इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. राष्ट्रवाद के दो उदाहरण दीजिए जहाँ यह लोगों को जोड़ने वाली शक्ति रहा।
उत्तर: उन्नीसवीं सदी के यूरोप में छोटी रियासतों के एकीकरण से जर्मनी और इटली का बनना, और भारत सहित पूर्व उपनिवेशों के स्वाधीनता संघर्ष, जिन्होंने लोगों को औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध एकजुट किया।
प्र. बास्क क्षेत्र किस देश में स्थित है?
उत्तर: स्पेन में।
प्र. टैगोर ने अपनी शरणस्थली किसे बताया?
उत्तर: मानवता को।
प्र. राष्ट्र की कल्पना के किन्हीं दो आधारों के नाम बताइए।
उत्तर: साझे विश्वास और इतिहास (भूक्षेत्र या राजनीतिक आदर्श भी सही उत्तर हैं)।
प्र. वर्साय की संधि किस विचार पर आधारित थी?
उत्तर: ‘एक संस्कृति-एक राज्य’ के विचार पर।
प्र. यहूदी लोग किस भूमि को अपना मूल गृह-स्थल मानते हैं?
उत्तर: फिलिस्तीन को।
प्र. फ्रैंको कौन था?
उत्तर: बीसवीं सदी का एक स्पेनी तानाशाह, जिसने बास्क की स्वायत्तता में कटौती की और बास्क भाषा पर पाबंदी लगाई।
प्र. राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार का सीधा अर्थ क्या है?
उत्तर: राष्ट्र का अपना शासन ख़ुद करने और अपना भविष्य ख़ुद तय करने का अधिकार।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. कनाडा और भारत का उदाहरण किस तर्क को सिद्ध करता है?
उत्तर: दोनों देशों में एक से अधिक भाषाएँ बोली जाती हैं, फिर भी दोनों एकल राष्ट्र माने जाते हैं। इससे सिद्ध होता है कि राष्ट्र के लिए एक साझी भाषा होना अनिवार्य शर्त नहीं है।
प्र. राष्ट्र को ‘काल्पनिक’ समुदाय क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि राष्ट्र किसी भौतिक वस्तु की तरह नहीं, बल्कि सदस्यों के साझे विश्वास, आकांक्षाओं और कल्पनाओं पर टिका होता है। सदस्य एक-दूसरे को व्यक्तिगत रूप से न जानते हुए भी स्वयं को एक समूह मानते हैं।
प्र. साझी सांस्कृतिक पहचान (एक धर्म) को अनिवार्य आधार बनाने का पहला ख़तरा क्या है?
उत्तर: हर बड़ा धर्म भीतर से विविध है और उसमें कई पंथ होते हैं जिनकी व्याख्याएँ अलग-अलग हैं; इन भेदों को नज़रअंदाज़ कर एक समान धर्म को थोपने से वर्चस्ववादी और दमनकारी समाज बनने का ख़तरा है।
प्र. बास्क आंदोलन के नेता स्वायत्तता से संतुष्ट क्यों नहीं हैं?
उत्तर: क्योंकि वे बास्क को स्पेन से अलग एक पूर्ण स्वतंत्र देश के रूप में देखना चाहते हैं, महज़ ‘स्वायत्त’ क्षेत्र के दर्जे से संतुष्ट नहीं हैं।
प्र. वर्साय की संधि के बाद किस तरह की मानवीय क़ीमत चुकानी पड़ी?
उत्तर: सीमाओं में बदलाव से लाखों लोग अपने पीढ़ियों पुराने घरों से उजड़ गए, और बहुत-से लोग सांप्रदायिक हिंसा के शिकार भी बने।
प्र. टैगोर ने पश्चिमी साम्राज्यवाद के विरोध और पश्चिमी सभ्यता की अस्वीकृति में क्या फ़र्क़ किया?
उत्तर: उन्होंने कहा कि भारतीयों को अपनी संस्कृति-विरासत में गहरी आस्था रखनी चाहिए, पर इसका मतलब बाहरी दुनिया से सीखने का विरोध करना नहीं है; उपनिवेशवाद का विरोध पश्चिम की हर चीज़ को नकारने के बराबर नहीं है।
प्र. भारतीय संविधान अल्पसंख्यकों को कौन-सी सुरक्षा देता है?
उत्तर: धार्मिक, भाषायी और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों के लिए विस्तृत संवैधानिक प्रावधान, जिनमें भाषा-संस्कृति-धर्म की सुरक्षा और कुछ मामलों में विधायी संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का अधिकार शामिल है।
प्र. राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार की आधुनिक पुनर्व्याख्या क्या है?
उत्तर: अब इसका अर्थ हमेशा स्वतंत्र राज्य पाना नहीं, बल्कि किसी राष्ट्रीयता को मौजूदा राज्य के भीतर ही कुछ लोकतांत्रिक अधिकार देना समझा जाता है।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. राष्ट्र की कल्पना के चार आधारों को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर: पहला, साझे विश्वास: राष्ट्र किसी टीम की तरह तभी अस्तित्व में रहता है जब सदस्य ख़ुद को एक समूह मानें। दूसरा, इतिहास: राष्ट्र साझी स्मृतियों और अभिलेखों के ज़रिए ख़ुद को एक निरंतर पहचान के रूप में देखते हैं, जैसे नेहरू का भारत की सभ्यतागत निरंतरता वाला तर्क। तीसरा, भूक्षेत्र: राष्ट्र किसी ख़ास भूमि को गृहभूमि मानते हैं, जैसे यहूदी लोगों का फिलिस्तीन से जुड़ाव। चौथा, साझे राजनीतिक आदर्श: सदस्य भविष्य की साझी दृष्टि और लोकतंत्र-धर्मनिरपेक्षता-उदारवाद जैसे मूल्यों पर सहमत होते हैं। कोई भी एक आधार अकेले पर्याप्त नहीं, राष्ट्र इन सबके मेल से बनता है।
प्र. राष्ट्रवाद ने इतिहास में लोगों को जोड़ने और तोड़ने, दोनों तरह से कैसे काम किया है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर: जोड़ने वाले रूप में राष्ट्रवाद ने उन्नीसवीं सदी में छोटी रियासतों को एकीकृत कर जर्मनी-इटली जैसे बड़े राष्ट्र-राज्य बनाए, और भारत सहित अनेक उपनिवेशों में स्वाधीनता आंदोलनों को एकजुट कर औपनिवेशिक शासन से मुक्ति दिलाई। तोड़ने वाले रूप में यही राष्ट्रवाद बीसवीं सदी की शुरुआत में ऑस्ट्रो-हंगेरियाई और रूसी साम्राज्यों के टूटने का कारण बना, और आज भी क्यूबेकवासियों, बास्कवासियों और कुर्दों जैसे पृथकतावादी आंदोलनों को हवा देता है, जो मौजूदा राष्ट्र-राज्यों को ही तोड़ने के लिए संघर्षरत हैं।
प्र. ‘एक संस्कृति-एक राज्य’ के विचार को आज़माने के बावजूद अल्पसंख्यक समस्या का समाधान क्यों नहीं हो सका?
उत्तर: वर्साय की संधि के बाद राज्यों की सीमाओं को सांस्कृतिक समुदायों के अनुसार बदला गया, लेकिन यह सुनिश्चित करना असंभव साबित हुआ कि हर नए राज्य में केवल एक ही नस्ल-संस्कृति के लोग रहें। परिणामस्वरूप अधिकतर नए राज्यों में भी एक से अधिक समुदाय रह गए, जो अल्पसंख्यक बनकर अक्सर नुकसानदेह स्थितियों में रहे। इसी तरह उपनिवेशों की स्वाधीनता के बाद भी हर सांस्कृतिक समूह को अलग राज्य देना संभव नहीं हुआ, इसलिए अल्पसंख्यक समस्या मूलतः बनी रही।
प्र. बास्क आंदोलन के इतिहास और वर्तमान स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर: बास्क स्पेन का एक पहाड़ी, समृद्ध और स्वायत्त क्षेत्र है, जिसकी भाषा और संस्कृति स्पेनी से बिल्कुल अलग है (आज मात्र एक-तिहाई बास्क लोग ही अपनी भाषा समझते हैं)। रोमन काल से बास्क ने अपनी न्यायिक-प्रशासनिक-वित्तीय व्यवस्था कभी पूरी तरह स्पेनी शासकों को नहीं सौंपी। उन्नीसवीं सदी के अंत में जब स्पेनी शासकों ने इस व्यवस्था को समाप्त करने की कोशिश की, तभी आधुनिक बास्क राष्ट्रवादी आंदोलन शुरू हुआ, और बीसवीं सदी में तानाशाह फ्रैंको ने स्वायत्तता में और कटौती की तथा सार्वजनिक स्थानों, यहाँ तक कि घर में भी बास्क भाषा बोलने पर पाबंदी लगाई। आज ये दमनकारी उपाय वापस लिए जा चुके हैं, पर बास्क नेता पूर्ण स्वतंत्रता चाहते हैं और सरकार पर अविश्वास बरक़रार है, जबकि विरोधी इसे पहले ही सुलझा हुआ मुद्दा मानते हैं।
प्र. साझी सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्र का अनिवार्य आधार बनाने के दोनों ख़तरे विस्तार से समझाइए।
उत्तर: पहला ख़तरा: दुनिया का हर बड़ा धर्म भीतर से ही विविध है, उसमें अनेक पंथ होते हैं जिनकी व्याख्याएँ अलग-अलग हैं; इन भेदों को नज़रअंदाज़ कर एक समान धर्म को पहचान का आधार बनाने से एक वर्चस्ववादी और दमनकारी समाज बनने का ख़तरा है। दूसरा ख़तरा: अधिकतर समाज सांस्कृतिक रूप से पहले से ही विविध हैं, एक ही भूक्षेत्र में विभिन्न धर्म-भाषा के लोग साथ रहते हैं; किसी एक भाषा या धर्म को सदस्यता की शर्त बनाने से कुछ समूह ज़रूर बाहर हो जाएँगे, जिससे लोकतंत्र के सबसे बुनियादी आदर्श, सबके लिए समान बर्ताव और स्वतंत्रता, पर आँच आएगी। इसीलिए राष्ट्र की कल्पना सांस्कृतिक की बजाय राजनीतिक शब्दावली में करना बेहतर है।
प्र. टैगोर की राष्ट्रवाद-समालोचना का सार क्या है?
उत्तर: टैगोर ख़ुद औपनिवेशिक शासन के विरोधी और भारत की स्वाधीनता के हिमायती थे, पर वे संकीर्ण राष्ट्रवाद के कड़े आलोचक भी थे। उन्होंने कहा कि देशभक्ति हमारी अंतिम आध्यात्मिक मंजिल नहीं हो सकती, उनकी शरणस्थली तो मानवता थी, और वे देशभक्ति को मानवता पर कभी विजयी नहीं होने देना चाहते थे। उन्होंने पश्चिमी साम्राज्यवाद के विरोध और पश्चिमी सभ्यता की अस्वीकृति में स्पष्ट फ़र्क़ किया, और चेताया कि ‘भारतीय परंपरा’ के नाम पर पश्चिम की अस्वीकृति आसानी से देश में मौजूद ईसाई, यहूदी, पारसी और इस्लाम जैसे प्रभावों के प्रति शत्रुता में बदल सकती है।
प्र. राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार ने राष्ट्र-राज्यों के निर्माण और चुनौती, दोनों में कैसे योगदान दिया?
उत्तर: निर्माण में: उन्नीसवीं सदी के यूरोप और फिर वर्साय की संधि के बाद ‘एक संस्कृति-एक राज्य’ के आधार पर कई नए राज्य बने, और एशिया-अफ्रीका के उपनिवेशों ने भी इसी अधिकार का दावा कर स्वाधीनता पाई। चुनौती में: यही अधिकार अब उन्हीं नए राष्ट्र-राज्यों के भीतर अल्पसंख्यक समूहों द्वारा माँगा जा रहा है, जिससे वे राष्ट्र-राज्य, जो स्वयं संघर्ष से आज़ाद हुए थे, अब अपने भीतर की ऐसी माँगों का विरोध करने की विरोधाभासी स्थिति में हैं।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. राष्ट्र की परिभाषा की कठिनाई पर चर्चा करते हुए बताइए कि राष्ट्र किन आधारों पर बनता है, और कोई एक साझी विशेषता (भाषा/धर्म/वंश) क्यों पर्याप्त नहीं है।
उत्तर: पिछली दो शताब्दियों में राष्ट्रवाद विश्व इतिहास की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में से एक रहा है, फिर भी राष्ट्र या राष्ट्रवाद की कोई एक सुस्पष्ट और सर्वमान्य परिभाषा देना कठिन है। प्रश्न इसलिए भी कठिन है कि आमतौर पर माना जाता है कि वंश, भाषा, धर्म या जातीयता जैसी किसी एक साझी विशेषता से राष्ट्र बनता है, पर ऐसा कोई निश्चित गुण नहीं है जो सभी राष्ट्रों में मौजूद हो: कनाडा में अंग्रेज़ी-फ्रांसीसी दोनों भाषाभाषी लोग हैं, भारत में भी अनेक भाषाएँ हैं, और कई राष्ट्रों का कोई साझा धर्म भी नहीं है। इसके बजाय राष्ट्र बहुत हद तक एक ‘काल्पनिक’ समुदाय है, जो अपने सदस्यों के सामूहिक विश्वास, आकांक्षाओं और कल्पनाओं के सहारे एक सूत्र में बँधा होता है और चार आधारों पर टिका है: साझे विश्वास (टीम जैसी सामूहिकता), इतिहास (साझी स्मृतियाँ और निरंतर पहचान), भूक्षेत्र (गृहभूमि से जुड़ाव) और साझे राजनीतिक आदर्श (लोकतंत्र-धर्मनिरपेक्षता-उदारवाद पर सहमति)। इसीलिए राष्ट्र की कल्पना किसी एक सांस्कृतिक विशेषता की बजाय इन आधारों और राजनीतिक शब्दावली में करना बेहतर माना गया है, ताकि यह समावेशी बना रहे।
प्र. वर्साय की संधि से लेकर आज तक राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार की यात्रा का विस्तृत वर्णन कीजिए, इसके परिणामों और वर्तमान पुनर्व्याख्या सहित।
उत्तर: उन्नीसवीं सदी के यूरोप में ‘एक संस्कृति-एक राज्य’ का विचार ज़ोर पकड़ने लगा और प्रथम विश्वयुद्ध के बाद वर्साय की संधि में इसी विचार को आज़माते हुए कई नए, छोटे स्वतंत्र राज्य बनाए गए। पर उस समय की सभी आत्म-निर्णय की माँगों को संतुष्ट करना असंभव साबित हुआ, और सीमाओं में बदलाव से लाखों लोग विस्थापित हुए, कई सांप्रदायिक हिंसा के शिकार बने। इतना होने के बाद भी अधिकतर नए राज्यों में एक से अधिक नस्ल-संस्कृति के लोग रह गए, जो अल्पसंख्यक बने। यही अधिकार बीसवीं सदी में एशिया-अफ्रीका के उपनिवेशों के मुक्ति आंदोलनों ने भी माँगा, पर वहाँ भी हर सांस्कृतिक समूह को अलग राज्य देना संभव नहीं हुआ, जिससे देशांतरण और सीमा-युद्ध जारी रहे। परिणामस्वरूप आज एक विरोधाभासी स्थिति है, जो राष्ट्र-राज्य ख़ुद संघर्ष से आज़ाद हुए, वे अब अपने भीतर की अल्पसंख्यक माँगों का विरोध करते हैं। इसी वजह से आज इस अधिकार की पुनर्व्याख्या हो चुकी है: अब इसका अर्थ हर बार स्वतंत्र राज्य पाना नहीं, बल्कि किसी राष्ट्रीयता को मौजूदा राज्य के भीतर ही कुछ लोकतांत्रिक अधिकार देना समझा जाता है, और समाधान नए राज्य बनाने की बजाय मौजूदा राज्यों को अधिक लोकतांत्रिक-समतामूलक बनाने में देखा जाता है।
प्र. बास्क आंदोलन को एक केस स्टडी के रूप में लेते हुए बताइए कि राष्ट्रीय आत्म-निर्णय की माँग कब जायज़ और कब अतिवादी बन जाती है।
उत्तर: बास्क स्पेन का एक स्वायत्त, पहाड़ी और सांस्कृतिक रूप से अलग क्षेत्र है, जिसकी अपनी भाषा (आज केवल एक-तिहाई लोग समझते हैं), न्यायिक-प्रशासनिक व्यवस्था और लंबा इतिहास है, और जिसे बीसवीं सदी में फ्रैंको के दमन (भाषा पर पाबंदी) जैसे वास्तविक अन्याय झेलने पड़े। इस हद तक बास्क की पहचान और स्वायत्तता की माँग जायज़ ठहराई जा सकती है, क्योंकि यह एक वास्तविक सांस्कृतिक भिन्नता और ऐतिहासिक अनुभव पर आधारित है। लेकिन जब यह माँग किसी भी क़ीमत पर, दमनकारी उपाय वापस लिए जाने के बावजूद, पूर्ण अलगाव और हिंसा तक पहुँचती है, या हर बाहरी व्यक्ति को संदेह की नज़र से देखती है, तो यह उस बिंदु को पार कर जाती है जहाँ लोकतांत्रिक समाधान, जैसे संवैधानिक सुरक्षा और स्वायत्तता, पहले ही उपलब्ध हैं। इसीलिए पाठ्यपुस्तक स्वयं यह सवाल खुला छोड़ती है कि क्या बास्क को एक अलग राष्ट्र माना जाए, और यही दिखाता है कि आत्म-निर्णय की माँग और उसकी सीमा के बीच का फ़र्क़ हमेशा तर्क-वितर्क का विषय बना रहता है।
प्र. राष्ट्रवाद और बहुलवाद के बीच संतुलन कैसे बनाया जा सकता है? भारतीय संविधान के उदाहरण सहित समझाइए, और टैगोर की चेतावनी को भी शामिल कीजिए।
उत्तर: ‘एक संस्कृति-एक राज्य’ का विचार त्यागते ही यह ज़रूरी हो जाता है कि विभिन्न संस्कृतियाँ और समुदाय एक ही देश में साथ फल-फूल सकें। भारतीय संविधान में धार्मिक, भाषायी और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए विस्तृत प्रावधान हैं, जिनमें भाषा-संस्कृति-धर्म की संवैधानिक सुरक्षा और कुछ मामलों में विधायी संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का अधिकार शामिल है; इसका औचित्य यह है कि ये अधिकार समान क़ानूनी व्यवहार के साथ-साथ समूह की सांस्कृतिक पहचान की भी रक्षा करते हैं, और राष्ट्रीय पहचान को समावेशी ढंग से परिभाषित करते हैं। फिर भी मान्यता मिलने के बाद भी कुछ समूह पृथक राज्य की माँग पर अड़े रह सकते हैं, इसलिए ऐसी माँगों से लोकतांत्रिक ढंग से निपटने के लिए उदारता और कुशलता, दोनों ज़रूरी हैं। यहीं टैगोर की चेतावनी प्रासंगिक हो जाती है: उन्होंने कहा कि देशभक्ति को मानवता पर कभी विजयी नहीं होने देना चाहिए, और आगाह किया कि ‘भारतीय परंपरा’ के नाम पर पश्चिम की अस्वीकृति देश में मौजूद ईसाई, यहूदी, पारसी और इस्लाम जैसे प्रभावों के प्रति शत्रुता में बदल सकती है। इसीलिए राष्ट्रवाद और बहुलवाद के बीच संतुलन तभी संभव है जब राष्ट्रीय पहचान समावेशी और असहिष्णुता से मुक्त रहे।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक फ्रैंको ने बास्क भाषा पर कहाँ-कहाँ पाबंदी लगाई?
उत्तर: सार्वजनिक स्थानों पर, और घर में भी।
(ख) 2 अंक बास्क राष्ट्रवादी आंदोलन के नेता स्वायत्तता से संतुष्ट क्यों नहीं हैं?
उत्तर: क्योंकि वे बास्क को स्पेन से पूरी तरह अलग एक स्वतंत्र देश के रूप में देखना चाहते हैं, महज़ स्वायत्त क्षेत्र का दर्जा उनकी माँग को संतुष्ट नहीं करता।
(ग) 3 अंक गद्यांश के आधार पर विश्लेषण कीजिए कि दमनकारी उपाय वापस लिए जाने के बावजूद बास्क आंदोलनकारियों का संदेह क्यों बना हुआ है।
उत्तर: दमनकारी उपाय वापस लेना अतीत के नुक़सान की भरपाई नहीं करता; फ्रैंको के दमन ने बास्क समुदाय में स्पेनी सरकार के इरादों को लेकर गहरा संदेह पैदा किया, जो केवल क़ानूनी बदलाव से मिट नहीं सकता। इसके अलावा आंदोलनकारियों को अब भी बाहरी लोगों के अपने क्षेत्र में प्रवेश और सांस्कृतिक पहचान के कमज़ोर पड़ने का डर है, इसलिए भले ही विरोधी इसे सुलझा हुआ मुद्दा मानें, बास्क नेताओं के लिए यह अब भी अधूरी माँग है।
(क) 1 अंक टैगोर किसके विरोधी थे?
उत्तर: औपनिवेशिक शासन के।
(ख) 2 अंक टैगोर ने पश्चिमी साम्राज्यवाद और पश्चिमी सभ्यता के बीच क्या फ़र्क़ किया?
उत्तर: उन्होंने कहा कि पश्चिमी साम्राज्यवाद (उपनिवेशवाद) का विरोध करना सही है, पर इसका मतलब पश्चिमी सभ्यता की हर बात को नकारना नहीं है; भारतीयों को बाहरी दुनिया से सीखने का विरोध नहीं करना चाहिए।
(ग) 3 अंक गद्यांश के आधार पर बताइए कि टैगोर की यह चेतावनी आज के भारत के लिए क्यों प्रासंगिक है।
उत्तर: टैगोर की चेतावनी आज भी प्रासंगिक है क्योंकि किसी भी समाज में ‘शुद्ध परंपरा’ के नाम पर बाहरी या भीतरी अल्पसंख्यक प्रभावों को अस्वीकार करने की प्रवृत्ति असहिष्णुता और सामाजिक विभाजन को जन्म दे सकती है। भारत जैसे बहुधार्मिक-बहुसांस्कृतिक देश में, जहाँ ईसाई, यहूदी, पारसी और इस्लाम जैसी परंपराएँ मौजूद रही हैं, राष्ट्रीय पहचान को किसी एक संस्कृति तक सीमित करने की कोई भी कोशिश उन्हीं लोकतांत्रिक मूल्यों, समान बर्ताव और स्वतंत्रता, को कमज़ोर करती है, जिन्हें अध्याय स्वयं राष्ट्र की सबसे मज़बूत बुनियाद मानता है।