1 अधिकार क्या हैं?
अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हम अक्सर अधिकारों की चर्चा करते हैं। लोकतांत्रिक देश के सदस्य होने के नाते हम वोट देने, राजनीतिक पार्टियाँ बनाने और चुनाव लड़ने जैसे अधिकारों की बात करते हैं। आम तौर पर स्वीकृत नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के अलावा सूचना के अधिकार, स्वच्छ वायु के अधिकार तथा सुरक्षित पेयजल के अधिकार का भी दावा जताया जा रहा है। हम अपना कैरियर चुनने और देश में बेरोकटोक घूमने के अधिकारों की भी बात करते हैं। न केवल वयस्क मनुष्यों के लिए, बल्कि बच्चों, गर्भस्थ भ्रूणों और पशुओं के लिए भी अधिकारों का दावा किया जाता है।
अधिकार मूल रूप से हकदारी अथवा ऐसा दावा है जिसका औचित्य सिद्ध हो। यह बताता है कि नागरिक, व्यक्ति और मनुष्य होने के नाते हम किसके हकदार हैं, ऐसी चीज़ जिसे शेष समाज एक वैध दावे के रूप में स्वीकार करे।
इसका यह मतलब नहीं है कि हर वह चीज़, जिसे मैं ज़रूरी और वांछनीय समझूँ, अधिकार है। मेरी इच्छा हो सकती है कि स्कूल के लिए निर्धारित पोशाक की बजाय अपनी पसंद के कपड़े पहनूँ या देर रात तक घर से बाहर रहूँ, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि मुझे ऐसा करने का अधिकार है। मैं जो चाहता हूँ और जिसके लिए मैं स्वयं को हकदार समझता हूँ, तथा जिनका बतौर अधिकार उल्लेख किया जा सकता है, इन दोनों के बीच फ़र्क़ होता है।
पहला आधार, गरिमा-सम्मान की ज़िंदगी : अधिकार उन बातों का द्योतक हैं जिन्हें हम सम्मान और गरिमा का जीवन बसर करने के लिए महत्त्वपूर्ण समझते हैं। जैसे आजीविका का अधिकार (लाभकर रोज़गार व्यक्ति को आर्थिक स्वतंत्रता देता है) या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार (सृजनात्मक और मौलिक होने का मौक़ा देता है, लोकतांत्रिक सरकार के लिए भी ज़रूरी)। ऐसे अधिकार समाज में रहने वाले तमाम लोगों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं, इसीलिए इनकी प्रकृति विश्वजनीन कही जाती है।
दूसरा आधार, हमारी बेहतरी : अधिकार लोगों को उनकी दक्षता और प्रतिभा विकसित करने में मदद करते हैं। जैसे शिक्षा का अधिकार, जो तर्क-शक्ति विकसित करता है, उपयोगी कौशल देता है और जीवन में सूझ-बूझ के साथ चयन करने में सक्षम बनाता है, इसीलिए शिक्षा को सार्वभौम अधिकार माना गया है।
बहरहाल, अगर कोई कार्यकलाप हमारे स्वास्थ्य और कल्याण के लिए नुक़सानदेह है, तो उसे अधिकार नहीं माना जा सकता। उदाहरण के लिए, डॉक्टरी शोध ने प्रमाणित किया है कि नशीली दवाएँ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं और चूँकि ये अन्यों के साथ हमारे रिश्तों पर दुष्प्रभाव डालती हैं, इसलिए हम यह दावा नहीं कर सकते कि हमें नशीले पदार्थों के सेवन, सुई लगाने या धूम्रपान का अधिकार होना चाहिए। धूम्रपान तो उन लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी नुक़सानदेह है, जो धूम्रपान करने वालों के आस-पास होते हैं।
पिछले कुछ महीनों के अखबारों को बाँचिए और उन जन आंदोलनों और संगठनों की सूची बनाइये जिन्होंने नए किस्म के अधिकारों की माँग की है।
2 अधिकार कहाँ से आते हैं?
सतरहवीं और अठारहवीं शताब्दी में राजनीतिक सिद्धांतकार तर्क देते थे कि हमारे लिए अधिकार प्रकृति या ईश्वर प्रदत्त हैं, इसीलिए इन्हें प्राकृतिक अधिकार कहा गया। उनके अनुसार ये अधिकार किसी शासक या समाज द्वारा नहीं दिए गए, बल्कि हम जन्म से ही इनके साथ पैदा होते हैं, इसलिए ये अपरिहार्य हैं और कोई इन्हें हमसे छीन नहीं सकता।
हाल के वर्षों में “प्राकृतिक अधिकार” की जगह “मानवाधिकार” शब्द का ज़्यादा प्रयोग हो रहा है, क्योंकि यह मानना मुश्किल होता जा रहा है कि कुछ नियम प्रकृति या ईश्वर ने रचे हैं। अधिकारों को अब ऐसी गारंटियों के रूप में देखा जाता है जिन्हें मनुष्य ने स्वयं एक अच्छा जीवन जीने के लिए खोजा या पाया है। मानव अधिकारों के पीछे मूल मान्यता यह है कि सभी लोग, मनुष्य होने मात्र से, कुछ चीज़ों को पाने के अधिकारी हैं, और सभी मनुष्य एक आंतरिक दृष्टि से समान हैं। इसी समझदारी पर संयुक्त राष्ट्र के मानव अधिकारों का सार्वभौम घोषणा-पत्र बना है।
18वीं सदी के जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट के लिए हर मनुष्य की गरिमा है, चाहे वह अशिक्षित, ग़रीब या शक्तिहीन ही क्यों न हो। कांट का प्रसिद्ध कथन: “हर चीज़ की या तो कीमत होती है या गरिमा। जिसकी कीमत होती है, उसकी जगह उसके समतुल्य कोई दूसरी चीज़ भी रखी जा सकती है। इसके विपरीत, जो तमाम कीमतों से ऊपर हो और जिसका कोई समतुल्य न हो, उसकी गरिमा होती है।” कांट के अनुसार अधिकार की इस नैतिक अवधारणा के दो आधार हैं: पहला, हमें दूसरों के साथ वैसा ही आचरण करना चाहिए जैसा हम अपने लिए दूसरों से चाहते हैं; दूसरा, हमें दूसरों को अपनी स्वार्थसिद्धि का साधन नहीं बनाना चाहिए, हमें लोगों का सम्मान इसलिए करना चाहिए क्योंकि वे मनुष्य हैं, न कि इसलिए कि वे हमारे लिए उपयोगी हैं।
दुनिया भर के उत्पीड़ित लोगों ने मानवाधिकार की अवधारणा का उपयोग उन क़ानूनों को चुनौती देने के लिए किया है जो उन्हें पृथक करते हैं और समान अवसरों से वंचित करते हैं। कुछ संघर्ष सफल भी हुए, जैसे दास प्रथा का उन्मूलन, लेकिन कुछ अन्य संघर्षों में अभी तक सीमित सफलता ही मिल पाई है। जैसे-जैसे नए ख़तरे और चुनौतियाँ उभरती गई हैं, मानवाधिकारों की सूची भी बढ़ती गई है, जैसे स्वच्छ हवा, शुद्ध जल और टिकाऊ विकास के अधिकार, या युद्ध-प्राकृतिक संकट में महिलाओं, बच्चों और बीमारों की आजीविका के अधिकार।
मानवाधिकार के दावे अक्सर व्यापक जन-समर्थन पाते हैं। आपने शायद पॉप स्टार बॉब गेल्डॉफ की ओर से अफ्रीका में गरीबी ख़त्म करने के लिए पश्चिमी मुल्कों की सरकारों से की गई अपील के बारे में सुना होगा और टीवी पर देखा होगा कि उसे आम जनता का कितना प्रबल समर्थन हासिल हुआ।
3 कानूनी अधिकार और राज्यसत्ता
मानवाधिकारों के दावों की नैतिक अपील चाहे जितनी हो, उनकी सफलता सरकारों और क़ानून के समर्थन पर निर्भर करती है। अनेक देशों में अधिकारों का विधेयक वहाँ के संविधान में प्रतिष्ठित रहता है। संविधान देश का सर्वोच्च क़ानून होता है, इसलिए कुछ खास अधिकारों की संवैधानिक मान्यता उन्हें बुनियादी महत्त्व प्रदान करती है, अपने देश में इन्हें हम मौलिक अधिकार कहते हैं। कुछ अधिकार किसी देश के विशिष्ट इतिहास और रीति-रिवाज़ों के चलते भी शामिल किए जाते हैं, जैसे भारत में अस्पृश्यता पर प्रतिबंध का प्रावधान, जो देश की परंपरागत सामाजिक कुप्रथा का ध्यान दिलाता है।
बहुत-से सिद्धांतकार अधिकार को ऐसे दावों के रूप में परिभाषित करते हैं जिन्हें राज्य ने मान्य किया हो। कानूनी मान्यता निश्चित रूप से हमारे अधिकारों को समाज में एक ख़ास दर्जा देती है, लेकिन कानूनी मान्यता के आधार पर ही किसी अधिकार का दावा नहीं किया जा सकता। अधिकारों का धीरे-धीरे विस्तार और पुनर्व्याख्या होती रहती है, ताकि पहले अलग रखे गए समूहों को भी शामिल किया जा सके।
अधिकतर मामलों में अधिकार राज्य से किए जाने वाले दावे हैं। जब मैं शिक्षा के अधिकार पर ज़ोर देता हूँ, तो मैं राज्य से बुनियादी शिक्षा के लिए प्रावधान करने की माँग करता हूँ, समाज भी इसमें सहयोग कर सकता है, लेकिन मुख्य ज़िम्मेदारी राज्य की बनती है। इस तरह अधिकार राज्य को दो तरह से बाँधते हैं:

दूसरे शब्दों में, हमारे अधिकार सुनिश्चित करते हैं कि राज्य की सत्ता व्यक्तिगत जीवन और स्वतंत्रता की मर्यादा का उल्लंघन किए बग़ैर काम करे। राज्य संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न सत्ता हो सकता है, लेकिन उसका अस्तित्व अपने लिए नहीं, बल्कि व्यक्ति के हित के लिए है, जनता का ही अधिक महत्त्व है, और सत्तारूढ़ सरकार को उसी के कल्याण के लिए काम करना होता है।
पिछले कुछ दिनों के अखबारों को देखिए और अधिकारों के उल्लंघन के मामलों की तलाश कीजिए। सरकार और समाज के लोगों को अधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिए क्या करना चाहिए?
“मेरे पिता ने टेलीफ़ोन लगवाने के लिए आवेदन किया था। दो महीने से भी ज़्यादा हो गए हैं और अभी तक कुछ नहीं हुआ है। वे क्या कर सकते हैं?” · “जानते हो! अब हमारे पास सूचना का अधिकार है। हम जान सकते हैं कि हमारे आवेदन का क्या हुआ। हम देरी का कारण भी जान सकते हैं।”
4 अधिकारों के प्रकार
अधिकतर लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ राजनीतिक अधिकारों का घोषणापत्र बनाने से अपनी शुरुआत करती हैं। राजनीतिक अधिकार नागरिकों को क़ानून के समक्ष बराबरी तथा राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी का हक़ देते हैं, जैसे वोट देना, प्रतिनिधि चुनना, चुनाव लड़ना, राजनीतिक पार्टियाँ बनाना या उनमें शामिल होना। राजनीतिक अधिकार नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़े होते हैं : स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायिक जाँच का अधिकार, विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार, प्रतिवाद करने तथा असहमति प्रकट करने का अधिकार। दोनों मिलकर किसी लोकतांत्रिक सरकार की बुनियाद बनाते हैं।
अधिकारों का उद्देश्य लोगों के कल्याण की हिफ़ाज़त करना होता है। राजनीतिक अधिकार इसमें तीन तरह से सहयोग करते हैं : सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाकर, शासकों की अपेक्षा लोगों के सरोकार को अधिक महत्त्व देकर, और तमाम लोगों के लिए सरकार के निर्णयों को प्रभावित करने का मौका सुनिश्चित करके।
राजनीतिक भागीदारी का अपना अधिकार हम तभी पूरी तरह अमल में ला सकते हैं जब भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य जैसी हमारी बुनियादी ज़रूरतें पूरी हों। फुटपाथ पर रहने और इन ज़रूरतों के लिए संघर्ष करने वालों के लिए अपने-आप में राजनीतिक अधिकार का कोई मूल्य नहीं है।
| अधिकार का प्रकार | क्या शामिल है | उदाहरण |
|---|---|---|
| राजनीतिक अधिकार + नागरिक स्वतंत्रताएँ | क़ानून के समक्ष बराबरी, राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी | वोट देना, चुनाव लड़ना, पार्टी बनाना, निष्पक्ष सुनवाई, विरोध जताना |
| आर्थिक अधिकार | बुनियादी ज़रूरतों की पूर्ति हेतु राज्य के दायित्व | आवास, चिकित्सा, न्यूनतम भत्ता, ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना |
| सांस्कृतिक अधिकार | अपनी भाषा-संस्कृति में जीने और सीखने का हक़ | मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा, अपनी भाषा-संस्कृति के लिए संस्थाएँ बनाना |
इनमें से जीने का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, समान व्यवहार का अधिकार और राजनीतिक भागीदारी का अधिकार बुनियादी अधिकार माने जाते हैं, जिन्हें प्राथमिकता मिलनी ही चाहिए। शालीन जीवनयापन के लिए ज़रूरी बाक़ी स्थितियाँ भी धीरे-धीरे न्यायोचित दावों के रूप में मान्य होती जा रही हैं।
4.1 समूह-अधिकारों की उलझन : चिंतन-मंथन
समूह या समुदाय विशेष को दिए गए इन अधिकारों में से कौन-से न्यायोचित हैं?
(क) एक शहर में जैन समुदाय के लोगों ने अपना विद्यालय खोला और उसमें केवल अपने समुदाय के छात्र-छात्राओं को ही प्रवेश दिया।
(ख) हिमाचल प्रदेश में वहाँ के स्थायी निवासियों के अलावा बाक़ी लोग ज़मीन या अन्य अचल संपत्ति नहीं ख़रीद सकते।
(ग) एक सह-शिक्षा विद्यालय के प्रधानाध्यापक ने एक सर्कुलर जारी किया कि कोई भी छात्रा किसी भी प्रकार का पश्चिमी परिधान नहीं पहनेगी।
(घ) हरियाणा की एक पंचायत ने निर्णय दिया कि अलग-अलग जातियों के जिस लड़के और लड़की ने शादी कर ली थी, वे अब गाँव में नहीं रहेंगे।
संस्कृति के अधिकार का मतलब है कि किसी को भी ऐसी फ़िल्म बनाने की अनुमति नहीं होनी चाहिए जो किसी धार्मिक या सांस्कृतिक आस्थाओं को चोट पहुँचाए। क्या आप सहमत हैं?
5 अधिकार और जिम्मेदारियाँ
अधिकार न केवल राज्य पर, बल्कि हम सब पर भी ज़िम्मेदारी डालते हैं। यह चार तरह की ज़िम्मेदारियाँ हैं:
क्या आतंकी बमबारी की धमकी का सामना करते राष्ट्र को अपने नागरिकों की आज़ादी छीनने की इजाज़त दी जा सकती है? क्या उसे महज़ संदेह के आधार पर किसी को गिरफ़्तार करने, चिट्ठियाँ देखने या फ़ोन टेप करने की छूट दी जानी चाहिए? क्या सच कबूल करवाने के लिए यातना का सहारा लिया जा सकता है? पाठ्यपुस्तक के अनुसार ऐसी स्थितियों में यह सवाल पूछना चाहिए कि संबद्ध व्यक्ति समाज के लिए ख़तरा तो नहीं पैदा कर रहा है। गिरफ़्तार लोगों को भी क़ानूनी सलाह और अदालत के सामने अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना ही चाहिए। सरकारों को ऐसी शक्तियाँ देने में बेहद सावधानी बरतनी चाहिए जिनसे नागरिक स्वतंत्रताओं में कटौती हो सकती है, क्योंकि इनका दुरुपयोग हो सकता है और सरकारें निरंकुश होकर उसी उद्देश्य को कमज़ोर कर सकती हैं जिसके लिए वे बनी हैं, यानी राज्य के सदस्यों का कल्याण।
“क्या कल तुमने टी.वी. पर ताज़ा तरीन स्टिंग ऑपरेशन देखा? प्रसिद्ध सिने तारिका और नामी अधिकारी के बीच की बातचीत पर मुझे तो यक़ीन ही नहीं हुआ।” · “यह टी.वी. पर सनसनी फैलाने का सस्ता तरीक़ा है। इसके अलावा यह उनके निजता के अधिकार का अतिक्रमण भी है।”
“किसी व्यक्ति के अधिकार वहाँ ख़त्म हो जाते हैं, जहाँ दूसरे व्यक्ति की नाक शुरू होती है।”
अधिकार कभी संपूर्ण-सर्वोच्च नहीं हो सकते, फिर भी हमें अपने और दूसरों के अधिकारों की रक्षा में चौकस रहने की ज़रूरत है, क्योंकि ये ही लोकतांत्रिक समाज की बुनियाद का निर्माण करते हैं।
10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा ने मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को स्वीकार और लागू किया। सभा ने सभी सदस्य देशों से इसका पाठ विद्यालयों और अन्य शैक्षिक संस्थानों में प्रचारित-प्रसारित करने का आवाह्न किया।
“चूँकि, मानव परिवार के सभी सदस्यों की स्वाभाविक अंतर्निहित गरिमा तथा उनके समान एवं अत्याज्य अधिकारों की प्रतिष्ठा विश्व में स्वतंत्रता, न्याय तथा शांति की आधारशिला है।” घोषणा यह भी कहती है कि मानव अधिकारों की अवमानना से उपजे क्रूरतापूर्ण कृत्यों से बचने और मनुष्य को अत्याचार के विरुद्ध विद्रोह जैसे अंतिम अस्त्र तक न पहुँचना पड़े, इसके लिए विधि के शासन द्वारा मानवाधिकारों की रक्षा आवश्यक है।

- अधिकार = हकदारी/औचित्यपूर्ण दावा; इच्छा और अधिकार में फ़र्क़ है
- दो आधार : गरिमा-सम्मान की ज़िंदगी (विश्वजनीन अधिकार) और हमारी बेहतरी (शिक्षा जैसे सार्वभौम अधिकार)
- प्राकृतिक अधिकार (जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति) → आज “मानवाधिकार”; कांट: गरिमा किसी क़ीमत से ऊपर
- क़ानूनी मान्यता अधिकार को दर्जा देती है, पर वह अधिकार का आधार नहीं; मौलिक अधिकार भारत का संवैधानिक नाम है
- अधिकार राज्य पर दो तरह के दायित्व डालते हैं : कुछ करना, और कुछ न करना (मनमाना गिरफ़्तार न करना)
- तीन प्रकार : राजनीतिक+नागरिक स्वतंत्रता, आर्थिक, सांस्कृतिक अधिकार
- चार ज़िम्मेदारियाँ : आम भलाई, दूसरों का सम्मान, टकराव में संतुलन, चौकसी
- मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा : 10 दिसंबर 1948, संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा द्वारा स्वीकृत
- क्या मुझे अधिकार की परिभाषा और इच्छा-अधिकार का फ़र्क़ शब्दशः याद है?
- क्या मुझे अधिकारों के दावे के दोनों आधार अलग-अलग उदाहरण सहित याद हैं?
- क्या मुझे तीनों प्राकृतिक अधिकार और कांट के दोनों तर्क याद हैं?
- क्या मुझे राज्य के “क्या करना है” और “क्या नहीं करना है” वाले उदाहरण अलग-अलग याद हैं?
- क्या मैं बता सकता हूँ कि राजनीतिक अधिकार किन तीन तरीक़ों से लोगों के कल्याण में सहयोग करते हैं, और राष्ट्रीय सुरक्षा वाले प्रतिबंधों पर पुस्तक कौन-सा सवाल पूछने को कहती है?
- क्या मुझे तीनों प्रकार के अधिकार (राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक) का एक-एक उदाहरण याद है?
- क्या मैं चारों ज़िम्मेदारियाँ क्रम से गिना सकता हूँ?
- क्या मुझे सार्वभौमिक घोषणा की तारीख़ और प्रस्तावना की मूल पंक्ति याद है?