इस अध्याय का संक्षिप्त सार, अंतिम समय के रिवीज़न के लिए: विचारक, उद्धरण, परिभाषाएँ और तुलना-सारणियाँ। पूरे नोट्स अलग से पढ़ने के लिए उपलब्ध हैं।
1 न्याय के तीन सिद्धांत, एक सारणी में
| सिद्धांत | मुख्य विचार | उदाहरण |
|---|---|---|
| समान बरताव | वर्ग, जाति, नस्ल, लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं | समान काम का समान दाम |
| समानुपातिक न्याय | प्रयास और कौशल के अनुपात में पुरस्कार | उत्तर-पुस्तिका की गुणवत्ता के अनुसार अंक |
| विशेष ज़रूरतों की पहचान | असमान परिस्थिति वालों को अतिरिक्त सहायता | दिव्यांग छात्र को अतिरिक्त समय, आरक्षण |
2 उद्धरण और विचारक, याद रखने लायक़
किसने क्या कहा
कन्फ़्यूशसराजा को गलत करने वालों को दंडित करके, भले लोगों को पुरस्कृत करके न्याय कायम रखना चाहिए
प्लेटो, “द रिपब्लिक”सुकरात-ग्लाउकॉन-एडीमंटस के संवाद से न्याय की पड़ताल
इमैनुएल कांटहर मनुष्य की गरिमा है, इसलिए हर एक को प्रतिभा-विकास और लक्ष्य-पूर्ति का अवसर मिलना चाहिए
जॉन रॉल्स“अज्ञानता का आवरण”: भावी सामाजिक स्थिति अज्ञात होने पर विवेकसम्मत स्वार्थ ही निष्पक्ष नियम चुनता है
डॉ. भीम राव अंबेडकर“न्यायपूर्ण समाज वह है, जिसमें परस्पर सम्मान की बढ़ती हुई भावना और अपमान की घटती हुई भावना मिलकर एक करुणा से भरे समाज का निर्माण करें।”
जे.एस. मिल“न्याय में ऐसा कुछ अंतर्निहित है जिसे करना न सिर्फ़ सही है और न करना सिर्फ़ ग़लत, बल्कि जिस पर बतौर अपने नैतिक अधिकार कोई व्यक्ति विशेष हमसे दावा जता सकता है।”
3 रॉल्स का तर्क, तीन पंक्तियों में
ख़ुद को “अज्ञानता के आवरण” में कल्पित करो, यानी यह न जानते हुए कि भावी समाज में तुम्हारी अपनी जगह क्या होगी। तब हर कोई विवेकसम्मत स्वार्थ से यही सोचेगा, “अगर मैं वंचित तबके में पैदा हुआ तो?” इसलिए वह ऐसे नियम चुनेगा जो सबसे कमज़ोर तबके की भी रक्षा करें, यह निष्पक्षता परोपकार से नहीं, विवेक से निकलती है।
4 परिभाषाएँ, ठीक उसी तरह जैसे लिखी जानी चाहिए
सभी परिभाषाएँ एक जगह
वितरणात्मक न्यायसमाज के लाभों और कर्त्तव्यों का सदस्यों के बीच न्यायोचित बंटवारा
अज्ञानता का आवरणरॉल्स की कल्पित स्थिति जिसमें व्यक्ति को अपनी भावी सामाजिक स्थिति का पता नहीं होता
मुक्त बाज़ारवह व्यवस्था जिसमें व्यक्ति राज्य के हस्तक्षेप के बिना संपत्ति, मूल्य और मज़दूरी पर स्वतंत्र रूप से समझौता करते हैं
न्यूनतम बुनियादी ज़रूरतेंपोषण, आवास, शुद्ध पेयजल, शिक्षा और न्यूनतम मज़दूरी
5 दो पक्षों की बहस, मत मिलाएँ
5.1 मुक्त बाज़ार बनाम राज्य का हस्तक्षेप
मुक्त बाज़ार के समर्थक
- बाज़ार जाति-धर्म-लिंग नहीं, केवल योग्यता देखता है
- ज़्यादा विकल्प देता है
- राज्य की भूमिका सिर्फ़ नियम-कानून के ढाँचे तक सीमित हो
राज्य-हस्तक्षेप के समर्थक
- मुक्त बाज़ार अक्सर पहले से सुविधासंपन्न लोगों के पक्ष में काम करता है
- निजी सेवाएँ दूर-दराज़/ग़रीब इलाकों में नहीं पहुँचतीं
- राज्य को न्यूनतम बुनियादी सुविधाएँ सुनिश्चित करनी चाहिए
5.2 भारत में उठाए गए तीन ठोस क़दम
छुआछूत की प्रथा का उन्मूलन, अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण, और राज्यों द्वारा ज़मीन के न्यायपूर्ण बँटवारे के लिए भूमि-सुधार।
आख़िरी दोहराव
- न्याय के तीन सिद्धांत: समान बरताव, समानुपातिक न्याय, विशेष ज़रूरतों की पहचान; सरकार को इनमें सामंजस्य बिठाना पड़ता है, क्योंकि ये कभी-कभी एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े हो सकते हैं
- रॉल्स का अज्ञानता का आवरण: भावी स्थिति अज्ञात होने पर विवेकसम्मत स्वार्थ ही निष्पक्ष नियम चुनता है
- न्यूनतम बुनियादी ज़रूरतें: पोषण, आवास, स्वच्छ जल, शिक्षा, न्यूनतम मज़दूरी
- मुक्त बाज़ार बनाम राज्य-हस्तक्षेप: दोनों के तर्क, पर बाज़ार अक्सर सुविधासंपन्न के पक्ष में झुकता है
- भारत में उठाए गए तीन क़दम: छुआछूत उन्मूलन और आरक्षण (संविधान द्वारा), भूमि-सुधार (राज्य सरकारों द्वारा)
- अंबेडकर और मिल की परिभाषाएँ शब्दशः याद रखें
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