NCERT की पाठ्यपुस्तक राजनीतिक सिद्धांत के अध्याय 2 «स्वतंत्रता» की प्रश्नावली के पाँचों प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्नों (आओ कुछ करके सीखें, वाद-विवाद-संवाद, चिंतन-मंथन और हाशिये के प्रश्न) के उत्तर अंत में दिए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
1 स्वतंत्रता से क्या आशय है
प्र. स्वतंत्रता से क्या आशय है? क्या व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता और राष्ट्र के लिए स्वतंत्रता में कोई संबंध है?
उत्तर: स्वतंत्रता के दो पहलू हैं: पहला, व्यक्ति पर बाहरी प्रतिबंधों, नियंत्रण या दबाव का अभाव, यानी वह बिना किसी बाहरी दबाव के अपने फ़ैसले ख़ुद ले सके। दूसरा, ऐसी परिस्थितियों का होना जिनमें व्यक्ति अपनी रचनात्मकता और क्षमताओं का भरपूर विकास कर सके। हाँ, व्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्र की स्वतंत्रता में गहरा संबंध है। मंडेला और आँग सान सू की के उदाहरण दिखाते हैं कि व्यक्ति अपनी निजी स्वतंत्रता को अपने पूरे देश की स्वतंत्रता से जोड़कर देखते हैं। जब तक कोई राष्ट्र पराधीन (जैसे औपनिवेशिक शासन में) है, उसके नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी सीमित रहती है, इसलिए दोनों साथ-साथ चलती हैं।
2 नकारात्मक और सकारात्मक स्वतंत्रता में अंतर
प्र. स्वतंत्रता की नकारात्मक और सकारात्मक अवधारणा में क्या अंतर है?
उत्तर: नकारात्मक स्वतंत्रता व्यक्ति के लिए एक अनुल्लंघनीय क्षेत्र परिभाषित और सुरक्षित करने का प्रयास करती है, जिसमें कोई बाहरी सत्ता हस्तक्षेप न करे। नकारात्मक स्वतंत्रता का तर्क यह स्पष्ट करता है कि व्यक्ति क्या करने से मुक्त है। सकारात्मक स्वतंत्रता व्यक्ति के विकास के लिए अनुकूल भौतिक, राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ बनाने से जुड़ी है। इसके तर्क “कुछ करने की स्वतंत्रता” के विचार की व्याख्या से जुड़े हैं और इस सवाल के जवाब में आते हैं कि “मुझ पर शासन कौन करता है?” इस प्रश्न का आदर्श उत्तर है “मैं स्वयं पर शासन करता हूँ।” नकारात्मक स्वतंत्रता केवल अहस्तक्षेप के छोटे क्षेत्र की चिंता करती है, जबकि सकारात्मक स्वतंत्रता मानती है कि व्यक्ति समाज में ही, समाज से बाहर नहीं, स्वतंत्र हो सकता है। दोनों सामान्यतः साथ चलती हैं, पर निरंकुश शासक कभी-कभी सकारात्मक स्वतंत्रता के तर्क का दुरुपयोग भी करते हैं।
3 सामाजिक प्रतिबंध और उनकी आवश्यकता
प्र. सामाजिक प्रतिबंधों से क्या आशय है? क्या किसी भी प्रकार के प्रतिबंध स्वतंत्रता के लिए आवश्यक हैं?
उत्तर: सामाजिक प्रतिबंध वे सीमाएँ हैं जो व्यक्ति के व्यवहार पर समाज, सरकार या क़ानून द्वारा लगाई जाती हैं, ताकि सामूहिक जीवन सुचारु रूप से चल सके। हाँ, कुछ प्रतिबंध ज़रूरी हैं क्योंकि कोई भी समाज बिना किसी नियम के अव्यवस्था में डूब सकता है, लोगों के हितों और महत्त्वाकांक्षाओं में टकराव हो सकता है। पर सभी प्रतिबंध उचित नहीं होते, जॉन स्टुअर्ट मिल का हानि सिद्धांत बताता है कि प्रतिबंध केवल तभी उचित है जब किसी का कार्य दूसरों को गंभीर हानि पहुँचाए। छोटी-मोटी हानि के लिए केवल सामाजिक असहमति काफ़ी है, क़ानूनी दंड नहीं। भारत में संवैधानिक चर्चाओं में इसके लिए “औचित्यपूर्ण प्रतिबंध” पद का इस्तेमाल किया गया है, प्रतिबंध तर्कसंगत और कार्य के अनुपात में होना चाहिए।
4 स्वतंत्रता बनाए रखने में राज्य की भूमिका
प्र. नागरिकों की स्वतंत्रता को बनाए रखने में राज्य की क्या भूमिका है?
उत्तर: राज्य की भूमिका दोहरी है। एक ओर लोकतांत्रिक सरकार स्वयं स्वतंत्रता की रक्षा का एक ज़रूरी माध्यम मानी जाती है, क्योंकि नागरिकों का अपने शासकों पर कुछ नियंत्रण बना रहता है, यह औपनिवेशिक शासन या रंगभेद जैसी अलोकतांत्रिक सत्ताओं से अलग है। दूसरी ओर, राज्य हानि सिद्धांत के अनुसार परसंबद्ध कार्यों (जो दूसरों को गंभीर हानि पहुँचाते हैं) पर रोक लगाकर नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा करता है, जैसे घृणा फैलाने वाले अभियानों पर प्रतिबंध। साथ ही राज्य को यह भी ध्यान रखना होता है कि उसके प्रतिबंध इतने कठोर न हों कि स्वतंत्रता ही नष्ट हो जाए, प्रतिबंध सदैव औचित्यपूर्ण और तर्कसंगत होने चाहिए।
5 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके उचित प्रतिबंध
प्र. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या अर्थ है? आपकी राय में इस स्वतंत्रता पर समुचित प्रतिबंध क्या होंगे? उदाहरण सहित बताइये।
उत्तर: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अहस्तक्षेप के न्यूनतम क्षेत्र का हिस्सा माना जाता है, यानी अपने विचार, राय और आलोचना बिना बाहरी रोक के व्यक्त करने का अधिकार। जे.एस. मिल ने चार तर्क दिए: कोई विचार पूरी तरह ग़लत नहीं होता, सत्य विरोधी विचारों के टकराव से पैदा होता है, यह टकराव हर समय मूल्यवान है, और हम कभी पूरी तरह निश्चित नहीं हो सकते कि आज का सत्य ही अंतिम सत्य है। मेरी राय में समुचित प्रतिबंध वही हैं जो हानि सिद्धांत की कसौटी पर खरे उतरें, जैसे घृणा फैलाने वाले या हिंसा भड़काने वाले भाषण पर रोक। पर केवल इस आधार पर कि कोई विचार किसी वर्ग को नापसंद है (जैसे सलमान रुश्दी की “द सेटानिक वर्सेस” या औब्रे मेनन की “रामायण रिटोल्ड” पर हुए प्रतिबंध), प्रतिबंध लगाना उचित नहीं, क्योंकि इससे प्रतिबंध लगाने की आदत बनती है जो दीर्घकाल में स्वतंत्रता के लिए ही ख़तरनाक साबित होती है।
6 पाठगत प्रश्न (अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्न)
अध्याय अपने “आओ कुछ करके सीखें”, वाद-विवाद-संवाद और चिंतन-मंथन बॉक्सों तथा हाशिये में भी प्रश्न पूछता है। ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर इन्हीं विचारों को परखते हैं, इसलिए हर एक का उत्तर उसी क्रम में दिया गया है जिसमें ये किताब में छपे हैं।
पाठगत प्रश्न 1. क्या केवल महान स्त्रियाँ और पुरुष ही स्वतंत्रता जैसे ऊँचे आदर्शों के लिए लड़ते हैं? इस सिद्धांत का मेरे लिए क्या मतलब है?
उत्तर: नहीं। मंडेला और आँग सान सू की प्रसिद्ध उदाहरण हैं, पर अध्याय बताता है कि स्वतंत्रता का आदर्श हमारे राष्ट्रीय संघर्ष और ब्रिटिश, फ़्रांसीसी तथा पुर्तगाली उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ एशिया-अफ़्रीका के लोगों के संघर्ष के केंद्र में था, यानी पूरी जनता इसके लिए लड़ी। साधारण लोग भी रोज़मर्रा के जीवन में स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते हैं, जैसे पढ़ाई जारी रखने के लिए लड़ती कोई लड़की या बंधुआ मज़दूरी का विरोध करता कोई मज़दूर। मेरे लिए स्वतंत्रता के दो अर्थ हैं, जो अध्याय बताता है: अन्यायपूर्ण बाहरी प्रतिबंधों से मुक्त रहकर अपने फ़ैसले ख़ुद लेना, और अपनी क्षमताओं के विकास के लिए शिक्षा व अवसर जैसी स्थितियाँ पाना। सू की के शब्दों में, इसका अर्थ भय से मुक्ति भी है, यानी साथियों के मज़ाक या अपनी बात कहने से न डरना।
पाठगत प्रश्न 2. आओ कुछ करके सीखें: क्या आप अपने गाँव, शहर या जनपद में ऐसे किसी व्यक्ति के बारे में याद कर सकते हैं, जिसने अपनी या औरों की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया हो? उस व्यक्ति के बारे में एक छोटा-सा लेख लिखिए। इस लेख में यह भी लिखिए कि उस व्यक्ति ने स्वतंत्रता के किस खास पहलू की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
उत्तर: लेख ऐसे लिखिए: व्यक्ति का नाम, उसके सामने कौन-सा प्रतिबंध था, उसने क्या किया और स्वतंत्रता के किस पहलू की रक्षा हुई। उदाहरण: हमारे गाँव की एक महिला ने विरोध के बावजूद अपनी बेटियों को कॉलेज भेजा और दूसरे परिवारों को भी इसके लिए राज़ी किया। प्रतिबंध सामाजिक था (रीति-रिवाज और परिवार का दबाव); जिस पहलू की उसने रक्षा की वह है स्वतंत्रता का सकारात्मक पहलू, यानी लड़कियों के लिए अपनी क्षमताएँ विकसित करने और अपना भविष्य ख़ुद चुनने के अवसर। अन्य संभावित उदाहरण: आपके ज़िले का कोई स्वतंत्रता सेनानी (औपनिवेशिक शासन से राष्ट्र की स्वतंत्रता), या जातिगत भेदभाव के ख़िलाफ़ लड़ने वाला कोई कार्यकर्ता (सामाजिक असमानता से मुक्ति)।
पाठगत प्रश्न 3. वाद-विवाद-संवाद: लड़के-लड़कियों को यह तय करने की आज़ादी होनी चाहिए कि वे किससे शादी करें। इस मामले में अभिभावकों को कुछ नहीं कहना चाहिए।
उत्तर: पक्ष में: जीवनसाथी का चुनाव व्यक्ति के अपने जीवन का केंद्रीय, स्वसंबद्ध निर्णय है; उदारवादी कहते हैं कि किसी से विवाह करने का निर्णय व्यक्ति को लेना चाहिए, परिवार, जाति या समुदाय को नहीं; विवाह करने में मुक्त चयन पर प्रतिबंध रंगभेदी शासन के उन प्रतिबंधों में से था जिनकी अध्याय निंदा करता है। विपक्ष में या बीच का मत: माता-पिता उपयोगी सलाह और सहारा दे सकते हैं, और चुनाव करने के साथ अपने कार्यों की ज़िम्मेदारी भी लेनी पड़ती है; अध्याय कहता है कि सही विकल्प चुनने की क्षमता शिक्षा और विवेक के विकास से बनती है। संतुलित निष्कर्ष: अंतिम निर्णय युवाओं का ही होना चाहिए; अभिभावक सलाह दे सकते हैं, पर दबाव नहीं डालना चाहिए।
पाठगत प्रश्न 4. (मिल के कथन पर हाशिये का प्रश्न) सभ्य समाज से उनका क्या मतलब है? जिस समाज में कानून का राज नहीं होता वहाँ स्वतंत्रता में हस्तक्षेप किस प्रकार होता है?
उत्तर: मिल के लिए सभ्य समाज वह है जहाँ शक्ति का प्रयोग मनमाने ढंग से नहीं, बल्कि औचित्यपूर्ण ढंग से और नियमों के अनुसार होता है, यानी जहाँ कानून का राज है; वहाँ किसी की इच्छा के ख़िलाफ़ शक्ति का प्रयोग केवल किसी अन्य को हानि से बचाने के लिए हो सकता है। जिस समाज में कानून का राज नहीं होता, वहाँ हस्तक्षेप शासक की मर्ज़ी, बल-प्रयोग या प्रभावशाली समूहों के दबाव से होता है: बिना कारण गिरफ़्तारी, विचारों पर रोक, या लोगों के निजी (स्वसंबद्ध) फ़ैसलों में दख़ल, और ऐसे हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ व्यक्ति के पास कोई उपाय नहीं होता।
पाठगत प्रश्न 5. चिंतन-मंथन: परिधानों पर प्रतिबंध का मुद्दा। यदि अपने परिधान का चयन अपनी स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है, तो इन स्थितियों को किस तरह देखेंगे: माओ के शासनकाल में चीन में सबको ‘माओ सूट’ पहनना पड़ता था; एक मौलवी द्वारा सानिया मिर्ज़ा के ख़िलाफ़ उसके पहनावे के कारण फ़तवा; टेस्ट मैचों में हर खिलाड़ी के लिए सफ़ेद कपड़े; विद्यालय में निर्धारित वेशभूषा? मनचाहे परिधान पर प्रतिबंध सभी मामलों में न्यायोचित है या केवल कुछ में? इन प्रतिबंधों को लगाने का अधिकार किसको है? क्या प्रतिबंध आरोपित करना अन्यायपूर्ण होता है? इसे स्वीकार करने के परिणाम क्या होते हैं?
उत्तर: केवल कुछ मामलों में न्यायोचित। टेस्ट क्रिकेट की सफ़ेद पोशाक और स्कूल की वेशभूषा किसी भूमिका (मैच, विद्यालय) के नियम हैं, जिन्हें लोग उस गतिविधि के लिए अपनाते हैं; ये उसी दायरे तक सीमित हैं और बाक़ी जीवन में अभिव्यक्ति नहीं रोकते। हर नागरिक को माओ सूट पहनने के लिए मजबूर करना, या किसी मौलवी का एक खिलाड़ी के पहनावे पर फ़तवा देना, व्यक्ति के स्वसंबद्ध चुनाव पर रोक है, जिससे दूसरों को कोई हानि नहीं होती। अधिकार: क्रिकेट की अंतर्राष्ट्रीय संस्था (आईसीसी) या विद्यालय अपनी गतिविधि के नियम बना सकते हैं; राज्य को आम तौर पर यह तय नहीं करना चाहिए कि नागरिक क्या पहनें, और धार्मिक नेताओं को परिधान पर फ़ैसले देने का अधिकार नहीं होना चाहिए। अन्यायपूर्ण? माओ सूट का नियम अन्यायपूर्ण था, क्योंकि उसने लोगों की अभिव्यक्ति के अनेक तरीक़े ख़त्म कर दिए। परिणाम: केवल सबके एक जैसे कपड़े पहनने से समाज की ग़रीबी या असमानता अपने आप दूर नहीं होती, उसके लिए भौतिक परिस्थितियाँ बदलनी पड़ती हैं; और अगर महिलाएँ ऐसे कपड़े न पहन सकें जिनमें वे पुरज़ोर तरीक़े से मुक़ाबला कर पाएँ, तो वे खेल में सहभागिता से वंचित होती हैं। रंगीन कपड़े पहनने से क्रिकेट के खेल पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता, जिससे पता चलता है कि खेल के नियम भी परिपाटी हैं जो बदल सकती हैं।
पाठगत प्रश्न 6. क्या हमें अपने पर्यावरण को नष्ट करने की आज़ादी है?
उत्तर: नहीं। पर्यावरण को नष्ट करना स्वसंबद्ध कार्य नहीं है: नदी को प्रदूषित करना, जंगल काटना या कचरा जलाना दूसरे लोगों और आने वाली पीढ़ियों को हानि पहुँचाता है, और यह हानि गंभीर है। मिल के हानि सिद्धांत के अनुसार ऐसे परसंबद्ध कार्यों पर, जो गंभीर हानि पहुँचाते हैं, कानून से रोक लगाई जा सकती है। सकारात्मक स्वतंत्रता के लिए भी स्वस्थ पर्यावरण ज़रूरी है, क्योंकि व्यक्ति तभी विकसित होता है जब आसपास की परिस्थितियाँ अनुकूल हों।
पाठगत प्रश्न 7. इंग्लैंड में जो भी राजपरिवार के लिए काम करता है वह राजमहल की आंतरिक बातों के बारे में न लिखने के लिए एक समझौते से बंधा होता है; नौकरी छोड़ने के बाद भी वह महल की राजनीति पर साक्षात्कार, लेख या पुस्तक नहीं दे सकता। क्या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अन्यायपूर्ण प्रतिबंध है?
उत्तर: अध्याय के अपने तर्क से, अधिकतर नहीं। उस व्यक्ति ने नौकरी पाने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर करके यह शर्त स्वेच्छा से मानी है; अध्याय कहता है कि यदि हम स्वेच्छापूर्वक या अपने लक्ष्यों और आकांक्षाओं के लिए कुछ प्रतिबंध स्वीकार करते हैं, तो हमारी स्वतंत्रता उस तरह सीमित नहीं होती, और अगर हमें किन्हीं स्थितियों को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं किया जा रहा तो हम यह दावा नहीं कर सकते कि हमारी स्वतंत्रता कम हुई है। फिर भी कहा जा सकता है कि जीवन भर का प्रतिबंध ज़्यादा है, ख़ासकर तब जब वह जनहित से जुड़ी किसी ग़लती को छिपाए; औचित्यपूर्ण प्रतिबंध उस चीज़ के अनुपात से बाहर नहीं होना चाहिए जिसकी वह रक्षा करता है।