कक्षा 11 राजनीति विज्ञान बुक 2 अध्याय 8 धर्मनिरपेक्षता (Secularism) के नोट्स हिंदी में

अंतर-धार्मिक वर्चस्वअंतःधार्मिक वर्चस्वधर्मतांत्रिक राज्यपारस्परिक निषेधसैद्धांतिक दूरीअस्पृश्यतावोट-बैंक राजनीति

1 धर्मनिरपेक्षता क्या है?

यहूदियों को सदियों तक समस्त यूरोप में भेदभाव झेलना पड़ा था, मगर आज भी वर्तमान इज़रायल राष्ट्र में ईसाई और मुसलमान, दोनों ही अरबी अल्पसंख्यक, उन राजनीतिक और आर्थिक लाभों से वंचित हैं जो यहूदी नागरिकों को मिले हुए हैं। यूरोप के अनेक हिस्सों में गैर-ईसाइयों के प्रति भेदभाव के सूक्ष्म रूप अभी भी बरकरार हैं। पड़ोसी देशों, पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति ने लोगों का ध्यान खींचा है। ऐसे उदाहरण हमें समकालीन विश्व में धर्मनिरपेक्षता के महत्त्व की याद दिलाते हैं।

1.1 अंतर-धार्मिक वर्चस्व

हमारे अपने देश में संविधान घोषणा करता है कि हर भारतीय नागरिक को देश के किसी भी भाग में आज़ादी और प्रतिष्ठा के साथ रहने का अधिकार है। मगर वास्तव में वर्जना और भेदभाव के अनेक रूप अभी भी बरकरार हैं। पाठ्यपुस्तक तीन उदाहरण गिनाती है:

घटना क्या हुआ
1984, दिल्ली व अन्य हिस्से लगभग 2,700 से ज़्यादा सिख मारे गए। पीड़ितों के परिवारजनों का मानना है कि दोषियों को आज तक सज़ा नहीं मिली है।
कश्मीरी पंडित हज़ारों कश्मीरी पंडितों को घाटी में अपना घर छोड़ने के लिए विवश किया गया। वे दो दशकों के बाद भी अपने घर नहीं लौट सके हैं।
2002, गुजरात गोधरा दंगों के पश्चात लगभग 1,000 से अधिक लोग मारे गए। बचे परिवारों के बहुत-से सदस्य अपने गाँव वापस नहीं जा सके, जहाँ से उन्हें उजाड़ दिया गया था।

इन तीनों उदाहरणों में एक बात सामान्य है: हर मामले में किसी एक धार्मिक समुदाय के लोगों को उनकी धार्मिक पहचान के कारण लक्ष्य किया गया, नागरिकों के एक समूह को बुनियादी आज़ादी से वंचित किया गया। इन्हें अंतर-धार्मिक वर्चस्व और एक धार्मिक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय के उत्पीड़न के मामले कहा जा सकता है।

रट लेंपरिभाषा 1 · धर्मनिरपेक्षता

धर्मनिरपेक्षता सर्वप्रथम और सर्वप्रमुख रूप से ऐसा सिद्धांत है जो अंतर-धार्मिक वर्चस्व (एक धर्म का दूसरे धर्म पर वर्चस्व) का विरोध करता है। यह इसका केवल एक पहलू है; इसका दूसरा उतना ही महत्त्वपूर्ण पहलू अंतःधार्मिक वर्चस्व (धर्म के भीतर छुपे वर्चस्व) का विरोध करना है।

1.2 अंतःधार्मिक वर्चस्व

कुछ लोगों का मानना है कि धर्म महज़ “जनसमुदाय के लिए अफ़ीम” है और जिस दिन सबकी बुनियादी ज़रूरतें पूरी हो जाएँगी, धर्म विलुप्त हो जाएगा। ऐसा विचार मानव की क्षमता के बारे में अतिरंजित बोध से पैदा होता है। मनुष्य कभी अमर नहीं हो सकेगा, रोगों का पूरी तरह उन्मूलन नहीं हो सकता, न ही हम दुर्घटना और भाग्य के तत्त्व से छुटकारा पा सकते हैं। धर्म, कला और दर्शन ऐसे दुख-दर्दों के प्रत्युत्तर हैं, इसीलिए धर्मनिरपेक्षता भी इसे स्वीकार करती है और स्वयं धर्मविरोधी नहीं है।

बहरहाल, धर्म का भी कुछ योगदान गहरी जड़ जमाए बैठी समस्याओं में है। किसी ऐसे धर्म के बारे में सोचना भी मुश्किल है, जो पुरुष और स्त्री को समान नज़र से देखता हो। हिंदू धर्म में कुछ तबके भेदभाव से स्थायी रूप से पीड़ित रहे हैं: दलितों को हिंदू मंदिरों में प्रवेश से रोका जाता रहा है, और देश के कुछ हिस्सों में हिंदू महिलाओं का भी मंदिरों में प्रवेश वर्जित है। जब कोई धर्म एक संगठन में बदलता है, तो आमतौर पर उसका सर्वाधिक रूढ़िवादी हिस्सा उस पर हावी हो जाता है, जो किसी भी असहमति को बर्दाश्त नहीं करता। अमेरिका के कुछ हिस्सों में धार्मिक रूढ़िवाद बड़ी समस्या बन गया है, जो देश के भीतर और बाहर, दोनों जगह शांति के लिए ख़तरा है। कई धर्म संप्रदायों में टूट जाते हैं, जिससे निरंतर आपसी हिंसा और भिन्न मत रखने वाले अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न होता है।

चित्र 1 · धार्मिक वर्चस्व के दो रूप : अंतर-धार्मिक वर्चस्व (एक धर्म का दूसरे धर्म पर) और अंतःधार्मिक वर्चस्व (धर्म के भीतर वर्चस्व)। धर्मनिरपेक्षता दोनों का विरोध करती है।
चित्र 1 · धार्मिक वर्चस्व के दो रूप : अंतर-धार्मिक वर्चस्व (एक धर्म का दूसरे धर्म पर) और अंतःधार्मिक वर्चस्व (धर्म के भीतर वर्चस्व)। धर्मनिरपेक्षता दोनों का विरोध करती है।

अतः धार्मिक वर्चस्व को केवल अंतर-धार्मिक वर्चस्व के रूप में नहीं देखा जा सकता; यह अंतःधार्मिक वर्चस्व का रूप भी लेता है। संस्थाबद्ध धार्मिक वर्चस्व के सभी रूपों के विरोधी होने के नाते धर्मनिरपेक्षता को दोनों को चुनौती देनी होगी। धर्मनिरपेक्षता ऐसा नियामक सिद्धांत है जो एक ऐसा समाज बनाना चाहता है जो अंतर-धार्मिक और अंतःधार्मिक, दोनों तरह के वर्चस्वों से मुक्त हो। सकारात्मक रूप से देखें तो यह धर्मों के भीतर आज़ादी तथा विभिन्न धर्मों के बीच और उनके भीतर समानता को बढ़ावा देती है।

2 धर्मनिरपेक्ष राज्य

आओ कुछ करके सीखें

कुछ ऐसे तरीकों की सूची बनाओ जिनके माध्यम से सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा दिया जा सकता है।

शिक्षा लोगों की सोच बदलने में मदद कर सकती है, और सांप्रदायिक दंगों के बीच हिंदुओं द्वारा मुसलमानों को या मुसलमानों द्वारा हिंदुओं को बचाने की कहानियाँ प्रेरणादायी होती हैं। लेकिन यह नामुमकिन है कि केवल शिक्षा या भलाई धार्मिक भेदभाव को मिटा दे। आधुनिक समाज में राज्यों के हाथ में प्रचुर सार्वजनिक शक्ति होती है, और राज्यसत्ता जिस तरह काम करती है, उसका अंतर-सामुदायिक टकराव और धार्मिक भेदभाव कम करने के प्रयासों पर निर्णायक प्रभाव पड़ता है। इसीलिए यह देखना ज़रूरी है कि धार्मिक टकराव रोकने और धार्मिक समानता बढ़ाने के लिए किस तरह की राज्यसत्ता चाहिए।

रट लेंपरिभाषा 2 · धर्मतांत्रिक राज्य

धर्मतांत्रिक राज्य वह राष्ट्र है जो किसी धर्म के पुरोहितों/प्रमुखों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से शासित होता है। उदाहरण: मध्यकालीन यूरोप की पोप की राज्यसत्ता, और हाल के समय में तालिबानी राज्यसत्ता। ऐसे राज्य अपनी श्रेणीबद्धता, उत्पीड़न और दूसरे धार्मिक समूहों को धार्मिक स्वतंत्रता न देने के लिए कुख्यात रहे हैं।

यदि हमारे लिए शांति, स्वतंत्रता और समानता का महत्त्व है, तो धार्मिक संस्थाओं और राज्यसत्ता की संस्थाओं के बीच संबंध-विच्छेद अवश्य होना चाहिए। लेकिन क्या यह अकेला पर्याप्त है? नहीं। अनेक राज्य धर्मतांत्रिक न होते हुए भी किसी खास धर्म के साथ घनिष्ठ गठजोड़ बनाए रखते हैं:

देश स्थिति
इंग्लैंड (16वीं सदी) राज्य पुरोहित वर्ग द्वारा संचालित नहीं था, फिर भी स्पष्ट रूप से आंग्ल चर्च और उसके सदस्यों का पक्षपोषण करता था। आंग्ल चर्च राष्ट्र का आधिकारिक धर्म था।
पाकिस्तान (आज) सुन्नी इस्लाम पाकिस्तान का आधिकारिक राजधर्म है। ऐसे शासनतंत्रों में आंतरिक विरोध या धार्मिक समानता की गुंजाइश बहुत कम होती है।

सचमुच धर्मनिरपेक्ष होने के लिए राज्यसत्ता को न केवल धर्मतांत्रिक होने से इनकार करना होगा, बल्कि किसी भी धर्म के साथ किसी भी औपचारिक कानूनी गठजोड़ से भी बचना होगा। धर्म-राज्य का संबंध-विच्छेद धर्मनिरपेक्ष राज्य के लिए ज़रूरी तो है, मगर पर्याप्त नहीं। धर्मनिरपेक्ष राज्य को ऐसे सिद्धांतों और लक्ष्यों के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए जो कम-से-कम अंशतः गैर-धार्मिक स्रोतों से निकलते हों, शांति, धार्मिक स्वतंत्रता, धार्मिक उत्पीड़न-भेदभाव-वर्जना से आज़ादी, और अंतर-धार्मिक व अंतःधार्मिक समानता।

इन लक्ष्यों के लिए राज्य को संगठित धर्म और उसकी संस्थाओं से कुछ हद तक पृथक रहना चाहिए, मगर इस पृथकता का कोई एक ही रूप नहीं है, यह इस पर निर्भर करता है कि किन मूल्यों को बढ़ावा देना है और उन्हें कैसे परिभाषित किया गया है। अब हम दो संकल्पनाओं पर विचार करेंगे: एक मुख्यधारा की पश्चिमी संकल्पना, जिसका सर्वोत्तम उदाहरण अमेरिकी राज्य है, और एक वैकल्पिक संकल्पना, जिसका सर्वोत्तम उदाहरण भारतीय राज्य है।

3 धर्मनिरपेक्षता का यूरोपीय मॉडल

सभी धर्मनिरपेक्ष राज्यों में एक चीज़ सामान्य है: वे न तो धर्मतांत्रिक हैं, न किसी खास धर्म की स्थापना करते हैं। हालाँकि सर्वाधिक प्रचलित संकल्पना, जो मुख्यतः अमेरिकी मॉडल से प्रेरित है, धर्म और राज्यसत्ता के संबंध-विच्छेद को पारस्परिक निषेध के रूप में समझती है।

रट लेंपरिभाषा 3 · पारस्परिक निषेध

राज्यसत्ता धर्म के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी, और इसी तरह धर्म राज्यसत्ता के मामलों में दखल नहीं देगा। दोनों के अपने अलग-अलग क्षेत्र और सीमाएँ हैं। राज्यसत्ता की कोई नीति पूर्णतः धार्मिक तर्क पर आधारित नहीं हो सकती, और कोई धार्मिक वर्गीकरण किसी सार्वजनिक नीति की बुनियाद नहीं बन सकता।

उसी तरह राज्य किसी धार्मिक संस्था को वित्तीय मदद नहीं देगा, और जब तक धार्मिक समुदायों की गतिविधियाँ देश के कानून की व्यापक सीमा के भीतर हैं, राज्य उनमें व्यवधान नहीं डालेगा। उदाहरण के लिए, अगर कोई धार्मिक संस्था औरतों के पुरोहित बनने को वर्जित करती है, या कोई धार्मिक समुदाय अपने भिन्न मत रखने वालों का बहिष्कार करता है, या कोई धर्म अपने कुछ सदस्यों को मंदिर के गर्भगृह में जाने से रोकता है, तो राज्य इन तीनों मामलों में मूक दर्शक ही बना रह सकता है। इस दृष्टि से धर्म एक निजी मामला है, राज्यसत्ता की नीति या कानून का विषय नहीं।

यह संकल्पना स्वतंत्रता और समानता की व्यक्तिवादी ढंग से व्याख्या करती है, स्वतंत्रता का मतलब है व्यक्तियों की स्वतंत्रता, समानता का मतलब है व्यक्तियों के बीच समानता। इसमें समुदाय आधारित अधिकारों या अल्पसंख्यक अधिकारों की कोई गुंजाइश नहीं है, क्योंकि यहूदियों को छोड़ दें तो पश्चिमी समाज काफ़ी हद तक धार्मिक रूप से सजातीय (एक जैसे) थे, इसलिए उनका ध्यान अंतःधार्मिक वर्चस्व पर ही केंद्रित रहा। इस मॉडल में राज्य-समर्थित धार्मिक सुधार के लिए भी कोई जगह नहीं है, क्योंकि यह मानता है कि राज्य-धर्म का अलगाव पारस्परिक निषेध का रिश्ता है।

कमाल अतातुर्क की धर्मनिरपेक्षता

बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में तुर्की में एक बिल्कुल अलग किस्म की धर्मनिरपेक्षता अमल में आई, यह संगठित धर्म से सैद्धांतिक दूरी बनाने की बजाय धर्म में सक्रिय हस्तक्षेप और उसके दमन की हिमायत करती थी। मुस्तफा कमाल अतातुर्क प्रथम विश्वयुद्ध के बाद सत्ता में आए और तुर्की के सार्वजनिक जीवन से खिलाफ़त को समाप्त करने पर तुले थे। उन्होंने अपना नाम मुस्तफा कमाल पाशा से बदलकर कमाल अतातुर्क कर लिया (अतातुर्क का अर्थ है “तुर्कों का पिता”)। हैट कानून के ज़रिए मुसलमानों की परंपरागत फ़ेज़ टोपी प्रतिबंधित कर दी गई, पश्चिमी पोशाकों को बढ़ावा मिला, तुर्की पंचांग की जगह पश्चिमी (ग्रिगोरियन) पंचांग आया, और 1928 में नई तुर्की वर्णमाला (संशोधित लैटिन रूप में) अपनाई गई। क्या आप ऐसी धर्मनिरपेक्षता की कल्पना कर सकते हैं जो आपको अपनी पहचान वाला नाम रखने, मनचाहे कपड़े पहनने या अपनी भाषा बोलने की आज़ादी न दे?

धर्मनिरपेक्षता के बारे में नेहरू के विचार

जब एक विद्यार्थी ने नेहरू से पूछा कि आज़ाद भारत में धर्मनिरपेक्षता का क्या मतलब होगा, तो उन्होंने जवाब दिया: “सभी धर्मों को राज्य द्वारा समान संरक्षण।” वे ऐसा धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र चाहते थे जो सभी धर्मों की हिफ़ाज़त करे, अन्य धर्मों की क़ीमत पर किसी एक धर्म की तरफ़दारी न करे, और स्वयं किसी धर्म को राजधर्म के तौर पर स्वीकार न करे। नेहरू भारतीय धर्मनिरपेक्षता के दार्शनिक थे। वे स्वयं किसी धर्म का अनुसरण नहीं करते थे और ईश्वर में विश्वास नहीं रखते थे, फिर भी उनके लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब धर्म के प्रति विद्वेष नहीं था, इस अर्थ में नेहरू तुर्की के अतातुर्क से काफ़ी भिन्न थे। नेहरू धर्म और राज्य के बीच पूर्ण संबंध-विच्छेद के भी पक्ष में नहीं थे: उनके अनुसार समाज में सुधार के लिए धर्मनिरपेक्ष राज्यसत्ता धर्म के मामले में हस्तक्षेप कर सकती है। जातीय भेदभाव, दहेज प्रथा और सती प्रथा की समाप्ति के लिए कानून बनवाने में नेहरू ने स्वयं महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक ही चीज़ पर वे हमेशा दृढ़ और समझौताहीन रहे: तमाम किस्म की सांप्रदायिकता का पूर्ण विरोध, ख़ासकर बहुसंख्यक समुदाय की सांप्रदायिकता की आलोचना में। उनके लिए धर्मनिरपेक्षता सिर्फ़ सिद्धांत का मामला नहीं, भारत की एकता और अखंडता की एकमात्र गारंटी भी थी।

4 धर्मनिरपेक्षता का भारतीय मॉडल

कभी-कभी कहा जाता है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता की नक़ल भर है। लेकिन अपने संविधान को ध्यान से पढ़ने से पता चलता है कि ऐसा नहीं है, भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से बुनियादी रूप से भिन्न है। यह केवल धर्म-राज्य के संबंध-विच्छेद पर बल नहीं देती; अंतर-धार्मिक समानता भी इस संकल्पना के लिए उतनी ही महत्त्वपूर्ण है।

भारतीय धर्मनिरपेक्षता को विशिष्ट क्या बनाता है? यह गहरी धार्मिक विविधता के संदर्भ में उदित हुई, जो पश्चिमी आधुनिक विचारों और राष्ट्रवाद के आगमन से भी पहले की है। भारत में पहले से ही अंतर-धार्मिक “सहिष्णुता” की संस्कृति मौजूद थी। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सहिष्णुता धार्मिक वर्चस्व की विरोधी नहीं है, यह हर किसी को कुछ मौक़ा तो देती है, पर वह आज़ादी अक्सर सीमित होती है, और सहिष्णुता हमें उन लोगों को बर्दाश्त करने की क्षमता देती है जिन्हें हम बिल्कुल नापसंद करते हैं। यह किसी बड़े गृहयुद्ध से उबरते समाज के लिए भारी गुण है, मगर शांति के समय में नहीं, जब लोग समान मान-मर्यादा के लिए संघर्ष कर रहे हों।

फ़्रांस और भारत : एक ही धर्मनिरपेक्षता नहीं

फ़्रांसीसी सरकार ने शैक्षिक संस्थाओं में पगड़ी जैसे धार्मिक प्रतीक धारण करने पर रोक लगा दी थी, जिस पर गरमागरम बहस हुई थी। यह अचरज की बात है कि फ़्रांस और भारत दोनों ही धर्मनिरपेक्ष राज्य हैं, लेकिन भारत में सार्वजनिक संस्थाओं में ऐसे धार्मिक प्रतीक धारण करने या दिखाने पर कोई रोक-टोक नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि धर्मनिरपेक्षता का जो आदर्श भारत में देखा गया है, वह फ़्रांस के तरीक़े से भिन्न है।

पश्चिमी आधुनिकता के आगमन ने भारतीय चिंतन में अब तक उपेक्षित और हाशिए पर रही समानता की अवधारणा को सतह पर ला दिया, उसने इसे धारदार बनाया और हमें समुदाय के भीतर समानता पर बल देने की ओर अग्रसर किया; साथ ही श्रेणीबद्धता की जगह अंतर-सामुदायिक समानता के विचार को भी ला दिया। इस तरह भारतीय समाज में पहले से मौजूद धार्मिक विविधता और पश्चिम से आए विचारों के बीच अंतःक्रिया से भारतीय धर्मनिरपेक्षता ने अपना विशिष्ट रूप ग्रहण किया, इसने अंतःधार्मिक और अंतर-धार्मिक वर्चस्व, दोनों पर एक साथ ध्यान केंद्रित किया।

4.1 भारतीय धर्मनिरपेक्षता की तीन विशिष्ट भिन्नताएँ

पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से भारतीय धर्मनिरपेक्षता की तीन भिन्नताएँ
पहली भिन्नताभारतीय धर्मनिरपेक्षता हिंदुओं के भीतर दलितों और महिलाओं के उत्पीड़न, भारतीय मुसलमानों या ईसाइयों के भीतर महिलाओं के प्रति भेदभाव, तथा बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों पर उत्पन्न ख़तरों, दोनों का समान रूप से विरोध करती है।
दूसरी भिन्नताइसका संबंध व्यक्तियों की धार्मिक आज़ादी से ही नहीं, अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक आज़ादी से भी है, हर आदमी को अपनी पसंद का धर्म मानने का अधिकार है, और धार्मिक अल्पसंख्यकों को भी अपनी संस्कृति व शैक्षिक संस्थाएँ क़ायम रखने का अधिकार है।
तीसरी भिन्नताचूँकि धर्मनिरपेक्ष राज्य को अंतर-धार्मिक वर्चस्व के साथ-साथ अंतःधार्मिक वर्चस्व पर भी समान रूप से चिंतित रहना है, भारतीय धर्मनिरपेक्षता में राज्य-समर्थित धार्मिक सुधार की गुंजाइश भी है और अनुकूलता भी।

इसी तीसरी भिन्नता के चलते भारतीय संविधान ने अस्पृश्यता पर प्रतिबंध लगाया है, और भारतीय राज्य ने बाल विवाह के उन्मूलन और अंतर्जातीय विवाह पर लगे निषेध को ख़त्म करने के लिए अनेक कानून बनाए हैं। सवाल उठता है: क्या कोई राज्य धार्मिक सुधारों की पहल या समर्थन करते हुए भी धर्मनिरपेक्ष बना रह सकता है? भारतीय राज्य का धर्मनिरपेक्ष चरित्र इसी बात से बरकरार है कि वह न तो धर्मतांत्रिक है, न ही किसी धर्म को राजधर्म मानता है। इसके परे, उसने धार्मिक समानता के लिए एक अत्यंत परिष्कृत नीति अपनाई है, जो उसे अमेरिकी शैली में धर्म से विलग होने या ज़रूरत पड़ने पर उससे जुड़ने, दोनों की छूट देती है।

जुड़ाव का तरीक़ा उदाहरण
नकारात्मक (धार्मिक अत्याचार का विरोध) अस्पृश्यता पर प्रतिबंध
सकारात्मक (सहयोग) धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपनी शिक्षण संस्थाएँ खोलने-चलाने का अधिकार, जिन्हें राज्य से सहायता भी मिल सकती है

4.2 पश्चिमी और भारतीय मॉडल की तुलना

पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता

  • धर्म-राज्य का पारस्परिक निषेध (एक-दूसरे के मामलों में दखल नहीं)
  • एक धर्म के भिन्न पंथों के बीच समानता पर ज़ोर
  • समुदाय आधारित अधिकारों पर कम ध्यान
  • व्यक्ति और उसके अधिकार केंद्र में

भारतीय धर्मनिरपेक्षता

  • राज्य-समर्थित धार्मिक सुधारों की अनुमति
  • विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच समानता मुख्य सरोकार
  • अल्पसंख्यक अधिकारों पर ध्यान
  • व्यक्ति और धार्मिक समुदाय, दोनों के अधिकार संरक्षित

अब तक स्पष्ट हो जाना चाहिए कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता की यह जटिलता “सर्व धर्म समभाव” के मुहावरे में क्यों नहीं समाई जा सकती। अगर इसका मतलब तमाम धर्मों का शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व या अंतर-धार्मिक सहिष्णुता है, तो यह पर्याप्त नहीं, क्योंकि धर्मनिरपेक्षता महज़ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व से कहीं आगे जाती है। और अगर इसका मतलब तमाम धर्मों के प्रति सम्मान की समान भावना है, तो इसमें एक अस्पष्टता है।

रट लेंपरिभाषा 4 · सैद्धांतिक दूरी और सैद्धांतिक हस्तक्षेप

सैद्धांतिक दूरी के तहत धर्मनिरपेक्ष राज्यसत्ता समुदायों के बीच शांति को बढ़ावा देने के लिए धर्म से सैद्धांतिक दूरी बनाए रख सकती है और ख़ास समुदायों की रक्षा के लिए उसमें हस्तक्षेप भी कर सकती है: ज़रूरत हो तो वह अमेरिकी ढंग से धर्म से अलग रह सकती है, और आवश्यक हो तो उससे जुड़ भी सकती है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता तमाम धर्मों में राज्यसत्ता के सैद्धांतिक हस्तक्षेप की अनुमति देती है। ऐसा हस्तक्षेप हर धर्म के कुछ ख़ास पहलुओं (जैसे धर्म के स्तर पर मान्य जातिगत विभाजन) के प्रति असम्मान भी दिखा सकता है। धर्मनिरपेक्ष राज्य के लिए ज़रूरी नहीं कि वह धर्म के हर पहलू को एक जैसा सम्मान दे; यह संगठित धर्मों के कुछ पहलुओं के प्रति एक जैसा असम्मान दिखाने की अनुमति भी देता है।

चिंतन-मंथन

क्या धर्मनिरपेक्षता नीचे लिखी बातों के संगत है?
(क) अल्पसंख्यक समुदाय की तीर्थ यात्रा को आर्थिक अनुदान देना।
(ख) सरकारी कार्यालयों में धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन करना।

5 भारतीय धर्मनिरपेक्षता की आलोचनाएँ

भारतीय धर्मनिरपेक्षता तीखी आलोचनाओं का विषय बनी रही है। पाठ्यपुस्तक छह आलोचनाएँ गिनाती है और हर एक का जवाब भी देती है।

5.1 धर्म-विरोधी

पहली आलोचना: धर्मनिरपेक्षता धर्मविरोधी है। जवाब: धर्मनिरपेक्षता संस्थाबद्ध धार्मिक वर्चस्व का विरोध करती है, यह धर्मविरोधी होने के समान नहीं। धर्मनिरपेक्षता धार्मिक स्वतंत्रता और समानता को बढ़ावा देती है, इसलिए यह धार्मिक पहचान की हिफ़ाज़त करती है, उसे ख़तरे में नहीं डालती। हाँ, यह धार्मिक पहचान के उन रूपों पर ज़रूर चोट करती है जो मतांध, हिंसक, दुराग्रही, बहिष्कारवादी या अन्य धर्मों के प्रति घृणा फैलाने वाले हैं, असली सवाल यह नहीं कि किसी चीज़ पर चोट की जाय या नहीं, बल्कि यह है कि जिस पर चोट की जा रही है वह मूल रूप से इस लायक़ है या नहीं।

5.2 पश्चिम से आयातित

दूसरी आलोचना: धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी अवधारणा है, इसलिए भारतीय परिस्थितियों के लिए अनुपयुक्त। एक सतही जवाब यह हो सकता है: पतलून से लेकर इंटरनेट और संसदीय लोकतंत्र तक, आज भारत में लाखों चीज़ें प्रचलन में हैं जिनकी जड़ें पश्चिम में हैं, क्या किसी यूरोपियन को यह शिकायत करते सुना है कि शून्य का आविष्कार भारत में हुआ, इसलिए वे इसका इस्तेमाल नहीं करेंगे? असली और अधिक महत्त्वपूर्ण जवाब यह है कि सचमुच धर्मनिरपेक्ष होने के लिए किसी राष्ट्र का अपना खुद का लक्ष्य होना चाहिए। पश्चिमी राज्य तब धर्मनिरपेक्ष बने, जब एक महत्त्वपूर्ण स्तर पर उन्होंने ईसाइयत से संबंध-विच्छेद कर लिया; पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता में वैसी कोई ईसाइयत नहीं है। धर्म-राज्य का पारस्परिक निषेध, जिसे पश्चिमी धर्मनिरपेक्ष समाजों का आदर्श माना जाता है, सभी धर्मनिरपेक्ष राज्यों की प्रमुख विशेषता भी नहीं है; संबंध-विच्छेद के विचार की व्याख्या अलग-अलग तरह से की जा सकती है। कोई धर्मनिरपेक्ष राज्यसत्ता समुदायों के बीच शांति को बढ़ावा देने के लिए धर्म से सैद्धांतिक दूरी बनाए रख सकती है और ख़ास समुदायों की रक्षा के लिए वह उसमें हस्तक्षेप भी कर सकती है। भारत में ठीक यही हुआ: यहाँ धर्मनिरपेक्षता का एक ऐसा रूप विकसित हुआ जो न तो पूरी तरह ईसाइयत से जुड़ा है, न भारतीय ज़मीन पर सीधा पश्चिमी आरोपण। तथ्य यह है कि धर्मनिरपेक्षता का इतिहास पश्चिमी और ग़ैर-पश्चिमी, दोनों मार्गों का अनुसरण करता दिखता है, पश्चिम में चर्च-राज्य का संबंध-विच्छेद केंद्रीय सवाल था, भारत जैसे देशों में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का सवाल महत्त्वपूर्ण रहा है।

5.3 अल्पसंख्यकवाद

तीसरी आलोचना: धर्मनिरपेक्षता पर अल्पसंख्यकवाद (अल्पसंख्यकों को अनुचित तरजीह देने) का आरोप। पाठ्यपुस्तक दो उदाहरणों से इसका जवाब देती है:

उदाहरण · धूम्रपान करने वाली ट्रेन

चार वयस्क सबसे तेज़ चलने वाली गाड़ी में सफ़र कर रहे हैं। एक यात्री सिगरेट पीना चाहता है, दूसरा शिकायत करता है कि वह धुआँ बर्दाश्त नहीं कर सकता; बाक़ी दो धूम्रपान करते हैं पर चुप रहते हैं। वोट होता है, दो मौन धूम्रपानकर्ता व्यसनी का साथ देते हैं, और धूम्रपान न करने वाला 2 मतों से हार जाता है। नतीजा उचित लगता है क्योंकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाई गई। अब स्थिति बदलें: मान लें धूम्रपान न करने वाला यात्री दमे (अस्थमा) से पीड़ित है, धूम्रपान से उसे जानलेवा दौरा पड़ सकता है। अब बहुमत के फ़ैसले को मान लेना उचित नहीं होगा, क्योंकि जब बुनियादी हितों की बात हो, वोटिंग उपयुक्त प्रक्रिया नहीं। जो व्यक्तियों के लिए सही है, वही समुदायों के लिए भी सही है: अल्पसंख्यकों के सर्वाधिक मौलिक हित संवैधानिक कानून द्वारा संरक्षित होने चाहिए, अल्पसंख्यक अधिकार उतने ही जायज़ हैं जितने वे उनके मौलिक हितों की रक्षा करते हैं।

उदाहरण · सीढ़ी और लिफ़्ट

पहली मंज़िल पर चल रही फ़िल्म तक सीढ़ी से हर कोई पहुँच सकता है, पर क्या सचमुच हर कोई स्वतंत्र है? कुछ दर्शक बुज़ुर्ग हैं, किसी की टांग टूटी है, कोई शारीरिक रूप से अक्षम है, इनमें से कोई सीढ़ी नहीं चढ़ सकता। उनके लिए लिफ़्ट या रैंप की व्यवस्था करना कोई विशेष सुविधा नहीं, बल्कि उन्हें भी वही चीज़ पाने देना है जो बाक़ी सब सीढ़ी से पा रहे हैं, यानी उनके साथ वैसा ही सम्मान और गरिमा भरा बरताव। इसीलिए अल्पसंख्यक अधिकारों को विशेष सुविधा नहीं, बराबरी का साधन मानना चाहिए।

5.4 अतिशय हस्तक्षेपकारी

चौथी आलोचना: धर्मनिरपेक्षता उत्पीड़नकारी है और धार्मिक स्वतंत्रता में अतिशय हस्तक्षेप करती है। यह भारतीय धर्मनिरपेक्षता की ग़लत समझ है। यह सच है कि पारस्परिक निषेध के विचार को न मानकर भारतीय धर्मनिरपेक्षता धर्म में हस्तक्षेप को अस्वीकार नहीं करती, पर इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि यह अतिशय हस्तक्षेपकारी है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता सैद्धांतिक दूरी के सिद्धांत पर चलती है, जो हस्तक्षेप की गुंजाइश भी रखती है और ग़ैर-हस्तक्षेप की भी, और हस्तक्षेप का मतलब अपने-आप में उत्पीड़नकारी हस्तक्षेप नहीं होता।

यह सही है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता राज्य-समर्थित धार्मिक सुधार की इजाज़त देती है, लेकिन इसे ऊपर से थोपे गए बदलाव के समान नहीं मानना चाहिए। तब यह सवाल उठता है: विभिन्न धर्मों के निजी कानून (विवाह, उत्तराधिकार व पारिवारिक मामलों से जुड़े) अभी तक पूरी तरह क्यों नहीं सुधारे गए? यह भारतीय राज्य के सामने बड़ी दुविधा है, इन्हें संविधान द्वारा संरक्षित समुदाय-विशेष के अधिकार भी माना जा सकता है, और महिलाओं को बराबरी न देने के कारण धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का तिरस्कार भी। ऐसे आंतरिक टकराव किसी जटिल सिद्धांत के स्वाभाविक अंग हैं, स्थायी नहीं। निजी कानूनों को इस तरह सुधारा जा सकता है कि वे अल्पसंख्यक अधिकार और स्त्री-पुरुष बराबरी, दोनों की मिसाल बने रहें, लेकिन ऐसा सुधार न तो राज्य/समूह की ज़बरदस्ती से लाया जाना चाहिए, न ही राज्य पूरी दूरी बनाकर बैठ सकता है। राज्यसत्ता को हर धर्म के भीतर उदारवादी और लोकतांत्रिक आवाज़ों का समर्थन करते हुए एक मददगार की भूमिका निभानी होगी।

5.5 वोट-बैंक की राजनीति

पाँचवीं आलोचना: धर्मनिरपेक्षता वोट-बैंक की राजनीति को बढ़ावा देती है। अनुभवजन्य दावे के रूप में यह पूरी तरह असत्य भी नहीं, लोकतंत्र में राजनेताओं के लिए वोट पाना उनके काम का ही हिस्सा है, इसके लिए उन्हें दोष देना अनुचित है। असली सवाल यह है: वोट किस मक़सद से माँगा गया, सिर्फ़ अपने स्वार्थ के लिए या समूह के कल्याण के लिए भी? अगर समूह को कोई लाभ नहीं मिलता, तो राजनेता ज़रूर दोषी है; अगर धर्मनिरपेक्ष राजनेता अल्पसंख्यकों को वह दिला पाते हैं जो वे चाहते थे, तो यह धर्मनिरपेक्ष परियोजना की सफलता है। लेकिन अगर समूह का कल्याण अन्य समूहों के कल्याण और अधिकारों की क़ीमत पर किया जाए, या ये राजनेता बहुसंख्यकों के हितों को नुकसान पहुँचाएँ, तो एक नया अन्याय पैदा होगा।

समस्या तब भी पैदा होती है जब वोट-बैंक की राजनीति किसी पूरे सामाजिक समूह को चुनाव में एक ख़ास उम्मीदवार या दल के लिए सामूहिक रूप से मतदान करने के लिए एकजुट करती है, तब यह चुनावी राजनीति को विकृत कर देती है, क्योंकि समूह के भीतर विविधता के बावजूद उसे एक इकाई की तरह दिखाया जाता है, और राजनीतिक दल समाज के दीर्घकालिक विकास से ज़्यादा अल्पकालिक चुनावी लाभ को प्राथमिकता देते हैं। भारत में देखा गया है कि दल अक्सर वास्तविक मुद्दों की उपेक्षा करते हुए भावनात्मक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, और प्रतिस्पर्धी वोट-बैंक राजनीति समूहों को सीमित संसाधनों के लिए लड़ते प्रतिद्वंद्वियों के रूप में चित्रित कर सामाजिक विभाजन बढ़ाती है। भारत में वोट-बैंक की राजनीति अल्पसंख्यक तुष्टीकरण से भी जुड़ी है, दल सभी नागरिकों की समानता के सिद्धांत की उपेक्षा कर किसी अल्पसंख्यक समूह के हित को प्राथमिकता देते हैं, जिसका विडंबनापूर्ण नतीजा उसी समूह का और अधिक अलगाव और हाशियाकरण होता है, और समूह के भीतर की विविधता नज़रअंदाज़ होने से उसमें सामाजिक सुधार के मुद्दे उठाना भी मुश्किल हो जाता है।

पढ़ें और सोचें · राजपत्रित अवकाशों की सूची (2019)

क्या नीचे दी गई गजटेड हॉलिडे लिस्ट भारत में धर्मनिरपेक्षता का उदाहरण प्रस्तुत करती है? तर्क दें।

अवकाश तिथि
गणतंत्र दिवस 26 जनवरी
महाशिवरात्रि 4 मार्च
होली 21 मार्च
महावीर जयंती 17 अप्रैल
गुड फ्राइडे 19 अप्रैल
बुद्ध पूर्णिमा 18 मई
ईद-उल-फ़ित्र 5 जून
ईद-उल-अज़हा (बकरीद) 12 अगस्त
स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त
जन्माष्टमी 24 अगस्त
मुहर्रम 10 सितंबर
महात्मा गांधी जयंती 2 अक्तूबर
दशहरा (विजयदशमी) 8 अक्तूबर
दिवाली 27 अक्तूबर
ईद-ए-मिलादुन्नबी 10 नवंबर
गुरु नानक जयंती 12 नवंबर
क्रिसमस 25 दिसंबर

5.6 एक असंभव परियोजना

अंतिम, सबसे उन्मादपूर्ण आलोचना: धर्मनिरपेक्षता काम नहीं कर सकती क्योंकि गहरे धार्मिक मतभेद रखने वाले लोग कभी शांति से एक साथ नहीं रह सकते। यह दावा अनुभव से ग़लत साबित होता है, भारतीय सभ्यता का इतिहास दिखाता है कि इस तरह साथ रहना बिल्कुल संभव है, और यह अन्यत्र भी हुआ है: ऑटोमन साम्राज्य इसका प्रेरणादायी उदाहरण है। आलोचक फिर कह सकते हैं कि वह सह-अस्तित्व केवल असमानता की स्थितियों में संभव था (श्रेणीबद्ध व्यवस्था में हर किसी को जगह मिल जाती थी), और आज जब समानता एक प्रभावी सांस्कृतिक मूल्य बनती जा रही है, यह काम नहीं करेगा।

पाठ्यपुस्तक का जवाब: भारतीय धर्मनिरपेक्षता किसी असंभव लक्ष्य का पीछा नहीं कर रही, बल्कि यह दुनिया के भविष्य का प्रतिबिंब प्रस्तुत करती है। भारत में एक महान प्रयोग किया जा रहा है, जिसे पूरी दुनिया बड़े चाव और पैनी निगाहों से देख रही है, क्योंकि पूर्व उपनिवेशों से पश्चिम की ओर हो रहे प्रवासन और वैश्वीकरण की तेज़ी के साथ, यूरोप और अमेरिका तथा मध्य-पूर्व के कुछ हिस्से भी अब धर्म-संस्कृति की विविधता के लिहाज़ से भारत जैसे दीखने लगे हैं। ये समाज भारतीय प्रयोग के भविष्य को गहरी रुचि के साथ देख रहे हैं।

चित्र 2 · भारतीय धर्मनिरपेक्षता पर छह आलोचनाएँ और पाठ्यपुस्तक के मुख्य जवाब : धर्म-विरोधी, पश्चिम से आयातित, अल्पसंख्यकवाद, अतिशय हस्तक्षेपकारी, वोट-बैंक की राजनीति, और असंभव परियोजना।
चित्र 2 · भारतीय धर्मनिरपेक्षता पर छह आलोचनाएँ और पाठ्यपुस्तक के मुख्य जवाब : धर्म-विरोधी, पश्चिम से आयातित, अल्पसंख्यकवाद, अतिशय हस्तक्षेपकारी, वोट-बैंक की राजनीति, और असंभव परियोजना।
परिभाषाएँ एक जगह
धर्मनिरपेक्षताअंतर-धार्मिक और अंतःधार्मिक, दोनों तरह के वर्चस्वों से मुक्त समाज चाहने वाला नियामक सिद्धांत
धर्मतांत्रिक राज्यकिसी धर्म के पुरोहितों/प्रमुखों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से शासित राष्ट्र
पारस्परिक निषेधपश्चिमी/अमेरिकी मॉडल : राज्य धर्म में दख़ल नहीं देगा, धर्म राज्य में दख़ल नहीं देगा
सैद्धांतिक दूरीभारतीय मॉडल : राज्य धर्मों से एक तयशुदा दूरी रखता है, पर ज़रूरत पड़ने पर सैद्धांतिक हस्तक्षेप भी कर सकता है
अस्पृश्यता-प्रतिबंधराज्य के नकारात्मक (धार्मिक अत्याचार-विरोधी) जुड़ाव का उदाहरण
वोट-बैंक की राजनीतिकिसी सामाजिक समूह को चुनाव में सामूहिक रूप से एक इकाई की तरह मतदान के लिए एकजुट करना
आख़िरी दोहराव
  • धर्मनिरपेक्षता दो तरह के वर्चस्व का विरोध करती है : अंतर-धार्मिक (1984, कश्मीर, 2002 गुजरात) और अंतःधार्मिक (दलित-महिला मंदिर-प्रवेश)
  • धर्मतांत्रिक राज्य = पुरोहितों द्वारा शासित (पोप-राज्य, तालिबान); धर्म-राज्य अलगाव ज़रूरी है पर पर्याप्त नहीं (इंग्लैंड, पाकिस्तान)
  • पश्चिमी/यूरोपीय मॉडल : पारस्परिक निषेध, व्यक्तिवादी, राज्य-समर्थित सुधार की गुंजाइश नहीं; अतातुर्क के तुर्की में एक बिल्कुल अलग किस्म की धर्मनिरपेक्षता (धर्म में सक्रिय हस्तक्षेप और दमन) थी, नेहरू की धर्मनिरपेक्षता से भिन्न
  • भारतीय मॉडल : सैद्धांतिक दूरी, तीन भिन्नताएँ, राज्य-समर्थित धार्मिक सुधार (अस्पृश्यता-प्रतिबंध)
  • छह आलोचनाएँ और जवाब : धर्म-विरोधी नहीं, पश्चिमी आयात नहीं, अल्पसंख्यकवाद नहीं (ट्रेन/लिफ़्ट उदाहरण), अतिशय हस्तक्षेपकारी नहीं, वोट-बैंक राजनीति ग़लत तब जब समूह को लाभ न मिले या दूसरे समूहों के अधिकारों की क़ीमत चुकानी पड़े, असंभव परियोजना नहीं (ऑटोमन साम्राज्य)
परीक्षा से पहले ख़ुद को जाँचें
  • क्या मुझे अंतर-धार्मिक और अंतःधार्मिक वर्चस्व के तीनों-तीनों उदाहरण अलग-अलग याद हैं?
  • क्या मुझे धर्मतांत्रिक राज्य की परिभाषा और इंग्लैंड-पाकिस्तान के उदाहरण याद हैं?
  • क्या मुझे पारस्परिक निषेध और सैद्धांतिक दूरी के बीच का अंतर स्पष्ट है?
  • क्या मुझे भारतीय धर्मनिरपेक्षता की तीनों भिन्नताएँ क्रम से याद हैं?
  • क्या मुझे छहों आलोचनाएँ और उनके जवाब अलग-अलग याद हैं?
  • क्या मुझे अतातुर्क और नेहरू की धर्मनिरपेक्षता के बीच अंतर स्पष्ट है?
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