NCERT की पाठ्यपुस्तक राजनीतिक सिद्धांत के अध्याय 7 «राष्ट्रवाद» की प्रश्नावली के सातों प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। अध्याय के गतिविधि-बॉक्स और बास्क आंदोलन वाले बॉक्स में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर अंत में दिए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
1 राष्ट्र और अन्य सामूहिक संबद्धताओं में अंतर
प्र. राष्ट्र किस प्रकार से बाकी सामूहिक संबद्धताओं से अलग है?
उत्तर: राष्ट्र परिवार, जनजाति या अन्य सगोत्रीय समूहों जैसा नहीं है। परिवार और जनजाति में सदस्य प्रत्यक्ष संबंधों या वंश-परंपरा के सूत्रों से जुड़े होते हैं, यानी हर सदस्य दूसरे को व्यक्तिगत रूप से जानता है या ज़रूरत पड़ने पर जोड़ने वाली कड़ी ढूँढ सकता है। लेकिन राष्ट्र के सदस्य के रूप में हम अपने अधिकतर सह-नागरिकों से कभी आमने-सामने भी नहीं मिलते और न ही उनसे वंशानुगत नाता जोड़ने की ज़रूरत होती है। फिर भी राष्ट्र का अस्तित्व बना रहता है, क्योंकि राष्ट्र मूलतः एक ‘काल्पनिक’ समुदाय है, जो सदस्यों के साझे विश्वास, इतिहास-बोध, भूक्षेत्र से जुड़ाव और साझे राजनीतिक आदर्शों पर टिका होता है, न कि प्रत्यक्ष परिचय या वंश-परंपरा पर।
2 राष्ट्रीय आत्म-निर्णय का अधिकार
प्र. राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार से आप क्या समझते हैं? किस प्रकार यह विचार राष्ट्र-राज्यों के निर्माण और उनको मिल रही चुनौती में परिणत होता है?
उत्तर: राष्ट्रीय आत्म-निर्णय का अधिकार यह है कि कोई राष्ट्र अपना शासन ख़ुद चलाए और अपना भविष्य ख़ुद तय करे, और इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से एक पृथक राजनीतिक इकाई या राज्य के रूप में मान्यता माँगे। यह विचार राष्ट्र-राज्यों के निर्माण में तब सहायक बना जब उन्नीसवीं सदी के यूरोप में ‘एक संस्कृति-एक राज्य’ के आधार पर, और फिर पहले विश्वयुद्ध के बाद वर्साय की संधि से, कई नए स्वतंत्र राज्य बनाए गए। एशिया और अफ्रीका के राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों ने भी औपनिवेशिक प्रभुत्व के खिलाफ़ यही अधिकार माँगा, जिससे वहाँ अनेक स्वतंत्र राष्ट्र-राज्य बने। लेकिन यही विचार चुनौती भी बन गया, क्योंकि किसी भी पुनर्व्यवस्था में हर सांस्कृतिक समूह को अलग राज्य देना संभव नहीं हुआ। परिणामस्वरूप नए बने राज्यों में भी अल्पसंख्यक समुदाय रह गए, जो आगे चलकर स्वयं आत्म-निर्णय की माँग करने लगे, जिससे वही राष्ट्र-राज्य जो स्वयं संघर्ष से आज़ाद हुए थे, अब अपने भीतर की अल्पसंख्यक माँगों का विरोध करने की विरोधाभासी स्थिति में आ गए।
3 राष्ट्रवाद : जोड़ने और तोड़ने वाली दोनों शक्ति
प्र. हम देख चुके हैं कि राष्ट्रवाद लोगों को जोड़ भी सकता है और तोड़ भी सकता है। उन्हें मुक्त कर सकता है और उनमें कटुता और संघर्ष भी पैदा कर सकता है। उदाहरणों के साथ उत्तर दीजिए।
उत्तर: राष्ट्रवाद के दोनों रूप इतिहास में देखे जा सकते हैं। जोड़ने वाला रूप: उन्नीसवीं सदी के यूरोप में राष्ट्रवाद ने छोटी रियासतों को एकीकृत कर आज के जर्मनी और इटली जैसे बड़े राष्ट्र-राज्य बनाए, और भारत सहित अनेक उपनिवेशों में स्वाधीनता आंदोलनों को एकजुट कर औपनिवेशिक शासन से मुक्ति दिलाई। तोड़ने वाला रूप: यही राष्ट्रवाद बीसवीं सदी की शुरुआत में ऑस्ट्रियाई-हंगेरियाई और रूसी साम्राज्यों के टूटने का कारण बना, और आज भी कनाडा के क्यूबेकवासियों, स्पेन के बास्कवासियों, तुर्की-इराक के कुर्दों जैसे पृथकतावादी आंदोलनों को हवा देता है, जो मौजूदा राष्ट्र-राज्यों को ही तोड़ने के लिए संघर्षरत हैं। इस तरह राष्ट्रवाद अपने संदर्भ के अनुसार मुक्तिदायक भी हो सकता है और विभाजनकारी भी।
4 वंश, भाषा, धर्म या नस्ल : कोई एक साझा कारण नहीं
प्र. वंश, भाषा, धर्म या नस्ल में से कोई भी पूरे विश्व में राष्ट्रवाद के लिए साझा कारण होने का दावा नहीं कर सकता। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर: यह कथन सही है। कनाडा में अंग्रेज़ी और फ्रांसीसी, दोनों भाषाभाषी लोग रहते हैं, और भारत में भी अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं, फिर भी दोनों एकल राष्ट्र हैं। इसी तरह कई राष्ट्रों का कोई साझा धर्म नहीं है, और नस्ल या वंश के आधार पर भी कोई एक निश्चित पहचान सभी राष्ट्रों में समान रूप से नहीं मिलती। असल में राष्ट्र किसी एक भौतिक विशेषता से नहीं, बल्कि सदस्यों के साझे विश्वास, साझी ऐतिहासिक पहचान, भूक्षेत्र से जुड़ाव और साझे राजनीतिक आदर्शों से बनता है। इसीलिए राष्ट्र की कल्पना सांस्कृतिक पदों (एक भाषा/धर्म/वंश) में करने के बजाय राजनीतिक शब्दावली में करना बेहतर माना जाता है, ताकि वह समावेशी बना रहे।
5 राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रेरित करने वाले कारक
प्र. राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रेरित करने वाले कारकों पर सोदाहरण रोशनी डालिए।
उत्तर: राष्ट्रवादी भावनाएँ मुख्यतः चार कारकों से प्रेरित होती हैं। साझे विश्वास से, जैसे किसी टीम के सदस्यों का यह मानना कि वे एक साथ हैं। साझी ऐतिहासिक पहचान से, जैसे नेहरू ने भारत की सभ्यतागत निरंतरता का हवाला देकर भारतीय राष्ट्र की पहचान गढ़ी। भूक्षेत्र से जुड़ाव से, जैसे यहूदी लोगों का फिलिस्तीन को अपनी मूल गृहभूमि मानना, या भारतीय राष्ट्र का अपनी नदियों-पर्वतों से जुड़ाव। और साझे राजनीतिक आदर्शों से, जैसे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और उदारवाद जैसे मूल्यों पर सहमति। इसके अलावा उपनिवेशवाद के विरुद्ध स्वाधीनता की चाहत (भारत सहित एशिया-अफ्रीका के देश) और पृथकतावादी आकांक्षाएँ (बास्क, कुर्द) भी राष्ट्रवादी भावनाओं को जन्म देती हैं।
6 लोकतंत्र बनाम तानाशाही : विरोधाभासी राष्ट्रवादी आकांक्षाओं से निपटना
प्र. संघर्षरत राष्ट्रवादी आकांक्षाओं के साथ बर्ताव करने में तानाशाही की अपेक्षा लोकतंत्र अधिक समर्थ होता है। कैसे?
उत्तर: तानाशाही शासन प्रायः किसी एक सांस्कृतिक पहचान को ज़बरदस्ती थोपकर या दमन करके (जैसे स्पेनी तानाशाह फ्रैंको ने बास्क भाषा पर पाबंदी लगाई) राष्ट्रवादी माँगों को दबाने की कोशिश करता है, जिससे नाराज़गी और गहरी होती है। इसके विपरीत लोकतंत्र में अल्पसंख्यक समुदायों की भाषा, संस्कृति और धर्म को संवैधानिक संरक्षा और कभी-कभी विधायी संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का अधिकार देकर उनकी पहचान को मान्यता दी जाती है; भारतीय संविधान में भी धार्मिक, भाषायी और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों की संरक्षा के लिए विस्तृत प्रावधान हैं। ऐसी माँगों से लोकतांत्रिक ढंग से निपटने के लिए अत्यंत उदारता और दक्षता की ज़रूरत होती है। इस तरह लोकतंत्र अलग-अलग सांस्कृतिक पहचान वाले लोगों को समान नागरिकों की तरह सह-अस्तित्व की गुंजाइश देता है, जिससे मौजूदा राज्य को नए राज्यों में तोड़े बिना ही राष्ट्रवादी आकांक्षाओं को समायोजित करना संभव होता है।
7 राष्ट्रवाद की सीमाएँ
प्र. आपकी राय में राष्ट्रवाद की सीमाएँ क्या हैं?
उत्तर: राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी सीमा यह है कि जब यह असहिष्णु और एकजातीय रूप ले लेता है, तो यह विभाजन, कटुता और हिंसा को जन्म दे सकता है, जैसा टैगोर ने चेताया था कि देशभक्ति को मानवता पर कभी विजयी नहीं होने देना चाहिए। इसके अलावा हर सांस्कृतिक समूह को अलग राज्य देना संभव नहीं है, क्योंकि इससे आर्थिक-राजनीतिक रूप से अव्यावहारिक छोटे राज्य बन सकते हैं और अल्पसंख्यक समस्या और बढ़ सकती है। आज पहचान की मान्यता के बहुत-से संघर्ष राष्ट्रवाद की भाषा का इस्तेमाल करते हैं; उनके दावों की सत्यता स्वीकार करते हुए भी राष्ट्रवाद के असहिष्णु और एकजातीय स्वरूपों के साथ कोई सहानुभूति नहीं बरती जा सकती, क्योंकि ऐसे स्वरूप लोकतंत्र के समावेशी स्वभाव के विरुद्ध हैं।
8 पाठ के बीच के प्रश्न (अध्याय के भीतर पूछे गए)
अध्याय ने दो «आओ कुछ करके सीखें» गतिविधि-बॉक्स में और बास्क आंदोलन वाले बॉक्स के अंत में भी प्रश्न पूछे हैं। ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर इन्हीं विचारों को परखते हैं, इसलिए पुस्तक के क्रम में हर एक का उत्तर यहाँ दिया गया है।
आओ कुछ करके सीखें 1. अपनी भाषा में देशभक्ति के किसी गीत की खोज करो। इस गीत में राष्ट्र को किस तरह दिखाया गया है। अपनी भाषा में देशभक्ति की किसी फिल्म की खोज करो और उसे देखो। इस फिल्म में देशभक्ति को किस तरह दिखाया गया है और इसकी जटिलताओं को किस तरह हल किया है।
कैसे करें: यह गतिविधि है, इसलिए गीत और फिल्म आपकी अपनी पसंद के होंगे। गीत को अध्याय में बताए राष्ट्र के आधारों पर परखिए। ज़्यादातर देशभक्ति गीत राष्ट्र का वर्णन उसके भूक्षेत्र (नदियाँ, पर्वत, खेत, «मातृभूमि»), उसके इतिहास (गौरवशाली अतीत, स्वाधीनता सेनानियों का बलिदान) और साझे विश्वास (हम सब एक हैं) के ज़रिए करते हैं, और कुछ गीत स्वतंत्रता और समानता जैसे साझे राजनीतिक आदर्शों के ज़रिए भी। फिल्म में देखिए कि देशभक्ति को केवल किसी शत्रु के प्रति विरोध के रूप में दिखाया गया है, या उसकी जटिलताएँ भी सुलझाई गई हैं: अलग-अलग भाषा, धर्म और क्षेत्र के लोगों का साथ खड़ा होना, संघर्ष की क़ीमत, और देश से प्रेम तथा दूसरों से नफ़रत के बीच का फ़र्क़। अध्याय में टैगोर की चेतावनी, कि देशभक्ति को मानवता पर कभी विजयी नहीं होने देना चाहिए, फिल्म को परखने की अच्छी कसौटी है।
बॉक्स: बास्क में आत्म-निर्णय की माँग. क्या आपके विचार में बास्क राष्ट्रवादियों की अलग राष्ट्र की माँग जायज है? क्या बास्क एक राष्ट्र है? इस सवाल का उत्तर देने के पहले आप और किन बातों की जानकारी चाहेंगे? क्या आप दुनिया के दूसरे भागों के ऐसे उदाहरणों के बारे में विचार कर सकते हैं? क्या आप अपने देश के ऐसे क्षेत्रों और समूहों के बारे में विचार कर सकते हैं जहाँ, इस तरह की माँग की जा रही है?
उत्तर: बॉक्स दोनों पक्षों के तर्क देता है। माँग के पक्ष में: बास्क राष्ट्रवादियों का कहना है कि उनकी संस्कृति स्पेनी संस्कृति से बहुत भिन्न है; उनकी अपनी भाषा है जो स्पेनी भाषा से बिल्कुल नहीं मिलती; पहाड़ी भू-संरचना इस क्षेत्र को शेष स्पेन से भौगोलिक तौर पर अलग करती है; रोमन काल से इस क्षेत्र ने अपनी स्वायत्तता का कभी समर्पण नहीं किया और इसकी न्यायिक, प्रशासनिक एवं वित्तीय प्रणालियाँ इसकी अपनी विशिष्ट व्यवस्था से चलती थीं; और फ्रैंको ने इस स्वायत्तता में कटौती की तथा बास्क भाषा को सार्वजनिक स्थानों, यहाँ तक कि घर में भी बोलने पर पाबंदी लगा दी थी। माँग के विरोध में: यह क्षेत्र पहले से ही स्पेन राज्यसंघ के अंतर्गत «स्वायत्त» क्षेत्र है, फ्रैंको के दमनकारी कदम अब वापस लिए जा चुके हैं, आज बास्क के मात्र एक-तिहाई लोग ही उस भाषा को समझ पाते हैं, और विरोधियों का कहना है कि बास्क अलगाववादी एक ऐसे मुद्दे का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं जिसका समाधान हो चुका है। अध्याय की अपनी कसौटी के अनुसार राष्ट्र तब होता है जब उसके सदस्य मानते हैं कि वे एक-दूसरे के साथ हैं और स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व की साझी आकांक्षा रखते हैं, इसलिए बास्क लोगों का राष्ट्र होने का दावा मज़बूत है; पर अध्याय यह भी कहता है कि ऐसे दावों का समाधान प्रायः नए राज्य बनाने में नहीं, बल्कि वर्तमान राज्यों को अधिक लोकतांत्रिक और समतामूलक बनाने में है। और किन बातों की जानकारी चाहिए: क्षेत्र के कितने लोग सचमुच अलगाव चाहते हैं, क्या मिली हुई स्वायत्तता उनकी भाषा और संस्कृति की रक्षा करती है, और वहाँ रहने वाले गैर-बास्क लोगों के साथ कैसा बर्ताव होगा। दुनिया के दूसरे उदाहरण (अध्याय से): कनाडा के क्यूबेकवासी, तुर्की और इराक के कुर्द, और श्रीलंका के तमिल। अपने देश के बारे में अध्याय कहता है कि राष्ट्रवाद की भाषा का इस्तेमाल भारत में भी कुछ समूह करते हैं; अलग-अलग क्षेत्रों में पृथक राज्य या अधिक स्वायत्तता की माँगें उठी हैं, और भारतीय संविधान धार्मिक, भाषायी और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों की संरक्षा के प्रावधानों के ज़रिए इनका उत्तर देता है।
आओ कुछ करके सीखें 2. भारत और भारत से बाहर आत्म-निर्णय के अधिकार की माँग कर रहे विभिन्न समूहों से संबंधित समाचार पत्र-पत्रिकाओं की कतरनों को इकट्ठा करो। निम्न मामलों पर अपनी राय बनाओ: इन माँगों के पीछे क्या कारण हैं? इनके संघर्ष की प्रकृति क्या है? क्या उनकी माँग जायज है? आप क्या सोचते हैं? संभव समाधान क्या हो सकता है?
कैसे करें: कतरनें स्वयं इकट्ठी करें और उन्हें समूह-वार लगाएँ। हर समूह के लिए इन बिंदुओं का उत्तर लिखें। कारण: अध्याय में बताए कारक खोजिए, जैसे अलग भाषा या संस्कृति, अलग इतिहास का बोध, गृहभूमि से जुड़ाव, और अल्पसंख्यक होने के कारण नुकसान की भावना। संघर्ष की प्रकृति: देखिए कि समूह संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीक़े (चुनाव, याचिका, बातचीत) अपनाता है या हिंसक, जैसा बास्क बॉक्स दिखाता है कि एक आंदोलन दोनों तरीक़े अपना सकता है। क्या माँग जायज है: समूह की शिकायतों को अध्याय के इस तर्क के सामने तौलिए कि हर उस समूह को स्वतंत्र राज्य देना, जो ख़ुद को अलग राष्ट्र मानता है, नामुमकिन है और संभवतः अवांछनीय भी, क्योंकि इससे आर्थिक और राजनीतिक क्षमता की दृष्टि से बेहद छोटे राज्य बन सकते हैं और अल्पसंख्यक समूहों की समस्याएँ और बढ़ सकती हैं। संभव समाधान: अध्याय का अपना उत्तर है वर्तमान राज्यों को अधिक लोकतांत्रिक और समतामूलक बनाना, भाषा, संस्कृति और धर्म की संवैधानिक संरक्षा देकर समूहों की पहचान को मान्यता देना, ज़रूरत हो तो प्रतिनिधित्व देना, और राष्ट्रीय पहचान को समावेशी रीति से परिभाषित करना।