1 भूमिका
नागरिकता की परिभाषा किसी राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता के रूप में की गई है। समकालीन विश्व में राष्ट्रों ने अपने सदस्यों को एक सामूहिक राजनीतिक पहचान के साथ-साथ कुछ अधिकार भी प्रदान किए हैं। इसीलिए हम संबद्ध राष्ट्र के आधार पर अपने को भारतीय, जापानी या जर्मन मानते हैं। नागरिक अपने राष्ट्र से कुछ बुनियादी अधिकारों के अलावा कहीं भी यात्रा करने में सहयोग और सुरक्षा की अपेक्षा रखते हैं।
नागरिकता की परिभाषा किसी राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता के रूप में की गई है। किसी राष्ट्र के संपूर्ण सदस्य होने का महत्त्व तब ठीक-ठीक समझ में आता है, जब हम उन हज़ारों शरणार्थियों व अवैध प्रवासियों की स्थिति के बारे में सोचते हैं जिन्हें कोई राष्ट्र सदस्यता देने को तैयार नहीं (जैसे मध्यपूर्व के फ़िलिस्तीनी शरणार्थी)।
नागरिकों को दिए गए अधिकारों की सुस्पष्ट प्रकृति विभिन्न राष्ट्रों में भिन्न-भिन्न हो सकती है, लेकिन अधिकतर लोकतांत्रिक देशों ने आज उनमें कुछ राजनीतिक अधिकार (जैसे मतदान), कुछ नागरिक अधिकार (जैसे अभिव्यक्ति या आस्था की आज़ादी) और कुछ सामाजिक-आर्थिक अधिकार (जैसे न्यूनतम मज़दूरी या शिक्षा पाने का अधिकार) शामिल किए हैं। अधिकारों और प्रतिष्ठा की समानता नागरिकता के बुनियादी अधिकारों में से एक है।
नागरिक आज जिन अधिकारों का प्रयोग करते हैं, वे सभी संघर्ष के बाद ही हासिल हुए हैं। जनता ने अपनी स्वतंत्रता और अधिकारों को मुखर करने के लिए शक्तिशाली राजतंत्रों के ख़िलाफ़ प्रारंभिक संघर्ष छेड़े थे। अनेक यूरोपीय देशों में ऐसे संघर्ष हुए, उनमें से कुछ हिंसक थे, जैसे 1789 की फ्रांसीसी क्रांति। एशिया और अफ़्रीका के अनेक उपनिवेशों में समान नागरिकता की माँग औपनिवेशिक शासकों से स्वतंत्रता हासिल करने के संघर्ष का हिस्सा रही। दक्षिण अफ़्रीका में समान नागरिकता पाने के लिए वहाँ की अश्वेत आबादी को सत्तारूढ़ गोरे अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ लंबा संघर्ष करना पड़ा, जो 1990 के दशक के आरंभ तक जारी रहा।
सत्रहवीं से बीसवीं सदी के बीच यूरोप के गोरे लोगों ने दक्षिण अफ़्रीका पर अपना शासन कायम रखा। 1994 तक अपनाई गई नीतियों के अनुसार: श्वेत लोगों को मत देने, चुनाव लड़ने और सरकार चुनने का अधिकार था; वे संपत्ति ख़रीदने और देश में कहीं भी आने-जाने के लिए स्वतंत्र थे। काले लोगों को ऐसे अधिकार नहीं थे। काले और गोरे लोगों के लिए पृथक बस्तियाँ बसाई गई थीं। काले लोगों को गोरों की बस्ती में काम करने के लिए ‘पास’ लेने पड़ते थे और वहाँ अपने परिवार रखने की अनुमति नहीं थी। अलग-अलग रंग के लोगों के लिए विद्यालय भी अलग-अलग थे। क्या इस स्थिति में अश्वेत लोगों को पूर्ण और समान सदस्यता मिली हुई थी?
पूर्ण सदस्यता और समान अधिकार पाने का संघर्ष विश्व के कई हिस्सों में आज भी जारी है, जैसे भारत में महिला आंदोलन और दलित आंदोलन, जिनका मक़सद जनमत बदलना और समान अधिकार-अवसर सुनिश्चित करने के लिए सरकारी नीतियों को प्रभावित करना है।
नागरिकता सिर्फ़ राज्यसत्ता और उसके सदस्यों के बीच के संबंधों तक सीमित नहीं, बल्कि यह नागरिकों के आपसी संबंधों के बारे में भी है। इसमें नागरिकों के एक-दूसरे के प्रति और समाज के प्रति निश्चित दायित्व शामिल हैं, जिनमें सिर्फ़ राज्य द्वारा थोपी गई कानूनी बाध्यताएँ ही नहीं, बल्कि समुदाय के सहजीवन में भागीदार होने और योगदान करने का नैतिक दायित्व भी शामिल है। नागरिकों को देश के सांस्कृतिक और प्राकृतिक संसाधनों का उत्तराधिकारी और न्यासी भी माना जाता है।
अपने क्षेत्र के नागरिकों की उन गतिविधियों के उदाहरण सोचें जो दूसरों की मदद करने, क्षेत्र की उन्नति या पर्यावरण की रक्षा से संबंधित हों। ऐसी गतिविधियों की एक सूची बनाएँ जो आपके हमउम्र युवाओं द्वारा अपनाई जा सकती हैं।
2 संपूर्ण और समान सदस्यता
अगर आपने कभी भीड़ भरे रेल के डिब्बे या बस में सफर किया है तो आप इस चलन से अवगत होंगे: जो लोग प्रवेश पाने के लिए पहले शायद एक-दूसरे से लड़ पड़े थे, अंदर पहुँचते ही दूसरों को बाहर रखने के साझे स्वार्थ में शामिल हो जाते हैं। जल्दी ही ‘भीतरी’ और ‘बाहरी’ का विभाजन उभर आता है और ‘बाहरी’ को ख़तरे के रूप में देखा जाने लगता है।
इसी तरह की प्रक्रियाएँ समय-समय पर नगरों, प्रदेशों या कभी-कभार पूरे राष्ट्र में भी चलती हैं। अगर आजीविका, चिकित्सा या शिक्षा जैसी सुविधाएँ और जल-जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधन सीमित हों, तो ‘बाहरी’ लोगों के प्रवेश को रोकने की माँग उठने की संभावना रहती है, भले ही वे सहनागरिक क्यों न हों। “मुंबई मुंबईकर (मुंबई वाले) के लिए” का नारा ऐसी ही भावनाएँ प्रकट करता है। भारत और विश्व के विभिन्न हिस्सों में इस तरह के अनेक संघर्ष होते आए हैं।
इससे यह प्रश्न उठता है कि आख़िर “संपूर्ण और समान सदस्यता” का असली अर्थ क्या है? क्या इसका अर्थ यह है कि नागरिकों को देश में जहाँ भी चाहें रहने, पढ़ने या काम करने का समान अधिकार और अवसर मिलना चाहिए? क्या इसका अर्थ यह है कि सभी अमीर-गरीब नागरिकों को कुछ बुनियादी अधिकार और सुविधाएँ मिलनी चाहिए?
2.1 गमनागमन की स्वतंत्रता और प्रवासी मज़दूर
अपने देश और अन्य अनेक देशों में नागरिकों को प्रदत्त अधिकारों में एक है गमनागमन की स्वतंत्रता। यह अधिकार कामगारों के लिए विशेष महत्त्व का है। गृहक्षेत्र में अवसर उपलब्ध न होने पर कामगार रोज़गार की तलाश में आप्रवास करते हैं। उदाहरण के लिए, सूचना तकनीक के अधिकतर कर्मी बंगलोर जैसे शहरों की ओर उमड़ते हैं, केरल की नर्सें पूरे देश में कहीं भी मिल सकती हैं, और शहरों में तेज़ी से पनपता भवन-निर्माण उद्योग देश के विभिन्न हिस्सों के श्रमिकों को आकर्षित करता है।
1950 का दशक संयुक्त राज्य अमेरिका के अनेक दक्षिणी राज्यों में काली और गोरी आबादी के बीच बरक़रार विषमताओं के ख़िलाफ़ नागरिक अधिकार आंदोलन के उभार का साक्षी है। ये विषमताएँ “पृथक्करण कानून” के ज़रिए पोषित होती थीं, जिनसे काले लोगों को अनेक नागरिक और राजनीतिक अधिकारों से वंचित किया जाता था और रेल, बस, स्कूल, होटल जैसी सुविधाओं में गोरे-काले के लिए अलग-अलग स्थान तय थे।
इन कानूनों के ख़िलाफ़ आंदोलन में मार्टिन लूथर किंग जूनियर अग्रणी अश्वेत नेता थे। उनके तीन तर्क: (1) आत्म-गौरव और आत्म-सम्मान में विश्व का हर मनुष्य बराबर है, चाहे उसकी जाति या वर्ण कुछ भी हो। (2) पृथक्करण राजनीति के चेहरे पर “सामाजिक कोढ़” की तरह है, क्योंकि यह ऐसे कानूनों के शिकार लोगों को गहरे मनोवैज्ञानिक ज़ख़्म देता है; पृथक्करण की प्रथा गोरे समुदाय के जीवन की गुणवत्ता भी कम करती है (जैसे गोरे समुदाय ने अदालत के निर्देश के अनुसार कुछ सामुदायिक उद्यानों में काले लोगों को प्रवेश देने के बजाय उन्हें बंद कर दिया, और कुछ बेसबॉल टीमें टूट गईं क्योंकि अधिकारी काले खिलाड़ियों को स्वीकार नहीं करना चाहते थे)। (3) पृथक्करण कानून लोगों के बीच कृत्रिम सीमाएँ खींचते हैं और उन्हें देश के व्यापक हित के लिए एक-दूसरे का सहयोग करने से रोकते हैं। किंग ने पृथक्करण कानूनों के ख़िलाफ़ शांतिपूर्ण और अहिंसक प्रतिरोध का आह्वान किया और कहा: “हमें अपने रचनात्मक प्रतिरोध को कभी भी शारीरिक हिंसा में ढालकर पतन का शिकार नहीं होने देना चाहिए।”
हालाँकि, अधिक संख्या में रोज़गार बाहर के लोगों के हाथ में जाने के ख़िलाफ़ अक्सर स्थानीय लोगों में प्रतिरोध की भावना पैदा हो जाती है, कभी-कभी कम मज़दूरी पर काम मिलने की वजह से भी। कुछ नौकरियों को राज्य के मूल निवासियों या स्थानीय भाषा जानने वालों तक सीमित रखने की माँग उठती है, और राजनीतिक पार्टियाँ यह मुद्दा उठाती हैं। यह प्रतिरोध कभी-कभी ‘बाहरी’ के ख़िलाफ़ संगठित हिंसा का रूप भी ले लेता है। भारत के लगभग सभी क्षेत्र इस तरह के आंदोलनों से गुज़र चुके हैं। एक और अहम भेद यह है कि गरीब और कुशल प्रवासियों के प्रति हमारी प्रतिक्रिया अक्सर अलग-अलग होती है, हम कुशल-दौलतमंद कामगारों का जितना स्वागत करते हैं उतना ग़रीब प्रवासियों का नहीं।
पूरे पृष्ठ का यह कार्टून शहरी मध्यवर्ग के परिवारों को उन सब कामों से जूझते दिखाता है जो आमतौर पर प्रवासी मज़दूर उनके लिए करते हैं : खाना बनाना और बर्तन धोना, सफ़ाई, सामान ढोना, बच्चों की देखभाल, मरम्मत, गाड़ी और घर धोना। संदेश : प्रवासी, अक्सर कम मज़दूरी पर, ज़रूरी और उपयोगी काम करते हैं और उनके बिना शहर नहीं चल सकता, भले ही स्थानीय लोग कभी-कभी उन्हें ‘बाहरी’ मानकर उनका विरोध करें।
नागरिकों के लिए देशभर में गमनागमन और रोज़गार की स्वतंत्रता के पक्ष और विपक्ष के तर्कों की जाँच करें। क्या किसी क्षेत्र में लंबे समय से रहने वाले निवासियों को रोज़गार और सुविधाओं में प्राथमिकता मिलनी चाहिए? क्या राज्यों को व्यावसायिक कॉलेजों में बाहरी छात्रों के प्रवेश के लिए कोटा निर्धारित करने की अनुमति दी जानी चाहिए?
हालाँकि, लोकतांत्रिक समाजों में भी कभी-कभी विवाद उठ सकते हैं। प्रतिवाद करने का अधिकार हमारे संविधान में नागरिकों को सुनिश्चित की गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक पहलू है, बशर्ते वह किसी की जान-माल को नुकसान न पहुँचाए। नागरिक समूह बनाकर, प्रदर्शन कर, मीडिया का उपयोग कर या अदालत में जाकर जनमत और सरकारी नीतियों को प्रभावित करने के लिए स्वतंत्र हैं। लोकतंत्र का एक बुनियादी सिद्धांत यह है कि ऐसे विवादों का समाधान बल प्रयोग के बजाय संधि-वार्ता और विचार-विमर्श से हो, यह नागरिकता के प्रमुख दायित्वों में से एक है।
3 समान अधिकार
इस भाग में हम नागरिकता के एक अन्य पहलू की तहक़ीक़ात करेंगे: क्या पूर्ण और समान नागरिकता का अर्थ यह है कि राज्यसत्ता द्वारा सभी नागरिकों को, चाहे वे अमीर या ग़रीब हों, कुछ बुनियादी अधिकारों और न्यूनतम जीवन-स्तर की गारंटी दी जानी चाहिए? इसके लिए हम शहरी ग़रीबों पर नज़र डालेंगे। भारत के हर शहर में बहुत बड़ी आबादी झोपड़पट्टियों और अवैध कब्ज़े की ज़मीन पर बसी है। यद्यपि ये लोग अपरिहार्य और उपयोगी काम अक्सर कम मज़दूरी पर करते हैं, फिर भी शहर की बाक़ी आबादी उन्हें अवांछनीय मेहमान की तरह देखती है और उन पर संसाधनों पर बोझ बनने या अपराध-बीमारी फैलाने का आरोप मढ़ती है।
गंदी बस्तियों की स्थिति अक्सर वीभत्स होती है, छोटे-छोटे कमरों में कई-कई लोग ठुँसे रहते हैं, जहाँ न निजी शौचालय होता है, न जलापूर्ति और न सफ़ाई। फिर भी झोपड़पट्टियों के निवासी अपने श्रम से अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं, फेरीवाले, छोटे व्यापारी, सफ़ाईकर्मी, घरेलू नौकर, नल ठीक करने वाले या मिस्त्री के रूप में।
ब्रिटिश समाजशास्त्री टी.एच. मार्शल (1893-1981) ने अपनी पुस्तक नागरिकता और सामाजिक वर्ग (1950) में नागरिकता को परिभाषित किया: “किसी समुदाय के पूर्ण सदस्यों को प्रदत्त प्रतिष्ठा।” इस प्रतिष्ठा को ग्रहण करने वाले सभी लोग अधिकारों और कर्त्तव्यों के मामले में बराबर होते हैं। मार्शल के अनुसार नागरिकता में तीन प्रकार के अधिकार शामिल हैं:
• नागरिक अधिकार: व्यक्ति के जीवन, आज़ादी और जायदाद की हिफ़ाज़त करते हैं
• राजनीतिक अधिकार: व्यक्ति को शासन प्रक्रिया में सहभागी बनने की शक्ति देते हैं
• सामाजिक अधिकार: व्यक्ति के लिए शिक्षा और रोज़गार को सुलभ बनाते हैं
मार्शल ने सामाजिक वर्ग को “असमानता की व्यवस्था” कहा; नागरिकता वर्ग पदानुक्रम के विभाजक परिणामों का प्रतिकार कर समानता सुनिश्चित करती है।

शहरी ग़रीबों की हालत के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। उदाहरण के लिए, जनवरी 2004 में फुटपाथी दुकानदारों के लिए एक राष्ट्रीय नीति तैयार की गई, ताकि उन्हें सरकारी नियमों के दायरे में उत्पीड़न-मुक्त कारोबार की शक्ति मिले। बाद में स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट/पथ विक्रेता (जीविका संरक्षण और पथ विक्रय विनियमन) अधिनियम, 2014 भी पारित हुआ। झोपड़पट्टी निवासियों के लिए वोट देने जैसा बुनियादी राजनीतिक अधिकार भी कठिन हो जाता है, क्योंकि मतदाता सूची में दर्ज होने के लिए स्थायी पता चाहिए, जो अनधिकृत बस्तियों और पटरी पर रहने वालों के लिए पेश करना कठिन होता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने मुंबई की झोपड़पट्टियों में रहने वालों के अधिकारों के बारे में समाजकर्मी ओल्गा टेलिस की जनहित याचिका (ओल्गा टेलिस बनाम बंबई नगर निगम) पर 1985 में एक महत्त्वपूर्ण फ़ैसला दिया। याचिका में कार्यस्थल के निकट रहने की वैकल्पिक जगह न होने के कारण फुटपाथ या झोपड़पट्टियों में रहने के अधिकार का दावा किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा: “संविधान की धारा-21 में जीने के अधिकार की गारंटी दी गई है, जिसमें आजीविका का अधिकार शामिल है। इसलिए अगर फुटपाथवासियों को बेदख़ल करना हो, तो उन्हें आश्रय के अधिकार के तहत पहले वैकल्पिक जगह उपलब्ध करानी होगी।”
हमारे समाज में हाशिए पर ठेले जा रहे अन्य समूहों में आदिवासी और वनवासी शामिल हैं, जो अपने जीवनयापन के लिए जंगल और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। बढ़ती आबादी, संसाधनों की कमी, खनन के इच्छुक उद्यमियों के दबाव और पर्यटन उद्योग से इनकी जीवन-पद्धति और आजीविका ख़तरे में है। सरकारें इस सवाल से जूझ रही हैं कि देश के विकास को ख़तरे में डाले बिना इन लोगों और इनके रहवास की सुरक्षा कैसे करें, और यह मुद्दा सिर्फ़ आदिवासी आबादी नहीं बल्कि सभी नागरिकों को प्रभावित करता है।
ज़िम्बाब्वे में भूमि वितरण के सरकारी आँकड़ों के अनुसार, लगभग 4,400 गोरे परिवारों के पास लगभग 1 करोड़ हेक्टेयर (देश की कुल कृषि योग्य भूमि का 32%) उपजाऊ और सिंचित भूमि है, जबकि लगभग 10 लाख काले किसान परिवारों के पास केवल 1.6 करोड़ हेक्टेयर (38%) कम उपजाऊ और असिंचित भूमि है। ज़िम्बाब्वे में गोरों की आबादी कुल जनसंख्या की केवल 0.06% है, फिर भी लगभग सौ वर्ष पहले गोरे लोगों ने उपजाऊ ज़मीन स्थानीय निवासियों से अपने कब्ज़े में ले ली थी। 1997 में ज़िम्बाब्वे के राष्ट्रपति राबर्ट मुगाबे ने 1500 बड़े फार्मों पर कब्ज़ा करने की योजना घोषित की। ज़िम्बाब्वे के काले और गोरे नागरिकों के अपने-अपने दावों का समर्थन या विरोध करने के लिए आप नागरिकता के कौन-कौन से विचारों का उपयोग करेंगे?
सभी नागरिकों को समान अधिकार और अवसर देना किसी सरकार के लिए आसान मामला नहीं है, क्योंकि विभिन्न समूहों की ज़रूरतें अलग-अलग हो सकती हैं और एक समूह के अधिकार दूसरे समूह के अधिकारों के प्रतिकूल हो सकते हैं। नागरिकों के लिए समान अधिकार का मतलब यह नहीं कि सभी पर समान नीतियाँ लागू कर दी जाएँ, बल्कि नीतियाँ तैयार करते समय लोगों की विभिन्न ज़रूरतों और दावों का ध्यान रखा जाना चाहिए, ताकि लोगों को अधिक बराबरी पर लाया जा सके।
4 नागरिक और राष्ट्र
राष्ट्र-राज्य की अवधारणा आधुनिक काल में विकसित हुई। राष्ट्र-राज्य की संप्रभुता और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का सबसे पहला दावा 1789 में फ्रांस के क्रांतिकारियों ने किया था। राष्ट्र-राज्यों का दावा है कि उनकी सीमाएँ सिर्फ़ राज्यक्षेत्र को नहीं, बल्कि एक अनोखी संस्कृति और साझा इतिहास को भी परिभाषित करती हैं। राष्ट्रीय पहचान झंडा, राष्ट्रगान, राष्ट्रभाषा या कुछ ख़ास उत्सवों जैसे प्रतीकों से व्यक्त होती है।
अधिकतर आधुनिक राज्य विभिन्न धर्मों, भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं के लोगों को सम्मिलित करते हैं। लोकतांत्रिक देश आमतौर पर अपनी पहचान को यथासंभव समावेशी परिभाषित करने का प्रयास करते हैं, लेकिन व्यवहार में अधिकतर देश ऐसी पहचान अपनाते हैं जो कुछ नागरिकों के लिए राष्ट्र से जुड़ना अन्यों की तुलना में आसान बना देती है। यह आप्रवासियों का देश होने पर गौरवान्वित संयुक्त राज्य अमेरिका के बारे में भी उतना ही सच है जितना किसी अन्य देश के बारे में।
उदाहरण के लिए, फ्रांस स्वयं को धर्मनिरपेक्ष और समावेशी होने का दावा करने वाला देश है। संस्कृति और भाषा इसकी राष्ट्रीय पहचान की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ हैं, और सभी नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने जीवन के सार्वजनिक पहलुओं में फ्रांसीसी भाषा-संस्कृति से आत्मसात हो जाएँ, भले ही वे अपने निजी जीवन में अपनी आस्थाएँ बनाए रखें। यही नीति कुछ विवादों को जन्म देती है: फ्रांस के सिख छात्रों की स्कूल में पगड़ी पहनने और मुस्लिम लड़कियों की स्कूली वर्दी के साथ सिर पर दुपट्टा डालने की माँग को कुछ स्कूलों ने इस आधार पर अमान्य कर दिया कि यह सरकारी शिक्षा के सार्वजनिक क्षेत्र में धार्मिक प्रतीक लाने का मामला है।
नागरिकता देने की कसौटी हर देश में भिन्न होती है। इज़राइल और जर्मनी जैसे देशों में धर्म या जातीय मूल जैसे तत्त्वों को वरीयता दी जाती है। जर्मनी में एक समय तुर्की मज़दूरों को काम के लिए बुलाया गया था, और उनकी स्थायी माँग है कि जर्मनी में ही जन्मे-पले उनके बच्चों को स्वतः जर्मनी की नागरिकता मिलनी चाहिए, यह बहस आज भी जारी है।
भारत स्वयं को धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्य कहता है। स्वतंत्रता आंदोलन का आधार व्यापक था और विभिन्न धर्म-क्षेत्र-संस्कृति के लोगों को जोड़ने के प्रयास हुए। यह सच है कि मुस्लिम लीग से विवाद न सुलझ पाने पर 1947 में देश का विभाजन हुआ, लेकिन इसने धर्मनिरपेक्ष और समावेशी चरित्र बनाए रखने के भारतीय राष्ट्रीय नेताओं के संकल्प को और मज़बूत ही किया, जो संविधान में सम्मिलित हुआ।
भारतीय संविधान ने बहुत विविधतापूर्ण समाज को समायोजित करने की कोशिश की, जैसे अनुसूचित जाति-जनजाति, पहले समान अधिकार से वंचित महिलाएँ, और अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह के आधुनिक सभ्यता से कम संपर्क वाले सुदूरवर्ती समुदाय। इसने लोगों को उनकी निजी आस्था, भाषा या सांस्कृतिक रिवाज़ छोड़ने के लिए बाध्य किए बिना सभी को समान अधिकार देने का अद्वितीय प्रयोग किया। दिल्ली में गणतंत्र दिवस परेड विभिन्न क्षेत्र, संस्कृति और धर्म के लोगों को सम्मिलित करने के इस प्रयास को प्रतिबिंबित करती है।
नागरिकता से जुड़े प्रावधान संविधान के भाग दो और संसद द्वारा बाद में पारित कानूनों में मिलते हैं। संविधान ने नागरिकता की लोकतांत्रिक और समावेशी धारणा अपनाई।
संविधान में नागरिकों के अधिकार और दायित्व दर्ज हैं। यह प्रावधान भी है कि राज्य केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर नागरिकों से भेदभाव न करे। धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकार भी संरक्षित हैं। फिर भी इन समावेशी प्रावधानों ने भी संघर्ष और विवादों को जन्म दिया है, जैसे महिला आंदोलन, दलित आंदोलन या विकास योजनाओं से विस्थापित लोगों का संघर्ष। भारत के अनुभव से संकेत मिलता है कि किसी देश में लोकतांत्रिक नागरिकता एक परियोजना है, एक सिद्ध तथ्य नहीं, और जैसे-जैसे समाज बदलते हैं वैसे-वैसे नए मुद्दे उठते रहते हैं जिन पर लोकतांत्रिक राज्य को खुले दिमाग़ से बातचीत करनी होती है।
विद्यालयों या सेना जैसी किसी अन्य सार्वजनिक संस्था के लिए साझा वर्दी पर ज़ोर देना और पगड़ी जैसे धार्मिक प्रतीकों पर प्रतिबंध लगाना उपयुक्त नहीं है?
अपने घर, विद्यालय या आसपास कार्यरत तीन कामगार परिवारों का सर्वेक्षण करें: वे कहाँ रहते हैं? आवास में कितने लोग रहते हैं? उन्हें किस तरह की सुविधाएँ उपलब्ध हैं? क्या उनके बच्चे विद्यालय जाते हैं? साथ ही स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट (जीविका संरक्षण और पथ विक्रय विनियमन अधिनियम), 2014 के बारे में पता करें।
5 सार्वभौमिक नागरिकता
जब हम शरणार्थियों या अवैध आप्रवासियों के बारे में सोचते हैं तो अनेक छवियाँ उभरती हैं: एशिया-अफ़्रीका से यूरोप या अमेरिका में चोरी-छिपे घुसने की कोशिश करने वाले लोग, या युद्ध-अकाल से विस्थापित लोग। सूडान के डरफर क्षेत्र के शरणार्थी, फ़िलिस्तीनी, बर्मी या बांग्लादेशी शरणार्थी इसके उदाहरण हैं, ये सभी अपने ही या पड़ोसी देश में शरणार्थी बनने के लिए मजबूर किए गए लोग हैं।
हम अक्सर मान लेते हैं कि किसी देश की पूर्ण सदस्यता उन सबको उपलब्ध होनी चाहिए जो सामान्यतया वहाँ रहते-काम करते हैं। लेकिन हर राज्य नागरिकता देने की शर्तें भी तय करता है, और अवांछित आगंतुकों को बाहर रखने के लिए अपनी ताक़त का प्रयोग करता है। दीवारों-बाड़ों के बावजूद विश्व में बड़े पैमाने पर देशांतरण होता रहता है। युद्ध, उत्पीड़न या अकाल से विस्थापित लोग, अगर कोई देश उन्हें स्वीकार करने को राज़ी न हो और वे घर न लौट सकें, तो राज्यहीन या शरणार्थी बन जाते हैं। वे शिविरों में या अवैध प्रवासी के रूप में रहने के लिए मजबूर किए जाते हैं, और अक्सर वे क़ानूनी तौर पर काम नहीं कर सकते, अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा नहीं सकते या संपत्ति अर्जित नहीं कर सकते। समस्या इतनी विकराल है कि संयुक्त राष्ट्र ने शरणार्थियों की मदद के लिए एक उच्चायुक्त नियुक्त किया हुआ है।
भारत उत्पीड़ित लोगों को आश्रय देने पर गर्व करता है, जैसा उसने 1959 में दलाई लामा और उनके अनुयायियों के लिए किया। भारतीय राष्ट्र की सभी सीमाओं से पड़ोसी देशों के लोगों का प्रवेश होता रहा है, और इनमें से अनेक लोग वर्षों-पीढ़ियों तक राज्यहीन व्यक्तियों की तरह शिविरों में या अवैध प्रवासी के रूप में रहते हैं, अंततः इनमें से अपेक्षाकृत कुछ को ही नागरिकता मिलती है। ऐसी समस्याएँ लोकतांत्रिक नागरिकता के इस वायदे को चुनौती देती हैं कि समकालीन विश्व में सभी लोगों को नागरिक की पहचान और अधिकार उपलब्ध होने चाहिए। अनेक लोग अपनी पसंद के देश की नागरिकता हासिल नहीं कर सकते, और उनके लिए अपनी पहचान का कोई विकल्प भी नहीं होता।
नागरिक के रूप में कितने लोगों को अंगीकार किया जा सकता है, इस सवाल पर फ़ैसला करना अनेक देशों के लिए कठिन मानवीय और राजनीतिक समस्या है। अनेक देशों में युद्ध या उत्पीड़न से पलायन करने वाले लोगों को अंगीकार करने की नीति है, लेकिन वे भी लोगों की अनियंत्रित भीड़ को स्वीकार करना या सुरक्षा के संदर्भ में देश को जोखिम में डालना नहीं चाहेंगे।
भारत में अभी रह रहे कुछ राज्यहीन लोगों की सूची बनाओ। उनमें से किसी पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।
6 विश्व नागरिकता
इन उक्तियों पर ग़ौर करें: 2004 में दक्षिण एशिया के कई देशों पर कहर बरपाने वाली सुनामी से पीड़ित लोगों के लिए सहानुभूति और सहायता उमड़ पड़ी। अंतरराष्ट्रीय तंत्र आज आतंकवादियों को जोड़ने में मदद करता है। विभिन्न देशों में बर्ड फ़्लू के प्रसार और मानव-विषाणुजनित महामारी की संभावना रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र सक्रिय है। इन उक्तियों में साझा यह है: हम एक अंतर्संबद्ध विश्व में रहते हैं।
इंटरनेट, टेलीविज़न और सेलफ़ोन जैसे संचार के नए साधनों ने हमें विश्व की घटनाओं से तत्काल जोड़ दिया है, हम टेलीविज़न पर विनाश और युद्धों को होते देख सकते हैं, जिससे विभिन्न देशों के लोगों में साझे सरोकार और सहानुभूति विकसित हुई है। वैश्विक/विश्व नागरिकता के समर्थक दलील देते हैं कि यद्यपि विश्व-समाज अभी विद्यमान नहीं, राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार लोग आज एक-दूसरे से जुड़ा महसूस करते हैं, जैसा एशियाई सुनामी के पीड़ितों के लिए विश्वभर से उमड़ी सहायता से पता चलता है। वे मानते हैं कि हमें इस भावना को मज़बूत कर वैश्विक नागरिकता की अवधारणा की दिशा में सक्रिय होना चाहिए।
राष्ट्रीय नागरिकता की अवधारणा मानती है कि हमारी राज्यसत्ता ही हमें गरिमा से जीने के लिए ज़रूरी सुरक्षा और अधिकार दे सकती है। पर आज राज्यसत्ताओं के सामने ऐसी अनेक समस्याएँ हैं जिनका मुक़ाबला वे अकेले नहीं कर सकतीं (जैसे प्रवासी और राज्यहीन लोगों की समस्या), इसलिए वैश्विक नागरिकता की अवधारणा राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार सहयोग को आसान बना सकती है। फिर भी, एक देश के भीतर की सामाजिक-आर्थिक असमानताओं का समाधान अंततः उसी समाज की सरकार और जनता कर सकती है, इसलिए पूर्ण और समान सदस्यता आज भी महत्त्वपूर्ण है। वैश्विक नागरिकता राष्ट्रीय नागरिकता की जगह नहीं लेती, बल्कि उसे अंतर्संबद्ध विश्व की समझदारी से जोड़कर पूरक बनाती है।
वैश्विक नागरिकता शिक्षा के बारे में पता करें कि यह क्या है और यह किन संगठनों द्वारा बढ़ावा दी जाती है।
- नागरिकता = किसी राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता; अधिकार संघर्ष से हासिल हुए (1789 फ्रांसीसी क्रांति, दक्षिण अफ़्रीका का संघर्ष 1990 के दशक तक)
- “पूर्ण और समान सदस्यता” का सवाल : गमनागमन की स्वतंत्रता, प्रवासी मज़दूर, मार्टिन लूथर किंग और पृथक्करण कानून
- टी.एच. मार्शल के तीन अधिकार : नागरिक, राजनीतिक, सामाजिक; ओल्गा टेलिस मुक़दमा (1985): धारा-21, आजीविका का अधिकार
- राष्ट्र-राज्य अपनी पहचान परिभाषित करता है (फ्रांस, इज़राइल, जर्मनी); भारत का संविधान भाग दो: नागरिकता के पाँच रास्ते (जन्म, वंश-परंपरा, पंजीकरण, देशीकरण, भू-क्षेत्र सम्मिलन)
- सार्वभौमिक नागरिकता : शरणार्थी, राज्यहीन लोग, भारत में दलाई लामा को शरण (1959)
- विश्व नागरिकता : अंतर्संबद्ध विश्व की सहानुभूति, पर राष्ट्रीय नागरिकता की पूरक है, विकल्प नहीं
- क्या मुझे “पूर्ण और समान सदस्यता” का ठीक-ठीक अर्थ और उसके तीन उदाहरण (मुंबई मुंबईकर, गमनागमन, मार्टिन लूथर किंग) याद हैं?
- क्या मुझे टी.एच. मार्शल के तीनों अधिकार अलग-अलग और ओल्गा टेलिस मुक़दमे का फ़ैसला याद है?
- क्या मुझे भारत में नागरिकता प्राप्ति के पाँचों रास्ते और भेदभाव-निषेध के आधार याद हैं?
- क्या मुझे राज्यहीन लोगों और शरणार्थियों की कठिनाइयाँ और भारत के दलाई लामा को शरण देने का उदाहरण याद है?
- क्या मैं बता सकता हूँ कि वैश्विक नागरिकता राष्ट्रीय नागरिकता की जगह क्यों नहीं ले सकती?