कक्षा 11 राजनीति विज्ञान बुक 2 अध्याय 6 नागरिकता महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. नागरिकता की परिभाषा एक वाक्य में दीजिए।

उत्तर: नागरिकता किसी राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता है।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. टी.एच. मार्शल के अनुसार नागरिकता के तीन प्रकार के अधिकार बताइए।

उत्तर: नागरिक अधिकार, राजनीतिक अधिकार और सामाजिक अधिकार।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. 1789 में किस देश में क्रांति हुई जिसने राष्ट्र-राज्य की संप्रभुता का दावा किया?

उत्तर: फ्रांस में 1789 की फ्रांसीसी क्रांति।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. ओल्गा टेलिस मुक़दमे में सुप्रीम कोर्ट ने किस धारा का हवाला दिया?

उत्तर: संविधान की धारा-21।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. भारत ने 1959 में किसे शरण दी?

उत्तर: दलाई लामा और उनके अनुयायियों को।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. भारत में नागरिकता प्राप्ति के कोई तीन रास्ते बताइए।

उत्तर: जन्म, वंश-परंपरा और पंजीकरण (देशीकरण या भू-क्षेत्र सम्मिलन में से कोई भी स्वीकार्य)।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. “मुंबई मुंबईकर के लिए” के नारे का क्या अर्थ है?

उत्तर: यह नारा उस भावना को दर्शाता है जिसमें शहर के मूल निवासी सीमित संसाधनों (नौकरी, आवास) पर ‘बाहरी’ लोगों के दावे का विरोध करते हुए उन्हें प्रवेश से रोकने की माँग करते हैं, भले ही वे ‘बाहरी’ सहनागरिक ही क्यों न हों।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. मार्टिन लूथर किंग के पृथक्करण-विरोधी किन्हीं दो तर्कों को बताइए।

उत्तर: पहला, आत्म-गौरव और आत्म-सम्मान में विश्व का हर मनुष्य बराबर है, चाहे उसकी जाति या वर्ण कुछ भी हो। दूसरा, पृथक्करण “सामाजिक कोढ़” की तरह है जो गहरे मनोवैज्ञानिक ज़ख़्म देता है।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. ज़िम्बाब्वे में भूमि वितरण की मुख्य असमानता क्या थी?

उत्तर: केवल 0.06% गोरी आबादी (लगभग 4,400 परिवार) के पास लगभग 1 करोड़ हेक्टेयर (32%) उपजाऊ, सिंचित भूमि थी, जबकि लगभग 10 लाख काले किसान परिवारों के पास केवल 1.6 करोड़ हेक्टेयर (38%) कम उपजाऊ, असिंचित भूमि थी।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. फुटपाथी दुकानदारों के संबंध में सरकार ने क्या क़दम उठाए?

उत्तर: जनवरी 2004 में एक राष्ट्रीय नीति तैयार की गई ताकि दुकानदारों को मान्यता व नियमन मिले और वे सरकारी नियमों के दायरे में उत्पीड़न-मुक्त कारोबार कर सकें। बाद में 2014 में स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट (जीविका संरक्षण और पथ विक्रय विनियमन अधिनियम) पारित किया गया।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. फ्रांस में सिख छात्रों और मुस्लिम लड़कियों से जुड़ा विवाद क्या था?

उत्तर: फ्रांस के सिख छात्रों ने स्कूल में पगड़ी पहनने और मुस्लिम लड़कियों ने स्कूली वर्दी के साथ सिर पर दुपट्टा डालने की माँग की, जिसे कुछ स्कूलों ने इस आधार पर अस्वीकार किया कि यह सरकारी शिक्षा के सार्वजनिक क्षेत्र में धार्मिक प्रतीक लाने का मामला है।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. राज्यहीन/शरणार्थी लोगों को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है (कोई दो)?

उत्तर: वे अक्सर क़ानूनी तौर पर काम नहीं कर सकते और अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा नहीं सकते; वे संपत्ति अर्जित नहीं कर सकते और शिविरों में या अवैध प्रवासी के रूप में रहने को मजबूर होते हैं।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. वैश्विक नागरिकता की अवधारणा के पक्ष में कोई दो तर्क दीजिए।

उत्तर: पहला, इंटरनेट-टेलीविज़न जैसे संचार साधनों ने हमें एक अंतर्संबद्ध विश्व में ला दिया है, जिससे लोग राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार एक-दूसरे से जुड़ा महसूस करते हैं (जैसा 2004 की सुनामी में विश्वभर से मिली सहायता से दिखा)। दूसरा, यह प्रवासी और राज्यहीन लोगों जैसी सीमा-पार समस्याओं से निपटने में देशों के बीच सहयोग को आसान बना सकती है।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. संविधान किन आधारों पर नागरिकों से भेदभाव करने से राज्य को रोकता है?

उत्तर: संविधान के अनुसार राज्य केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर नागरिकों से भेदभाव नहीं कर सकता। धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकार भी अलग से संरक्षित हैं।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. टी.एच. मार्शल के अनुसार नागरिकता की परिभाषा और उसमें निहित समानता के दो पहलुओं की व्याख्या करें।

उत्तर: ब्रिटिश समाजशास्त्री टी.एच. मार्शल ने अपनी पुस्तक “नागरिकता और सामाजिक वर्ग” (1950) में नागरिकता को “किसी समुदाय के पूर्ण सदस्यों को प्रदत्त प्रतिष्ठा” के रूप में परिभाषित किया। इस प्रतिष्ठा को ग्रहण करने वाले सभी लोग अधिकारों और कर्त्तव्यों के मामले में बराबर होते हैं। मार्शल की परिभाषा में “समानता” की दो बातें अंतर्निहित हैं: पहली, प्रदत्त अधिकारों और कर्त्तव्यों की गुणवत्ता बढ़नी चाहिए; दूसरी, उन लोगों की संख्या बढ़नी चाहिए जिन्हें ये अधिकार दिए गए हैं। मार्शल ने सामाजिक वर्ग को “असमानता की व्यवस्था” कहा, और तर्क दिया कि नागरिकता वर्ग-पदानुक्रम के विभाजक परिणामों का प्रतिकार कर समानता सुनिश्चित करती है, जिससे एक बेहतर सुबद्ध और समरस समाज की रचना संभव होती है।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. ओल्गा टेलिस मुक़दमे का पूरा विवरण दीजिए: याचिका किस बारे में थी और सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला क्या था?

उत्तर: 1985 में समाजकर्मी ओल्गा टेलिस ने बंबई नगर निगम के ख़िलाफ़ एक जनहित याचिका दायर की। याचिका में यह दावा किया गया कि मुंबई के फुटपाथ और झोपड़पट्टी निवासियों को वहाँ रहने का अधिकार है, क्योंकि उनके कार्यस्थल के निकट कोई वैकल्पिक आवास उपलब्ध नहीं था, और अगर उन्हें वहाँ से हटने पर मजबूर किया गया तो वे अपनी आजीविका भी खो देंगे। सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि संविधान की धारा-21 में दिया गया जीने का अधिकार आजीविका के अधिकार को भी शामिल करता है। इसलिए अगर फुटपाथवासियों को बेदख़ल करना आवश्यक हो, तो पहले उन्हें आश्रय के अधिकार के तहत वैकल्पिक जगह उपलब्ध करानी होगी। यह फ़ैसला दिखाता है कि पूर्ण और समान सदस्यता का अर्थ केवल औपचारिक अधिकार नहीं, बल्कि व्यवहार में उन अधिकारों का वास्तविक संरक्षण भी है।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. “पूर्ण और समान सदस्यता” के प्रश्न को गमनागमन की स्वतंत्रता के उदाहरण से समझाइए।

उत्तर: अपने देश में नागरिकों को गमनागमन की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है, जो कामगारों के लिए विशेष महत्त्व रखता है। उदाहरण के लिए, सूचना तकनीक के कर्मी बंगलोर की ओर, केरल की नर्सें पूरे देश में, और भवन-निर्माण उद्योग के श्रमिक विभिन्न शहरों की ओर आकर्षित होते हैं। लेकिन जब अधिक रोज़गार बाहर के लोगों के हाथ में जाने लगते हैं, तो स्थानीय लोगों में प्रतिरोध पैदा होता है, कभी-कभी यह प्रतिरोध कुछ नौकरियों को राज्य के मूल निवासियों तक सीमित रखने की माँग या संगठित हिंसा का रूप भी ले लेता है (जैसा भारत के लगभग हर क्षेत्र में देखा गया है)। इससे यह सवाल उठता है कि क्या गमनागमन की स्वतंत्रता में देश के किसी भी हिस्से में रहने-काम करने का अधिकार शामिल है, और क्या ग़रीब-अकुशल प्रवासियों को कुशल प्रवासियों जितना ही स्वागत मिलना चाहिए। यही “पूर्ण और समान सदस्यता” के असली अर्थ पर बहस का केंद्र है।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. मार्टिन लूथर किंग के पृथक्करण-विरोधी तीनों तर्कों को विस्तार से समझाइए।

उत्तर: पहला तर्क : आत्म-गौरव और आत्म-सम्मान के मामले में विश्व की हर जाति या वर्ण का मनुष्य बराबर है। दूसरा तर्क : पृथक्करण राजनीति के चेहरे पर “सामाजिक कोढ़” की तरह है, क्योंकि यह उन लोगों को गहरे मनोवैज्ञानिक ज़ख़्म देता है जो ऐसे कानूनों के शिकार हैं; किंग ने यह भी कहा कि पृथक्करण की प्रथा गोरे समुदाय के जीवन की गुणवत्ता भी कम करती है, जैसे गोरे समुदाय ने अदालत के निर्देश के अनुसार कुछ सामुदायिक उद्यानों में काले लोगों को प्रवेश देने के बजाय उन्हें बंद कर दिया, और कुछ बेसबॉल टीमें टूट गईं क्योंकि अधिकारी काले खिलाड़ियों को स्वीकार नहीं करना चाहते थे। तीसरा तर्क : पृथक्करण कानून लोगों के बीच कृत्रिम सीमाएँ खींचते हैं और उन्हें देश के व्यापक हित के लिए एक-दूसरे का सहयोग करने से रोकते हैं। इन कारणों से किंग ने इन कानूनों को ख़त्म करने की माँग की और इनके ख़िलाफ़ शांतिपूर्ण और अहिंसक प्रतिरोध का आह्वान किया।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. भारत के संविधान ने नागरिकता के मामले में किस विविधतापूर्ण समाज को समायोजित करने की कोशिश की, उदाहरण सहित बताइए।

उत्तर: भारतीय संविधान ने बहुत विविधतापूर्ण समाज को समायोजित करने की कोशिश की। इसने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे भिन्न-भिन्न समुदायों को, उन महिलाओं को जो पहले समान अधिकार से वंचित थीं, और अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह के उन सुदूरवर्ती समुदायों को जिनका आधुनिक सभ्यता से बहुत कम संपर्क था, पूर्ण और समान नागरिकता देने का प्रयास किया। इसने देश के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित विभिन्न भाषाओं, धर्मों और रिवाज़ों को भी मान्यता दी, और लोगों को उनकी निजी आस्था, भाषा या सांस्कृतिक रिवाज़ छोड़ने के लिए बाध्य किए बिना सभी को समान अधिकार देने का अद्वितीय प्रयोग किया। दिल्ली में गणतंत्र दिवस परेड विभिन्न क्षेत्र, संस्कृति और धर्म के लोगों को सम्मिलित करने के इसी प्रयास को प्रतिबिंबित करती है।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. शहरी ग़रीबों/झोपड़पट्टी निवासियों की समस्याओं और उनके प्रति समाज के दृष्टिकोण की व्याख्या करें।

उत्तर: भारत के हर शहर में बहुत बड़ी आबादी झोपड़पट्टियों और अवैध कब्ज़े की ज़मीन पर बसी है। ये लोग अक्सर अपरिहार्य और उपयोगी काम कम मज़दूरी पर करते हैं (फेरीवाले, छोटे व्यापारी, सफ़ाईकर्मी, घरेलू नौकर, मिस्त्री), फिर भी शहर की बाक़ी आबादी उन्हें अवांछनीय मेहमान की तरह देखती है और संसाधनों पर बोझ बनने या अपराध-बीमारी फैलाने का आरोप मढ़ती है। गंदी बस्तियों की स्थिति अक्सर वीभत्स होती है, जहाँ छोटे कमरों में कई लोग बिना निजी शौचालय, जलापूर्ति या सफ़ाई के रहते हैं। इसके बावजूद, झोपड़पट्टी निवासी अपने श्रम से अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। उनके लिए मतदान जैसा बुनियादी राजनीतिक अधिकार भी कठिन हो जाता है क्योंकि मतदाता सूची में स्थायी पता चाहिए, जो अनधिकृत बस्तियों में देना कठिन है। सरकार और सुप्रीम कोर्ट (ओल्गा टेलिस मुक़दमा) दोनों ने धीरे-धीरे इनके अधिकारों को मान्यता देना शुरू किया है।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. फ्रांस के उदाहरण से समझाइए कि राष्ट्रीय पहचान किस प्रकार कुछ नागरिकों के लिए दूसरों से आसान हो सकती है।

उत्तर: फ्रांस स्वयं को धर्मनिरपेक्ष और समावेशी देश मानता है, और यूरोपीय मूल के अलावा उत्तर अफ़्रीका जैसे इलाक़ों से आए नागरिकों को भी अपने में शामिल करता है। संस्कृति और भाषा इसकी राष्ट्रीय पहचान की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ हैं, और सभी नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे सार्वजनिक जीवन में फ्रांसीसी भाषा-संस्कृति से आत्मसात हो जाएँ, भले ही वे निजी जीवन में अपनी आस्थाएँ बनाए रख सकें। लेकिन क्या सार्वजनिक और क्या निजी है, यह परिभाषित करना हमेशा आसान नहीं होता। इसीलिए फ्रांस के सिख छात्रों की पगड़ी और मुस्लिम लड़कियों के दुपट्टे की माँग को कुछ स्कूलों ने अस्वीकार कर दिया, यह कहते हुए कि यह धार्मिक प्रतीकों को सार्वजनिक शिक्षा में लाने का मामला है। जिन नागरिकों के धर्म ऐसे रिवाज़ों की माँग नहीं करते, उन्हें यह समस्या नहीं झेलनी पड़ती। इस तरह राष्ट्रीय संस्कृति में शामिल होना कुछ समूहों के लिए दूसरों की अपेक्षा आसान हो जाता है।

प्रश्न 8 (4 अंक)

प्र. राज्यहीन लोगों और शरणार्थियों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, और भारत ने उनके प्रति क्या रुख़ अपनाया है?

उत्तर: युद्ध, उत्पीड़न, अकाल या अन्य कारणों से विस्थापित लोग, अगर कोई देश उन्हें स्वीकार करने को राज़ी न हो और वे घर न लौट सकें, तो राज्यविहीन या शरणार्थी हो जाते हैं। वे शिविरों में या अवैध प्रवासी के रूप में रहने को मजबूर होते हैं, और अक्सर क़ानूनी तौर पर काम नहीं कर सकते, अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा नहीं सकते या संपत्ति अर्जित नहीं कर सकते; समस्या इतनी विकराल है कि संयुक्त राष्ट्र ने शरणार्थियों के लिए उच्चायुक्त नियुक्त किया है। भारत उत्पीड़ित लोगों को आश्रय देने पर गर्व करता है, जैसा उसने 1959 में दलाई लामा और उनके अनुयायियों के लिए किया। भारत की सभी सीमाओं से पड़ोसी देशों के लोगों का प्रवेश हुआ है, और इनमें से अनेक लोग वर्षों या पीढ़ियों तक राज्यहीन व्यक्तियों के रूप में शिविरों में या अवैध प्रवासी के रूप में रहते हैं; अंततः इनमें से अपेक्षाकृत कुछ को ही नागरिकता मिलती है। कितने लोगों को नागरिक के रूप में अंगीकार किया जाए, यह कठिन मानवीय और राजनीतिक समस्या है, क्योंकि देश अनियंत्रित भीड़ स्वीकार करना या सुरक्षा का जोखिम लेना नहीं चाहते।

प्रश्न 9 (4 अंक)

प्र. वैश्विक नागरिकता राष्ट्रीय नागरिकता का पूर्ण विकल्प क्यों नहीं बन सकती, तर्क सहित समझाइए।

उत्तर: वैश्विक नागरिकता के समर्थक तर्क देते हैं कि इंटरनेट, टेलीविज़न जैसे संचार साधनों ने हमें एक अंतर्संबद्ध विश्व में ला दिया है, जहाँ राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार लोग एक-दूसरे से जुड़ा महसूस करते हैं (जैसे 2004 की सुनामी के समय विश्वभर से मिली सहायता)। इससे प्रवासियों और राज्यहीन लोगों जैसी सीमा-पार समस्याओं से निपटना आसान हो सकता है। लेकिन किसी देश के भीतर की सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ (जैसे शहरी ग़रीबों या आदिवासियों की समस्याएँ) अंततः उसी समाज की सरकार और जनता ही सुलझा सकती है, कोई वैश्विक इकाई नहीं। इसलिए पूर्ण और समान सदस्यता आज भी महत्त्वपूर्ण बनी हुई है, और वैश्विक नागरिकता की अवधारणा राष्ट्रीय नागरिकता को हटाती नहीं, बल्कि उसे अंतर्संबद्ध विश्व की समझदारी और सहयोग की भावना से जोड़कर पूरक बनाती है।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. टी.एच. मार्शल के सिद्धांत के आधार पर यह विस्तार से व्याख्या करें कि नागरिकता सिर्फ़ क़ानूनी अवधारणा क्यों नहीं है, बल्कि समानता और अधिकारों से किस प्रकार गहराई से जुड़ी है, उदाहरण सहित समझाएँ।

उत्तर: ब्रिटिश समाजशास्त्री टी.एच. मार्शल (1893-1981) ने अपनी पुस्तक “नागरिकता और सामाजिक वर्ग” (1950) में नागरिकता की जो परिभाषा दी, वह इस कथन की पुष्टि करती है। मार्शल के अनुसार नागरिकता “किसी समुदाय के पूर्ण सदस्यों को प्रदत्त प्रतिष्ठा” है, और इस प्रतिष्ठा को ग्रहण करने वाले सभी लोग अधिकारों और कर्त्तव्यों के मामले में बराबर होते हैं। मार्शल की परिभाषा की मुख्य संकल्पना “समानता” है, जिसके दो पहलू हैं: दिए गए अधिकारों-कर्त्तव्यों की गुणवत्ता बढ़ना, और जिन्हें ये दिए जाते हैं उनकी संख्या बढ़ना। मार्शल नागरिकता में तीन प्रकार के अधिकार गिनाते हैं: नागरिक अधिकार (जीवन, आज़ादी, जायदाद की हिफ़ाज़त), राजनीतिक अधिकार (शासन प्रक्रिया में सहभागिता की शक्ति), और सामाजिक अधिकार (शिक्षा-रोज़गार तक पहुँच)। ये तीनों मिलकर नागरिक को इज़्ज़त के साथ जीवन-बसर करना संभव बनाते हैं। मार्शल ने सामाजिक वर्ग को “असमानता की व्यवस्था” कहा और तर्क दिया कि नागरिकता वर्ग-पदानुक्रम के विभाजक परिणामों का प्रतिकार कर समानता सुनिश्चित करती है। इसका सजीव उदाहरण ओल्गा टेलिस मुक़दमा (1985) है, जहाँ सुप्रीम कोर्ट ने धारा-21 के जीने के अधिकार में आजीविका के अधिकार को शामिल कर दिखाया कि नागरिकता केवल काग़ज़ी दर्जा नहीं, बल्कि व्यवहार में समान अधिकार-सुरक्षा दिलाने का साधन है। इस तरह नागरिकता महज़ एक क़ानूनी अवधारणा नहीं, बल्कि समाज में समानता और वास्तविक अधिकार-उपभोग सुनिश्चित करने की एक सतत परियोजना है।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. भारत में “पूर्ण और समान सदस्यता” को लेकर उठने वाले मुद्दों (गमनागमन की स्वतंत्रता, शहरी ग़रीब, आदिवासी-वनवासी) पर विस्तार से चर्चा करें।

उत्तर: “पूर्ण और समान सदस्यता” का प्रश्न भारत में कई रूपों में उठता है। पहला, गमनागमन की स्वतंत्रता को लेकर: कामगार रोज़गार की तलाश में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाते हैं (जैसे सूचना तकनीक के कर्मी बंगलोर, केरल की नर्सें), पर स्थानीय लोग अक्सर बाहरी लोगों के रोज़गार पर दावे का विरोध करते हैं, जैसा “मुंबई मुंबईकर के लिए” के नारे में दिखा, और यह प्रतिरोध कभी-कभी संगठित हिंसा का रूप भी ले लेता है। दूसरा, शहरी ग़रीबों/झोपड़पट्टी निवासियों को लेकर: वे उपयोगी काम करते हुए भी अवांछनीय समझे जाते हैं, उनके लिए वोट देने जैसा बुनियादी अधिकार भी स्थायी पते की अनिवार्यता के कारण कठिन हो जाता है, और ओल्गा टेलिस मुक़दमे (1985) में सुप्रीम कोर्ट को धारा-21 के तहत उनके आजीविका के अधिकार को मान्यता देनी पड़ी। तीसरा, आदिवासी और वनवासी समुदायों को लेकर: ये लोग जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं, पर बढ़ती आबादी, खनन के इच्छुक उद्यमियों के दबाव और पर्यटन उद्योग से उनकी जीवन-पद्धति और आजीविका ख़तरे में है, और सरकारों को देश के विकास व इन समुदायों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। इन तीनों मुद्दों में साझा बात यह है कि समान अधिकार होने के बावजूद अलग-अलग समूहों की ज़रूरतें भिन्न होती हैं, इसलिए नीतियाँ बनाते समय उनकी विशेष परिस्थितियों का ध्यान रखना ज़रूरी है, न कि केवल एक समान नीति सबके लिए लागू करना।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. राष्ट्र-राज्य अपनी राष्ट्रीय पहचान किस प्रकार परिभाषित करते हैं, और इससे किस प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं? फ्रांस, इज़राइल-जर्मनी और भारत के उदाहरण देते हुए विस्तार से समझाएँ।

उत्तर: राष्ट्र-राज्य की अवधारणा आधुनिक काल में विकसित हुई, जिसका सबसे पहला दावा 1789 में फ्रांस के क्रांतिकारियों ने किया। राष्ट्र-राज्य अपनी सीमाओं से न केवल राज्यक्षेत्र, बल्कि एक अनोखी संस्कृति और साझा इतिहास को भी परिभाषित करने का दावा करते हैं, जिसे झंडा, राष्ट्रगान, राष्ट्रभाषा या ख़ास उत्सवों जैसे प्रतीकों से व्यक्त किया जाता है। समस्या यह है कि व्यवहार में अधिकतर देश अपनी पहचान इस तरह परिभाषित करते हैं जो कुछ नागरिकों के लिए राष्ट्र से जुड़ना दूसरों की तुलना में आसान बना देती है। फ्रांस का उदाहरण: स्वयं को धर्मनिरपेक्ष-समावेशी मानने के बावजूद, फ्रांस अपने नागरिकों से भाषा-संस्कृति में सार्वजनिक रूप से आत्मसात होने की अपेक्षा करता है, जिससे सिख छात्रों की पगड़ी और मुस्लिम लड़कियों के दुपट्टे जैसे विवाद उठे। इज़राइल-जर्मनी का उदाहरण: यहाँ नागरिकता देने में धर्म या जातीय मूल को वरीयता दी जाती है, जैसा जर्मनी में जन्मे तुर्की मज़दूरों के बच्चों की नागरिकता की माँग पर जारी बहस से दिखता है। भारत का उदाहरण: भारत स्वयं को धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्य मानता है, और 1947 के विभाजन के बावजूद इसने अनुसूचित जाति-जनजाति, महिलाओं और सुदूरवर्ती समुदायों को समान नागरिकता देने का प्रयास किया, बिना उन्हें अपनी भाषा-संस्कृति छोड़ने के लिए बाध्य किए। इस तरह हर राष्ट्र-राज्य को समावेशी पहचान बनाने और वास्तविक व्यवहार में सभी नागरिकों को बराबर महसूस कराने के बीच संतुलन बनाना पड़ता है, और यह संतुलन आसानी से नहीं बनता।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. सार्वभौमिक और वैश्विक नागरिकता की अवधारणाओं की तुलना करते हुए बताएँ कि आज के अंतर्संबद्ध विश्व में नागरिकता के सामने कौन-सी चुनौतियाँ हैं।

उत्तर: सार्वभौमिक नागरिकता का सिद्धांत मानता है कि नागरिकता सभी को उपलब्ध होनी चाहिए, यानी हर व्यक्ति किसी न किसी राज्य का सदस्य हो। लेकिन व्यवहार में राज्य नागरिकता देने की शर्तें तय करते हैं और अवांछित आगंतुकों को बाहर रखने की ताक़त का प्रयोग करते हैं, जिससे अनेक लोग शरणार्थी या राज्यहीन बनकर शिविरों या अवैध प्रवासी के रूप में जीने को मजबूर होते हैं (जैसे सूडान के डरफर क्षेत्र के शरणार्थी, फ़िलिस्तीनी, बर्मी या बांग्लादेशी शरणार्थी)। संयुक्त राष्ट्र ने इस समस्या से निपटने के लिए एक उच्चायुक्त नियुक्त किया है, फिर भी अंततः बहुत कम लोगों को ही नागरिकता मिल पाती है। इसके सामने वैश्विक नागरिकता की अवधारणा खड़ी है, जो मानती है कि इंटरनेट-टेलीविज़न जैसे साधनों से जुड़े आज के अंतर्संबद्ध विश्व में लोग राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार एक-दूसरे से जुड़ा महसूस करते हैं (जैसे 2004 की सुनामी में विश्वभर से मिली सहायता, या बर्ड फ़्लू रोकने में संयुक्त राष्ट्र की सक्रियता)। यह अवधारणा प्रवासी-शरणार्थी जैसी सीमा-पार समस्याओं से निपटने में सहयोग को आसान बना सकती है। लेकिन इसकी सीमा यह है कि किसी देश की भीतरी सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ केवल उसी देश की सरकार-जनता सुलझा सकती है। इसलिए आज की सबसे बड़ी चुनौती यह संतुलन बनाना है: राष्ट्रीय नागरिकता के ठोस अधिकार-सुरक्षा को बनाए रखते हुए, वैश्विक नागरिकता की सहयोग भावना को भी विकसित करना, ताकि शरणार्थियों और राज्यहीन लोगों जैसी समस्याओं का मानवीय समाधान निकल सके।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
सर्वोच्च न्यायालय ने मुंबई की झोपड़पट्टियों में रहने वालों के अधिकारों के बारे में समाजकर्मी ओल्गा टेलिस की जनहित याचिका (ओल्गा टेलिस बनाम बंबई नगर निगम) पर 1985 में एक महत्त्वपूर्ण फ़ैसला दिया। याचिका में कार्यस्थल के निकट रहने की वैकल्पिक जगह न होने के कारण फुटपाथ या झोपड़पट्टियों में रहने के अधिकार का दावा किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संविधान की धारा-21 में जीने के अधिकार की गारंटी दी गई है, जिसमें आजीविका का अधिकार शामिल है।

(क) 1 अंक ओल्गा टेलिस मुक़दमे में याचिका किसके ख़िलाफ़ दायर की गई थी?
उत्तर: बंबई नगर निगम के ख़िलाफ़।

(ख) 2 अंक सुप्रीम कोर्ट ने धारा-21 के संदर्भ में क्या कहा?
उत्तर: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा-21 का जीने का अधिकार आजीविका के अधिकार को भी शामिल करता है, इसलिए फुटपाथवासियों को बेदख़ल करने से पहले उन्हें वैकल्पिक जगह उपलब्ध करानी होगी।

(ग) 3 अंक यह गद्यांश “पूर्ण और समान सदस्यता” की अवधारणा को कैसे स्पष्ट करता है, विस्तार से समझाइए।
उत्तर: यह गद्यांश दिखाता है कि “पूर्ण और समान सदस्यता” केवल काग़ज़ी अधिकार नहीं है, बल्कि इसका मतलब यह है कि राज्य को हर नागरिक के बुनियादी अधिकारों को व्यवहार में भी संरक्षित करना होगा, चाहे वे शहर के सबसे ग़रीब तबके से ही क्यों न हों। फुटपाथ और झोपड़पट्टी निवासी अक्सर अवांछनीय समझे जाते हैं, फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जीने के अधिकार में आजीविका का अधिकार शामिल है, इसलिए उन्हें बिना वैकल्पिक व्यवस्था के बेदख़ल नहीं किया जा सकता। यह फ़ैसला दिखाता है कि लोकतांत्रिक नागरिकता एक निरंतर विकसित होने वाली परियोजना है, जिसमें हाशिए पर पड़े समूहों के संघर्ष (जैसे ओल्गा टेलिस की याचिका) से क़ानून की व्याख्या बदलती है और उनके अधिकारों का दायरा बढ़ता है।

केस स्टडी
ज़िम्बाब्वे में भूमि वितरण के सरकारी आँकड़ों के अनुसार लगभग 4,400 गोरे परिवारों के पास लगभग 1 करोड़ हेक्टेयर भूमि थी, जो देश की कुल कृषि योग्य भूमि का 32% हिस्सा था, जबकि लगभग 10 लाख काले किसान परिवारों के पास केवल 1.6 करोड़ हेक्टेयर (38%) कम उपजाऊ और असिंचित भूमि थी। ज़िम्बाब्वे में गोरों की आबादी कुल जनसंख्या की केवल 0.06% थी। 1997 में ज़िम्बाब्वे के राष्ट्रपति राबर्ट मुगाबे ने 1500 बड़े फार्मों पर कब्ज़ा करने की योजना घोषित की।

(क) 1 अंक ज़िम्बाब्वे में गोरी आबादी कुल जनसंख्या का कितना प्रतिशत थी?
उत्तर: केवल 0.06%।

(ख) 2 अंक गोरे और काले किसान परिवारों के बीच भूमि वितरण में क्या असमानता थी?
उत्तर: केवल 4,400 गोरे परिवारों के पास 1 करोड़ हेक्टेयर (32%) उपजाऊ-सिंचित भूमि थी, जबकि लगभग 10 लाख काले किसान परिवारों के पास केवल 1.6 करोड़ हेक्टेयर (38%) कम उपजाऊ, असिंचित भूमि थी।

(ग) 3 अंक यह गद्यांश समान अधिकार और नागरिकता की अवधारणा के लिए क्या चुनौती पेश करता है, विस्तार से समझाइए।
उत्तर: यह गद्यांश दिखाता है कि औपनिवेशिक इतिहास के कारण उत्पन्न अत्यधिक असमान संसाधन-वितरण किसी देश में समान नागरिकता के दावे को कैसे जटिल बना सकता है। गोरे लोग पीढ़ियों से ज़िम्बाब्वे में रह रहे हैं और स्वयं को ज़िम्बाब्वेवासी मानते हैं, इसलिए उनकी नागरिकता और संपत्ति के अधिकार को नकारना भी अन्यायपूर्ण होगा, पर लगभग सौ वर्ष पहले उपजाऊ ज़मीन स्थानीय निवासियों से छीनी गई थी, इसलिए काले बहुसंख्यक समुदाय का यह तर्क भी उतना ही मान्य है कि ऐतिहासिक अन्याय को सुधारा जाना चाहिए। यह मामला दिखाता है कि “समान अधिकार” का मतलब केवल सबको एक जैसी नीति लागू करना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक असमानताओं को ध्यान में रखते हुए न्यायसंगत समाधान खोजना है, जो किसी भी सरकार के लिए आसान काम नहीं होता।