1 न्याय क्या है?
प्रेम की तरह न्याय को भी ठीक-ठीक परिभाषित करना कठिन है, फिर भी हम सहज रूप से समझते हैं कि न्याय का क्या मतलब है। हर इंसान अपने लिए और कुछ हद तक दूसरों के लिए भी न्याय चाहता है। लेकिन प्रेम केवल उन थोड़े-से लोगों से जुड़ा है जिन्हें हम अच्छी तरह जानते हैं, जबकि न्याय का सरोकार पूरे समाज में जीवन को व्यवस्थित करने के उन नियमों से है, जिनके ज़रिए समाज के सदस्यों के बीच सामाजिक लाभ और सामाजिक कर्त्तव्यों का बंटवारा होता है। यही कारण है कि न्याय के प्रश्न राजनीति के लिए केंद्रीय महत्त्व के हैं।
हर संस्कृति ने अपने ढंग से न्याय के प्रश्न से जूझा है। प्राचीन भारतीय समाज में न्याय धर्म से जुड़ा था, और धर्म या न्यायोचित सामाजिक व्यवस्था बनाए रखना राजा का प्रथम कर्त्तव्य माना जाता था।
चीन के दार्शनिक कन्फ़्यूशस का तर्क था कि राजा को गलत करने वालों को दंडित करके और भले लोगों को पुरस्कृत करके न्याय कायम रखना चाहिए।
ईसा पूर्व चौथी सदी के एथेंस (यूनान) में प्लेटो ने अपनी पुस्तक “द रिपब्लिक” में न्याय के मुद्दों पर चर्चा की। सुकरात और उनके युवा मित्रों ग्लाउकॉन और एडीमंटस के बीच एक लंबी वार्ता के ज़रिए प्लेटो ने दिखाया कि हमारा न्याय से सरोकार क्यों होना चाहिए। युवाओं ने तर्क दिया कि जो अन्यायी हैं, वे अक्सर न्यायी लोगों से ज़्यादा सफल दिखते हैं क्योंकि वे कानून तोड़ते-मरोड़ते हैं, कर चुकाने से बचते हैं और झूठ-धोखे का सहारा लेते हैं।
सुकरात ने उन्हें याद दिलाया कि यदि हर कोई अन्यायी हो जाए, तो कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा, इसलिए न्यायी बने रहना हमारे अपने दीर्घकालिक हित में है। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्याय का मतलब सिर्फ़ मित्रों का भला और शत्रुओं का बुरा करना नहीं, बल्कि तमाम लोगों की भलाई है, ठीक वैसे ही जैसे एक डॉक्टर अपने सभी मरीज़ों की भलाई की चिंता करता है।
“वे कहते हैं कि अन्याय करना, स्वभाविक रूप से अच्छा है और दुष्टता झेलना बुरा। लेकिन यह भी कि भलाई की तुलना में दुष्टता बड़ी है। और इसीलिए जब लोग अन्याय करने और झेलने, दोनों का अनुभव प्राप्त करते हैं, जब वे किसी एक से बचने और दूसरे को पाने में सफल नहीं होते, तब वे सोचते हैं कि दोनों में से कुछ भी न होने के लिए आपस में समझौता करना बेहतर होता। यहाँ से कानून और आपसी प्रसंविदाएँ बनती हैं। और जो कुछ कानून के द्वारा किया जाता है, उसे ही कानूनसम्मत और न्यायोचित कहा जाता है।”
– ग्लाउकॉन से सुकरात, “रिपब्लिक” में
यह विचार कि न्याय में हर व्यक्ति को उसका प्राप्य देना शामिल है, आज भी न्याय की हमारी समझ का महत्त्वपूर्ण अंग है। लेकिन प्लेटो के ज़माने से आज यह समझ बदल चुकी है कि किसी व्यक्ति का प्राप्य, यानी जो उसे वाजिब रूप से मिलना चाहिए, क्या है। जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट के अनुसार हर मनुष्य की गरिमा होती है। अगर सभी व्यक्तियों की गरिमा स्वीकृत है, तो हर एक का प्राप्य यह होगा कि उसे अपनी प्रतिभा विकसित करने और अपने लक्ष्य पूरा करने का अवसर मिले। इसीलिए न्याय के लिए ज़रूरी है कि हम तमाम व्यक्तियों को समुचित और बराबर अहमियत दें।

2 समान बरताव का सिद्धांत
आधुनिक समाज में इस बात पर व्यापक सहमति है कि सभी लोग समान महत्त्व के हैं, लेकिन यह तय करना आसान नहीं कि हर व्यक्ति को उसका प्राप्य कैसे दिया जाए। इसके लिए पहला सिद्धांत है समकक्षों के साथ समान बरताव : सभी व्यक्ति मनुष्य होने के नाते कुछ समान विशेषताएँ रखते हैं, इसलिए वे समान अधिकार और समान बरताव के अधिकारी हैं।
समान अधिकारों के अलावा, समान बरताव के सिद्धांत के लिए ज़रूरी है कि लोगों के साथ वर्ग, जाति, नस्ल या लिंग के आधार पर भेदभाव न हो। उन्हें उनके काम और कार्यकलापों के आधार पर आँका जाना चाहिए, न कि इस आधार पर कि वे किस समुदाय के सदस्य हैं।
अगर भिन्न जातियों के दो व्यक्ति एक जैसा काम करते हैं, चाहे वह पत्थर तोड़ना हो या पिज़्ज़ा पहुँचाना, तो उन्हें समान पारिश्रमिक मिलना चाहिए। यदि एक व्यक्ति को उसी काम के लिए सौ रुपये और दूसरे को केवल पिचहत्तर रुपये इसलिए मिलते हैं क्योंकि वे भिन्न जातियों के हैं, तो यह अनुचित और अन्यायपूर्ण है। इसी तरह, यदि स्कूल में पुरुष शिक्षक को महिला शिक्षक से ज़्यादा वेतन मिलता है, तो यह फ़र्क भी नाजायज़ और ग़लत है।
3 समानुपातिक न्याय
समान बरताव न्याय का एकमात्र सिद्धांत नहीं है। ऐसी परिस्थितियाँ हो सकती हैं जिनमें सबके साथ बिल्कुल समान बरताव करना ही अन्याय लगे। सोचिए, अगर आपके स्कूल में यह फ़ैसला हो कि परीक्षा देने वाले सभी छात्रों को बराबर अंक मिलेंगे क्योंकि वे एक ही स्कूल के छात्र हैं और एक ही परीक्षा दे रहे हैं, तो कैसा लगेगा? यहाँ ज़्यादा उचित यही लगेगा कि छात्रों को उनकी उत्तर-पुस्तिकाओं की गुणवत्ता और प्रयास के अनुसार अंक मिलें।
दूसरे शब्दों में, सबको समान अधिकारों की एक ही शुरुआती रेखा से आरंभ करने के बाद, न्याय का मतलब होगा लोगों को उनके प्रयास के पैमाने और गुणवत्ता के अनुपात में पुरस्कृत करना। समान काम का समान दाम मिलना चाहिए, लेकिन मेहनत, कौशल और संभावित खतरे जैसे कारकों को देखते हुए अलग-अलग काम के लिए अलग-अलग पारिश्रमिक तय करना उचित और न्यायसंगत है।
खनिक, कुशल कारीगर या पुलिसकर्मी जैसे कभी-कभी ख़तरनाक लेकिन सामाजिक रूप से उपयोगी पेशों में लगे लोगों को अक्सर वह पारिश्रमिक नहीं मिलता, जो समाज के कुछ अन्य लोगों की कमाई की तुलना में न्यायोचित हो। इसीलिए समाज में न्याय के लिए समान बरताव के सिद्धांत को समानुपातिकता के सिद्धांत के साथ संतुलित करने की ज़रूरत है।
4 विशेष ज़रूरतों की पहचान
न्याय का तीसरा सिद्धांत यह है कि समाज को पारिश्रमिक या कर्त्तव्यों का वितरण करते समय लोगों की विशेष ज़रूरतों का ध्यान रखना चाहिए। यह सिद्धांत समान बरताव के सिद्धांत का खंडन नहीं, बल्कि उसका विस्तार है, क्योंकि समान बरताव के सिद्धांत में ही यह अंतर्निहित है कि जो लोग कुछ महत्त्वपूर्ण संदर्भों में समान नहीं हैं, उनके साथ भिन्न ढंग से बरताव किया जाए। शारीरिक विकलांगता, उम्र, या अच्छी शिक्षा-स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँच न होना, कुछ ऐसे कारक हैं जिन्हें अनेक देशों में विशेष बरताव का आधार माना जाता है।
नीचे दी गई स्थितियों की जाँच करें और बताएँ कि इनमें न्याय का कौन-सा सिद्धांत काम कर रहा है:
- दृष्टिहीन छात्र सुरेश को गणित का प्रश्नपत्र हल करने के लिए साढ़े तीन घंटे मिलते हैं, जबकि बाकी सभी छात्रों को केवल तीन घंटे।
- गीता बैसाखी की सहायता से चलती है। अध्यापिका ने उसे भी गणित के प्रश्नपत्र के लिए साढ़े तीन घंटे देने का निश्चय किया।
- एक अध्यापक कक्षा के कमज़ोर छात्रों का मनोबल बढ़ाने के लिए उन्हें कुछ अतिरिक्त अंक देता है।
- एक प्रोफ़ेसर अलग-अलग छात्राओं को उनकी क्षमताओं के मूल्यांकन के आधार पर अलग-अलग प्रश्नपत्र बाँटती हैं।
- संसद में एक प्रस्ताव विचाराधीन है कि संसद की कुल सीटों में से एक तिहाई (33 प्रतिशत) महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी जाएँ।
हमारे देश में अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य और ऐसी अन्य सुविधाओं तक पहुँच का अभाव अक्सर जाति-आधारित सामाजिक भेदभाव से जुड़ा पाया जाता है। इसीलिए संविधान में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोगों के लिए सरकारी नौकरियों तथा शैक्षणिक संस्थानों में दाख़िले के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है।
अध्याय का एक कार्टून पूछता है: “न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी क्यों बँधी है?” जवाब मिलता है: “न्याय की देवी आँखों पर पट्टी इसलिए बाँधे रखती है क्योंकि उसे निष्पक्ष रहना है।” पहला पात्र फिर कहता है: “बिल्कुल ठीक, उसे निष्पक्ष रहना है। लेकिन अगर वह आँखों पर पट्टी बाँधे रहेगी तो लोगों की विशेष ज़रूरतों को कैसे देखेगी?” यह संवाद ठीक इसी अध्याय की मूल समस्या दिखाता है : निष्पक्षता (समान बरताव) और विशेष ज़रूरतों की पहचान, दोनों को साथ साधना आसान नहीं।
न्याय के इन तीन सिद्धांतों, समान बरताव, प्रयास-कौशल की पहचान और न्यूनतम ज़रूरतमंदों को अवसर देना, के बीच सामंजस्य बिठाना सरकारों के लिए हमेशा आसान नहीं होता। समान बरताव पर ज़्यादा ज़ोर कभी-कभी योग्यता को उचित प्रतिफल देने के ख़िलाफ़ जा सकता है, जबकि योग्यता को ही मुख्य सिद्धांत मानने पर हाशिये पर खड़े तबके कई क्षेत्रों में वंचित रह सकते हैं क्योंकि उनकी अच्छे पोषण और शिक्षा तक पहुँच ही नहीं रही।
5 न्यायपूर्ण बंटवारा और रॉल्स का सिद्धांत
सामाजिक न्याय पाने के लिए सरकारों को सिर्फ़ यह सुनिश्चित करना काफ़ी नहीं कि कानून और नीतियाँ सभी पर निष्पक्ष रूप से लागू हों। सामाजिक न्याय का सरोकार वस्तुओं और सेवाओं के न्यायोचित वितरण से भी है, चाहे यह राष्ट्रों के बीच हो या किसी समाज के अंदर विभिन्न समूहों और व्यक्तियों के बीच। यदि समाज में गंभीर आर्थिक या सामाजिक असमानताएँ हों, तो नागरिकों को जीने का समतल धरातल देने के लिए कुछ प्रमुख संसाधनों का पुनर्वितरण ज़रूरी हो सकता है।
हमारे देश में सामाजिक समानता को बढ़ावा देने के लिए संविधान ने छुआछूत की प्रथा का उन्मूलन किया, ताकि “निचली” कही जाने वाली जातियों के लोगों को मंदिरों में प्रवेश, नौकरी और पानी जैसी बुनियादी ज़रूरतों से रोका न जा सके। विभिन्न राज्य सरकारों ने ज़मीन जैसे महत्त्वपूर्ण संसाधन के अधिक न्यायपूर्ण वितरण के लिए भूमि-सुधार लागू किए हैं। ऐसे प्रश्नों पर मतभेद अक्सर समाज में तीव्र भावावेश और कभी-कभी हिंसा तक पैदा करते हैं, क्योंकि लोगों को लगता है कि उनके और उनके परिवार का भविष्य दांव पर है, जैसा शिक्षा या नौकरियों में सीट-आरक्षण के प्रस्तावों पर हमारे देश में देखा गया है।
5.1 रॉल्स का न्याय सिद्धांत : अज्ञानता का आवरण
राजनीतिक दार्शनिक जॉन रॉल्स ने तर्क दिया है कि समाज के न्यूनतम सुविधा-प्राप्त सदस्यों की मदद करने की ज़रूरत को स्वीकार करने का एक युक्तिसंगत औचित्य है। रॉल्स के अनुसार निष्पक्ष और न्यायसंगत नियम तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता यह है कि हम ख़ुद को ऐसी परिस्थिति में कल्पित करें जहाँ हमें यह तय करना है कि समाज कैसे संगठित हो, जबकि हमें यह पता ही नहीं कि उस समाज में हमारी अपनी जगह क्या होगी : हम किस परिवार में जन्म लेंगे, “ऊँची” जाति में या “निचली” जाति में, धनी होंगे या ग़रीब, सुविधासंपन्न होंगे या सुविधाहीन।
रॉल्स के अनुसार, जब हम अपनी भावी सामाजिक स्थिति के बारे में पूरी तरह अनजान होकर (“अज्ञानता के आवरण” में) समाज के नियम तय करते हैं, तो हर व्यक्ति अपने ही स्वार्थ में यह सोचकर निर्णय लेगा कि “अगर मैं समाज के सबसे वंचित तबके में पैदा हुआ तो?” इसलिए वह ऐसे नियम चाहेगा जो कमज़ोर तबके के लिए भी उचित अवसर सुनिश्चित करें। इस तरह निष्पक्षता विवेकसम्मत स्व-हित से निकलती है, न कि परोपकार या नैतिकता से।
रॉल्स का यह तर्क इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह लोगों से असाधारण त्याग या परोपकार की अपेक्षा नहीं करता, केवल इतना कि वे विवेकशील स्वार्थ से सोचें। चूँकि कोई नहीं जानता कि वह अंततः किस स्थिति में होगा, इसलिए वह ऐसी नीतियाँ चाहेगा जो समाज के सबसे बुरी स्थिति वाले व्यक्ति की भी रक्षा करें, साथ ही समाज के बेहतर स्थिति वाले सदस्यों को भी कमज़ोर न बनाएँ। इस तरह पूरे समाज को लाभ पहुँचाने वाली नीतियाँ ही विवेकसम्मत निष्पक्षता का परिणाम होती हैं।
इसलिए रॉल्स तर्क देते हैं कि नैतिकता नहीं, बल्कि विवेकशील चिंतन हमें समाज में लाभ और भार के वितरण के मामले में निष्पक्ष होकर विचार करने की ओर ले जाता है। उनके उदाहरण में हमारे पास पहले से बना-बनाया कोई लक्ष्य या नैतिकता के प्रतिमान नहीं होते, और अपने लिए सबसे अच्छा क्या है, यह तय करने के लिए हम स्वतंत्र होते हैं। यही विश्वास रॉल्स के सिद्धांत को निष्पक्षता और न्याय के प्रश्न को हल करने का महत्त्वपूर्ण और सबल रास्ता बनाता है।
अध्याय का एक कार्टून पूछता है कि लोग ऐसा क्यों कहते हैं कि न्याय में देर होना, अंधेर होना है। अगर किसी विवाद में फ़ैसला बहुत देर से होता है, तो हो सकता है कि पीड़ित व्यक्ति को क़ानूनी कार्यवाही से कोई लाभ ही न मिले : मरने के बाद अपने पक्ष में आए फ़ैसले का क्या फ़ायदा? जो राहत इतनी देर से मिले कि काम ही न आए, वह व्यक्ति को उसका प्राप्य नहीं देती, इसलिए बहुत देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है।
6 सामाजिक न्याय का अनुसरण : मुक्त बाज़ार बनाम राज्य का हस्तक्षेप
अगर किसी समाज में धन-संपत्ति और सत्ता का उपभोग करने वालों तथा बहिष्कृत-वंचितों के बीच गहरी और स्थायी खाई हो, तो हम कहेंगे कि वहाँ सामाजिक न्याय का अभाव है। न्याय के लिए लोगों के रहन-सहन में पूर्ण समानता या एकरूपता ज़रूरी नहीं, लेकिन उस समाज को अन्यायपूर्ण माना जाएगा जहाँ धनी और ग़रीब के बीच खाई इतनी गहरी हो कि वे मानो अलग-अलग दुनिया में रहते हों, और वंचितों के पास अपनी स्थिति सुधारने का कोई मौका ही न हो। इसलिए एक न्यायपूर्ण समाज को लोगों को स्वस्थ और सुरक्षित जीवन जीने तथा अपनी प्रतिभा विकसित करने के लिए न्यूनतम बुनियादी शर्तें ज़रूर मुहैया करानी चाहिए।
विभिन्न सरकारों और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने बुनियादी ज़रूरतों की गणना के लिए तरीक़े विकसित किए हैं। आमतौर पर इस पर सहमति है कि पोषण की बुनियादी मात्रा, आवास, शुद्ध पेयजल, शिक्षा और न्यूनतम मज़दूरी इन बुनियादी शर्तों का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। लेकिन सभी नागरिकों को यह सुनिश्चित करना, ख़ासकर भारत जैसे देश में जहाँ ग़रीबों की बड़ी तादाद है, सरकार पर भारी बोझ बन सकता है।
मुक्त बाज़ार बनाम राज्य का हस्तक्षेप
भले ही यह सहमति बन जाए कि राज्य को समाज के सबसे वंचित सदस्यों की मदद करनी चाहिए, इस बात पर असहमति बनी रह सकती है कि यह कैसे किया जाए। यही आज की सबसे बड़ी बहस है :
मुक्त बाज़ार का पक्ष
- व्यक्तियों को संपत्ति अर्जित करने और मूल्य-मज़दूरी-मुनाफ़े पर स्वतंत्र रूप से समझौता करने की छूट
- तर्क: बाज़ार जाति-धर्म-लिंग नहीं देखता, केवल योग्यता और कौशल देखता है
- तर्क: बाज़ार उपभोक्ता को ज़्यादा विकल्प देता है
राज्य के हस्तक्षेप का पक्ष
- निजी एजेंसियाँ दूर-दराज़ या कम-मुनाफ़े वाले इलाकों में सेवाएँ देने से बचती हैं, तो सरकार को क़दम रखना पड़ता है
- तर्क: मुक्त बाज़ार अक्सर पहले से सुविधासंपन्न लोगों के पक्ष में काम करता है
- तर्क: निजी सेवाएँ अच्छी हो सकती हैं, पर उनकी क़ीमत ग़रीबों की पहुँच से बाहर हो सकती है
मुक्त बाज़ार के सभी समर्थक आज पूर्णतया अप्रतिबंधित बाज़ार का समर्थन नहीं करेंगे। कई लोग अब यह मानने को तैयार हैं कि राज्य सबको समान शर्तों पर प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाने के लिए न्यूनतम बुनियादी जीवन-मानक सुनिश्चित करे। लेकिन वे तर्क कर सकते हैं कि यहाँ भी स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा जैसी सेवाओं के लिए बाज़ार को विकसित होने देना ही इन बुनियादी सेवाओं की आपूर्ति का सबसे कारगर तरीक़ा है : ऐसी सेवाएँ देने के लिए निजी एजेंसियों को प्रोत्साहित किया जाए, जबकि राज्य की नीतियाँ लोगों को ये सेवाएँ ख़रीदने के लिए सशक्त बनाएँ। राज्य उन वृद्धों और रोगियों को विशेष सहायता भी दे सकता है जो प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते, लेकिन इसके आगे राज्य की भूमिका केवल नियम-कानून का ढाँचा बनाए रखने तक सीमित रहनी चाहिए। दूसरी ओर, जो लोग राज्य के हस्तक्षेप का समर्थन करते हैं, वे बताते हैं कि निजी व्यवसाय सबसे ज़्यादा मुनाफ़े वाले इलाकों की ओर ही जाता है, इसलिए मुक्त बाज़ार अक्सर ताक़तवर, धनी और प्रभावशाली लोगों के हित में काम करता है।
लोकतांत्रिक समाज में वितरण और न्याय के मुद्दों पर असहमतियाँ स्वाभाविक हैं, क्योंकि वे हमें अलग-अलग नज़रियों की जाँच-परख करने और अपने विचारों का विवेकसम्मत ढंग से बचाव करने को बाध्य करती हैं। इन्हीं असहमतियों के बीच वाद-विवाद के ज़रिए राह निकालना ही राजनीति है।
विभिन्न सरकारी और संयुक्त राष्ट्र संघ की इकाइयों ने भोजन, आय और पानी जैसी सुविधाओं की न्यूनतम आवश्यकता की गणना की है। अपने स्कूल की लाइब्रेरी या इंटरनेट पर ऐसी गणनाओं को खोजें और देखें कि आपके राज्य के लिए ये आँकड़े क्या कहते हैं।
“न्यायपूर्ण समाज वह है, जिसमें परस्पर सम्मान की बढ़ती हुई भावना और अपमान की घटती हुई भावना मिलकर एक करुणा से भरे समाज का निर्माण करें।”
– डॉ. भीम राव अंबेडकर
“न्याय में ऐसा कुछ अंतर्निहित है जिसे करना न सिर्फ़ सही है और न करना सिर्फ़ ग़लत, बल्कि जिस पर बतौर अपने नैतिक अधिकार कोई व्यक्ति विशेष हमसे दावा जता सकता है।”
– जे.एस. मिल
- न्याय का मतलब है हर व्यक्ति को उसका प्राप्य देना, इस प्राप्य का अर्थ प्लेटो के समय से आज तक बदल चुका है
- न्याय के तीन सिद्धांत : समान बरताव, समानुपातिक न्याय, विशेष ज़रूरतों की पहचान; सरकार को इनमें सामंजस्य बिठाना पड़ता है, क्योंकि ये कभी-कभी एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े हो सकते हैं
- सामाजिक न्याय के लिए केवल कानूनी समानता काफ़ी नहीं, संसाधनों के न्यायोचित पुनर्वितरण की भी ज़रूरत है (छुआछूत उन्मूलन, भूमि-सुधार, आरक्षण)
- रॉल्स का “अज्ञानता का आवरण” : भावी सामाजिक स्थिति अज्ञात होने पर हर व्यक्ति विवेकसम्मत स्वार्थ से ही सबसे वंचित तबके का हित सोचेगा
- न्यूनतम बुनियादी ज़रूरतें : पोषण, आवास, स्वच्छ जल, शिक्षा, न्यूनतम मज़दूरी
- मुक्त बाज़ार बनाम राज्य-हस्तक्षेप की बहस : दोनों पक्षों के तर्क हैं, पर मुक्त बाज़ार अक्सर पहले से सुविधासंपन्न लोगों के पक्ष में काम करता है
- क्या मुझे न्याय के तीनों सिद्धांत अलग-अलग उदाहरण सहित याद हैं?
- क्या मैं समझा सकता हूँ कि “अज्ञानता का आवरण” कैसे काम करता है और यह विवेकसम्मत स्वार्थ पर क्यों टिका है?
- क्या मुझे भारत में उठाए गए तीन क़दम (छुआछूत उन्मूलन, आरक्षण, राज्य सरकारों द्वारा भूमि-सुधार) याद हैं?
- क्या मुझे मुक्त बाज़ार और राज्य-हस्तक्षेप, दोनों पक्षों के कम-से-कम दो-दो तर्क याद हैं?
- क्या मुझे अंबेडकर और मिल, दोनों की न्याय की परिभाषा शब्दशः याद है?