NCERT की पाठ्यपुस्तक राजनीतिक सिद्धांत के अध्याय 4 «सामाजिक न्याय» की प्रश्नावली के सभी छह प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। अध्याय के भीतर छपे प्रश्न (चिंतन-मंथन, दोनों कार्टून और आओ कुछ करके सीखें) अंत में हल किए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
1 प्राप्य देने का अर्थ और उसका बदलता स्वरूप
प्र. हर व्यक्ति को उसका प्राप्य देने का क्या मतलब है? हर किसी को उसका प्राप्य देने का मतलब समय के साथ-साथ कैसे बदला?
उत्तर: हर व्यक्ति को उसका प्राप्य देने का मतलब है हर व्यक्ति को वह देना जो उसे वाजिब रूप से मिलना चाहिए। प्लेटो के विवरण में, जैसे एक अच्छा डॉक्टर अपने मरीज़ों की भलाई की चिंता करता है, वैसे ही न्यायसंगत शासक या सरकार को जनता की भलाई की चिंता करनी चाहिए, और जनता की भलाई सुनिश्चित करने में हर व्यक्ति को उसका प्राप्य देना शामिल है। यह विचार प्लेटो के समय से ही न्याय की समझ का केंद्रीय हिस्सा रहा है, लेकिन किसी व्यक्ति का प्राप्य क्या है, यह समझ समय के साथ बदल चुकी है।
आज, जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट के विचार के अनुसार, हमारी समझ इस बात से गहरे जुड़ गई है कि मनुष्य होने के नाते हर व्यक्ति का प्राप्य क्या है। कांट के अनुसार हर मनुष्य की गरिमा होती है, इसलिए अगर सभी व्यक्तियों की गरिमा स्वीकृत है, तो हर एक का प्राप्य यह है कि उसे अपनी प्रतिभा विकसित करने और अपने चुने हुए लक्ष्य पूरा करने का अवसर मिले। इस तरह न्याय के लिए अब ज़रूरी है कि हम तमाम व्यक्तियों को समुचित और बराबर की अहमियत दें।
2 न्याय के तीन सिद्धांत
प्र. अध्याय में दिए गए न्याय के तीन सिद्धांतों की संक्षेप में चर्चा करो। प्रत्येक को उदाहरण के साथ समझाइये।
उत्तर:
1. समान बरताव का सिद्धांत: सभी व्यक्ति मनुष्य होने के नाते समान अधिकार और समान बरताव के अधिकारी हैं, इसलिए वर्ग, जाति, नस्ल या लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। उदाहरण: अगर भिन्न जातियों के दो व्यक्ति एक ही काम (जैसे पत्थर तोड़ना) करते हैं, तो उन्हें समान पारिश्रमिक मिलना चाहिए, सौ रुपये और पिचहत्तर रुपये का भेद अन्यायपूर्ण होगा।
2. समानुपातिक न्याय: कभी-कभी सबके साथ बिल्कुल समान बरताव ही अन्याय होगा, क्योंकि प्रयास, कौशल या जोखिम में अंतर होता है। उदाहरण: परीक्षा में सबको बराबर अंक देने के बजाय उत्तर-पुस्तिका की गुणवत्ता और प्रयास के अनुसार अंक देना ज़्यादा न्यायसंगत है, ठीक वैसे ही जैसे खनिकों या पुलिसकर्मियों को उनके काम के जोखिम को ध्यान में रखते हुए पारिश्रमिक मिलना चाहिए।
3. विशेष ज़रूरतों की पहचान: समाज को कुछ लोगों की विशेष ज़रूरतों (जैसे दिव्यांगता) का ध्यान रखते हुए उन्हें अतिरिक्त सहायता देनी चाहिए। उदाहरण: दृष्टिहीन छात्र सुरेश को परीक्षा के लिए अतिरिक्त आधा घंटा देना, या अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण।
3 विशेष ज़रूरतें बनाम समान बरताव
प्र. क्या विशेष ज़रूरतों का सिद्धांत सभी के साथ समान बरताव के सिद्धांत के विरुद्ध है?
उत्तर: नहीं, ये दोनों सिद्धांत एक-दूसरे के विपरीत नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। विशेष ज़रूरतों को ध्यान में रखने का सिद्धांत समान बरताव के सिद्धांत का खंडन नहीं करता, बल्कि उसका विस्तार करता है, क्योंकि समान बरताव के सिद्धांत में यह बात पहले से ही अंतर्निहित है कि जो लोग कुछ महत्त्वपूर्ण संदर्भों में समान नहीं हैं (जैसे दिव्यांगता, आयु या वंचना के कारण), उनके साथ भिन्न ढंग से बरताव किया जाना चाहिए।
दृष्टिहीन छात्र सुरेश को गणित की परीक्षा के लिए अतिरिक्त समय देना समान बरताव के सिद्धांत को तोड़ता नहीं, बल्कि उसे सही मायने में लागू करता है, क्योंकि बाकी छात्रों के बराबर स्थिति में लाने के लिए ही यह अतिरिक्त सहायता ज़रूरी है। इसी तरह अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए आरक्षण भी समान बरताव के सिद्धांत को कमज़ोर नहीं करता, बल्कि उन असमानताओं की भरपाई करता है जो ऐतिहासिक भेदभाव से पैदा हुई हैं।
4 रॉल्स का “अज्ञानता का आवरण”
प्र. निष्पक्ष और न्यायपूर्ण वितरण को युक्तिसंगत आधार पर सही ठहराया जा सकता है। रॉल्स ने इस तर्क को आगे बढ़ाने में ‘अज्ञानता के आवरण’ के विचार का उपयोग किस प्रकार किया।
उत्तर: रॉल्स का तर्क है कि निष्पक्ष और न्यायसंगत नियम तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता यह है कि हम ख़ुद को ऐसी परिस्थिति में कल्पित करें जहाँ हमें समाज के नियम तय करने हैं, लेकिन हमें यह पता नहीं है कि उस भावी समाज में हमारी अपनी जगह क्या होगी, यानी हम किस परिवार में जन्म लेंगे, “ऊँची” जाति में या “निचली” जाति में, धनी होंगे या ग़रीब। इसी अज्ञानता की स्थिति को वे “अज्ञानता का आवरण” कहते हैं।
इस आवरण में हर व्यक्ति अपने ही स्वार्थ में सोचेगा, लेकिन चूँकि कोई नहीं जानता कि वह कौन होगा, इसलिए हर कोई यह मानकर चलेगा कि “अगर मैं समाज के सबसे वंचित तबके में पैदा हुआ तो?” इसलिए वह ऐसे नियम चाहेगा जो कमज़ोर तबके के लिए भी उचित अवसर सुनिश्चित करें, साथ ही समाज के बेहतर स्थिति वाले सदस्यों को भी कमज़ोर न बनाएँ। इस तरह निष्पक्षता किसी परोपकार या नैतिकता से नहीं, बल्कि विवेकसम्मत स्वार्थ से निकलती है, यही रॉल्स के सिद्धांत को युक्तिसंगत और सशक्त बनाता है।
5 न्यूनतम बुनियादी ज़रूरतें और सरकार की ज़िम्मेदारी
प्र. आम तौर पर एक स्वस्थ और उत्पादक जीवन जीने के लिए व्यक्ति की न्यूनतम बुनियादी ज़रूरतें क्या मानी गई है? इस न्यूनतम को सुनिश्चित करने में सरकार की क्या ज़िम्मेदारी है?
उत्तर: स्वस्थ और उत्पादक जीवन जीने के लिए आमतौर पर इन बुनियादी ज़रूरतों पर सहमति मानी जाती है: स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक पोषण की बुनियादी मात्रा, आवास, शुद्ध पेयजल की आपूर्ति, शिक्षा और न्यूनतम मज़दूरी। विभिन्न सरकारों और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इन ज़रूरतों की गणना के तरीक़े विकसित किए हैं।
लोगों को उनकी बुनियादी ज़रूरतें उपलब्ध कराना लोकतांत्रिक सरकार की ज़िम्मेदारी मानी जाती है, ताकि हर व्यक्ति स्वस्थ, सुरक्षित जीवन जी सके और अपनी प्रतिभा विकसित कर सके। हालाँकि, भारत जैसे देश में जहाँ ग़रीबों की बड़ी तादाद है, सभी नागरिकों के लिए इन बुनियादी शर्तों को सुनिश्चित करना सरकार पर भारी बोझ बन सकता है, इसलिए इसे कैसे पूरा किया जाए, इस पर मुक्त बाज़ार और राज्य-हस्तक्षेप के समर्थकों के बीच बहस चलती रहती है।
6 न्यूनतम बुनियादी ज़रूरतों के लिए राज्य की कार्यवाही का औचित्य
प्र. सभी नागरिकों को जीवन की न्यूनतम बुनियादी स्थितियाँ उपलब्ध कराने के लिए राज्य की कार्यवाई को निम्न में से कौन-से तर्क से वाजिब ठहराया जा सकता है?
(क) गरीब और ज़रूरतमंदों को निशुल्क सेवाएँ देना एक धर्म कार्य के रूप में न्यायोचित है।
(ख) सभी नागरिकों को जीवन का न्यूनतम बुनियादी स्तर उपलब्ध करवाना अवसरों की समानता सुनिश्चित करने का एक तरीका है।
(ग) कुछ लोग प्राकृतिक रूप से आलसी होते हैं और हमें उनके प्रति दयालु होना चाहिए।
(घ) सभी के लिए बुनियादी सुविधाएँ और न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित करना साझी मानवता और मानव अधिकारों की स्वीकृति है।
उत्तर: सही तर्क (ख) और (घ) हैं।
(ख) सही है क्योंकि न्यूनतम बुनियादी जीवन-स्तर के बिना लोग समान शर्तों पर प्रतिस्पर्धा ही नहीं कर सकते, इसलिए यह अवसरों की वास्तविक समानता सुनिश्चित करने की पहली शर्त है।
(घ) सही है क्योंकि यह अध्याय स्पष्ट करता है कि बुनियादी ज़रूरतों की गारंटी दान या दया का मामला नहीं, बल्कि हर मनुष्य की गरिमा (कांट) और साझी मानवता की स्वीकृति है।
(क) ग़लत है क्योंकि इसे “धर्म कार्य” या दान के रूप में देखना इसे एक अधिकार के बजाय ऐच्छिक दया बना देता है, जबकि अध्याय इसे न्याय का प्रश्न मानता है।
(ग) ग़लत है क्योंकि यह ग़रीबी को व्यक्ति की अपनी कमी (आलस) मान लेता है, जबकि अध्याय दिखाता है कि वंचना अक्सर सामाजिक और ऐतिहासिक भेदभाव (जैसे जाति) से जुड़ी होती है, व्यक्तिगत आलस से नहीं।
7 पाठ के बीच के प्रश्न
अध्याय के भीतर भी प्रश्न पूछे गए हैं: “चिंतन-मंथन” और “आओ कुछ करके सीखें” के बॉक्स में और दो कार्टूनों में। नीचे इन्हें किताब के क्रम में, हिंदी संस्करण के अपने शब्दों में, हल किया गया है।
प्र. नीचे दी गई स्थितियों की जाँच करें और बताएँ कि क्या वे न्यायसंगत हैं। अपने तर्क के साथ यह भी बताएँ कि प्रत्येक स्थिति में न्याय का कौन-सा सिद्धांत काम कर रहा है।
- एक दृष्टिहीन छात्र सुरेश को गणित का प्रश्न पत्र हल करने के लिए साढ़े तीन घंटे मिलते हैं, जबकि अन्य सभी छात्रों को केवल तीन घंटे। न्यायसंगत। यहाँ विशेष ज़रूरतों की पहचान का सिद्धांत काम कर रहा है: दृष्टिहीनता उसे प्रश्नपत्र हल करने में अलाभकारी स्थिति में डालती है, और अतिरिक्त समय उसे केवल बाक़ी कक्षा के बराबर लाता है। यह समान बरताव का खंडन नहीं, उसका विस्तार है।
- गीता बैसाखी की सहायता से चलती है। अध्यापिका ने गणित का प्रश्नपत्र हल करने के लिए उसे भी साढ़े तीन घंटे का समय देने का निश्चय किया। जैसा है, वैसा न्यायसंगत नहीं। बैसाखी से चलना गणित का प्रश्नपत्र लिखने की गति पर असर नहीं डालता, इसलिए यह इस काम से जुड़ी विशेष ज़रूरत नहीं है। उसे अतिरिक्त समय देना समकक्षों के साथ समान बरताव के सिद्धांत को तोड़ता है, क्योंकि जिस बात से यहाँ फ़र्क़ पड़ता है उसमें वह बाक़ी कक्षा के समान है। (विशेष सहायता उन्हीं असमानताओं के लिए उचित है जो सचमुच उस काम पर असर डालती हों।)
- एक अध्यापक कक्षा के कमज़ोर छात्रों के मनोबल को उठाने के लिए कुछ अतिरिक्त अंक देते हैं। न्यायसंगत नहीं। अंक उत्तर-पुस्तिका की गुणवत्ता और किए गए प्रयास को दर्शाने चाहिए, यही समानुपातिक न्याय है; अतिरिक्त अंक काम के अलावा किसी और बात का पुरस्कार हैं। कमज़ोर छात्रों को विशेष मदद (जैसे अतिरिक्त कक्षाएँ) मिल सकती है, पर बिना कमाए अंक नहीं।
- एक प्रोफ़ेसर अलग-अलग छात्राओं को उनकी क्षमताओं के मूल्यांकन के आधार पर अलग-अलग प्रश्नपत्र बाँटते हैं। न्यायसंगत नहीं। एक ही परीक्षा देने वाले छात्रों को एक ही प्रश्नपत्र पर आँका जाना चाहिए, यह समान बरताव का सिद्धांत है; अलग-अलग प्रश्नपत्रों से अंकों की तुलना संभव नहीं रहती और परिणाम पहले से ही परीक्षक की राय से तय हो जाता है।
- संसद में एक प्रस्ताव विचाराधीन है कि संसद की कुल सीटों में से एक तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी जाएँ। विशेष ज़रूरतों की पहचान के सिद्धांत से इसे न्यायसंगत ठहराया जा सकता है: संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम रहा है, और आरक्षण उन्हें राजनीतिक निर्णयों में उचित हिस्सा दिलाने में मदद करता है, ठीक वैसे ही जैसे संविधान में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण। विरोधी इसे समान बरताव से हटना मानते हैं, इसीलिए यह बहस का विषय है।
ये चर्चा वाले उत्तर हैं: किताब आपसे अपना तर्क देने को कहती है। सबसे ज़रूरी है न्याय के सही सिद्धांत (समान बरताव, समानुपातिक न्याय या विशेष ज़रूरतों की पहचान) का नाम लेना और उसे सही ढंग से लागू करना।
प्र. “न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी क्यों बँधी है?” “न्याय की देवी आँखों पर पट्टी इसलिए बाँधे रखती है क्योंकि उसे निष्पक्ष रहना है।” “बिल्कुल ठीक, उसे निष्पक्ष रहना है। लेकिन अगर वह आँखों पर पट्टी बाँधे रहेगी तो लोगों की विशेष ज़रूरतों को कैसे देखेगी?”
उत्तर: आँखों की पट्टी निष्पक्षता का प्रतीक है: न्याय इस बात से प्रभावित नहीं होना चाहिए कि व्यक्ति कौन है, यही समकक्षों के साथ समान बरताव का सिद्धांत है। दूसरे पात्र की शंका तीसरे सिद्धांत, विशेष ज़रूरतों की पहचान, की ओर इशारा करती है, जिसके लिए लोगों की अलग-अलग परिस्थितियों (जैसे विकलांगता, या अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँच का अभाव) को देखना ज़रूरी है। यह कार्टून अध्याय की इस बात को सामने रखता है कि सरकारें न्याय के सिद्धांतों के बीच सामंजस्य बिठाने में कठिनाई महसूस कर सकती हैं: केवल निष्पक्षता विशेष ज़रूरतों को अनदेखा कर सकती है, इसलिए न्यायपरक सरकार को दोनों में संतुलन बनाना पड़ता है।
प्र. मैंने सुना है कि न्याय में देर होना, अंधेर होना है। लोग ऐसा क्यों कहते हैं?
उत्तर: इसका उत्तर कार्टून में ही दिया गया है: क्योंकि यदि किसी विवाद में निर्णय बहुत देर से होता है तो हो सकता है कि पीड़ित व्यक्ति को क़ानूनी कार्यवाही से कोई लाभ न मिले। क्या ऐसा मुक़दमा जीतने का कोई फ़ायदा है जिसका फ़ैसला मरने के बाद आए? न्याय का अर्थ है हर व्यक्ति को उसका प्राप्य देना; जो राहत इतनी देर से मिले कि अन्याय झेलने वाले के काम ही न आए, वह व्यवहार में उसे कुछ नहीं देती, इसलिए बहुत देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है।
प्र. विभिन्न सरकारी और संयुक्त राष्ट्र संघ इकाइयों ने भोजन, आय और पानी जैसी सुविधाओं की न्यूनतम आवश्यकता की गणना की है। अपने स्कूल के पुस्तकालय या इंटरनेट से ऐसी गणनाओं की खोज करो।
उत्तर: यह खोज की गतिविधि है। न्यूनतम ज़रूरतों के सरकारी पैमाने खोजिए, जैसे भारत सरकार द्वारा न्यूनतम भोजन और अन्य ज़रूरी चीज़ों की लागत से तय की गई ग़रीबी रेखा, सरकार द्वारा अधिसूचित न्यूनतम मज़दूरी, और पोषण या प्रति व्यक्ति रोज़ाना पानी की ज़रूरत के बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के मानक। हर गणना किसने की और उसमें क्या-क्या शामिल है, यह लिखिए। फिर इसे अध्याय से जोड़िए: आम तौर पर यह माना जाता है कि स्वस्थ रहने के लिए ज़रूरी बुनियादी पोषण, आवास, शुद्ध पेयजल की आपूर्ति, शिक्षा और न्यूनतम मज़दूरी जीवन की बुनियादी स्थितियों का अहम हिस्सा हैं, और इन्हें उपलब्ध कराना लोकतांत्रिक सरकार की ज़िम्मेदारी मानी जाती है।