कक्षा 11 राजनीति विज्ञान बुक 2 अध्याय 6 नागरिकता NCERT समाधान

NCERT की पाठ्यपुस्तक राजनीतिक सिद्धांत के अध्याय 6 «नागरिकता» की प्रश्नावली के छहों प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। अध्याय के भीतर छपे प्रश्न और गतिविधियाँ (चिंतन-मंथन, आओ कुछ करके सीखें, कार्टून और विश्व नागरिकता वाली उक्तियाँ) अंत में हल की गई हैं। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।

1 नागरिकों के अधिकार और दायित्व

प्र. राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता के रूप में नागरिकता में अधिकार और दायित्व दोनों शामिल हैं। समकालीन लोकतांत्रिक राज्यों में नागरिक किन अधिकारों के उपभोग की अपेक्षा कर सकते हैं? नागरिकों के राज्य और अन्य नागरिकों के प्रति क्या दायित्व हैं?

उत्तर: अधिकतर लोकतांत्रिक देशों में नागरिक तीन तरह के अधिकारों की अपेक्षा कर सकते हैं: कुछ राजनीतिक अधिकार जैसे मतदान का अधिकार; कुछ नागरिक अधिकार जैसे अभिव्यक्ति और आस्था की आज़ादी; और कुछ सामाजिक-आर्थिक अधिकार जैसे न्यूनतम मज़दूरी या शिक्षा पाने का अधिकार। टी.एच. मार्शल के अनुसार ये क्रमशः राजनीतिक, नागरिक और सामाजिक अधिकार कहलाते हैं, और तीनों मिलकर नागरिक को इज़्ज़त के साथ जीवन-बसर करना संभव बनाते हैं।
नागरिकों के दायित्व दो तरह के हैं: पहला, राज्य द्वारा थोपी गई क़ानूनी बाध्यताएँ जैसे क़ानून का पालन करना और कर चुकाना। दूसरा, एक नैतिक दायित्व, जिसमें समुदाय के सहजीवन में भागीदार होना और योगदान करना, विवादों को बल-प्रयोग के बजाय संधि-वार्ता और विचार-विमर्श से सुलझाना, और देश के सांस्कृतिक-प्राकृतिक संसाधनों के उत्तराधिकारी व न्यासी के रूप में व्यवहार करना शामिल है।

2 समान अधिकार, असमान उपभोग

प्र. सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए तो जा सकते हैं लेकिन हो सकता है कि वे इन अधिकारों का प्रयोग समानता से न कर सकें। इस कथन की व्याख्या कीजिए।

उत्तर: यह कथन सही है। उदाहरण के लिए, वोट देने का अधिकार सभी नागरिकों को समान रूप से प्राप्त है, लेकिन झोपड़पट्टी और फुटपाथ पर रहने वालों के लिए इसका प्रयोग कठिन हो जाता है, क्योंकि मतदाता सूची में दर्ज होने के लिए स्थायी पता चाहिए और अनधिकृत बस्तियों में रहने वालों के लिए ऐसा पता देना कठिन होता है। इसी तरह, गमनागमन और रोज़गार की स्वतंत्रता सभी नागरिकों को समान रूप से प्राप्त है, पर ग़रीब और अकुशल प्रवासियों को कुशल-दौलतमंद कामगारों जितना स्वागत नहीं मिलता। शिक्षा का अधिकार भी सभी को है, पर आर्थिक तंगी के कारण दिहाड़ी मज़दूरों के बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। इससे स्पष्ट होता है कि औपचारिक (काग़ज़ पर लिखी) समानता और वास्तविक (व्यवहार में उपभोग की जाने वाली) समानता में फ़र्क़ होता है, और आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियाँ इस फ़र्क़ को जन्म देती हैं।

3 भारत में नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष

प्र. भारत में नागरिक अधिकारों के लिए हाल के वर्षों में किए गए किन्हीं दो संघर्षों पर टिप्पणी लिखिए। इन संघर्षों में किन अधिकारों की माँग की गई थी?

उत्तर: पहला उदाहरण ओल्गा टेलिस बनाम बंबई नगर निगम (1985) का है। सामाजिक कार्यकर्ता ओल्गा टेलिस ने मुंबई की झोपड़पट्टियों और फुटपाथों पर रहने वालों के लिए जनहित याचिका दायर की, क्योंकि कार्यस्थल के निकट रहने की वैकल्पिक जगह न होने के कारण वे वहाँ रहने को मजबूर थे। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संविधान की धारा-21 के जीने के अधिकार में आजीविका का अधिकार भी शामिल है, इसलिए फुटपाथवासियों को बेदख़ल करने से पहले वैकल्पिक जगह देनी होगी। यहाँ आश्रय और आजीविका के अधिकार की माँग की गई थी।
दूसरा उदाहरण महिला आंदोलन और दलित आंदोलन है, जिनका मक़सद जनमत बदलना और समान अधिकार-अवसर सुनिश्चित करने के लिए सरकारी नीतियों को प्रभावित करना रहा है। इनमें समान सामाजिक प्रतिष्ठा, भेदभाव-मुक्त व्यवहार और पूर्ण नागरिकता के अधिकारों की माँग की गई।

4 शरणार्थियों की समस्याएँ और वैश्विक नागरिकता

प्र. शरणार्थियों की समस्याएँ क्या हैं? वैश्विक नागरिकता की अवधारणा किस प्रकार उनकी सहायता कर सकती है?

उत्तर: शरणार्थी अक्सर युद्ध, उत्पीड़न या अकाल से विस्थापित होकर अपने ही या पड़ोसी देश में शरण लेने को मजबूर होते हैं (जैसे सूडान के डरफर क्षेत्र, फ़िलिस्तीन, म्यांमार या बांग्लादेश के शरणार्थी)। अगर कोई देश उन्हें नागरिकता देने को राज़ी न हो और वे घर न लौट सकें, तो वे राज्यहीन बन जाते हैं और शिविरों में या अवैध प्रवासी के रूप में रहने को मजबूर होते हैं। ऐसे में वे न क़ानूनी तौर पर काम कर सकते हैं, न अपने बच्चों को पढ़ा सकते हैं, न संपत्ति अर्जित कर सकते हैं, और उनकी सुरक्षा भी अनिश्चित रहती है।
वैश्विक नागरिकता की अवधारणा इसलिए मददगार हो सकती है क्योंकि यह राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार की समस्याओं (जैसे शरणार्थी संकट) से निपटने के लिए विभिन्न देशों की सरकारों और लोगों के बीच सहयोग को आसान बना सकती है। इससे कम-से-कम शरणार्थियों को बुनियादी मानव अधिकार और सुरक्षा, चाहे वे किसी भी देश में हों, सुनिश्चित करना आसान हो सकता है, भले ही राष्ट्रीय नागरिकता का विकल्प तुरंत न मिले।

5 प्रवासियों का स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान

प्र. देश के अंदर एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में लोगों के आप्रवासन का आमतौर पर स्थानीय लोग विरोध करते हैं। प्रवासी लोग स्थानीय अर्थव्यवस्था में क्या योगदान दे सकते हैं?

उत्तर: प्रवासी मज़दूर अक्सर वे काम करते हैं जो स्थानीय लोग नहीं करना चाहते या नहीं कर पाते, जैसे निर्माण उद्योग, घरेलू काम, फेरी लगाना, नल-मिस्त्री का काम, या कुशल तकनीकी काम (जैसे सूचना तकनीक के कर्मी, केरल की नर्सें)। वे सड़क और भवन-निर्माण जैसी बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में मज़दूरी देते हैं, छोटे कारोबार (बेंत बुनाई, कपड़ा रंगाई-छपाई, सिलाई) चलाते हैं, और अक्सर कम मज़दूरी पर वह ज़रूरी काम करते हैं जिससे शहर की अर्थव्यवस्था चलती रहती है। इस तरह वे स्थानीय माँग और आपूर्ति के अंतर को पाटते हैं और समग्र उत्पादन व सेवाओं में वृद्धि करते हैं, भले ही स्थानीय लोग सीमित रोज़गार अवसरों की प्रतिद्वंद्विता के डर से उनका विरोध करें।

6 लोकतांत्रिक नागरिकता : एक परियोजना

प्र. “भारत जैसे समान नागरिकता देने वाले देशों में भी लोकतांत्रिक नागरिकता एक पूर्ण स्थापित तथ्य नहीं वरन एक परियोजना है।” नागरिकता से जुड़े उन मुद्दों की चर्चा कीजिए जो आजकल भारत में उठाए जा रहे हैं।

उत्तर: भारतीय संविधान ने नागरिकता की एक समावेशी और लोकतांत्रिक धारणा अपनाई, जिसमें अनुसूचित जाति-जनजाति, महिलाओं और सुदूरवर्ती समुदायों को समान नागरिकता देने का प्रयास हुआ। फिर भी इन समावेशी प्रावधानों ने संघर्ष और विवादों को जन्म दिया है। आज भारत में उठ रहे कुछ प्रमुख मुद्दे हैं: महिला आंदोलन (लैंगिक भेदभाव और असमान अधिकार-उपभोग के ख़िलाफ़), दलित आंदोलन (जातिगत भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार के ख़िलाफ़), विकास परियोजनाओं से विस्थापित लोगों का संघर्ष (पुनर्वास और मुआवज़े के अधिकार के लिए), प्रवासी मज़दूरों के गमनागमन और रोज़गार की स्वतंत्रता को लेकर स्थानीय-बाहरी विवाद, और झोपड़पट्टी-फुटपाथ निवासियों के आश्रय व आजीविका के अधिकार (जैसा ओल्गा टेलिस मुक़दमे में उठा)। इसलिए भारत का अनुभव दिखाता है कि लोकतांत्रिक नागरिकता एक निरंतर चलने वाली परियोजना है, जिसमें समाज के बदलने के साथ नए-नए समूह अपनी माँगें उठाते रहते हैं और लोकतांत्रिक राज्य को उन्हें खुले दिमाग़ से सुनना होता है।

7 पाठ के बीच के प्रश्न

अध्याय के भीतर भी प्रश्न और गतिविधियाँ छपी हैं: “चिंतन-मंथन” और “आओ कुछ करके सीखें” के बॉक्स, एक पूरे पृष्ठ का कार्टून, और विश्व नागरिकता वाले खंड की शुरुआत में दी गई उक्तियाँ। नीचे इन्हें किताब के क्रम में, हिंदी संस्करण के अपने शब्दों में, हल किया गया है। गतिविधियों और चर्चा वाले प्रश्नों का कोई एक “सही” उत्तर नहीं होता; आदर्श उत्तर दिखाते हैं कि एक अच्छे उत्तर में क्या-क्या होना चाहिए।

चिंतन-मंथन

प्र. सत्रहवीं से बीसवीं सदी के बीच यूरोप के गोरे लोगों ने दक्षिण अफ़्रीका के लोगों पर अपना शासन कायम रखा। 1994 तक दक्षिण अफ़्रीका में अपनाई गई नीतियों के बारे में नीचे दिए गए ब्यौरे को पढ़िए। श्वेत लोगों को मत देने, चुनाव लड़ने और सरकार को चुनने का अधिकार था। वे संपत्ति खरीदने और देश में कहीं भी आने-जाने के लिए स्वतंत्र थे। काले लोगों को ऐसे अधिकार नहीं थे। काले और गोरे लोगों के लिए पृथक मुहल्ले और कालोनियाँ बसाई गई थीं। काले लोगों को अपने पड़ोस की गोरे लोगों की बस्ती में काम करने के लिए ‘पास’ लेने पड़ते थे। उन्हें गोरों के इलाके में अपने परिवार रखने की अनुमति नहीं थी। अलग-अलग रंग के लोगों के लिए विद्यालय भी अलग-अलग थे।

  • क्या अश्वेत लोगों को दक्षिण अफ़्रीका में पूर्ण और समान सदस्यता मिली हुई थी? कारण सहित बताइये। नहीं। नागरिकता का अर्थ है किसी राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता, और अधिकारों तथा प्रतिष्ठा की समानता नागरिकता के बुनियादी अधिकारों में से एक है। काले लोगों को न मत देने, चुनाव लड़ने या सरकार चुनने का अधिकार था (राजनीतिक अधिकार), न संपत्ति खरीदने और कहीं भी आने-जाने की आज़ादी थी (नागरिक अधिकार); उन्हें गोरों की बस्ती में काम के लिए ‘पास’ लेने पड़ते थे, वहाँ परिवार रखने की अनुमति नहीं थी और उनके विद्यालय भी अलग थे। वे केवल नाम के सदस्य थे।
  • ऊपर दिया गया ब्यौरा हमें दक्षिण अफ़्रीका में भिन्न समूहों के अंतर्संबंधों के बारे में क्या बताता है? यह प्रभुत्व और अलगाव का संबंध था: गोरे अल्पसंख्यक शासन करते थे, सारे अधिकार अपने पास रखते थे और काले बहुसंख्यकों को रहने, काम करने और पढ़ने के मामलों में अलग और अधीन रखते थे। इसीलिए काले अफ़्रीकी लोगों को समान नागरिकता के लिए शासक गोरे अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ लंबा संघर्ष करना पड़ा, जो 1990 के दशक की शुरुआत तक चला।
आओ कुछ करके सीखें

प्र. अपने क्षेत्र के नागरिकों की गतिविधियों के कुछ वैसे उदाहरणों के बारे में सोचें जो दूसरे की मदद करने अथवा क्षेत्र की उन्नति या फिर पर्यावरण की रक्षा से संबंधित हों। ऐसी कुछ गतिविधियों की एक सूची बनाएँ जो आपके हमउम्र युवाओं द्वारा अपनाई जा सकती हैं।

उत्तर: यह कक्षा की गतिविधि है। आपके आसपास दिखने वाले उदाहरण: मोहल्ला समितियों द्वारा पार्क और नालियों की सफ़ाई, रक्तदान और स्वास्थ्य शिविर, ज़रूरतमंदों के लिए कपड़े और किताबें जुटाना, वृक्षारोपण और वर्षा-जल संचयन, प्लास्टिक के ख़िलाफ़ अभियान। युवाओं के लिए गतिविधियाँ: विद्यालय और मोहल्ले में सफ़ाई और वृक्षारोपण अभियान, छोटे बच्चों या बड़ों को पढ़ना-लिखना सिखाना, बुज़ुर्गों की मदद, पानी और बिजली बचाने के लिए जागरूकता, घर पर कचरा अलग-अलग करना। ये अध्याय की इस बात को दिखाते हैं कि नागरिकता में सिर्फ़ क़ानूनी बाध्यताएँ नहीं, बल्कि समुदाय के सहजीवन में भागीदार होने और योगदान करने का नैतिक दायित्व भी शामिल है, और नागरिक देश के सांस्कृतिक और प्राकृतिक संसाधनों के उत्तराधिकारी और न्यासी हैं।

चिंतन-मंथन

प्र. नागरिकों के लिए देशभर में गमनागमन और रोज़गार की स्वतंत्रता के पक्ष और विपक्ष के तर्कों की जाँच-पड़ताल करें। क्या किसी क्षेत्र में लंबे समय से रहने वाले निवासियों को रोज़गार और सुविधाओं में प्राथमिकता मिलनी चाहिए? क्या राज्यों को व्यावसायिक कॉलेजों में बाहरी छात्रों के प्रवेश के लिए कोटा निर्धारित करने की अनुमति दी जानी चाहिए?

उत्तर: आवागमन की स्वतंत्रता के पक्ष में: यह नागरिकों को मिला एक अधिकार है और कामगारों के लिए ख़ास महत्त्व रखता है, जो रोज़गार की तलाश में दूसरी जगह जाते हैं; पूर्ण और समान सदस्यता का अर्थ है कि नागरिक देश में जहाँ भी रहना, पढ़ना या काम करना चाहें, उन्हें समान अधिकार और अवसर मिलें; प्रवासी जहाँ जाते हैं वहाँ की अर्थव्यवस्था में योगदान करते हैं। विपक्ष में, या सीमाओं के पक्ष में: अगर रोज़गार, सुविधाएँ और संसाधन सीमित हों, तो स्थानीय लोग ‘बाहरी’ लोगों से प्रतिस्पर्धा का विरोध कर सकते हैं, ख़ासकर कम मज़दूरी पर, और माँग कर सकते हैं कि कुछ रोज़गार उस राज्य के निवासियों या स्थानीय भाषा जानने वालों को ही मिलें। लंबे समय से रहने वाले निवासियों को प्राथमिकता: पिछड़ गए स्थानीय लोगों के लिए उचित प्राथमिकता का तर्क दिया जा सकता है, पर दूसरे नागरिकों पर पूरी रोक उन्हें पूर्ण और समान सदस्यता से वंचित करेगी। व्यावसायिक कॉलेजों में कोटा: राज्य के अपने छात्रों के लिए कुछ कोटा उचित ठहराया जा सकता है, पर बाक़ी नागरिकों का प्रवेश पूरी तरह बंद नहीं होना चाहिए। अध्याय का मार्गदर्शक सिद्धांत यह है कि ऐसे विवादों का समाधान बल प्रयोग के बजाय वार्ता और विचार-विमर्श से हो, और सभी नागरिकों की पूर्ण और समान सदस्यता को ध्यान में रखा जाए।

कार्टून: प्रवासी मज़दूरों के बिना भारत के शहरी मध्यवर्ग के जीवन का एक दिन

प्र. इस कार्टून के साथ कोई प्रश्न नहीं छपा है। यह क्या दिखाता है?

उत्तर: यह कार्टून शहरी मध्यवर्ग के लोगों को उन सब कामों से जूझते दिखाता है जो आमतौर पर प्रवासी मज़दूर उनके लिए करते हैं: खाना बनाना और बर्तन धोना, सफ़ाई, सामान ढोना, बच्चों की देखभाल, चीज़ों की मरम्मत, गाड़ी और घर धोना। संदेश यह है कि प्रवासी, अक्सर कम मज़दूरी पर, ज़रूरी और उपयोगी काम करते हैं और उनके बिना शहर नहीं चल सकता, भले ही स्थानीय लोग कभी-कभी उन्हें ‘बाहरी’ मानकर उनका विरोध करते हों। यह प्रश्नावली के प्रश्न 5 से जुड़ा है, जो प्रवासियों द्वारा स्थानीय अर्थव्यवस्था में किए जाने वाले योगदान के बारे में है।

चिंतन-मंथन

प्र. ज़िम्बाब्वे में भूमि वितरण के बारे में प्रकाशित सरकारी आँकड़ों के अनुसार वहाँ लगभग 4400 गोरे परिवारों के पास लगभग एक करोड़ हेक्टेयर भूमि है। यह देश की कुल कृषि योग्य भूमि का 32 प्रतिशत हिस्सा है। लगभग दस लाख काले किसानों के पास केवल 1.6 करोड़ हेक्टेयर भूमि है जो कुल का 38 प्रतिशत भाग है। गोरे लोगों के पास जो ज़मीन है वह सिंचित और उपजाऊ है, जबकि काले लोगों के पास कम उपजाऊ और असिंचित ज़मीन है। भू-स्वामियों के इतिहास को खोजने से साफ़ पता चलता है कि लगभग सौ वर्ष पूर्व गोरे लोगों ने उपजाऊ ज़मीन स्थानीय निवासियों से अपने कब्ज़े में ले ली। गोरे लोग ज़िम्बाब्वे में पीढ़ियों से रह रहे हैं और अब स्वयं को ज़िम्बाब्वे वासी समझते हैं। ज़िम्बाब्वे में गोरों की आबादी कुल जनसंख्या की केवल 0.06 प्रतिशत है। 1997 में ज़िम्बाब्वे के राष्ट्रपति राबर्ट मुगाबे ने 1500 बड़े फार्मों पर कब्ज़ा करने की योजना की घोषणा की। ज़िम्बाब्वे के काले और गोरे नागरिकों के अपने-अपने दावों का समर्थन या विरोध करने के लिए आप नागरिकता के कौन-कौन से विचारों का उपयोग करेंगे?

उत्तर: काले नागरिकों के दावे के समर्थन में: समान नागरिकता का अर्थ है पूर्ण और समान सदस्यता, और जब समूहों की ज़रूरतें अलग हों तो समान अधिकार का अर्थ सब पर एक जैसी नीति लागू करना नहीं होता; काले बहुसंख्यकों के पास कम उपजाऊ, असिंचित ज़मीन इसलिए है क्योंकि सौ वर्ष पहले उपजाऊ ज़मीन स्थानीय लोगों से छीन ली गई थी, इसलिए ज़मीन का अधिक न्यायपूर्ण वितरण नागरिकों को अधिक बराबर बनाएगा। गोरे नागरिकों के दावे के समर्थन में: वे पीढ़ियों से ज़िम्बाब्वे में रह रहे हैं और ख़ुद को ज़िम्बाब्वे वासी मानते हैं, इसलिए वे भी पूर्ण और समान सदस्य हैं और संपत्ति सहित अपने अधिकारों की सुरक्षा के हक़दार हैं; बिना उचित प्रक्रिया के फार्मों पर कब्ज़ा उन्हें ‘बाहरी’ की तरह बरतना होगा। संतुलित दृष्टिकोण: इस विवाद का समाधान बल प्रयोग के बजाय वार्ता और विचार-विमर्श से, क़ानून और उचित मुआवज़े के ज़रिए होना चाहिए, और सभी नागरिकों की पूर्ण और समान सदस्यता को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

आओ कुछ करके सीखें

प्र. अपने घर, विद्यालय या आसपास कार्यरत तीन कामगार परिवारों का सर्वेक्षण करें। वे कहाँ रहते हैं? आवास में कितने लोग रहते हैं? उन्हें किस तरह की सुविधाएँ उपलब्ध हैं? क्या उनके बच्चे विद्यालय जाते हैं?

उत्तर: यह सर्वेक्षण की गतिविधि है; हर परिवार के उत्तर इन्हीं स्तंभों वाली तालिका में दर्ज कीजिए। जो मिले उसकी तुलना अध्याय में बताए गए शहरी ग़रीबों के हालात से कीजिए: छोटे कमरों में ठुँसे बहुत से लोग, न निजी शौचालय, न नल का पानी, न साफ़-सफ़ाई, और जान-माल की असुरक्षा, जबकि वे अपने श्रम से अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं। यह भी देखिए कि क्या वे मतदान जैसे अधिकारों का प्रयोग कर पाते हैं, जिसके लिए स्थायी पता चाहिए, और क्या उनके बच्चे विद्यालय जाते हैं, क्योंकि सबको बराबर दिए गए अधिकारों का सब बराबर प्रयोग नहीं कर पाते।

आओ कुछ करके सीखें

प्र. स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट/पथ विक्रेता (जीविका संरक्षण और पथ विक्रय) विनियमन अधिनियम, 2014 के बारे में पता करें।

उत्तर: यह खोज की गतिविधि है। 2014 में संसद द्वारा पारित यह अधिनियम पथ विक्रेताओं की जीविका के संरक्षण को क़ानूनी आधार देता है और शहरों में पथ विक्रय का नियमन करता है: विक्रेताओं का सर्वेक्षण करके उन्हें विक्रय प्रमाण-पत्र दिए जाते हैं, विक्रय क्षेत्र तय किए जाते हैं और विक्रेताओं के प्रतिनिधियों वाली समितियाँ बनाई जाती हैं, ताकि उन्हें मनमाने ढंग से हटाया या परेशान न किया जा सके। इसे अध्याय से जोड़िए: बड़े शहरों में लाखों फुटपाथी दुकानदार हैं जिन्हें अक्सर पुलिस और नगर प्रशासन परेशान करते हैं, और जनवरी 2004 में बनी फुटपाथी दुकानदारों की राष्ट्रीय नीति का उद्देश्य उन्हें मान्यता और नियमन देना था ताकि वे बिना परेशानी अपना पेशा चला सकें। यह अधिनियम शहरी ग़रीबों तक नागरिकता के अधिकारों के विस्तार का उदाहरण है।

आओ कुछ करके सीखें

प्र. विद्यालयों या सेना जैसी किसी अन्य सार्वजनिक संस्था के लिए साझा वर्दी पर ज़ोर देना और पगड़ी जैसे धार्मिक प्रतीकों पर प्रतिबंध लगाना उपयुक्त नहीं है?

उत्तर: पक्ष में तर्क: भारत का संविधान सबको समान अधिकार देता है, बिना लोगों को अपनी निजी आस्थाएँ, भाषा या सांस्कृतिक रिवाज़ छोड़ने के लिए बाध्य किए; धार्मिक प्रतीकों पर रोक कुछ समूहों के लिए आत्मसात होना दूसरों से आसान बना देती है, जैसा फ्रांस में सिख छात्रों की पगड़ी और मुस्लिम लड़कियों के स्कार्फ़ के विवाद में दिखा, क्योंकि जिनके धर्म में ऐसे रिवाज़ नहीं थे उन्हें यह समस्या नहीं झेलनी पड़ी। विपक्ष में तर्क: साझा वर्दी समानता और साझी सार्वजनिक पहचान को व्यक्त करती है, और सार्वजनिक संस्थाओं को अनुशासन और सुरक्षा के लिए एक जैसे नियमों की ज़रूरत हो सकती है। संतुलित उत्तर यह कह सकता है कि साझी वर्दी स्वीकार्य है, पर पगड़ी जैसे धार्मिक प्रतीक को जहाँ तक वह दूसरों को नुक़सान न पहुँचाए, स्वीकार किया जाना चाहिए, क्योंकि लोकतांत्रिक नागरिकता जितनी हो सके उतनी समावेशी होनी चाहिए। अपनी राय कारण के साथ लिखिए।

विश्व नागरिकता: निम्नलिखित उक्तियों पर गौर करें

प्र. 2004 में दक्षिण एशिया के कई देशों पर कहर बरपाने वाली सुनामी से पीड़ित लोगों के लिए सहानुभूति और सहायता के भावोद्गार फूट पड़े। आज अंतर्राष्ट्रीय तंत्र का ताना-बाना आतंकवादियों को जोड़ने में मदद करता है। विभिन्न देशों में बर्ड फ़्लू के प्रसार और इन्सानों में विषाणुजनित महामारी के संभावित उभार को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र सक्रिय है। इन उक्तियों में क्या साझा है? वे उस दुनिया के बारे में क्या बताती हैं, जिसमें हम रहते हैं?

उत्तर: तीनों उक्तियाँ ऐसी घटनाओं और समस्याओं के बारे में हैं जो राष्ट्रीय सीमाओं के पार जाती हैं: आपदा पीड़ितों के लिए मदद कई देशों से आई, आतंकवादियों का तंत्र अंतर्राष्ट्रीय है, और बीमारी सीमाओं के पार फैल सकती है, इसलिए देशों को मिलकर काम करना पड़ता है। ये बताती हैं कि हम आज एक ऐसे विश्व में रहते हैं जो आपस में जुड़ा हुआ है, जहाँ इंटरनेट, टेलीविज़न और सेलफ़ोन जैसे संचार के नए साधनों ने विश्व के विभिन्न हिस्सों की हलचलों को हमारे तत्काल संपर्क में ला दिया है और विभिन्न देशों के लोगों में साझे सरोकार और सहानुभूति पैदा की है। यही विश्व नागरिकता के तर्क का आधार है।

आओ कुछ करके सीखें

प्र. भारत में अभी रह रहे कुछ राज्यहीन लोगों की सूची बनाओ। उनमें से किसी पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।

उत्तर: यह खोज की गतिविधि है। अध्याय बताता है कि भारत की सभी सीमाओं से पड़ोसी देशों के लोगों का आना हुआ है और उनमें से बहुत से लोग वर्षों या पीढ़ियों तक शिविरों में या अवैध आप्रवासियों की तरह राज्यहीन बने रहते हैं, और उनमें से अपेक्षाकृत कम लोगों को ही अंततः नागरिकता मिलती है; भारत ने 1959 में दलाई लामा और उनके अनुयायियों को भी शरण दी थी। आप तिब्बती शरणार्थियों, श्रीलंकाई तमिल शरणार्थियों, या म्यांमार और बांग्लादेश से आए शरणार्थियों पर लिख सकते हैं। अच्छी टिप्पणी में ये बातें हों: वे कहाँ से और क्यों आए, कहाँ रहते हैं, उन्हें कौन-से अधिकार नहीं मिलते (अक्सर वे क़ानूनी रूप से काम नहीं कर सकते, बच्चों को पढ़ा नहीं सकते या संपत्ति नहीं ख़रीद सकते), और उन्हें क्या मदद मिलती है, जैसे संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी उच्चायुक्त से।

आओ कुछ करके सीखें

प्र. https://en.unesco.org/themes/gced और https://www.gcedclearinghouse.org से विश्व नागरिकता शिक्षा (GCED) के बारे में पता करें।

उत्तर: यह खोज की गतिविधि है। विश्व नागरिकता शिक्षा को यूनेस्को बढ़ावा देता है; इसका उद्देश्य है कि शिक्षार्थी वैश्विक मुद्दों को समझें, ख़ुद को व्यापक मानव समुदाय का सदस्य मानें, मानवाधिकार, विविधता और शांति का सम्मान करें, और सीमाओं के पार की समस्याओं पर काम करने को तैयार हों। इसे अध्याय से जोड़िए: विश्व नागरिकता राष्ट्रीय नागरिकता की जगह नहीं लेती, बल्कि याद दिलाती है कि राष्ट्रीय नागरिकता को इस समझदारी से जोड़ने की ज़रूरत है कि हम अंतर्संबद्ध विश्व में रहते हैं, और राष्ट्रीय सीमाओं के पार के लोगों और सरकारों के साथ काम करने के लिए तैयार रहना है।