कक्षा 11 राजनीति विज्ञान बुक 2 अध्याय 8 धर्मनिरपेक्षता महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. धर्मनिरपेक्षता के दो मुख्य पहलू कौन-से हैं?

उत्तर: अंतर-धार्मिक वर्चस्व का विरोध और अंतःधार्मिक वर्चस्व का विरोध।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. 1984 में दिल्ली में लगभग कितने सिख मारे गए थे?

उत्तर: लगभग 2,700 से ज़्यादा सिख मारे गए थे।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. धर्मतांत्रिक राज्य का एक उदाहरण दीजिए।

उत्तर: मध्यकालीन यूरोप की पोप राज्यसत्ता, या हाल की तालिबानी राज्यसत्ता।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. अतातुर्क का पूरा नाम-परिवर्तन क्या था?

उत्तर: मुस्तफ़ा कमाल पाशा से बदलकर कमाल अतातुर्क।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. नई तुर्की वर्णमाला किस वर्ष अपनाई गई?

उत्तर: 1928 में।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. ‘पारस्परिक निषेध’ का संक्षेप में क्या अर्थ है?

उत्तर: राज्य धर्म में दख़ल नहीं देगा, और धर्म राज्य में दख़ल नहीं देगा।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. भारतीय संविधान ने किस सामाजिक बुराई पर प्रतिबंध लगाया, जो राज्य के नकारात्मक जुड़ाव का उदाहरण है?

उत्तर: अस्पृश्यता पर।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. असंभव परियोजना आलोचना के जवाब में किस साम्राज्य का उदाहरण दिया गया है?

उत्तर: ऑटोमन साम्राज्य का।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. धर्मतांत्रिक राज्य और धर्मनिरपेक्ष राज्य में क्या मूल अंतर है?

उत्तर: धर्मतांत्रिक राज्य किसी धर्म के पुरोहितों/प्रमुखों द्वारा प्रत्यक्ष शासित होता है और धार्मिक-राजनीतिक संस्थाओं में कोई अलगाव नहीं होता। धर्मनिरपेक्ष राज्य धार्मिक संस्थाओं से संबंध-विच्छेद रखता है, किसी धर्म से औपचारिक कानूनी गठजोड़ नहीं करता, और ऐसे लक्ष्यों के लिए प्रतिबद्ध होता है जो कम-से-कम अंशतः गैर-धार्मिक स्रोतों से निकलते हों।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. नेहरू और अतातुर्क की धर्मनिरपेक्षता में मुख्य अंतर बताइए।

उत्तर: अतातुर्क की धर्मनिरपेक्षता धर्म में सक्रिय हस्तक्षेप व दमन पर आधारित थी। नेहरू धर्म के प्रति विद्वेष नहीं रखते थे और पूर्ण संबंध-विच्छेद के पक्ष में भी नहीं थे, बल्कि सामाजिक सुधार के लिए सीमित हस्तक्षेप चाहते थे।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. अंतर-धार्मिक वर्चस्व और अंतःधार्मिक वर्चस्व में अंतर स्पष्ट करें।

उत्तर: अंतर-धार्मिक वर्चस्व का मतलब है एक धर्म का दूसरे धर्म पर वर्चस्व (जैसे 1984 के दंगे)। अंतःधार्मिक वर्चस्व का मतलब है धर्म के भीतर ही वर्चस्व, जैसे दलितों या महिलाओं का मंदिर-प्रवेश रोका जाना।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. धर्म-राज्य का संबंध-विच्छेद ज़रूरी है पर पर्याप्त क्यों नहीं है?

उत्तर: क्योंकि कई ग़ैर-धर्मतांत्रिक राज्य भी किसी खास धर्म के साथ घनिष्ठ गठजोड़ बनाए रख सकते हैं, जैसे 16वीं सदी का इंग्लैंड आंग्ल चर्च का पक्षपोषण करता था, या आज पाकिस्तान का राजधर्म सुन्नी इस्लाम है। इसलिए धर्मनिरपेक्ष होने के लिए राज्य को किसी भी धर्म से औपचारिक कानूनी गठजोड़ से भी बचना होगा।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. सहिष्णुता धर्मनिरपेक्षता से किस तरह भिन्न है?

उत्तर: सहिष्णुता लोगों को कुछ मौक़ा देती है पर वह आज़ादी सीमित होती है, और यह धार्मिक वर्चस्व की विरोधी नहीं है। धर्मनिरपेक्षता इससे कहीं आगे जाकर वर्चस्व की सक्रिय समाप्ति चाहती है, केवल निष्क्रिय बर्दाश्त नहीं।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. फ़्रांस और भारत की धर्मनिरपेक्षता में अंतर का एक उदाहरण दें।

उत्तर: फ़्रांस ने शैक्षिक संस्थाओं में पगड़ी जैसे धार्मिक प्रतीकों पर रोक लगाई है, जबकि भारत में सार्वजनिक संस्थाओं में ऐसे धार्मिक प्रतीक धारण करने या दिखाने पर कोई रोक-टोक नहीं है।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. धूम्रपान ट्रेन के उदाहरण में असली सबक़ क्या है?

उत्तर: जब बुनियादी और गंभीर हितों (जैसे दमा के मरीज़ की जान) का सवाल हो, तो मतदान जैसी बहुमत-आधारित प्रक्रिया उपयुक्त नहीं होती; व्यक्ति और समुदाय, दोनों को अपने महत्त्वपूर्ण हितों की सुरक्षा का प्राथमिक अधिकार है।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. ‘सर्व धर्म समभाव’ मुहावरा भारतीय धर्मनिरपेक्षता को पूरी तरह क्यों नहीं दर्शाता?

उत्तर: अगर इसका मतलब शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व है तो यह अपर्याप्त है क्योंकि धर्मनिरपेक्षता इससे कहीं आगे जाती है; और अगर इसका मतलब सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान है तो अस्पष्टता है, क्योंकि भारतीय धर्मनिरपेक्षता कुछ धार्मिक पहलुओं (जैसे जातिगत भेदभाव) के प्रति असम्मान की भी अनुमति देती है।

प्रश्न 9 (2 अंक)

प्र. वोट-बैंक की राजनीति कब चुनावी राजनीति को विकृत करती है?

उत्तर: जब यह किसी पूरे सामाजिक समूह को, उसके भीतर की विविधता के बावजूद, चुनाव में किसी एक उम्मीदवार या दल के लिए सामूहिक रूप से मतदान करने वाली एक इकाई के रूप में एकजुट करती है, और दीर्घकालिक विकास पर अल्पकालिक चुनावी लाभ को प्राथमिकता देती है।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. अंतर-धार्मिक वर्चस्व के तीनों उदाहरण विस्तार से समझाइए जो पाठ्यपुस्तक भारत के संदर्भ में देती है।

उत्तर: पहला, 1984 में दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में लगभग 2,700 से ज़्यादा सिख मारे गए, और पीड़ितों के परिवार मानते हैं कि दोषियों को आज तक सज़ा नहीं मिली। दूसरा, हज़ारों कश्मीरी पंडितों को कश्मीर घाटी में अपना घर छोड़ने पर विवश किया गया, और वे दो दशकों बाद भी अपने घर नहीं लौट सके। तीसरा, 2002 में गुजरात में गोधरा दंगों के बाद 1,000 से अधिक लोग मारे गए, और बचे परिवारों के कई सदस्य अपने गाँव वापस नहीं जा सके। तीनों उदाहरणों में एक समान बात यह है कि किसी एक धार्मिक समुदाय के लोगों को उनकी धार्मिक पहचान के कारण लक्ष्य बनाया गया और उन्हें बुनियादी आज़ादी से वंचित किया गया, यही अंतर-धार्मिक वर्चस्व है।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. धर्मतांत्रिक राज्य और धर्म-राज्य के गठजोड़ वाले राज्य में अंतर उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तर: धर्मतांत्रिक राज्य वह है जो सीधे किसी धर्म के पुरोहितों द्वारा शासित होता है, जैसे मध्यकालीन यूरोप में पोप की राज्यसत्ता या हाल की तालिबानी राज्यसत्ता, जो अपनी श्रेणीबद्धता, उत्पीड़न और धार्मिक स्वतंत्रता न देने के लिए कुख्यात रहे हैं। इसके उलट, कुछ राज्य धर्मतांत्रिक न होते हुए भी किसी खास धर्म से घनिष्ठ गठजोड़ रखते हैं, जैसे 16वीं सदी का इंग्लैंड जो पुरोहित वर्ग द्वारा शासित नहीं था फिर भी आंग्ल चर्च का पक्षपोषण करता था, या आज का पाकिस्तान जिसका आधिकारिक राजधर्म सुन्नी इस्लाम है। इसीलिए सच्चे धर्मनिरपेक्ष राज्य के लिए धर्मतांत्रिक न होना काफ़ी नहीं, किसी भी धर्म से औपचारिक कानूनी गठजोड़ से भी बचना ज़रूरी है।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. कमाल अतातुर्क की धर्मनिरपेक्षता की विशेषताएँ विस्तार से बताइए।

उत्तर: मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क प्रथम विश्वयुद्ध के बाद सत्ता में आए और तुर्की के सार्वजनिक जीवन से खिलाफ़त को समाप्त करने पर तुले थे। उनकी धर्मनिरपेक्षता संगठित धर्म से सैद्धांतिक दूरी बनाने की बजाय धर्म में सक्रिय हस्तक्षेप और उसके दमन पर आधारित थी। उन्होंने अपना नाम मुस्तफ़ा कमाल पाशा से बदलकर कमाल अतातुर्क (तुर्कों का पिता) कर लिया, हैट कानून से परंपरागत फ़ेज़ टोपी प्रतिबंधित की, पश्चिमी पोशाकों को बढ़ावा दिया, तुर्की पंचांग की जगह ग्रिगोरियन पंचांग अपनाया, और 1928 में नई तुर्की वर्णमाला को संशोधित लैटिन रूप में अपनाया। यह धर्मनिरपेक्षता नेहरू की धर्मनिरपेक्षता से बिल्कुल भिन्न थी, क्योंकि नेहरू धर्म के प्रति विद्वेष नहीं रखते थे।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. भारतीय धर्मनिरपेक्षता की तीन विशिष्ट भिन्नताएँ पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से विस्तार से समझाइए।

उत्तर: पहली भिन्नता यह है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता हिंदुओं के भीतर दलितों-महिलाओं के उत्पीड़न, भारतीय मुसलमानों-ईसाइयों के भीतर महिलाओं के प्रति भेदभाव, तथा बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों पर संभावित ख़तरों, दोनों तरह के वर्चस्व का समान रूप से विरोध करती है। दूसरी भिन्नता यह है कि इसका संबंध केवल व्यक्तियों की धार्मिक आज़ादी से नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक आज़ादी से भी है, जिन्हें अपनी संस्कृति और शैक्षिक संस्थाएँ क़ायम रखने का अधिकार है। तीसरी भिन्नता यह है कि चूँकि धर्मनिरपेक्ष राज्य को अंतर-धार्मिक और अंतःधार्मिक, दोनों वर्चस्व की समान चिंता करनी है, भारतीय धर्मनिरपेक्षता में राज्य-समर्थित धार्मिक सुधार (जैसे अस्पृश्यता पर प्रतिबंध) की गुंजाइश और अनुकूलता, दोनों हैं।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. सैद्धांतिक दूरी को उदाहरण सहित समझाइए और यह पारस्परिक निषेध से किस तरह भिन्न है।

उत्तर: सैद्धांतिक दूरी भारतीय धर्मनिरपेक्षता की वह अवधारणा है जिसके अनुसार राज्य धर्मों से एक तयशुदा दूरी बनाए रखता है, पर ज़रूरत पड़ने पर सैद्धांतिक हस्तक्षेप भी कर सकता है, जैसे अस्पृश्यता पर प्रतिबंध (नकारात्मक जुड़ाव) या अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं को सहायता (सकारात्मक जुड़ाव)। इसके विपरीत, पारस्परिक निषेध (पश्चिमी/अमेरिकी मॉडल) में राज्य हर हाल में धर्म से दूर रहता है और धार्मिक सुधार में हस्तक्षेप नहीं करता। सैद्धांतिक दूरी राज्य को धर्म के हर पहलू का समान सम्मान करने के लिए बाध्य नहीं करती, यह कुछ पहलुओं (जैसे जातिगत भेदभाव) के प्रति असम्मान दिखाने की भी अनुमति देती है।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. अल्पसंख्यकवाद की आलोचना का जवाब धूम्रपान ट्रेन और सीढ़ी-लिफ़्ट, दोनों उदाहरणों से विस्तार से दीजिए।

उत्तर: धूम्रपान ट्रेन के उदाहरण में चार यात्रियों में से एक धूम्रपान चाहता है, एक विरोध करता है; वोट से 3-1 से धूम्रपान की अनुमति मिल जाती है और यह उचित लगता है। पर जब विरोध करने वाला यात्री दमे से पीड़ित हो, तो बहुमत का फ़ैसला अनुचित हो जाता है क्योंकि यह उसका बुनियादी हित है, और बुनियादी हितों पर मतदान उपयुक्त प्रक्रिया नहीं। ठीक इसी तरह अल्पसंख्यकों के मौलिक हित संवैधानिक कानून से संरक्षित होने चाहिए। सीढ़ी-लिफ़्ट के उदाहरण में वृद्ध, दिव्यांग दर्शक सीढ़ी नहीं चढ़ सकते; उनके लिए लिफ़्ट या रैंप की व्यवस्था विशेष सुविधा नहीं, बल्कि उन्हें भी वही चीज़ पाने देना है जो बाक़ी सब सीढ़ी से पाते हैं। इसी तरह अल्पसंख्यक अधिकार भी विशेष सुविधा नहीं, बराबरी और सम्मान का साधन हैं।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. भारतीय धर्मनिरपेक्षता पर लगी छहों आलोचनाओं और उनके जवाबों का विस्तार से वर्णन कीजिए।

उत्तर: पहली आलोचना है कि धर्मनिरपेक्षता धर्मविरोधी है, जिसका जवाब है कि यह संस्थाबद्ध वर्चस्व का विरोध करती है, धर्मविरोधी होने के बराबर नहीं। दूसरी आलोचना है कि यह पश्चिम से आयातित है, जिसका जवाब है कि पश्चिमी राज्य तब धर्मनिरपेक्ष बने जब उन्होंने ईसाइयत से संबंध-विच्छेद कर लिया, इसलिए पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता में वैसी कोई ईसाइयत नहीं है; कोई धर्मनिरपेक्ष राज्यसत्ता समुदायों के बीच शांति के लिए धर्म से सैद्धांतिक दूरी बनाए रख सकती है और ख़ास समुदायों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप भी कर सकती है; और धर्मनिरपेक्षता का इतिहास पश्चिमी और ग़ैर-पश्चिमी, दोनों मार्गों का अनुसरण करता है, भारत का अपना मौलिक रूप है। तीसरी आलोचना अल्पसंख्यकवाद की है, जिसका जवाब धूम्रपान ट्रेन और सीढ़ी-लिफ़्ट के उदाहरणों से दिया जाता है : अल्पसंख्यक अधिकार विशेष सुविधा नहीं, बराबरी का साधन हैं। चौथी आलोचना है कि यह अतिशय हस्तक्षेपकारी है, जिसका जवाब है कि सैद्धांतिक दूरी हस्तक्षेप और ग़ैर-हस्तक्षेप, दोनों की गुंजाइश रखती है, और हस्तक्षेप अपने-आप में उत्पीड़नकारी नहीं होता। पाँचवीं आलोचना वोट-बैंक की राजनीति की है, जिसका जवाब है कि वोट पाना लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है; राजनेता तब दोषी है जब वोट देने वाले समूह को कोई लाभ न मिले, किसी समूह का कल्याण अन्य समूहों के कल्याण और अधिकारों की क़ीमत पर करने से एक नया अन्याय पैदा होता है, और जब पूरे समूह को एक अखंड इकाई की तरह मतदान के लिए एकजुट किया जाता है तो चुनावी राजनीति विकृत होती है। छठी और अंतिम आलोचना है कि यह एक असंभव परियोजना है, जिसका जवाब ऑटोमन साम्राज्य के उदाहरण से दिया जाता है : गहरे धार्मिक मतभेदों के बावजूद सह-अस्तित्व संभव है, और भारतीय धर्मनिरपेक्षता दुनिया के भविष्य का प्रतिबिंब प्रस्तुत करती है।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. पश्चिमी (यूरोपीय) मॉडल और भारतीय मॉडल की धर्मनिरपेक्षता की तुलना विस्तार से कीजिए।

उत्तर: पश्चिमी मॉडल, जो मुख्यतः अमेरिकी मॉडल से प्रेरित है, धर्म-राज्य के संबंध-विच्छेद को पारस्परिक निषेध मानता है : राज्य धर्म में और धर्म राज्य में दख़ल नहीं देता, राज्य किसी धार्मिक संस्था को वित्तीय मदद नहीं देता और उसकी गतिविधियों में व्यवधान भी नहीं डालता। यह स्वतंत्रता-समानता की व्यक्तिवादी व्याख्या करता है, समुदाय-आधारित अधिकारों की गुंजाइश नहीं रखता, और राज्य-समर्थित धार्मिक सुधार के लिए कोई जगह नहीं छोड़ता। भारतीय मॉडल इससे मौलिक रूप से भिन्न है : यह सैद्धांतिक दूरी पर आधारित है, जिसमें राज्य धर्मों से दूरी रखते हुए भी ज़रूरत पड़ने पर सैद्धांतिक हस्तक्षेप कर सकता है। यह व्यक्ति और धार्मिक समुदाय, दोनों के अधिकार सुरक्षित रखता है, अल्पसंख्यकों को अपनी शिक्षण संस्थाएँ चलाने का अधिकार देता है, और अस्पृश्यता जैसी बुराइयों के विरुद्ध राज्य-समर्थित सुधार की अनुमति देता है। संक्षेप में, पश्चिमी मॉडल में राज्य धर्म से पूरी तरह अलग रहता है, जबकि भारतीय मॉडल में राज्य ज़रूरत पड़ने पर धर्म से जुड़ भी सकता है और अलग भी रह सकता है।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. अंतर-धार्मिक वर्चस्व और अंतःधार्मिक वर्चस्व की अवधारणाओं को उदाहरण सहित विस्तार से समझाइए और बताइए कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता दोनों से किस तरह निपटती है।

उत्तर: अंतर-धार्मिक वर्चस्व का मतलब है एक धार्मिक समुदाय का दूसरे धार्मिक समुदाय पर वर्चस्व, जैसे 1984 में सिखों का नरसंहार, कश्मीरी पंडितों का पलायन, या 2002 गुजरात के दंगे। अंतःधार्मिक वर्चस्व का मतलब है धर्म के भीतर ही वर्चस्व, जैसे हिंदू धर्म में दलितों और महिलाओं का मंदिर-प्रवेश रोका जाना, या किसी धर्म के रूढ़िवादी गुट का असहमति बर्दाश्त न करना। धर्मनिरपेक्षता सर्वप्रथम अंतर-धार्मिक वर्चस्व का विरोध करती है, पर उतना ही महत्त्वपूर्ण दूसरा पहलू अंतःधार्मिक वर्चस्व का विरोध भी है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता की विशेषता यह है कि यह दोनों वर्चस्वों पर बराबर ध्यान देती है, जबकि पश्चिमी मॉडल धार्मिक रूप से सजातीय समाजों के इतिहास के कारण मुख्यतः अंतःधार्मिक वर्चस्व पर ही केंद्रित रहा। इसी वजह से भारतीय संविधान ने अस्पृश्यता पर प्रतिबंध लगाया है और साथ ही धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की भी रक्षा की है, यानी दोनों तरह के वर्चस्व से निपटने का प्रावधान एक साथ मौजूद है।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. वोट-बैंक की राजनीति और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की आलोचना को विस्तार से समझाइए, और बताइए कि यह भारतीय राजनीति को किस तरह प्रभावित करती है।

उत्तर: वोट-बैंक की राजनीति का आरोप है कि धर्मनिरपेक्षता वोट पाने की राजनीति को बढ़ावा देती है। यह अनुभवजन्य दावे के रूप में पूरी तरह असत्य नहीं, क्योंकि लोकतंत्र में वोट पाना राजनेताओं के काम का हिस्सा है। असली सवाल यह है कि वोट किस मक़सद से माँगा गया, केवल स्वार्थ के लिए या समूह के कल्याण के लिए भी: अगर वोट देने वाले समूह को कोई लाभ नहीं मिलता तो राजनेता दोषी है, और अगर किसी समूह का कल्याण अन्य समूहों के कल्याण और अधिकारों की क़ीमत पर किया जाए तो एक नया अन्याय पैदा होता है। समस्या तब भी पैदा होती है जब यह किसी पूरे सामाजिक समूह को, उसके भीतर विविधता के बावजूद, चुनाव में एक इकाई की तरह मतदान के लिए एकजुट करती है, जिससे चुनावी राजनीति विकृत होती है और दल दीर्घकालिक विकास पर अल्पकालिक चुनावी लाभ को प्राथमिकता देते हैं। भारत में वोट-बैंक की राजनीति अल्पसंख्यक तुष्टीकरण से भी जुड़ी है, जिसमें दल समानता के सिद्धांत की उपेक्षा कर किसी अल्पसंख्यक समूह के हित को प्राथमिकता देते हैं। विडंबना यह है कि इससे उसी समूह का और अधिक अलगाव और हाशियाकरण होता है, और समूह के भीतर की विविधता नज़रअंदाज़ होने से उसमें सामाजिक सुधार के मुद्दे उठाना भी कठिन हो जाता है।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
1984 में दिल्ली और देश के बाकी हिस्सों में लगभग 2,700 से ज़्यादा सिख मारे गए। पीड़ितों के परिवारजनों का मानना है कि दोषियों को आज तक सज़ा नहीं मिली है। हज़ारों कश्मीरी पंडितों को घाटी में अपना घर छोड़ने के लिए विवश किया गया, वे दो दशकों के बाद भी अपने घर नहीं लौट सके हैं। 2002 में गुजरात में गोधरा दंगों के पश्चात लगभग 1,000 से अधिक लोग मारे गए। इन तमाम उदाहरणों में एक बात सामान्य है : हर मामले में किसी एक धार्मिक समुदाय के लोगों को उनकी धार्मिक पहचान के कारण लक्ष्य किया गया।

(क) 1 अंक 1984 में लगभग कितने सिख मारे गए?
उत्तर: लगभग 2,700 से ज़्यादा सिख मारे गए।

(ख) 2 अंक इन तीनों उदाहरणों में सामान्य बात क्या है?
उत्तर: हर मामले में किसी एक धार्मिक समुदाय के लोगों को उनकी धार्मिक पहचान के कारण लक्ष्य किया गया और नागरिकों के एक समूह को बुनियादी आज़ादी से वंचित किया गया। इन्हें अंतर-धार्मिक वर्चस्व के मामले कहा जा सकता है।

(ग) 3 अंक यह गद्यांश धर्मनिरपेक्षता की ज़रूरत को किस तरह उचित ठहराता है, विस्तार से समझाइए।
उत्तर: यह गद्यांश दिखाता है कि संविधान द्वारा हर नागरिक को आज़ादी और प्रतिष्ठा से रहने का अधिकार दिए जाने के बावजूद, वास्तव में वर्जना और भेदभाव के अनेक रूप बरकरार हैं, जहाँ किसी एक धार्मिक समुदाय को उसकी पहचान के कारण निशाना बनाया जाता है। यह ठीक वही अंतर-धार्मिक वर्चस्व है जिसका धर्मनिरपेक्षता सबसे पहले विरोध करती है। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि केवल संवैधानिक गारंटी काफ़ी नहीं, बल्कि एक ऐसी राज्यसत्ता चाहिए जो सक्रिय रूप से अंतर-धार्मिक वर्चस्व को रोके और सभी समुदायों की बुनियादी आज़ादी व सुरक्षा सुनिश्चित करे, यही धर्मनिरपेक्षता का पहला और मुख्य लक्ष्य है।

केस स्टडी
भारतीय धर्मनिरपेक्षता तमाम धर्मों में राज्यसत्ता के सैद्धांतिक हस्तक्षेप की अनुमति देती है। ऐसा हस्तक्षेप हर धर्म के कुछ ख़ास पहलुओं के प्रति असम्मान भी दर्शाता है। उदाहरण के लिए धर्म के स्तर पर मान्य जातिगत विभाजन भारतीय धर्मनिरपेक्षता के अंतर्गत स्वीकार्य नहीं हो सकता है। धर्मनिरपेक्ष राज्य के लिए ज़रूरी नहीं है कि वह धर्म के हर पहलू को एक जैसा सम्मान प्रदान करे। यह संगठित धर्मों के कुछ पहलुओं के प्रति एक जैसा असम्मान दर्शाने की अनुमति भी देता है।

(क) 1 अंक गद्यांश के अनुसार भारतीय धर्मनिरपेक्षता के अंतर्गत क्या स्वीकार्य नहीं है?
उत्तर: धर्म के स्तर पर मान्य जातिगत विभाजन स्वीकार्य नहीं है।

(ख) 2 अंक धर्मनिरपेक्ष राज्य के लिए धर्म के हर पहलू के प्रति सम्मान को लेकर गद्यांश क्या कहता है?
उत्तर: धर्मनिरपेक्ष राज्य के लिए ज़रूरी नहीं कि वह धर्म के हर पहलू को एक जैसा सम्मान दे; यह कुछ पहलुओं के प्रति एक जैसा असम्मान दिखाने की भी अनुमति देता है।

(ग) 3 अंक यह गद्यांश ‘सैद्धांतिक दूरी’ और ‘सर्व धर्म समभाव’ के मुहावरे के बीच के अंतर को कैसे स्पष्ट करता है?
उत्तर: यह गद्यांश दिखाता है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता की जटिलता ‘सर्व धर्म समभाव’ के सीधे-सादे मुहावरे में नहीं समा सकती, क्योंकि अगर इसका मतलब सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान लिया जाए तो यह ग़लत होगा। सैद्धांतिक दूरी के अनुसार राज्य धर्मों से एक तयशुदा दूरी बनाए रखते हुए भी उनके कुछ पहलुओं में, जैसे जातिगत भेदभाव में, सैद्धांतिक हस्तक्षेप करता है और उस पहलू के प्रति असम्मान भी दिखाता है। इस तरह धर्मनिरपेक्षता सभी धर्मों को बराबर मानते हुए भी हर धर्म की हर प्रथा को उचित नहीं मानती, बल्कि यह तय करती है कि कौन-सा पहलू मानवीय गरिमा और समानता के विरुद्ध है।