कक्षा 11 राजनीति विज्ञान बुक 2 अध्याय 8 धर्मनिरपेक्षता NCERT समाधान

1 प्रश्न 1 : कौन-सी बातें धर्मनिरपेक्षता के विचार से संगत हैं?

निम्न में से कौन-सी बातें धर्मनिरपेक्षता के विचार से संगत हैं? कारण सहित बताइये।

कथन संगत / असंगत कारण
(क) किसी धार्मिक समूह पर दूसरे धार्मिक समूह का वर्चस्व न होना। संगत यह तो धर्मनिरपेक्षता की मूल परिभाषा ही है, अंतर-धार्मिक वर्चस्व का न होना धर्मनिरपेक्षता का सबसे पहला और मुख्य लक्षण है।
(ख) किसी धर्म को राज्य के धर्म के रूप में मान्यता देना। असंगत राजधर्म का मतलब है राज्य और किसी एक धर्म के बीच औपचारिक क़ानूनी गठजोड़, जैसे सोलहवीं सदी के इंग्लैंड में आंग्ल चर्च या आज के पाकिस्तान में सुन्नी इस्लाम। ऐसा राज्य धर्मतांत्रिक न भी हो, तब भी धर्मनिरपेक्ष नहीं है: सच्चे धर्मनिरपेक्ष राज्य का किसी धर्म से कोई औपचारिक क़ानूनी गठजोड़ नहीं होता।
(ग) सभी धर्मों को राज्य का समान आश्रय होना। संगत यह नेहरू की परिभाषा से मेल खाता है : “सभी धर्मों को राज्य द्वारा समान संरक्षण”, जब तक यह आश्रय बराबर और निष्पक्ष हो।
(घ) विद्यालयों में अनिवार्य प्रार्थना होना। असंगत यह किसी विशेष धर्म/आस्था को थोपना है और गैर-धार्मिक या अन्य धर्मों के विद्यार्थियों की धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करता है।
(ड़) किसी अल्पसंख्यक समुदाय को अपने पृथक शैक्षिक संस्थान बनाने की अनुमति होना। संगत भारतीय संविधान धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपनी शिक्षण संस्थाएँ खोलने और चलाने का अधिकार देता है, यह भारतीय धर्मनिरपेक्षता के सकारात्मक जुड़ाव का उदाहरण है।
(च) सरकार द्वारा धार्मिक संस्थाओं की प्रबंधन समितियों की नियुक्ति करना। असंगत सामान्य रूप से संगत नहीं। भारतीय धर्मनिरपेक्षता पारस्परिक निषेध को नहीं मानती और सैद्धांतिक दूरी पर चलती है, इसलिए राज्य धर्म में हस्तक्षेप कर सकता है, लेकिन केवल शांति, स्वतंत्रता और समानता जैसे धर्मनिरपेक्ष लक्ष्यों के लिए (जैसे मंदिरों में जातिगत भेदभाव ख़त्म करना)। केवल किसी धर्म की संस्थाओं के प्रबंधक नियुक्त करना ऐसा लक्ष्य नहीं है; इससे राज्य को धर्म के आंतरिक मामलों पर नियंत्रण मिल जाता है।
(छ) किसी मंदिर में दलितों के प्रवेश के निषेध को रोकने के लिए सरकार का हस्तक्षेप। संगत यह अंतःधार्मिक वर्चस्व (धर्म के भीतर वर्चस्व) को रोकने के लिए राज्य का सैद्धांतिक हस्तक्षेप है, ठीक वैसे ही जैसे संविधान ने अस्पृश्यता पर प्रतिबंध लगाया।

2 प्रश्न 2 : पश्चिमी और भारतीय मॉडल की घालमेल तालिका सुलझाना

धर्मनिरपेक्षता के पश्चिमी और भारतीय मॉडल की कुछ विशेषताओं का आपस में घालमेल हो गया है। उन्हें अलग करें और एक नई सूची बनाएँ।

पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता भारतीय धर्मनिरपेक्षता
धर्म और राज्य का एक-दूसरे के मामले में हस्तक्षेप न करने की अटल नीति (पारस्परिक निषेध) राज्य द्वारा समर्थित धार्मिक सुधारों की अनुमति
एक धर्म के भिन्न पंथों के बीच समानता पर जोर देना (धार्मिक रूप से सजातीय पश्चिमी समाजों का ध्यान अंतःधार्मिक वर्चस्व पर रहा) विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच समानता एक मुख्य सरोकार होना
समुदाय आधारित अधिकारों पर कम ध्यान देना (स्वतंत्रता और समानता केवल व्यक्तियों के अधिकार माने जाते हैं) अल्पसंख्यक अधिकारों पर ध्यान देना
व्यक्ति और उसके अधिकारों को केंद्रीय महत्त्व दिया जाना व्यक्ति और धार्मिक समुदायों, दोनों के अधिकारों का संरक्षण

3 प्रश्न 3 : धर्मनिरपेक्षता क्या है? क्या यह धार्मिक सहनशीलता के बराबर है?

धर्मनिरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? क्या इसकी बराबरी धार्मिक सहनशीलता से की जा सकती है?

धर्मनिरपेक्षता एक नियामक सिद्धांत है जो ऐसा समाज बनाना चाहता है जो अंतर-धार्मिक वर्चस्व (एक धर्म का दूसरे धर्म पर वर्चस्व) और अंतःधार्मिक वर्चस्व (धर्म के भीतर वर्चस्व), दोनों से मुक्त हो। सकारात्मक रूप से देखें तो यह धर्मों के भीतर आज़ादी तथा विभिन्न धर्मों के बीच और उनके भीतर समानता को बढ़ावा देती है। धर्मनिरपेक्ष राज्य न तो धर्मतांत्रिक होता है, न किसी धर्म को राजधर्म मानता है, और अपने लक्ष्यों को (कम-से-कम अंशतः) गैर-धार्मिक स्रोतों से तय करता है।

नहीं, इसकी बराबरी धार्मिक सहनशीलता (सहिष्णुता) से नहीं की जा सकती। भारत में पहले से ही अंतर-धार्मिक सहिष्णुता की संस्कृति मौजूद थी, लेकिन सहिष्णुता धार्मिक वर्चस्व की विरोधी नहीं है। सहिष्णुता हर किसी को कुछ मौक़ा तो देती है, पर वह आज़ादी अक्सर सीमित होती है, और यह हमें उन लोगों को बर्दाश्त करने की क्षमता देती है जिन्हें हम बिल्कुल नापसंद करते हैं। यह किसी बड़े गृहयुद्ध से उबरते समाज के लिए भारी गुण है, मगर शांति के समय में पर्याप्त नहीं जब लोग समान मान-मर्यादा के लिए संघर्ष कर रहे हों। धर्मनिरपेक्षता इससे कहीं आगे जाती है : यह वर्चस्व की सक्रिय समाप्ति चाहती है, केवल निष्क्रिय बर्दाश्त नहीं।

4 प्रश्न 4 : कथनों से सहमति या असहमति

(क) धर्मनिरपेक्षता हमें धार्मिक पहचान बनाए रखने की अनुमति नहीं देती है।

असहमत। धर्मनिरपेक्षता धार्मिक स्वतंत्रता और समानता को बढ़ावा देती है, इसलिए यह धार्मिक पहचान की हिफ़ाज़त करती है, उसे ख़तरे में नहीं डालती। हाँ, यह धार्मिक पहचान के उन रूपों को ज़रूर कमज़ोर करती है जो मतांध, हिंसक, दुराग्रही, बहिष्कारवादी या अन्य धर्मों के प्रति घृणा फैलाने वाले हैं, बाक़ी धार्मिक पहचान पूरी तरह सुरक्षित रहती है।

(ख) धर्मनिरपेक्षता किसी धार्मिक समुदाय के अंदर या विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच असमानता के खिलाफ है।

सहमत। यही धर्मनिरपेक्षता की मूल परिभाषा है : यह अंतर-धार्मिक वर्चस्व (धार्मिक समुदायों के बीच) और अंतःधार्मिक वर्चस्व (एक ही धर्म के भीतर, जैसे दलितों या महिलाओं का मंदिर-प्रवेश रोकना), दोनों का विरोध करती है।

(ग) धर्मनिरपेक्षता के विचार का जन्म पश्चिमी और ईसाई समाज में हुआ है। यह भारत के लिए उपयुक्त नहीं है।

असहमत। पश्चिमी राज्य तब धर्मनिरपेक्ष बने, जब एक महत्त्वपूर्ण स्तर पर उन्होंने ईसाइयत से संबंध-विच्छेद कर लिया; पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता में वैसी कोई ईसाइयत नहीं है। धर्म-राज्य का पारस्परिक निषेध भी सभी धर्मनिरपेक्ष राज्यों की प्रमुख विशेषता नहीं है: कोई धर्मनिरपेक्ष राज्यसत्ता समुदायों के बीच शांति को बढ़ावा देने के लिए धर्म से सैद्धांतिक दूरी बनाए रख सकती है और ख़ास समुदायों की रक्षा के लिए वह उसमें हस्तक्षेप भी कर सकती है। धर्मनिरपेक्षता का इतिहास पश्चिमी और ग़ैर-पश्चिमी, दोनों मार्गों का अनुसरण करता दिखता है। भारत में धर्मनिरपेक्षता का एक ऐसा रूप विकसित हुआ जो न तो पूरी तरह ईसाइयत से जुड़ा है, न भारतीय ज़मीन पर सीधा पश्चिमी आरोपण। पश्चिम में केंद्रीय सवाल चर्च-राज्य का संबंध-विच्छेद था, जबकि भारत में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का सवाल महत्त्वपूर्ण रहा है। इसके अलावा, पतलून-इंटरनेट-संसदीय लोकतंत्र जैसी अनेक चीज़ों की जड़ें भी पश्चिम में हैं, फिर भी हम उन्हें अपनाते हैं।

5 प्रश्न 5 : भारतीय धर्मनिरपेक्षता का दायरा केवल धर्म-राज्य अलगाव तक सीमित नहीं

भारतीय धर्मनिरपेक्षता का जोर धर्म और राज्य के अलगाव पर नहीं वरन् उससे अधिक किन्हीं बातों पर है। इस कथन को समझाइये।

भारतीय धर्मनिरपेक्षता तीन बातों में पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से आगे जाती है :

तीन भिन्नताएँ
पहलीयह हिंदुओं के भीतर दलितों-महिलाओं के उत्पीड़न, मुसलमानों-ईसाइयों के भीतर महिलाओं के प्रति भेदभाव, और बहुसंख्यक द्वारा अल्पसंख्यक पर संभावित ख़तरों, दोनों तरह के वर्चस्व का समान विरोध करती है।
दूसरीयह व्यक्तियों की धार्मिक आज़ादी के साथ-साथ अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक आज़ादी (अपनी संस्कृति और शैक्षिक संस्थाएँ क़ायम रखने का अधिकार) की भी रक्षा करती है।
तीसरीयह राज्य-समर्थित धार्मिक सुधार की अनुमति देती है (जैसे अस्पृश्यता पर प्रतिबंध, बाल विवाह उन्मूलन), क्योंकि यह अंतःधार्मिक वर्चस्व पर भी उतना ही चिंतित रहती है।

इसलिए भारतीय धर्मनिरपेक्षता को केवल “सर्व धर्म समभाव” या मात्र शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के मुहावरे में नहीं समेटा जा सकता, क्योंकि यह धर्म-राज्य के अलगाव से आगे जाकर अंतर-धार्मिक और अंतःधार्मिक, दोनों तरह की समानता को साधने की कोशिश करती है।

6 प्रश्न 6 : सैद्धांतिक दूरी की व्याख्या

“सैद्धांतिक दूरी” क्या है? उदाहरण सहित समझाइये।

रट लेंसैद्धांतिक दूरी

सैद्धांतिक दूरी भारतीय धर्मनिरपेक्षता की वह अवधारणा है जिसके अनुसार राज्य धर्मों से एक तयशुदा दूरी बनाए रखता है, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर धर्म के मामलों में सैद्धांतिक हस्तक्षेप भी कर सकता है। यह अमेरिकी मॉडल के “पारस्परिक निषेध” से अलग है, जहाँ राज्य हर हाल में धर्म से दूर ही रहता है।

सैद्धांतिक दूरी के अनुसार राज्य धर्म के हर पहलू को एक जैसा सम्मान देने के लिए बाध्य नहीं है; यह संगठित धर्मों के कुछ पहलुओं (जैसे धर्म के स्तर पर मान्य जातिगत भेदभाव) के प्रति एक जैसा असम्मान दिखाने की अनुमति भी देता है। इसीलिए राज्य अस्पृश्यता पर प्रतिबंध लगा सकता है (नकारात्मक जुड़ाव, धार्मिक अत्याचार का विरोध) और साथ ही धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपनी शिक्षण संस्थाएँ चलाने में सहायता भी दे सकता है (सकारात्मक जुड़ाव)। यही कारण है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता को “सैद्धांतिक हस्तक्षेप की अनुमति देने वाली, पर विशेषाधिकार न देने वाली” धर्मनिरपेक्षता कहा जा सकता है।

7 पाठ के बीच के प्रश्न (अध्याय के भीतर पूछे गए)

अध्याय ने अपने «आओ कुछ करके सीखें», «वाद-विवाद-संवाद» और «चिंतन-मंथन» बॉक्स में, अतातुर्क वाले बॉक्स में, हाशिये पर और राजपत्रित अवकाशों की सूची के साथ भी प्रश्न पूछे हैं। ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर इन्हीं विचारों को परखते हैं, इसलिए पुस्तक के क्रम में हर एक का उत्तर यहाँ दिया गया है।

आओ कुछ करके सीखें 1. कुछ ऐसे तरीकों की सूची बनाओ जिनके माध्यम से सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा दिया जा सकता है।

उत्तर: पहले दो तरीके अध्याय ख़ुद बताता है: शिक्षा, जो लोगों की सोच बदलने में मदद करती है, और साझेदारी तथा पारस्परिक सहायता के व्यक्तिगत उदाहरण, जैसे सांप्रदायिक दंगों के बीच हिंदुओं द्वारा मुसलमानों को या मुसलमानों द्वारा हिंदुओं को बचाने की कहानियाँ। अन्य तरीके: दूसरे समुदायों के त्यौहारों, विश्वासों और रीति-रिवाज़ों के बारे में जानना; विद्यालयों, मोहल्लों और खेलों में अंतर-सामुदायिक गतिविधियाँ; और अफ़वाहें या नफ़रत न फैलाना। लेकिन अध्याय यह भी कहता है कि केवल शिक्षा या कुछ लोगों की भलाई धार्मिक भेदभाव को नहीं मिटा सकती, इसलिए सबसे ज़रूरी तरीका है धर्मनिरपेक्ष राज्यसत्ता: जो किसी धर्म के प्रमुखों द्वारा संचालित न हो, किसी धर्म से औपचारिक क़ानूनी गठजोड़ न रखे, धार्मिक स्वतंत्रता और समानता की रक्षा करे, धार्मिक हिंसा और भेदभाव पर निष्पक्ष कार्रवाई करे और अल्पसंख्यकों की हिफ़ाज़त करे।

वाद-विवाद-संवाद 1. «अन्य धर्मों के बारे में अधिक जानना, बाकी लोगों और उनकी आस्थाओं का सम्मान करना और उन्हें स्वीकार करने की ओर पहला कदम है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि हम उन मूल्यों के लिए खड़े नहीं हो सकते जिन्हें हम आधारभूत मानवीय मूल्य मानते हैं।»

बहस के बिंदु: पक्ष में: पूर्वाग्रह अक्सर अज्ञान से पैदा होता है, इसलिए दूसरे धर्मों को जानना सम्मान और स्वीकृति पैदा करता है और लोगों को बराबरी से साथ रहने में मदद करता है। दूसरा हिस्सा: किसी धर्म का सम्मान करने का मतलब उसकी हर प्रथा को स्वीकार करना नहीं है। अध्याय का अपना उदाहरण है कि धर्म के स्तर पर मान्य जातिगत विभाजन भारतीय धर्मनिरपेक्षता में स्वीकार्य नहीं है, और धर्मनिरपेक्ष राज्य के लिए ज़रूरी नहीं कि वह धर्म के हर पहलू को एक जैसा सम्मान दे; इसलिए हम दूसरी आस्थाओं का सम्मान करते हुए भी अस्पृश्यता, महिलाओं के साथ भेदभाव या धर्म के नाम पर हिंसा का विरोध कर सकते हैं, चाहे वह अपने धर्म में हो या दूसरे धर्म में।

बॉक्स: कमाल अतातुर्क की धर्मनिरपेक्षता. क्या आप ऐसी धर्मनिरपेक्षता की कल्पना कर सकते हैं, जो आपको अपनी पहचान से जुड़ा नाम रखने और आपकी पसंद के कपड़े पहनने की आजादी न दे, और आपकी बोलचाल की भाषा ही बदल डाले? आपके खयाल से अतातुर्क की धर्मनिरपेक्षता भारतीय धर्मनिरपेक्षता से किन मायनों में भिन्न है?

उत्तर: ऐसी धर्मनिरपेक्षता वही आज़ादियाँ छीन लेती है जिनकी रक्षा के लिए धर्मनिरपेक्षता होती है। अतातुर्क की धर्मनिरपेक्षता संगठित धर्म से सैद्धांतिक दूरी पर नहीं, बल्कि धर्म में सक्रिय हस्तक्षेप और उसके दमन पर आधारित थी: उन्होंने खिलाफ़त की संस्था समाप्त की, हैट कानून से फैज़ टोपी पर प्रतिबंध लगाया, पश्चिमी पोशाकों को बढ़ावा दिया, तुर्की पंचांग की जगह ग्रिगोरियन पंचांग लाए और 1928 में संशोधित लैटिन रूप में नई तुर्की वर्णमाला अपनाई। भारतीय धर्मनिरपेक्षता इससे भिन्न है: (1) यह धर्म के प्रति शत्रुता नहीं है (भारतीय धर्मनिरपेक्षता के दार्शनिक नेहरू स्वयं किसी धर्म का पालन नहीं करते थे, फिर भी उनके लिए धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म से शत्रुता नहीं था); (2) यह सैद्धांतिक दूरी पर चलती है, जिसमें राज्य धर्म से दूर रह सकता है या केवल शांति, स्वतंत्रता और समानता के लिए हस्तक्षेप करता है, जैसे अस्पृश्यता पर प्रतिबंध; और (3) यह सब पर एक ही जीवन-शैली थोपने के बजाय धार्मिक आज़ादी की रक्षा करती है, जिसमें अल्पसंख्यकों का अपनी संस्कृति और शैक्षिक संस्थाएँ क़ायम रखने का अधिकार भी शामिल है।

वाद-विवाद-संवाद 2. «धार्मिक पहचान और अंतर का बच्चों के लिए कोई मतलब नहीं है।»

बहस के बिंदु: पक्ष में: बहुत-से बच्चे और युवा अलग-अलग धर्मों के साथियों के साथ पढ़ते, खेलते और दोस्ती करते हैं, और उनके लिए पढ़ाई, खेल और साझी रुचियाँ धार्मिक अंतर से ज़्यादा मायने रखती हैं। विपक्ष में: ज़्यादातर बच्चों के नाम, त्यौहार, खान-पान, पहनावा और पारिवारिक जीवन धर्म से जुड़े होते हैं; और अध्याय के अंतर-धार्मिक वर्चस्व के उदाहरण (1984, कश्मीरी पंडित, गुजरात 2002) दिखाते हैं कि ऐसे अंतर लोगों की सुरक्षा तक तय कर सकते हैं, जिसका असर बच्चों पर भी पड़ता है। संतुलित निष्कर्ष: धर्मनिरपेक्षता किसी से धार्मिक पहचान छोड़ने को नहीं कहती; वह धार्मिक पहचान की रक्षा करती है और केवल वर्चस्व का विरोध करती है, इसलिए बच्चे अपनी पहचान को महत्त्व देते हुए भी दूसरों को बराबर मान सकते हैं।

चिंतन-मंथन. क्या धर्मनिरपेक्षता नीचे लिखी बातों के संगत है? (क) अल्पसंख्यक समुदाय की तीर्थ यात्रा को आर्थिक अनुदान देना। (ख) सरकारी कार्यालयों में धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन करना।

उत्तर: (क) बहस का विषय. भारतीय धर्मनिरपेक्षता धर्म के साथ सकारात्मक जुड़ाव की अनुमति देती है (जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों की शिक्षण संस्थाओं को राज्य की सहायता), इसलिए किसी अल्पसंख्यक समुदाय को सहायता सिद्धांततः वर्जित नहीं है। लेकिन अध्याय की कसौटी यह है कि राज्य का कदम शांति, स्वतंत्रता और समानता को बढ़ावा दे और उसके लक्ष्य कम-से-कम अंशतः गैर-धार्मिक स्रोतों से निकलें; किसी एक समुदाय की विशुद्ध धार्मिक गतिविधि के लिए अनुदान, अगर दूसरों को समान शर्तों पर उपलब्ध न हो, किसी एक धर्म की तरफ़दारी जैसा लग सकता है, और अध्याय सभी नागरिकों की समानता की जगह किसी एक समूह को प्राथमिकता देने वाली राजनीति के प्रति सावधान करता है। (ख) संगत नहीं. धर्मनिरपेक्ष राज्य का किसी धर्म से औपचारिक गठजोड़ नहीं होता और वह किसी धर्म को अपना धर्म नहीं बनाता; सरकारी कार्यालयों में धार्मिक अनुष्ठान से राज्य स्वयं किसी धर्म में भागीदार बन जाता है, और दूसरे धर्मों के या किसी धर्म को न मानने वाले कर्मचारी और नागरिक असमान स्थिति में आ जाते हैं।

आओ कुछ करके सीखें 2. बॉम्बे, गर्म हवा या इस विषय से जुड़ी कोई फिल्म देखें। इन फिल्मों में धर्मनिरपेक्षता के किन आदर्शों को दिखाया गया है। भीष्म साहनी के उपन्यास तमस या राही मासूम रजा के आधा गाँव को पढ़ें।

कैसे करें: यह गतिविधि है, इसलिए फिल्म देखना और उपन्यास पढ़ना आपको स्वयं करना है। देखते-पढ़ते समय नोट करें कि कहानी अध्याय में बताए आदर्शों को कैसे दिखाती है: अपना धर्म मानने की आज़ादी, समुदायों के बीच समानता, अंतर-धार्मिक वर्चस्व और हिंसा का विरोध, घर छोड़ने को मजबूर लोगों का दर्द, और अलग-अलग आस्था के लोगों का एक-दूसरे की मदद करना। फिर सोचिए कि कहानी केवल सहिष्णुता दिखाती है या वास्तविक समानता और प्रतिष्ठा, क्योंकि अध्याय इन दोनों में स्पष्ट फ़र्क़ करता है।

वोट बैंक की राजनीति और समान बरताव पर पाठ और हाशिये के प्रश्न. (i) यदि ये धर्मनिरपेक्ष राजनेता बहुसंख्यकों के हितों को नुकसान पहुँचायें, तब क्या होगा? क्या आप ऐसे उदाहरण सोच सकते हैं? (ii) राज्य धर्मों के साथ एक समान बरताव किस तरह कर सकता है। क्या हर धर्म के लिए बराबर संख्या में छुट्टी कर देने से ऐसा किया जा सकता है? या सार्वजनिक अवसरों पर किसी भी प्रकार के धार्मिक समारोह पर रोक लगाकर समान बरताव किया जा सकता है?

उत्तर: (i) अगर किसी एक समूह का कल्याण दूसरे समूहों के कल्याण और अधिकारों की कीमत पर किया जाए, तो अध्याय के शब्दों में «एक नया अन्याय पैदा होगा»। ऐसे उदाहरणों में वे नीतियाँ या वादे आते हैं जो केवल किसी समूह के वोट पाने के लिए किए जाएँ और जिनमें सभी नागरिकों की समानता के सिद्धांत की अनदेखी हो; अध्याय यह भी कहता है कि ऐसे अल्पसंख्यक तुष्टीकरण से विडंबनापूर्ण ढंग से उसी अल्पसंख्यक समूह का अलगाव और बढ़ा है। (ii) धर्मों से समान बरताव का मतलब हर बात में एक जैसा बरताव नहीं है। बराबर संख्या में छुट्टियाँ एक यांत्रिक तरीका होगा जो समुदायों की अलग-अलग ज़रूरतों की अनदेखी करेगा; सार्वजनिक अवसरों पर हर धार्मिक समारोह पर रोक धर्मनिरपेक्षता को धर्म-विरोध में बदल देगी, जो भारतीय धर्मनिरपेक्षता नहीं है। बेहतर रास्ता सैद्धांतिक दूरी है: राज्य सभी धर्मों से दूरी रखे, किसी का पक्ष न ले, केवल भेदभाव या वर्चस्व ख़त्म करने के लिए हस्तक्षेप करे, और जब जुड़ाव करे तो हर समुदाय को समान शर्तों पर सहयोग दे।

राजपत्रित अवकाश. भारत में राजपत्रित अवकाशों की सूची को ध्यान से पढ़ें। क्या यह भारत में धर्मनिरपेक्षता का उदाहरण प्रस्तुत करती है? तर्क प्रस्तुत करें।

उत्तर: काफ़ी हद तक, हाँ। 2019 की सूची में तीन राष्ट्रीय अवकाश (गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और महात्मा गांधी जयंती) हैं, और अनेक धर्मों के पर्व हैं: हिंदू (महा शिवरात्रि, होली, जन्माष्टमी, दशहरा, दिवाली), जैन (महावीर जयंती), बौद्ध (बुद्ध पूर्णिमा), ईसाई (गुड फ्राइडे, क्रिसमस), मुस्लिम (ईद-उल-फ़ितर, ईद-उल-अज़हा, मुहर्रम, ईद-ए-मिलादुन-नबी) और सिख (गुरु नानक जयंती)। किसी धर्म को राजधर्म नहीं बनाया गया और हर बड़े समुदाय को मान्यता मिली है, जो नेहरू के उस विचार से मेल खाता है कि राज्य सभी धर्मों की हिफ़ाज़त करे और किसी एक धर्म की तरफ़दारी न करे। विरोध में यह तर्क दिया जा सकता है कि अलग-अलग धर्मों के अवकाशों की संख्या अलग है और कुछ छोटे समुदाय सूची में नहीं हैं; लेकिन जैसा ऊपर के हाशिये वाले प्रश्न से स्पष्ट है, समान बरताव का मतलब छुट्टियों की बराबर गिनती नहीं होता।

आख़िरी दोहराव
  • प्रश्न 1 : सात कथनों में से (क), (ग), (ड़), (छ) संगत हैं; (ख), (घ), (च) असंगत हैं
  • प्रश्न 2 : पश्चिमी मॉडल = पारस्परिक निषेध, पंथों के बीच समानता, समुदाय-अधिकारों पर कम ध्यान, व्यक्ति केंद्रित; भारतीय मॉडल = राज्य-समर्थित सुधार, धार्मिक समुदायों के बीच समानता, अल्पसंख्यक अधिकारों पर ध्यान, समुदाय व व्यक्ति दोनों के अधिकार
  • प्रश्न 3 : धर्मनिरपेक्षता ≠ सहनशीलता, यह वर्चस्व की सक्रिय समाप्ति चाहती है
  • प्रश्न 5-6 : भारतीय धर्मनिरपेक्षता की तीन भिन्नताएँ और सैद्धांतिक दूरी की अवधारणा एक साथ याद रखें