इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. न्याय के तीन सिद्धांतों में से कोई एक बताइए।
उत्तर: समान बरताव, समानुपातिक न्याय, या विशेष ज़रूरतों की पहचान में से कोई एक।
प्र. कन्फ़्यूशस के अनुसार राजा को न्याय कैसे कायम रखना चाहिए?
उत्तर: गलत करने वालों को दंडित करके और भले लोगों को पुरस्कृत करके।
प्र. रॉल्स की कल्पित स्थिति को क्या कहा जाता है?
उत्तर: अज्ञानता का आवरण।
प्र. प्लेटो ने न्याय पर चर्चा किस पुस्तक में की?
उत्तर: द रिपब्लिक में।
प्र. इमैनुएल कांट के अनुसार हर मनुष्य में क्या होता है?
उत्तर: गरिमा।
प्र. संविधान ने सामाजिक समानता के लिए किस प्रथा का उन्मूलन किया?
उत्तर: छुआछूत की प्रथा का।
प्र. संसद में महिलाओं के लिए कितने प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रस्ताव है?
उत्तर: 33 प्रतिशत (एक तिहाई)। (पुस्तक में यह एक प्रस्ताव के रूप में है; लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने वाला क़ानून 2023 में पारित हुआ।)
प्र. अध्याय के अनुसार बुनियादी ज़रूरतों की गणना करने वाले एक अंतरराष्ट्रीय संगठन का नाम बताइए।
उत्तर: विश्व स्वास्थ्य संगठन।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. सुरेश और गीता, दोनों को गणित का प्रश्नपत्र हल करने के लिए साढ़े तीन घंटे दिए गए। क्या दोनों स्थितियों में यह न्यायसंगत है?
उत्तर: सुरेश के लिए यह न्यायसंगत है : दृष्टिहीनता एक विशेष ज़रूरत है जो प्रश्नपत्र हल करने पर असर डालती है, इसलिए अतिरिक्त समय (विशेष ज़रूरतों की पहचान) उसे केवल बाक़ी छात्रों के बराबर लाता है। गीता के लिए, जैसा है वैसा, यह न्यायसंगत नहीं : बैसाखी से चलना लिखने की गति पर असर नहीं डालता, इसलिए जिस बात से यहाँ फ़र्क़ पड़ता है उसमें वह बाक़ी छात्रों के समान है, और यहाँ समकक्षों के साथ समान बरताव का सिद्धांत लागू होता है।
प्र. अध्याय के अनुसार समान बरताव और समानुपातिक न्याय में संतुलन क्यों ज़रूरी है?
उत्तर: अकेला समान बरताव हर तरह के काम के लिए एक जैसा पुरस्कार देगा और यह अनदेखा कर देगा कि खनिकों, कुशल शिल्पकारों या पुलिसकर्मियों जैसे कामों में अलग-अलग प्रयास, कौशल और ख़तरा लगता है। इसलिए अध्याय कहता है कि समाज में न्याय के लिए समान बरताव के सिद्धांत का समानुपातिकता के सिद्धांत के साथ संतुलन बिठाना ज़रूरी है।
प्र. मुक्त बाज़ार के समर्थक बाज़ार को न्यायपूर्ण क्यों मानते हैं?
उत्तर: उनका तर्क है कि बाज़ार व्यक्ति की जाति, धर्म या लिंग नहीं देखता, केवल उसकी प्रतिभा और कौशल देखता है, इसलिए बाज़ारी वितरण का जो भी परिणाम हो, वह न्यायसंगत होगा।
प्र. मुक्त बाज़ार की आलोचना में क्या तर्क दिए जाते हैं?
उत्तर: निजी व्यवसाय वहीं जाना चाहता है जहाँ सबसे ज़्यादा मुनाफ़ा मिले, इसलिए मुक्त बाज़ार अक्सर ताक़तवर और धनी लोगों के हित में काम करता है, जिससे कमज़ोर और दूर-दराज़ इलाक़ों को अच्छी सेवाएँ नहीं मिल पातीं।
प्र. न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी वाले कार्टून का क्या संदेश है?
उत्तर: आँखों पर पट्टी न्याय की देवी की निष्पक्षता दिखाती है, पर इससे यह सवाल उठता है कि पट्टी बाँधे रहने पर वह लोगों की विशेष ज़रूरतों को कैसे पहचानेगी, यानी निष्पक्षता और विशेष ज़रूरतों की पहचान में संतुलन कठिन है।
प्र. अज्ञानता के आवरण में व्यक्ति सबसे बुरी स्थिति से क्यों सोचता है?
उत्तर: क्योंकि उसे नहीं पता कि भावी समाज में वह ख़ुद कहाँ होगा, इसलिए विवेकसम्मत स्वार्थ में वह यह मानकर चलता है कि शायद वह ख़ुद ही सबसे वंचित तबके में पैदा हो, और इसीलिए ऐसे नियम चुनता है जो कमज़ोर तबके की भी रक्षा करें।
प्र. भारत में बुनियादी ज़रूरतें सुनिश्चित करना सरकार के लिए भारी बोझ क्यों बन सकता है?
उत्तर: भारत जैसे देश में ग़रीबों की बड़ी तादाद है, इसलिए सभी नागरिकों को पोषण, आवास, स्वच्छ जल, शिक्षा और न्यूनतम मज़दूरी जैसी बुनियादी ज़रूरतें उपलब्ध कराना सरकार पर आर्थिक रूप से भारी बोझ बन सकता है।
प्र. समानुपातिक न्याय के अनुसार खनिकों और पुलिसकर्मियों के वेतन पर क्या तर्क दिया गया है?
उत्तर: खनिक, कुशल कारीगर और पुलिसकर्मी जैसे कभी-कभी ख़तरनाक पर सामाजिक रूप से उपयोगी पेशों में लगे लोगों को अक्सर वह पारिश्रमिक नहीं मिलता, जो उनके काम के जोखिम और महत्त्व को देखते हुए न्यायोचित हो।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. न्याय के तीन सिद्धांतों की व्याख्या उदाहरण सहित कीजिए।
उत्तर: 1. समान बरताव: वर्ग-जाति-नस्ल-लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं, जैसे समान काम का समान दाम। 2. समानुपातिक न्याय: प्रयास-कौशल के अनुपात में अलग-अलग पुरस्कार, जैसे उत्तर-पुस्तिका की गुणवत्ता के अनुसार अंक। 3. विशेष ज़रूरतों की पहचान: दिव्यांगता या वंचना के कारण अतिरिक्त सहायता, जैसे सुरेश को अतिरिक्त समय या अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण। तीनों मिलकर काम करते हैं, अकेले कोई एक पर्याप्त नहीं।
प्र. रॉल्स के अज्ञानता के आवरण के तर्क को समझाइए।
उत्तर: रॉल्स के अनुसार निष्पक्ष नियम तभी बन सकते हैं जब व्यक्ति ख़ुद को ऐसी स्थिति में कल्पित करे जहाँ उसे अपनी भावी सामाजिक स्थिति, जाति या आर्थिक हैसियत का पता न हो। इस अज्ञानता में हर व्यक्ति विवेकसम्मत स्वार्थ से यह सोचकर नियम चुनेगा कि ‘अगर मैं ही सबसे वंचित तबके में पैदा हुआ तो?’ इसलिए वह ऐसे नियम चुनेगा जो कमज़ोर तबके की रक्षा करें, पर साथ ही बेहतर स्थिति वालों को भी कमज़ोर न बनाएँ। इस तरह निष्पक्षता परोपकार से नहीं, विवेक से निकलती है।
प्र. मुक्त बाज़ार और राज्य के हस्तक्षेप, दोनों पक्षों के तर्क दीजिए।
उत्तर: मुक्त बाज़ार के पक्ष में: बाज़ार जाति-धर्म-लिंग नहीं देखता, केवल योग्यता देखता है, और उपभोक्ता को अधिक विकल्प देता है। राज्य के हस्तक्षेप के पक्ष में: निजी व्यवसाय सबसे अधिक मुनाफ़े वाले इलाक़ों की ओर जाता है, इसलिए दूर-दराज़ या ग़रीब इलाक़ों को अच्छी सेवाएँ नहीं मिल पातीं, और मुक्त बाज़ार अक्सर पहले से सुविधासंपन्न लोगों के पक्ष में काम करता है, इसलिए राज्य को न्यूनतम बुनियादी सुविधाएँ सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए।
प्र. अध्याय के अनुसार भारत में सामाजिक न्याय के लिए उठाए गए क़दमों की चर्चा कीजिए।
उत्तर: संविधान ने छुआछूत की प्रथा का उन्मूलन किया ताकि निचली कही जाने वाली जातियों के लोगों को मंदिर, नौकरी और पानी जैसी बुनियादी ज़रूरतों से रोका न जा सके। अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान किया गया। विभिन्न राज्य सरकारों ने ज़मीन के न्यायपूर्ण वितरण के लिए भूमि-सुधार लागू किए। ये सभी क़दम केवल क़ानूनी समानता से आगे बढ़कर वास्तविक सामाजिक-आर्थिक समानता लाने के प्रयास हैं।
प्र. विशेष ज़रूरतों की पहचान का सिद्धांत समान बरताव के सिद्धांत का विस्तार है, खंडन नहीं, इसे उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: समान बरताव के सिद्धांत में ही यह अंतर्निहित है कि जो लोग कुछ महत्त्वपूर्ण संदर्भों में समान नहीं हैं, उनके साथ भिन्न ढंग से बरताव किया जाए। जैसे दृष्टिहीन छात्र सुरेश को अतिरिक्त समय देना उसे बाक़ी छात्रों के बराबर स्थिति में लाने के लिए है, न कि उसे विशेष लाभ देने के लिए। इसी तरह अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण भी ऐतिहासिक भेदभाव से पैदा हुई असमानता की भरपाई है। इसलिए यह सिद्धांत समान बरताव को कमज़ोर नहीं करता, बल्कि उसे वास्तविक रूप से लागू करने में मदद करता है।
प्र. न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी वाले कार्टून-संवाद से अध्याय क्या दिखाना चाहता है?
उत्तर: कार्टून में एक पात्र पूछता है कि न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी क्यों बँधी है, जवाब मिलता है कि उसे निष्पक्ष रहना है। पहला पात्र यह बात मानते हुए पूछता है कि पट्टी बँधे होने पर वह लोगों की विशेष ज़रूरतों को कैसे देखेगी? यह संवाद अध्याय की मूल समस्या दिखाता है : निष्पक्षता (सबके साथ समान बरताव) और विशेष ज़रूरतों की पहचान, दोनों को एक साथ साधना आसान नहीं, और यही कारण है कि सरकारों को न्याय के विभिन्न सिद्धांतों में सामंजस्य बिठाना पड़ता है।
प्र. न्यूनतम बुनियादी ज़रूरतें सुनिश्चित करने में सरकार की भूमिका पर बहस क्यों है?
उत्तर: भले ही सब इस पर सहमत हों कि राज्य को समाज के सबसे वंचित सदस्यों की मदद करनी चाहिए, इस पर असहमति हो सकती है कि यह कैसे किया जाए। मुक्त बाज़ार समर्थक चाहते हैं कि निजी एजेंसियाँ स्वास्थ्य-शिक्षा जैसी सेवाएँ दें और राज्य केवल नियम-कानून का ढाँचा बनाए रखे, जबकि दूसरा पक्ष मानता है कि निजी एजेंसियाँ कम-मुनाफ़े वाले या दूर-दराज़ इलाक़ों में सेवाएँ नहीं देतीं, इसलिए राज्य को सीधे हस्तक्षेप करना चाहिए।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. न्याय के तीनों सिद्धांतों, समान बरताव, समानुपातिक न्याय और विशेष ज़रूरतों की पहचान, के बीच सामंजस्य बिठाना सरकारों के लिए कठिन क्यों होता है, विस्तार से समझाइए।
उत्तर: समान बरताव के सिद्धांत पर अत्यधिक ज़ोर देने से कभी-कभी योग्यता और प्रयास को उचित प्रतिफल देने के सिद्धांत के विरुद्ध परिणाम मिल सकता है, क्योंकि सबको बिल्कुल बराबर मानने पर बेहतर प्रयास करने वालों को अतिरिक्त श्रेय नहीं मिलता। दूसरी ओर, योग्यता को ही न्याय का प्रमुख सिद्धांत मान लेने पर हाशिये पर खड़े तबके कई क्षेत्रों में वंचित रह जाते हैं, क्योंकि उनकी अच्छे पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँच ही नहीं रही है, इसलिए वे ‘समान शर्तों’ पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते। वहीं विशेष ज़रूरतों की पहचान का सिद्धांत लागू करते समय यह तय करना कठिन होता है कि किन असमानताओं को मान्यता दी जाए और किन्हें नहीं। देश के अलग-अलग समूह, अपने-अपने हितों के अनुसार अलग-अलग सिद्धांत पर ज़ोर देते हैं, इसलिए सरकार की ज़िम्मेदारी बन जाती है कि वह इन तीनों सिद्धांतों में संतुलन बिठाकर एक न्यायपरक समाज को बढ़ावा दे।
प्र. जॉन रॉल्स के न्याय सिद्धांत की व्याख्या कीजिए और बताइए कि यह निष्पक्षता को नैतिकता के बजाय विवेकसम्मत स्वार्थ पर क्यों आधारित मानता है।
उत्तर: रॉल्स का तर्क है कि निष्पक्ष और न्यायसंगत नियम तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता यह कल्पना करना है कि हम ‘अज्ञानता के आवरण’ में हैं, यानी हमें नहीं पता कि भावी समाज में हमारी अपनी जगह, जाति, धन या सुविधा-स्तर क्या होगी। इस अज्ञानता में हर व्यक्ति अपने ही तरीक़े से, यानी स्वार्थ में, सोचेगा, पर चूँकि कोई नहीं जानता कि वह कौन होगा, इसलिए वह सबसे बुरी स्थिति के मद्देनज़र समाज की कल्पना करेगा और ऐसे नियम चाहेगा जो कमज़ोर तबके के लिए भी उचित अवसर सुनिश्चित करें। रॉल्स इसे परोपकार या नैतिकता पर आधारित नहीं मानते, क्योंकि अधिकांश लोगों के लिए असाधारण त्याग या परोपकार कठिन है। इसके बजाय, यह हर व्यक्ति के अपने विवेकसम्मत स्वार्थ का ही परिणाम है, इसलिए इसे किसी असाधारण नैतिक गुण की नहीं, बल्कि सामान्य विवेकशील सोच की आवश्यकता होती है, यही इसे व्यावहारिक और सशक्त सिद्धांत बनाता है।
प्र. मुक्त बाज़ार और राज्य के हस्तक्षेप के बीच की बहस का विस्तार से विश्लेषण कीजिए। आपकी राय में कौन-सा दृष्टिकोण अधिक न्यायसंगत है?
उत्तर: मुक्त बाज़ार के समर्थकों का मानना है कि व्यक्तियों को संपत्ति अर्जित करने और मूल्य-मज़दूरी-मुनाफ़े पर स्वतंत्र रूप से समझौता करने की छूट होनी चाहिए, और बाज़ार जाति-धर्म-लिंग नहीं, केवल प्रतिभा-कौशल देखता है, इसलिए बाज़ारी वितरण जो भी परिणाम दे, वह न्यायसंगत मानना चाहिए। दूसरी ओर, आलोचकों का तर्क है कि निजी व्यवसाय वहीं जाना चाहता है जहाँ सबसे ज़्यादा मुनाफ़ा मिले, इसलिए मुक्त बाज़ार अक्सर पहले से ताक़तवर, धनी और प्रभावशाली लोगों के हित में काम करता है, और दूर-दराज़ या कम-मुनाफ़े वाले इलाक़ों में अच्छी निजी सेवाएँ शायद ही मिलती हैं। मुक्त बाज़ार के सभी समर्थक आज पूर्णतया अप्रतिबंधित बाज़ार नहीं चाहते, और कई अब न्यूनतम बुनियादी जीवन-स्तर की गारंटी और वृद्धों-रोगियों के लिए विशेष सहायता जैसे कुछ प्रतिबंध स्वीकार करने लगे हैं। तर्क दोनों तरफ़ हैं, इसलिए एक संतुलित दृष्टिकोण अधिक न्यायसंगत जान पड़ता है : बाज़ार को प्रतिस्पर्धा और दक्षता के लिए खुला रखा जाए, पर राज्य यह सुनिश्चित करे कि सबको स्वास्थ्य, शिक्षा और न्यूनतम जीवन-स्तर जैसी बुनियादी सुविधाएँ ज़रूर मिलें, ताकि निर्धन और वंचित वर्ग बाज़ार की प्रतिस्पर्धा से पूरी तरह बाहर न हो जाएँ।
प्र. अध्याय के चिंतन-मंथन की स्थितियों (सुरेश, गीता, कमज़ोर छात्रों को अतिरिक्त अंक, प्रोफ़ेसर के अलग-अलग प्रश्नपत्र, संसद में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने का प्रस्ताव) के आधार पर बताइए कि हर स्थिति न्यायसंगत है या नहीं, और अपने तर्क के पक्ष में न्याय के किस सिद्धांत का उपयोग करेंगे।
उत्तर: (1) सुरेश को अतिरिक्त समय देना न्यायसंगत है, विशेष ज़रूरतों की पहचान के सिद्धांत से : दृष्टिहीनता उसे प्रश्नपत्र हल करने में अलाभकारी स्थिति में डालती है, और अतिरिक्त समय उसे केवल बाक़ी कक्षा के बराबर लाता है। (2) गीता को अतिरिक्त समय देना, जैसा है वैसा, न्यायसंगत नहीं : बैसाखी से चलना गणित का प्रश्नपत्र लिखने की गति पर असर नहीं डालता, इसलिए इस काम में वह बाक़ी कक्षा के समान है और समकक्षों के साथ समान बरताव का सिद्धांत लागू होता है; विशेष सहायता उन्हीं असमानताओं के लिए उचित है जो सचमुच उस काम पर असर डालती हों। (3) कमज़ोर छात्रों को अतिरिक्त अंक देना न्यायसंगत नहीं : अंक उत्तर-पुस्तिका की गुणवत्ता और किए गए प्रयास को दर्शाने चाहिए, यही समानुपातिक न्याय है; कमज़ोर छात्रों को अतिरिक्त कक्षाओं जैसी विशेष मदद मिल सकती है, पर बिना कमाए अंक नहीं। (4) अलग-अलग छात्राओं को अलग-अलग प्रश्नपत्र देना न्यायसंगत नहीं : एक ही परीक्षा देने वालों को एक ही प्रश्नपत्र पर आँका जाना चाहिए, यह समान बरताव का सिद्धांत है, वरना अंकों की तुलना संभव नहीं रहती। (5) संसद की एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने के प्रस्ताव को विशेष ज़रूरतों की पहचान के सिद्धांत से न्यायसंगत ठहराया जा सकता है, क्योंकि संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम रहा है; विरोधी इसे समान बरताव से हटना मानते हैं, इसीलिए यह बहस का विषय है। ये स्थितियाँ दिखाती हैं कि न्याय के तीनों सिद्धांत कभी-कभी अलग-अलग दिशा में खींचते हैं, इसीलिए सरकार को इनमें सामंजस्य बिठाना पड़ता है।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक गद्यांश के अनुसार सामाजिक न्याय के अभाव का संकेत क्या है?
उत्तर: जब सुविधासंपन्न वर्ग और बहिष्कृत-वंचितों के बीच गहरी और स्थायी खाई हो।
(ख) 2 अंक गद्यांश के अनुसार न्याय के लिए पूर्ण समानता क्यों ज़रूरी नहीं मानी गई है?
उत्तर: क्योंकि गद्यांश स्पष्ट करता है कि न्याय के लिए लोगों के रहन-सहन के तौर-तरीक़ों में पूर्ण समानता और एकरूपता ज़रूरी नहीं है, अलग-अलग व्यक्ति भिन्न जीवन-शैली अपना सकते हैं, बशर्ते किसी को अपनी स्थिति सुधारने का उचित मौक़ा मिलता रहे।
(ग) 3 अंक गद्यांश के आधार पर बताइए कि एक समाज को अन्यायपूर्ण कब माना जाएगा, और भारत के संदर्भ में इसे रोकने के लिए कौन-से क़दम उठाए जा सकते हैं, विस्तार से समझाइए।
उत्तर: गद्यांश के अनुसार समाज तब अन्यायपूर्ण माना जाएगा जब धनी और ग़रीब के बीच खाई इतनी गहरी हो जाए कि वे मानो अलग-अलग दुनिया में रहते हों, और सापेक्षतः वंचित वर्ग के पास चाहे वे कितनी भी मेहनत करें, अपनी स्थिति सुधारने का कोई वास्तविक मौक़ा ही न बचे। भारत के संदर्भ में इसे रोकने के लिए अध्याय में बताए गए क़दम प्रासंगिक हैं : छुआछूत की प्रथा का संवैधानिक उन्मूलन, अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए सरकारी नौकरियों व शिक्षा में आरक्षण, राज्यों द्वारा भूमि-सुधार, और सभी को पोषण, आवास, स्वच्छ जल, शिक्षा व न्यूनतम मज़दूरी जैसी बुनियादी न्यूनतम सुविधाएँ सुनिश्चित करना, ताकि वंचित वर्ग को भी एक समतल शुरुआती धरातल मिल सके।
(क) 1 अंक गद्यांश के अनुसार रॉल्स के इस विचार को क्या नाम दिया गया है?
उत्तर: अज्ञानता का आवरण।
(ख) 2 अंक गद्यांश के अनुसार इस स्थिति में व्यक्ति को किन-किन बातों का पता नहीं होता?
उत्तर: व्यक्ति को यह पता नहीं होता कि वह किस परिवार में जन्म लेगा, ऊँची जाति में या निचली जाति में, और वह धनी होगा या ग़रीब।
(ग) 3 अंक गद्यांश के आधार पर समझाइए कि रॉल्स इस कल्पित अज्ञानता की स्थिति के ज़रिए निष्पक्ष और न्यायसंगत नियम तक पहुँचने का तर्क कैसे देते हैं।
उत्तर: रॉल्स का तर्क है कि जब कोई व्यक्ति यह नहीं जानता कि भावी समाज में उसकी अपनी सामाजिक, आर्थिक या जातिगत स्थिति क्या होगी, तो वह समाज के नियम तय करते समय अपने विवेकसम्मत स्वार्थ के चलते यह मान लेगा कि शायद वह ख़ुद ही सबसे कम सुविधासंपन्न स्थिति में पैदा हो सकता है। इस आशंका के कारण वह ऐसे नियम और नीतियाँ चुनना पसंद करेगा जो समाज के सबसे कमज़ोर तबके के हितों की भी रक्षा करें, जबकि साथ ही यह भी सुनिश्चित करेगा कि इससे बेहतर स्थिति वाले सदस्यों को कोई नुक़सान न हो। इस प्रकार निष्पक्षता किसी नैतिक उपदेश या परोपकार से नहीं, बल्कि विवेकसम्मत स्व-हित से स्वाभाविक रूप से निकलती है, और यही रॉल्स के तर्क को इतना सशक्त बनाता है।