा माना जाता है जिसकी रक्षा नकारात्मक स्वतंत्रता करती है। जे.एस. मिल ने इसके पक्ष में चार तर्क दिए, कोई विचार पूरी तरह ग़लत नहीं होता, सत्य विरोधी विचारों के टकराव से पैदा होता है, यह टकराव सदा मूल्यवान रहता है, और हम कभी निश्चित नहीं हो सकते कि आज का सत्य ही अंतिम सत्य है। इसके बावजूद इतिहास में बार-बार किताबों, फ़िल्मों और नाटकों पर प्रतिबंध लगाया गया है, जैसे दीपा मेहता की काशी की विधवाओं पर बनने वाली फ़िल्म का विरोध, सलमान रुश्दी की द सेटानिक वर्सेस और औब्रे मेनन की रामायण रिटोल्ड पर प्रतिबंध, या द लास्ट टेम्पटेशन ऑफ़ क्राइस्ट फ़िल्म और मी नाथूराम बोलते नाटक पर रोक। ऐसे प्रतिबंध तात्कालिक विरोध को शांत तो कर देते हैं, पर दीर्घकाल में ख़तरनाक हैं क्योंकि एक बार प्रतिबंध लगाने की आदत बन जाए तो वह बढ़ती ही जाती है। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध केवल तभी लगाया जाना चाहिए जब हानि सिद्धांत की शर्त पूरी हो, यानी जब कोई अभिव्यक्ति किसी निश्चित व्यक्ति या समूह को गंभीर, ठोस हानि पहुँचाए, जैसे घृणा फैलाने वाला भाषण, न कि केवल इसलिए कि वह किसी वर्ग को नापसंद है या असहज करती है। समाज को इसके लिए कुछ असुविधा सहन करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए, जैसा वाल्तेयर के प्रसिद्ध कथन, तुम जो कहते हो मैं उसका समर्थन नहीं करता, पर मरते दम तक तुम्हारे कहने के अधिकार का बचाव करूँगा, में झलकता है।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक मंडेला की आत्मकथा का शीर्षक क्या है?
उत्तर: “लॉन्ग वॉक टू फ़्रीडम”।
(ख) 2 अंक रंगभेदी सरकार ने काले नागरिकों पर कौन-से दो प्रतिबंध लगाए?
उत्तर: मुक्त आवागमन पर रोक, और विवाह की स्वतंत्र पसंद पर पाबंदी, दोनों नस्ल के आधार पर लगाए गए भेदभावपूर्ण प्रतिबंध थे।
(ग) 3 अंक यह अनुच्छेद दिखाता है कि मंडेला का संघर्ष केवल काले लोगों के लिए क्यों नहीं था, विस्तार से समझाइए।
उत्तर: मंडेला और उनके साथियों का संघर्ष रंगभेदी शासन द्वारा नस्ल के आधार पर लगाए गए अन्यायपूर्ण प्रतिबंधों के विरुद्ध था, न कि किसी एक नस्ल विशेष के पक्ष में। उनका उद्देश्य दक्षिण अफ़्रीका के सभी नागरिकों, चाहे वे काले हों, गोरे हों या किसी अन्य समुदाय के, की स्वतंत्रता के रास्ते की बाधाओं को दूर करना था। यह दिखाता है कि उनके लिए स्वतंत्रता एक सार्वभौमिक मूल्य था, नस्ल के आधार पर बाँटा जाने वाला विशेषाधिकार नहीं, और रंगभेद जैसी व्यवस्था अंततः पूरे समाज, शासक वर्ग सहित, की स्वतंत्रता को ही विकृत करती है।
(क) 1 अंक हानि सिद्धांत किस विचारक से जुड़ा है?
उत्तर: जॉन स्टुअर्ट मिल।
(ख) 2 अंक स्वसंबद्ध और परसंबद्ध कार्यों में क्या अंतर है?
उत्तर: स्वसंबद्ध कार्यों का असर केवल कर्ता पर पड़ता है, राज्य को हस्तक्षेप की ज़रूरत नहीं। परसंबद्ध कार्यों का असर दूसरों पर भी पड़ता है, गंभीर हानि होने पर राज्य रोक सकता है।
(ग) 3 अंक मिल के अनुसार छोटी और गंभीर हानि में प्रतिक्रिया का अंतर, उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर: मिल के अनुसार छोटी-मोटी हानि, जैसे बहुमंज़िले भवन में किसी का ऊँची आवाज़ में संगीत बजाना जिससे पड़ोसियों को बातचीत करने या सोने में असुविधा हो, के लिए केवल सामाजिक असहमति काफ़ी है, जैसे उस व्यक्ति से बातचीत बंद कर देना, पुलिस को शामिल करने की ज़रूरत नहीं। इसके विपरीत गंभीर हानि, जैसे घृणा फैलाने वाला अभियान जो किसी निश्चित समुदाय को वास्तविक ख़तरे में डाले, पर क़ानूनी प्रतिबंध लगाया जा सकता है, हालाँकि यह प्रतिबंध भी इतना कठोर नहीं होना चाहिए कि स्वतंत्रता ही नष्ट हो जाए।