इस अध्याय का संक्षिप्त सार, अंतिम समय के रिवीज़न के लिए: राष्ट्र के आधार, आत्म-निर्णय, बास्क केस स्टडी और टैगोर का उद्धरण। पूरे नोट्स अलग से पढ़ने के लिए उपलब्ध हैं।
1 राष्ट्रवाद के दो चेहरे
| जोड़ने वाला रूप | तोड़ने वाला रूप |
|---|---|
| छोटी रियासतों का एकीकरण: जर्मनी, इटली | साम्राज्यों का पतन: ऑस्ट्रिया-हंगरी, रूस |
| उपनिवेशों की स्वाधीनता: भारत और अन्य देश | ब्रिटिश-फ्रांसीसी-डच-पुर्तगाली साम्राज्यों का विघटन |
| अरबी राष्ट्रवाद: अखिल अरब संघ की उम्मीद | पृथकतावाद: क्यूबेकवासी (कनाडा), बास्क (स्पेन), कुर्द (तुर्की-इराक), तमिल (श्रीलंका) |
2 राष्ट्र की कल्पना के चार आधार
2.1 राजनीतिक पहचान बनाम सांस्कृतिक पहचान
सांस्कृतिक पहचान (एक भाषा/धर्म)
- हर धर्म भीतर से विविध, ज़बरदस्ती एकता वर्चस्ववादी बनाती है
- बहुसांस्कृतिक समाज में कुछ समूह बाहर हो जाते हैं
- समान बर्ताव व स्वतंत्रता का लोकतांत्रिक आदर्श कमज़ोर होता है
राजनीतिक पहचान (साझा संविधान)
- धर्म/नस्ल/भाषा की जगह मूल्य-समूह के प्रति निष्ठा
- समावेशी : सभी सांस्कृतिक समुदाय शामिल
- लोकतंत्र के लिए ज़्यादा सुरक्षित आधार
3 राष्ट्रीय आत्म-निर्णय की कड़ी
वर्साय की संधि (प्रथम विश्वयुद्ध के बाद) में ‘एक संस्कृति-एक राज्य’ आज़माया गया → लाखों लोग विस्थापित, सांप्रदायिक हिंसा → फिर भी नए राज्यों में अल्पसंख्यक रह गए → आज का हल: नए राज्य नहीं, मौजूदा राज्यों को अधिक लोकतांत्रिक-समतामूलक बनाना।
CBSE की अतिरिक्त सामग्री (बोर्ड परीक्षा में मूल्यांकन नहीं): बहुसंस्कृतिवाद का अर्थ है विभिन्न धर्मों, सांस्कृतिक समूहों और समुदायों का सह-अस्तित्व, सबके लिए समान ‘स्वीकृति’ और ‘सम्मान’; भारत में इसे आशीष नंदी की «सलाद का कटोरा» धारणा से जोड़ा जाता है, जिसमें हर समूह अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखता है।
4 बास्क आंदोलन : याद रखने योग्य तथ्य
5 टैगोर का उद्धरण, ज्यों का त्यों याद करें
“राष्ट्रवाद हमारा अंतिम आध्यात्मिक मंजिल नहीं हो सकता। मेरी शरणस्थली तो मानवता है। मैं हीरों की कीमत पर शीशा नहीं खरीदूँगा, और जब तक मैं जीवित हूँ, देशभक्ति को मानवता पर कदापि विजयी नहीं होने दूँगा।”
- राष्ट्रवाद के दो चेहरे : जोड़ने वाला (जर्मनी-इटली, भारत की स्वाधीनता) और तोड़ने वाला (ऑस्ट्रिया-हंगरी, बास्क, कुर्द)
- राष्ट्र के चार आधार : साझे विश्वास, इतिहास, भूक्षेत्र, राजनीतिक आदर्श; कोई एक भाषा/धर्म/वंश ज़रूरी नहीं
- सांस्कृतिक पहचान ख़तरनाक क्यों : धार्मिक आंतरिक विविधता + सामाजिक बहुलता, दोनों वजहों से
- वर्साय की संधि: ‘एक संस्कृति-एक राज्य’ का भारी मानवीय मूल्य, अल्पसंख्यक समस्या फिर भी बनी रही
- बास्क: स्वायत्त क्षेत्र होते हुए भी पूर्ण स्वतंत्रता की माँग, फ्रैंको का दमन, एक-तिहाई भाषा-भाषी
- टैगोर: संकीर्ण राष्ट्रवाद के आलोचक, देशभक्ति मानवता से ऊपर नहीं