कक्षा 11 राजनीति विज्ञान बुक 2 अध्याय 5 अधिकार महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. अधिकार की परिभाषा एक पंक्ति में दीजिए।

उत्तर: अधिकार मूल रूप से हकदारी अथवा ऐसा दावा है जिसका औचित्य सिद्ध हो।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. मनुष्य के तीन प्राकृतिक अधिकार बताइए।

उत्तर: जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति का अधिकार।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा कब अपनाई गई थी?

उत्तर: 10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा द्वारा।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. भारत में संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त अधिकारों को क्या कहते हैं?

उत्तर: मौलिक अधिकार।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. इमैनुएल कांट कौन थे?

उत्तर: 18वीं सदी के जर्मन दार्शनिक, जिन्होंने अधिकार की नैतिक अवधारणा प्रस्तुत की।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. “किसी व्यक्ति के अधिकार वहाँ ख़त्म हो जाते हैं…” उक्ति पूरी कीजिए।

उत्तर: …जहाँ दूसरे व्यक्ति की नाक शुरू होती है।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. भारत में हाल में शुरू की गई किसी आर्थिक अधिकार से जुड़ी योजना का नाम बताइए।

उत्तर: ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. अधिकारों के साथ आने वाली चार ज़िम्मेदारियों में से कोई एक बताइए।

उत्तर: आम भलाई की रक्षा, जैसे प्रदूषण कम करना और वृक्षारोपण। (अन्य स्वीकार्य उत्तर: दूसरों के अधिकारों का सम्मान; टकराव में संतुलन; अधिकारों पर लगने वाले नियंत्रणों के प्रति चौकसी)

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. अधिकार और इच्छा में क्या फ़र्क़ है?

उत्तर: इच्छा वह है जो कोई व्यक्ति निजी तौर पर चाहे; अधिकार वह है जिसे शेष समाज एक वैध, औचित्यपूर्ण दावे के रूप में स्वीकार करे। जैसे स्कूल की पोशाक न पहनने की इच्छा अधिकार नहीं है।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. प्राकृतिक अधिकार और मानवाधिकार में क्या अंतर है?

उत्तर: प्राकृतिक अधिकार को प्रकृति/ईश्वर प्रदत्त और अपरिवर्तनीय माना जाता था; मानवाधिकार को मनुष्य द्वारा स्वयं खोजी/पाई गई गारंटियाँ माना जाता है, जिनकी सूची समय के साथ बढ़ती रहती है।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. कांट के अनुसार अधिकार की नैतिक अवधारणा के दो आधार क्या हैं?

उत्तर: (1) दूसरों के साथ वैसा ही आचरण करें जैसा स्वयं के लिए चाहते हैं। (2) दूसरों को अपनी स्वार्थसिद्धि का साधन न बनाएँ, बल्कि उन्हें मनुष्य होने के नाते सम्मान दें।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. कानूनी मान्यता अधिकार का आधार क्यों नहीं मानी जाती?

उत्तर: क्योंकि अधिकार क़ानूनी मान्यता से पहले भी न्यायोचित माने जा सकते हैं; क़ानून केवल उन्हें विशेष दर्जा और सुरक्षा देता है, वह उनका मूल स्रोत नहीं है।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. राजनीतिक भागीदारी का अधिकार बुनियादी ज़रूरतों पर क्यों निर्भर करता है?

उत्तर: फुटपाथ पर रहने वाला या बुनियादी ज़रूरतों के लिए संघर्ष करता व्यक्ति राजनीतिक अधिकारों का उपयोग प्रभावी ढंग से नहीं कर सकता, इसलिए आर्थिक अधिकार राजनीतिक भागीदारी को सार्थक बनाते हैं।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. सूचना का अधिकार टेलीफ़ोन आवेदन के उदाहरण में कैसे काम आता है?

उत्तर: नागरिक अब अपने आवेदन की स्थिति और देरी का कारण राज्य से जान सकता है, जबकि पहले उसे कोई जवाबदेही तंत्र उपलब्ध नहीं था।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. चिंतन-मंथन में दिए गए किन्हीं दो उदाहरणों का उल्लेख कीजिए, जहाँ समूह-अधिकार विवादास्पद हैं।

उत्तर: (1) जैन समुदाय का अपना विद्यालय, जो केवल अपने समुदाय के छात्रों को प्रवेश देता है। (2) हिमाचल प्रदेश में ग़ैर-निवासियों को भूमि या अचल संपत्ति ख़रीदने पर रोक।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. सांस्कृतिक अधिकार का क्या अर्थ है? एक उदाहरण सहित बताइए।

उत्तर: सांस्कृतिक अधिकार अपनी भाषा और संस्कृति में जीने, सीखने और उसे बनाए रखने का हक़ है। उदाहरण: मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा पाने का अधिकार, या अपनी भाषा-संस्कृति के शिक्षण के लिए संस्थाएँ बनाने का अधिकार।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. अधिकारों के दावे के दो आधार क्या हैं? उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तर: पहला आधार, गरिमा-सम्मान की ज़िंदगी: कुछ अधिकार, जैसे आजीविका का अधिकार या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समाज में रहने वाले तमाम लोगों के लिए महत्त्वपूर्ण होने के कारण विश्वजनीन कहलाते हैं। दूसरा आधार, हमारी बेहतरी: शिक्षा का अधिकार हमारी दक्षता-प्रतिभा विकसित करता है, इसलिए इसे सार्वभौम माना गया है। इसके विपरीत, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक कार्यकलाप (जैसे नशीली दवाएँ) अधिकार नहीं माने जा सकते।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. राज्य अधिकारों के माध्यम से किस तरह दो प्रकार से बाध्य होता है? उदाहरण दीजिए।

उत्तर: अधिकार राज्य को यह बताते हैं कि उसे क्या करना चाहिए, जैसे जीवन के अधिकार हेतु चोट पहुँचाने वालों को दंडित करने वाला कानून बनाना, और यह भी बताते हैं कि उसे क्या नहीं करना चाहिए, जैसे बिना वारंट किसी को गिरफ़्तार न करना और अदालत के सामने कारण बताए बग़ैर स्वतंत्रता में कटौती न करना।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों को उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तर: राजनीतिक अधिकार नागरिकों को क़ानून के समक्ष बराबरी और राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी का हक़ देते हैं, जैसे वोट देना और चुनाव लड़ना। आर्थिक अधिकार बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने के लिए राज्य के दायित्व हैं, जैसे आवास, चिकित्सा और ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना। सांस्कृतिक अधिकार अपनी भाषा-संस्कृति में जीने और सीखने का हक़ देते हैं, जैसे मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. अधिकारों के साथ आने वाली चार ज़िम्मेदारियों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर: पहली, आम भलाई की रक्षा (ओज़ोन परत, प्रदूषण, वृक्षारोपण)। दूसरी, दूसरों के अधिकारों का सम्मान (जो अधिकार मैं स्वयं चाहता हूँ, वही दूसरों को भी देना)। तीसरी, टकराव में संतुलन (अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाम किसी की गोपनीयता)। चौथी, अधिकारों पर लगने वाले नियंत्रणों के प्रति चौकसी (राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर बढ़ते प्रतिबंधों पर नज़र रखना)।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच टकराव को अध्याय के उदाहरणों सहित समझाइए।

उत्तर: अध्याय पूछता है : क्या आतंकी बमबारी की धमकी का सामना करते राष्ट्र को नागरिकों की आज़ादी छीनने, महज़ संदेह पर गिरफ़्तार करने, चिट्ठियाँ देखने, फ़ोन टेप करने या सच कबूल करवाने के लिए यातना का सहारा लेने की अनुमति दी जा सकती है? पुस्तक के अनुसार ऐसी स्थितियों में यह सवाल पूछना चाहिए कि संबद्ध व्यक्ति समाज के लिए ख़तरा तो नहीं पैदा कर रहा है। गिरफ़्तार लोगों को भी क़ानूनी सलाह और अदालत के सामने पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए, और सरकारों को ऐसी शक्तियाँ देने में बेहद सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि इनका दुरुपयोग हो सकता है और सरकारें निरंकुश हो सकती हैं।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. चिंतन-मंथन के चार उदाहरणों में से किन्हीं दो पर अपनी राय तर्क सहित दीजिए।

उत्तर: उदाहरण के लिए, हिमाचल प्रदेश में ग़ैर-निवासियों को भूमि ख़रीदने से रोकना स्थानीय संसाधनों और पहचान की रक्षा के तर्क पर आधारित हो सकता है, पर यह अन्य नागरिकों की समानता के अधिकार को सीमित भी करता है। इसी तरह हरियाणा की पंचायत का अंतर्जातीय विवाह करने वाले जोड़े को गाँव से निकालने का निर्णय व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा के अधिकार का सीधा उल्लंघन है, इसे न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा की प्रस्तावना क्या संदेश देती है? समझाइए।

उत्तर: प्रस्तावना कहती है कि मानव परिवार के सभी सदस्यों की स्वाभाविक गरिमा तथा उनके समान एवं अत्याज्य अधिकारों की प्रतिष्ठा विश्व में स्वतंत्रता, न्याय तथा शांति की आधारशिला है। यह यह भी कहती है कि मानवाधिकारों की अवमानना से क्रूरतापूर्ण कृत्य पैदा होते हैं, इसलिए विधि के शासन द्वारा मानवाधिकारों की रक्षा ज़रूरी है, ताकि मनुष्य को अत्याचार के विरुद्ध विद्रोह जैसे अंतिम अस्त्र तक न पहुँचना पड़े।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. अधिकार क्या है, यह कैसे तय होता है कि कोई दावा अधिकार है या नहीं? विस्तार से समझाइए।

उत्तर: अधिकार हकदारी या औचित्यपूर्ण दावा है, जिसे शेष समाज वैध रूप से स्वीकार करे। यह तय करने के लिए दो आधार देखे जाते हैं: पहला, क्या यह गरिमा-सम्मान की ज़िंदगी के लिए ज़रूरी है (जैसे आजीविका, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता); दूसरा, क्या यह व्यक्ति की बेहतरी, दक्षता और प्रतिभा विकसित करने में मदद करता है (जैसे शिक्षा)। इसके विपरीत, जो कार्यकलाप स्वास्थ्य-कल्याण के लिए हानिकारक हैं, उन्हें अधिकार नहीं माना जा सकता, भले ही कोई व्यक्ति उन्हें ज़रूरी समझे। इस तरह हर इच्छा अधिकार नहीं बनती, केवल वे दावे अधिकार बनते हैं जिन्हें समाज एक वैध, अनिवार्य रूप से मान्य दावे के तौर पर स्वीकार करता है।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. प्राकृतिक अधिकार सिद्धांत से मानवाधिकार तक की यात्रा और कांट के योगदान को विस्तार से समझाइए।

उत्तर: 17वीं-18वीं सदी में राजनीतिक सिद्धांतकारों ने तर्क दिया कि अधिकार प्रकृति या ईश्वर प्रदत्त हैं, इसलिए कोई व्यक्ति या शासक उन्हें हमसे छीन नहीं सकता; उन्होंने जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति को तीन प्राकृतिक अधिकार माना, जिनसे अन्य तमाम अधिकार निकले। 18वीं सदी के जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट ने अधिकार की नैतिक अवधारणा दी : हर मनुष्य की गरिमा है, चाहे वह अशिक्षित, ग़रीब या शक्तिहीन ही क्यों न हो, इसलिए हमें दूसरों के साथ वैसा ही आचरण करना चाहिए जैसा हम स्वयं के लिए चाहते हैं, और उन्हें कभी अपने स्वार्थ का साधन नहीं बनाना चाहिए। यह विचार सामाजिक ऊँच-नीच के विरुद्ध और मानवाधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों का संबल बना। हाल के वर्षों में प्राकृतिक अधिकार की जगह “मानवाधिकार” शब्द का ज़्यादा प्रयोग हो रहा है, क्योंकि यह मानना मुश्किल हो गया है कि कुछ नियम प्रकृति या ईश्वर ने रचे हैं; अधिकारों को अब ऐसी गारंटियों के रूप में देखा जाता है जिन्हें मनुष्य ने अच्छा जीवन जीने के लिए स्वयं खोजा या पाया है। आज संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (10 दिसंबर 1948) अधिकारों की इसी समझ पर आधारित है।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. कानूनी अधिकार और राज्यसत्ता के बीच संबंध को उदाहरण सहित विस्तार से समझाइए।

उत्तर: अनेक देशों में अधिकारों का विधेयक संविधान में प्रतिष्ठित रहता है; भारत में इन्हें मौलिक अधिकार कहा जाता है, और कुछ अधिकार (जैसे अस्पृश्यता पर प्रतिबंध) देश के विशिष्ट इतिहास के कारण जोड़े जाते हैं। बहुत-से सिद्धांतकार अधिकार को राज्य-मान्य दावों के रूप में परिभाषित करते हैं, पर अध्याय स्पष्ट करता है कि क़ानूनी मान्यता अधिकार को दर्जा देती है, उसका आधार नहीं बनाती। अधिकतर मामलों में अधिकार राज्य से किए गए दावे हैं, जो राज्य को दो तरह से बाँधते हैं: कुछ करने का दायित्व (जैसे जीवन के अधिकार हेतु सुरक्षा कानून बनाना) और कुछ न करने की मर्यादा (जैसे बिना वारंट गिरफ़्तार न करना)। इस तरह राज्य संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न होते हुए भी जनता के कल्याण के लिए बाध्य रहता है।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. अधिकारों के तीन प्रकार (राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक) की तुलना विस्तार से कीजिए, प्रत्येक के महत्व सहित।

उत्तर: राजनीतिक अधिकार (वोट, चुनाव लड़ना, पार्टी बनाना) नागरिक स्वतंत्रताओं (निष्पक्ष सुनवाई, अभिव्यक्ति) के साथ मिलकर लोकतांत्रिक सरकार की बुनियाद बनाते हैं और सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाते हैं। लेकिन ये तभी सार्थक हैं जब बुनियादी ज़रूरतें पूरी हों, इसीलिए आर्थिक अधिकार (आवास, चिकित्सा, न्यूनतम भत्ता, ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना) ज़रूरी हैं, जो नागरिकों को राजनीतिक भागीदारी के लिए सक्षम बनाते हैं। सांस्कृतिक अधिकार (मातृभाषा शिक्षा, अपनी भाषा-संस्कृति की संस्थाएँ) समुदायों की पहचान और परंपरा को सुरक्षित रखते हैं। तीनों मिलकर अधिकारों की उस बढ़ती सूची को बनाते हैं जो लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में शालीन जीवन के लिए ज़रूरी मानी जाती है।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
मेरे पिता ने टेलीफ़ोन लगवाने के लिए आवेदन किया था। दो महीने से भी ज़्यादा हो गए हैं और अभी तक कुछ नहीं हुआ है। तभी किसी ने बताया, जानते हो, अब हमारे पास सूचना का अधिकार है। हम जान सकते हैं कि हमारे आवेदन का क्या हुआ। हम देरी का कारण भी जान सकते हैं। यह उदाहरण दिखाता है कि कैसे एक नया क़ानूनी अधिकार राज्य को नागरिकों के प्रति जवाबदेह बनाता है।

(क) 1 अंक इस गद्यांश में किस अधिकार का ज़िक्र है?
उत्तर: सूचना का अधिकार।

(ख) 2 अंक यह अधिकार नागरिक की किस समस्या का समाधान करता है?
उत्तर: आवेदन में देरी की स्थिति में नागरिक अब जवाबदेही माँग सकता है और देरी का कारण जान सकता है, जो पहले संभव नहीं था।

(ग) 3 अंक यह उदाहरण अध्याय के इस मूल तर्क को कैसे दर्शाता है कि अधिकार राज्य से क्या माँग करते हैं, विस्तार से समझाइए।
उत्तर: यह दिखाता है कि अधिकार राज्य के समक्ष किए गए दावे हैं। सूचना के अधिकार से नागरिक राज्य को अपनी कार्यवाही के लिए जवाबदेह बना सकता है, जो अध्याय के इस तर्क को पुष्ट करता है कि अधिकार राज्य को कुछ ख़ास तरीक़ों से कार्य करने के लिए वैधानिक दायित्व सौंपते हैं, यानी वे राज्य से केवल निष्क्रिय आज्ञापालन नहीं, बल्कि सक्रिय जवाबदेही की माँग करते हैं।

केस स्टडी
18वीं सदी के जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट के अनुसार हर मनुष्य की गरिमा है, चाहे वह अशिक्षित, ग़रीब या शक्तिहीन ही क्यों न हो। हर चीज़ की या तो क़ीमत होती है या गरिमा; जिसकी क़ीमत होती है उसकी जगह कोई और चीज़ रखी जा सकती है, पर गरिमा का कोई समतुल्य नहीं होता। कांट के अनुसार हमें लोगों का सम्मान इसलिए करना चाहिए क्योंकि वे मनुष्य हैं, न कि इसलिए कि वे हमारे लिए उपयोगी हैं।

(क) 1 अंक कांट किस सदी और किस देश के दार्शनिक थे?
उत्तर: 18वीं सदी, जर्मनी।

(ख) 2 अंक कांट के अनुसार गरिमा और क़ीमत में क्या फ़र्क़ है?
उत्तर: जिसकी क़ीमत होती है, उसकी जगह कोई और चीज़ रखी जा सकती है; पर जिसकी गरिमा होती है, उसका कोई समतुल्य नहीं होता, यानी गरिमा किसी भी क़ीमत से ऊपर होती है।

(ग) 3 अंक कांट का यह विचार अधिकार की “नैतिक अवधारणा” को कैसे स्थापित करता है, विस्तार से समझाइए।
उत्तर: कांट का विचार बताता है कि मनुष्य को कभी केवल साधन के रूप में नहीं, बल्कि साध्य के रूप में देखा जाना चाहिए। इसी सिद्धांत ने अधिकार की उस नैतिक अवधारणा को जन्म दिया, जो कहती है कि हमें दूसरों के साथ वैसा ही आचरण करना चाहिए जैसा हम स्वयं के लिए चाहते हैं, और उन्हें कभी अपनी स्वार्थसिद्धि का साधन नहीं बनाना चाहिए। यही विचार आगे चलकर मानवाधिकारों और उनकी सार्वभौमिक घोषणा की वैचारिक नींव बना।