कक्षा 11 राजनीति विज्ञान बुक 2 अध्याय 7 राष्ट्रवाद (Nationalism) के नोट्स हिंदी में

राष्ट्रराष्ट्रवादआत्म-निर्णयबहुलवादअल्पसंख्यक अधिकारटैगोर

1 राष्ट्रवाद का परिचय

राष्ट्रवाद शब्द सुनते ही आम तौर पर देशभक्ति, राष्ट्रीय ध्वज और देश के लिए बलिदान जैसी बातें ज़ेहन में आती हैं। दिल्ली की गणतंत्र दिवस परेड भारतीय राष्ट्रवाद का एक बेजोड़ प्रतीक है, जो सत्ता और शक्ति के साथ-साथ भारत की विविधता को भी दिखाती है। लेकिन गहराई में जाने पर पता चलता है कि राष्ट्रवाद की कोई एक सुस्पष्ट और सर्वमान्य परिभाषा देना आसान नहीं है। फिर भी इसे समझने की कोशिश छोड़ी नहीं जा सकती, क्योंकि पिछली दो शताब्दियों में यह दुनिया की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्तियों में से एक रहा है।

राष्ट्रवाद का असर हमेशा एक जैसा नहीं रहा। इसने लोगों को गहरी निष्ठा से जोड़ा भी है और कट्टर नफ़रत में बाँटा भी है; इसने अत्याचारी शासन से मुक्ति दिलाई है तो युद्ध और कटुता का कारण भी बना है। उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप में इसने छोटी-छोटी रियासतों के एकीकरण से आज के जर्मनी और इटली जैसे बड़े राष्ट्र-राज्य बनाए, और लातिनी अमेरिका में भी कई नए राज्यों की स्थापना करवाई। राज्य की सीमाओं के सुदृढ़ीकरण के साथ स्थानीय निष्ठाएँ और बोलियाँ भी धीरे-धीरे राष्ट्रीय निष्ठाओं और सर्वमान्य जनभाषाओं के रूप में विकसित हुईं, और नए राष्ट्रों के लोगों ने राष्ट्र-राज्य की सदस्यता पर आधारित एक नई राजनीतिक पहचान अर्जित की। इसके ठीक उलट, बीसवीं सदी की शुरुआत में यही राष्ट्रवाद ऑस्ट्रियाई-हंगेरियाई और रूसी साम्राज्यों के पतन का कारण बना, और एशिया-अफ्रीका में ब्रिटिश, फ्रांसीसी, डच और पुर्तगाली साम्राज्यों के विघटन में भी इसकी भूमिका रही। भारत सहित तमाम उपनिवेशों का स्वाधीनता संघर्ष भी मूलतः एक राष्ट्रवादी संघर्ष ही था।

राष्ट्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया अभी जारी है। 1960 के दशक से ही सुस्थिर दिखने वाले राष्ट्र-राज्य भी कुछ समूहों या अंचलों द्वारा उठाई गई राष्ट्रवादी माँगों का सामना करते रहे हैं, जिनमें पृथक राज्य की माँग भी शामिल है। ऐसे पृथकतावादी आंदोलन कनाडा के क्यूबेकवासियों, उत्तरी स्पेन के बास्कवासियों, तुर्की-इराक के कुर्दों और श्रीलंका के तमिलों जैसे समूहों द्वारा चलाए जा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि राष्ट्रवाद की भाषा दोनों दिशाओं में इस्तेमाल होती है: अरबी राष्ट्रवाद तमाम अरब देशों को एक अखिल अरब संघ में जोड़ने की उम्मीद रखता है, जबकि बास्क या कुर्द जैसे आंदोलन मौजूदा राज्यों को तोड़ने के लिए संघर्षरत हैं। यही विरोधाभास इस अध्याय की मूल जिज्ञासा है: राष्ट्र क्या है, लोग राष्ट्र क्यों बनाते हैं, और राष्ट्रत्व के दावे राज्यत्व के दावों से क्यों जुड़ जाते हैं?

2 राष्ट्र किससे बनता है?

राष्ट्र किसी भी तरह का आकस्मिक जनसमूह नहीं है, लेकिन यह परिवार, जनजाति या अन्य सगोत्रीय समूहों से भी अलग है, क्योंकि परिवार और जनजाति में सदस्य प्रत्यक्ष या वंश-परंपरा के सूत्रों से जुड़े होते हैं, जबकि राष्ट्र के अधिकतर सदस्यों से हम कभी आमने-सामने भी नहीं मिलते। फिर भी राष्ट्र का अस्तित्व है, और लोग उसमें रहते व उसका आदर करते हैं।

आमतौर पर माना जाता है कि किसी एक साझी विशेषता, जैसे वंश, भाषा, धर्म या जातीयता, से राष्ट्र बनते हैं। लेकिन ऐसा कोई एक निश्चित गुण नहीं है जो सभी राष्ट्रों में समान रूप से मौजूद हो। कनाडा में अंग्रेज़ी और फ्रांसीसी दोनों भाषाभाषी लोग रहते हैं, भारत में भी अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं: यानी एक साझी भाषा ज़रूरी नहीं। इसी तरह कई राष्ट्रों का कोई साझा धर्म भी नहीं है। तो फिर राष्ट्र किससे बनता है? राष्ट्र बहुत हद तक एक ‘काल्पनिक’ समुदाय है, जो अपने सदस्यों के सामूहिक विश्वास, आकांक्षाओं और कल्पनाओं के सहारे एक सूत्र में बँधा होता है। पाठ्यपुस्तक इसे समझने के लिए चार आधार गिनाती है, और एक पाँचवीं बहस भी उठाती है कि क्या साझी सांस्कृतिक पहचान ही काफ़ी है।

राष्ट्र की कल्पना के चार आधार
1. साझे विश्वासराष्ट्र पहाड़-नदी जैसी भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि विश्वास से बनते हैं: जैसे कोई टीम तभी टीम है जब उसके सदस्य ख़ुद को एक समूह मानें
2. इतिहासराष्ट्र ख़ुद को अतीत से भविष्य तक फैली एक निरंतर ऐतिहासिक पहचान के रूप में देखते हैं, साझी स्मृतियों और अभिलेखों के ज़रिए
3. भूक्षेत्रराष्ट्र किसी ख़ास भूमि को अपनी गृहभूमि (मातृभूमि/पितृभूमि/पवित्र भूमि) मानते हैं। यही एक से अधिक दावों के चलते संघर्ष का कारण भी बनता है
4. साझे राजनीतिक आदर्शभविष्य की साझी दृष्टि और स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व की चाहत: लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, उदारवाद जैसे मूल्यों पर सहमति। लोकतंत्र में कुछ राजनीतिक मूल्यों और आदर्शों के लिए साझी प्रतिबद्धता ही राष्ट्र का सर्वाधिक वांछित आधार है, और नागरिकों के रूप में एक-दूसरे के अधिकारों को पहचानने से पैदा होने वाली आपसी जिम्मेदारियों को मान लेना राष्ट्र के प्रति वफादारी की सबसे कड़ी परीक्षा है
रट लेंनेहरू, “डिस्कवरी ऑफ इंडिया” में

भारत की सभ्यतागत निरंतरता को इतिहास-बोध के आधार के रूप में दिखाते हुए नेहरू ने लिखा: “हालाँकि बाहरी रूप में लोगों में विविधता और अनगिनत विभिन्नताएँ थीं, लेकिन हर जगह एकात्मकता की वह जबर्दस्त छाप थी जिसने हमें युगों तक साथ जोड़े रखा, चाहे हमें जो भी राजनीतिक भविष्य या दुर्भाग्य झेलना पड़ा हो।”

2.1 साझी राजनीतिक पहचान : क्या सांस्कृतिक एकता काफ़ी है?

बहुत-से लोग मानते हैं कि सिर्फ़ साझी राजनीतिक दृष्टि काफ़ी नहीं, बल्कि एक साझी भाषा या साझा वंश जैसी सांस्कृतिक पहचान भी ज़रूरी है। पाठ्यपुस्तक इसे लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक मानती है, और इसके दो कारण देती है। पहला, दुनिया का हर बड़ा धर्म भीतर से ही विविध है: हर धर्म में अनेक पंथ हैं जिनकी व्याख्याएँ अलग-अलग हैं; अगर इन भेदों को नज़रअंदाज़ कर एक समान धर्म को पहचान का आधार बना दिया जाए, तो इससे एक वर्चस्ववादी और दमनकारी समाज बनने का ख़तरा है। दूसरा, अधिकतर समाज सांस्कृतिक रूप से पहले से ही विविध हैं: किसी एक भाषा या धर्म को सदस्यता की शर्त बनाने से कुछ समूह ज़रूर बाहर हो जाएँगे, जिससे लोकतंत्र के सबसे बुनियादी आदर्श, सबके लिए समान बर्ताव और स्वतंत्रता, पर ही आँच आएगी। इसीलिए राष्ट्र की कल्पना सांस्कृतिक पदों में नहीं, बल्कि राजनीतिक शब्दावली में करना बेहतर है: यानी नागरिकों से किसी ख़ास धर्म, नस्ल या भाषा के प्रति नहीं, बल्कि देश के संविधान में दर्ज़ मूल्य-समूह के प्रति निष्ठा अपेक्षित है।

3 राष्ट्रीय आत्म-निर्णय

अन्य सामाजिक समूहों के विपरीत, राष्ट्र अपना शासन ख़ुद चलाने और अपना भविष्य ख़ुद तय करने का अधिकार चाहते हैं। इसे ही आत्म-निर्णय का अधिकार कहा जाता है। इसमें राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से अपनी एक पृथक राजनीतिक इकाई या राज्य के रूप में मान्यता माँगता है। अक्सर ऐसी माँग उन लोगों की ओर से आती है जो लंबे समय से किसी निश्चित भू-भाग पर साथ-साथ रहते आए हों और जिनमें साझी पहचान का बोध हो। कुछ मामलों में आत्म-निर्णय के ऐसे दावे एक स्वतंत्र राज्य बनाने की इच्छा से भी जुड़े होते हैं, जिनका संबंध समूह की संस्कृति की संरक्षा से होता है।

उन्नीसवीं सदी के यूरोप में ‘एक संस्कृति-एक राज्य’ का विचार ज़ोर पकड़ने लगा, और पहले विश्वयुद्ध के बाद वर्साय की संधि के ज़रिए राज्यों की सीमाएँ फिर से खींचते समय इसी विचार को आज़माया गया। इससे कई नए और छोटे स्वतंत्र राज्य बने, लेकिन उस समय उठ रही आत्म-निर्णय की सभी माँगों को संतुष्ट करना असंभव साबित हुआ। इसका भारी मूल्य चुकाना पड़ा: सीमाओं में बदलाव से लाखों लोग अपने पीढ़ियों पुराने घरों से उजड़ गए, और बहुत-से लोग सांप्रदायिक हिंसा के शिकार भी बने। इतना सब होने के बावजूद अधिकतर नए राज्यों में भी एक से अधिक नस्ल और संस्कृति के लोग रह ही गए। ये छोटे समुदाय अल्पसंख्यक बन गए और अक्सर नुकसान में रहे। इस विकास का सकारात्मक पहलू यह था कि उन बहुत-से राष्ट्रवादी समूहों को राजनीतिक मान्यता मिली जो स्वयं को एक अलग राष्ट्र के रूप में देखते थे और अपना शासन स्वयं चलाना तथा अपना भविष्य स्वयं तय करना चाहते थे।

यही अधिकार बीसवीं सदी में एशिया-अफ्रीका के उपनिवेशों के स्वाधीनता आंदोलनों ने भी माँगा: राजनीतिक स्वाधीनता से उन्हें सम्मान, न्याय और समृद्धि की उम्मीद थी। लेकिन यहाँ भी हर सांस्कृतिक समूह को अलग राज्य देना संभव नहीं हुआ, जिससे देशांतरण, सीमा-युद्ध और हिंसा जारी रही। इसका नतीजा एक विरोधाभास के रूप में सामने आया: जो राष्ट्र-राज्य ख़ुद संघर्ष से स्वाधीनता पा चुके थे, वे अब अपने ही भीतर आत्म-निर्णय माँगने वाले अल्पसंख्यक समूहों का विरोध करने लगे। इसीलिए आज ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग यह मानने लगे हैं कि समाधान नए राज्य बनाने में नहीं, बल्कि मौजूदा राज्यों को अधिक लोकतांत्रिक और समतामूलक बनाने में है, ताकि अलग-अलग सांस्कृतिक पहचान वाले लोग समान नागरिकों की तरह साथ रह सकें। जो राष्ट्र-राज्य अपने अल्पसंख्यकों की पहचान का सम्मान नहीं करता, उसके लिए अपने ही सदस्यों की निष्ठा पाना मुश्किल हो जाता है।

4 केस स्टडी : बास्क आंदोलन

बास्क में आत्म-निर्णय की माँग

बास्क स्पेन का एक पहाड़ी और समृद्ध क्षेत्र है, जिसे स्पेनी सरकार ने स्पेनी राज्यसंघ के भीतर ‘स्वायत्त’ क्षेत्र का दर्जा दे रखा है। लेकिन बास्क राष्ट्रवादी आंदोलन के नेता इस स्वायत्तता से संतुष्ट नहीं हैं और एक पूर्णतः स्वतंत्र देश चाहते हैं। इसके लिए संवैधानिक और हाल तक हिंसक, दोनों तरह के तरीक़े अपनाए गए हैं। बास्क संस्कृति और भाषा स्पेनी से बिल्कुल अलग है, हालाँकि आज बास्क के मात्र एक-तिहाई लोग ही अपनी भाषा समझ पाते हैं। रोमन काल से ही बास्क क्षेत्र ने अपनी न्यायिक, प्रशासनिक और वित्तीय व्यवस्था कभी पूरी तरह स्पेनी शासकों को नहीं सौंपी। उन्नीसवीं सदी के अंत में जब स्पेनी शासकों ने इस विशिष्ट व्यवस्था को ख़त्म करने की कोशिश की, तभी आधुनिक बास्क राष्ट्रवादी आंदोलन शुरू हुआ। बीसवीं सदी में स्पेनी तानाशाह फ्रैंको ने इस स्वायत्तता में और कटौती कर दी और सार्वजनिक स्थानों, यहाँ तक कि घर में भी बास्क भाषा बोलने पर पाबंदी लगा दी। ये दमनकारी उपाय अब वापस लिए जा चुके हैं, लेकिन बास्क आंदोलनकारियों का स्पेनी सरकार पर अविश्वास और बाहरी लोगों के प्रवेश का डर अब भी बना हुआ है; विरोधियों का कहना है कि यह मुद्दा वास्तव में सुलझ चुका है।

बास्क का उदाहरण यह दिखाता है कि आत्म-निर्णय की माँग सिर्फ़ किताबी बहस नहीं, बल्कि एक ज़िंदा राजनीतिक सवाल है: क्या हर सांस्कृतिक रूप से अलग समूह को अलग राज्य का हक़ है? क्या बास्क को वाक़ई एक राष्ट्र माना जाए? इन सवालों का कोई एक तय जवाब नहीं है, इसीलिए अगले भाग में हम देखेंगे कि लोकतांत्रिक समाज इस दुविधा से किस तरह निपटते हैं।

5 राष्ट्रवाद और बहुलवाद

जैसे ही ‘एक संस्कृति-एक राज्य’ का विचार त्याग दिया जाता है, यह सोचना ज़रूरी हो जाता है कि विभिन्न संस्कृतियाँ और समुदाय एक ही देश में कैसे साथ फल-फूल सकें। इसी लक्ष्य के लिए अनेक लोकतांत्रिक देशों ने अल्पसंख्यक समुदायों की पहचान को स्वीकारने और संरक्षित करने के उपाय अपनाए हैं। भारतीय संविधान में भी धार्मिक, भाषायी और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए विस्तृत प्रावधान हैं।

दुनिया भर में समूहों को दिए गए अधिकारों में मुख्यतः दो तरह के अधिकार शामिल हैं: भाषा, संस्कृति और धर्म की संवैधानिक सुरक्षा, और कुछ मामलों में विधायी संस्थाओं व अन्य राजकीय संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का अधिकार। इन्हें इस आधार पर उचित ठहराया जाता है कि ये अधिकार समान क़ानूनी व्यवहार के साथ-साथ समूह की सांस्कृतिक पहचान की भी रक्षा करते हैं। यहाँ राष्ट्रीय पहचान को समावेशी ढंग से परिभाषित करना ज़रूरी है, ताकि हर सांस्कृतिक समुदाय के महत्व और योगदान को मान्यता मिल सके।

फिर भी, मान्यता और संरक्षा मिलने के बावजूद कुछ समूह पृथक राज्य की माँग पर अड़े रह सकते हैं। भूमंडलीकरण के इस दौर में यह विरोधाभासी लग सकता है, पर राष्ट्रवादी आकांक्षाएँ अब भी बहुत-से समूहों और समुदायों को प्रेरित करती हैं। ऐसी माँगों से लोकतांत्रिक ढंग से निपटने के लिए ज़रूरी है कि संबंधित देश अत्यंत उदारता और दक्षता का परिचय दें। इसीलिए राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार को अब पहले जैसे ‘हर सांस्कृतिक समूह को स्वतंत्र राज्य’ के रूप में नहीं, बल्कि किसी राष्ट्रीयता को मौजूदा राज्य के भीतर ही कुछ लोकतांत्रिक अधिकार देने के रूप में समझा जाता है, क्योंकि हर समूह को अलग राज्य देना न सिर्फ़ असंभव, बल्कि आर्थिक-राजनीतिक रूप से अवांछनीय भी होगा। हम ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जो समूहों की पहचान को मान्यता देने के महत्त्व के प्रति काफ़ी सचेत है, और आज पहचान की मान्यता के बहुत-से संघर्ष राष्ट्रवाद की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। हमें राष्ट्रीय पहचान के उनके दावों की सत्यता स्वीकार करनी चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम राष्ट्रवाद के असहिष्णु और एकजातीय स्वरूपों के साथ कोई सहानुभूति बरतें।

CBSE की अतिरिक्त संदर्भ सामग्री : बहुसंस्कृतिवाद

CBSE के 2026-27 पाठ्यक्रम ने इस अध्याय के साथ «बहुसंस्कृतिवाद» पर एक छोटा पाठ जोड़ा है (परिशिष्ट, कक्षा 11 की अतिरिक्त संदर्भ सामग्री)। सामान्य अर्थ में बहुसंस्कृतिवाद दुनिया के सभी देशों में विभिन्न धर्मों, सांस्कृतिक समूहों और समुदायों के लोगों का सह-अस्तित्व है। इसकी शुरुआत 1970 के दशक में उस प्रति-संस्कृतिवादी और मानवाधिकार आंदोलन के साथ हुई, जो अमेरिका और यूरोप की श्वेत संस्कृति के पक्ष में दूसरी संस्कृतियों के समरूपीकरण के विरोध में था। बहुसंस्कृतिवाद मोटे तौर पर ‘स्वीकृति’ और ‘सम्मान’, दोनों सिद्धांतों पर टिका है, और अपेक्षा करता है कि दुनिया के सभी देश सांस्कृतिक समूहों को समान स्वीकृति और सम्मान दें। भारतीय संदर्भ में बहुसंस्कृतिवाद को समाज वैज्ञानिक आशीष नंदी द्वारा प्रतिपादित «सलाद का कटोरा» (सलाद बाउल) की धारणा से जोड़ा जाता है: एक राष्ट्र के भीतर अलग-अलग सांस्कृतिक समूह अपने-अपने विशिष्ट रूपों के साथ अपनी पहचान बनाए रखते हैं। CBSE के अनुसार यह अतिरिक्त सामग्री कक्षा में पढ़ाने के लिए है और बोर्ड परीक्षा में इसका मूल्यांकन नहीं होगा।

6 टैगोर की राष्ट्रवाद-समालोचना

रवींद्रनाथ टैगोर : देशभक्ति बनाम मानवता

टैगोर ख़ुद औपनिवेशिक शासन के विरोधी थे और भारत की स्वाधीनता के हिमायती। वे महसूस करते थे कि उपनिवेशों के ब्रितानी प्रशासन में ‘मानवीय संबंधों की गरिमा बरकरार रखने’ की गुंजाइश नहीं है, जबकि यह विचार ब्रितानी सभ्यता में भी स्थान पाता है। लेकिन वे “देशभक्ति” के नाम पर पनपने वाले संकीर्ण राष्ट्रवाद के भी कड़े आलोचक थे। उन्होंने कहा: “राष्ट्रवाद हमारा अंतिम आध्यात्मिक मंजिल नहीं हो सकता। मेरी शरणस्थली तो मानवता है। मैं हीरों की कीमत पर शीशा नहीं खरीदूँगा, और जब तक मैं जीवित हूँ, देशभक्ति को मानवता पर कदापि विजयी नहीं होने दूँगा।” टैगोर ने पश्चिमी साम्राज्यवाद के विरोध और पश्चिमी सभ्यता की अस्वीकृति के बीच एक स्पष्ट फ़र्क़ किया: भारतीयों को अपनी संस्कृति और विरासत में गहरी आस्था रखनी चाहिए, पर बाहरी दुनिया से सीखने का विरोध नहीं करना चाहिए। उन्हें डर था कि “भारतीय परंपरा” के नाम पर पश्चिम की अस्वीकृति आसानी से भारत में मौजूद ईसाई, यहूदी, पारसी और इस्लाम जैसे प्रभावों के प्रति शत्रुता में बदल सकती है।

टैगोर की यह चेतावनी आज भी प्रासंगिक है: राष्ट्रीय पहचान की चाहत जायज़ है, पर जब यह असहिष्णु और एकजातीय रूप ले लेती है, तो यही राष्ट्रवाद लोकतंत्र और मानवता, दोनों के लिए ख़तरा बन जाता है।

चित्र 1 · राष्ट्र की कल्पना के चार आधार : साझे विश्वास, इतिहास, भूक्षेत्र और साझे राजनीतिक आदर्श।
चित्र 1 · राष्ट्र की कल्पना के चार आधार : साझे विश्वास, इतिहास, भूक्षेत्र और साझे राजनीतिक आदर्श।
आख़िरी दोहराव
  • राष्ट्रवाद ने राष्ट्र-राज्य भी बनाए हैं (जर्मनी, इटली) और साम्राज्य भी तोड़े हैं (ऑस्ट्रिया-हंगरी, रूस, ब्रिटिश-फ्रांसीसी उपनिवेश)
  • राष्ट्र की कल्पना के चार आधार: साझे विश्वास, इतिहास, भूक्षेत्र, साझे राजनीतिक आदर्श; कोई एक साझी भाषा/धर्म/वंश ज़रूरी नहीं
  • साझी सांस्कृतिक पहचान को अकेला आधार बनाना ख़तरनाक है: धार्मिक विविधता और सामाजिक बहुलता, दोनों वजहों से
  • वर्साय की संधि के बाद ‘एक संस्कृति-एक राज्य’ आज़माया गया, पर मानवीय क़ीमत भारी थी और अल्पसंख्यक समस्या फिर भी बनी रही
  • बास्क आंदोलन: स्वायत्त क्षेत्र होते हुए भी पूर्ण स्वतंत्रता की माँग, फ्रैंको के दमन का इतिहास
  • आधुनिक हल: नए राज्य नहीं, मौजूदा राज्यों को अधिक लोकतांत्रिक और समावेशी बनाना
  • CBSE की अतिरिक्त सामग्री, बहुसंस्कृतिवाद: सभी सांस्कृतिक समूहों को स्वीकृति और सम्मान; भारत में आशीष नंदी की «सलाद का कटोरा» धारणा
  • टैगोर: देशभक्ति मानवता से ऊपर नहीं हो सकती; संकीर्ण राष्ट्रवाद का ख़तरा
परीक्षा से पहले ख़ुद को जाँचें
  • क्या मुझे राष्ट्र की कल्पना के चारों आधार अलग-अलग उदाहरण सहित याद हैं?
  • क्या मुझे साझी सांस्कृतिक पहचान के ख़तरनाक होने के दोनों कारण याद हैं?
  • क्या मुझे वर्साय की संधि और उसके नतीजों की कड़ी याद है?
  • क्या मुझे बास्क आंदोलन के मुख्य तथ्य (एक-तिहाई भाषा-भाषी, फ्रैंको) याद हैं?
  • क्या मुझे टैगोर का उद्धरण और उनकी दलील ठीक-ठीक याद है?
यही अध्याय पढ़ें:English Mediumहिंदी माध्यम