- समानता एक आदर्श क्यों है, और असमानता के बावजूद यह हर समाज में क्यों ज़रूरी मानी जाती है
- “बराबर सम्मान” और “एक जैसा बरताव” में फ़र्क, और प्राकृतिक व सामाजिक असमानता में अंतर
- समानता के तीन आयाम, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक, और इन्हें समझाने वाली चार विचारधाराएँ
- समानता को बढ़ावा देने के तीन तरीके, औपचारिक समानता, विभेदक बरताव और सकारात्मक कार्यवाई (आरक्षण)
•परिचय
समानता एक ऐसा मूल्य है जिसे हमारे संविधान में भी दर्ज किया गया है। यह अध्याय चार सवालों के इर्द-गिर्द घूमता है: समानता है क्या, क्या इसका मतलब हर हाल में सबसे एक जैसा बरताव करना है, हम असमानता को कैसे घटा सकते हैं, और समानता के अलग-अलग आयाम (राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक) कैसे पहचाने जाएँ। इस क्रम में हम समाजवाद, मार्क्सवाद, उदारवाद और नारीवाद जैसी विचारधाराओं से भी मिलेंगे।
इस अध्याय में आगे कुछ आँकड़े और तालिकाएँ आएँगी (जैसे वैश्विक असमानता का तथ्य-पत्रक)। किताब कहती है कि ये केवल इसलिए दिए गए हैं कि हम असमानता की प्रकृति को समझ सकें, इन आँकड़ों को याद करने की आवश्यकता नहीं है। इनसे यह समझना है कि ये क्या दिखाते हैं: अमीर और ग़रीब देशों व लोगों के बीच की खाई, भारत में गाँव और शहर के परिवारों के बीच की खाई, और जातियों व समुदायों के बीच की खाई।
3.1समानता महत्त्वपूर्ण क्यों है?
समानता की धारणा सदियों से मानव समाज को प्रेरित करती आई है। यह लगभग हर धर्म में अंतर्निहित है, क्योंकि हर आस्था मनुष्यों को ईश्वर की संतान मानते हुए उनके समान महत्त्व की घोषणा करती है। इसी साझी मानवता के विचार से “सार्वभौम मानवाधिकार” और “मानवता के विरुद्ध अपराध” जैसी धारणाएँ भी निकलती हैं। आधुनिक काल में समानता का नारा पद, धन, हैसियत और विशेषाधिकार की असमानता के विरुद्ध संघर्षों में एकजुटता लाने के लिए इस्तेमाल हुआ।
समानता एक नैतिक और राजनीतिक आदर्श है जो कहता है कि रंग, लिंग, वंश या राष्ट्रीयता के भेद के बावजूद सभी मनुष्य साझी मानवता के कारण समान महत्त्व और सम्मान पाने के हक़दार हैं।
आज समानता एक व्यापक रूप से स्वीकृत आदर्श है, जिसे कई देशों के संविधान और क़ानूनों में शामिल किया गया है। फिर भी हमारे चारों ओर समानता से ज़्यादा असमानता दिखाई देती है, आलीशान मकानों के बगल में झोपड़पट्टियाँ, वातानुकूलित स्कूलों के साथ पेयजल तक से वंचित स्कूल, भोजन की बर्बादी के साथ भुखमरी।
| वैश्विक असमानता का तथ्य-पत्रक | आँकड़ा |
|---|---|
| दुनिया के 50 सबसे अमीर लोगों की सामूहिक आमदनी | दुनिया के 40 करोड़ सबसे ग़रीब लोगों की सामूहिक आमदनी से भी ज़्यादा |
| दुनिया की 40% ग़रीब जनसंख्या का हिस्सा वैश्विक आय में | केवल 5% (जबकि सबसे अमीर 10% लोग 54% आय नियंत्रित करते हैं) |
| प्रथम विश्व के औद्योगिक देश (विश्व जनसंख्या का 25%) | विश्व के 86% उद्योग के मालिक, 80% ऊर्जा के उपभोक्ता |
| प्रति व्यक्ति उपभोग (विकसित बनाम विकासशील देश) | पानी 3 गुना, ऊर्जा 10 गुना, लोहा-इस्पात 13 गुना, काग़ज़ 14 गुना ज़्यादा |
| गर्भावस्था से मृत्यु का जोखिम | नाइजीरिया में 18 में से 1, कनाडा में 8,700 में से 1 |
| वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड / अम्ल-वर्षा उत्सर्जन में प्रथम-विश्व का हिस्सा | लगभग दो-तिहाई CO₂, तीन-चौथाई सल्फर-नाइट्रोजन ऑक्साइड |
स्रोत: मानव विकास रिपोर्ट, 2005, यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (UNDP)। पुस्तक स्वयं कहती है, इन आँकड़ों को रटने की ज़रूरत नहीं, केवल असमानता की प्रकृति समझने के लिए।
| भारत में आर्थिक असमानता (जनगणना 2011) | ग्रामीण परिवार | शहरी परिवार |
|---|---|---|
| बिजली का कनेक्शन | 55% | 93% |
| घर में नल का पानी | 35% | 71% |
| घर में स्नानघर | 45% | 87% |
| टेलीविज़न | 33% | 77% |
| स्कूटर/मोपेड/मोटरसाइकिल | 14% | 35% |
| कार/जीप/वैन | 2% | 10% |
लगभग हर कोई समानता के आदर्श को स्वीकार करता है, फिर भी लगभग हर तरफ़ असमानता दिखती है, यही वह विरोधाभास है जो समानता को राजनीतिक सिद्धांत का केंद्रीय विषय बनाता है।
प्रश्न यह है: क्या असमानता मनुष्यों की प्रतिभा-योग्यता के अंतर का स्वाभाविक नतीजा है, या समाज की बनाई हुई?
3.2समानता क्या है?
किताब इस भाग की शुरुआत कुछ संकेत-पट्टों की तस्वीरों से करती है: “अश्वेतों को पीछे परोसा जाएगा”, पेयजल फ़व्वारे पर “गोरे” और “अश्वेत” के लिए अलग-अलग दिशा, और “शौचालय: केवल गोरों के लिए”। ये सब नस्ल और रंग के आधार पर भेद करते हैं, जो हमारी समझ के अनुसार अस्वीकार्य है, क्योंकि साझी मानवता के कारण सभी मनुष्य बराबर सम्मान के हक़दार हैं।
बराबर सम्मान का व्यवहार करने का मतलब हमेशा एक जैसा बरताव करना नहीं है। कोई भी समाज अपने सभी सदस्यों से सभी हालात में पूरी तरह एक जैसा व्यवहार नहीं करता (जैसे प्रधानमंत्री या सेना-जनरल को विशेष दर्ज़ा मिलना, जब तक इसका दुरुपयोग न हो)। लेकिन जन्म के आधार पर (धर्म, नस्ल, जाति, लिंग) होने वाला भेद अस्वीकार्य असमानता है।
अवसरों की समानता
समानता का मतलब यह नहीं कि सभी अंतर मिटा दिए जाएँ। लोगों की पसंद, प्रतिभा और मेहनत अलग-अलग हो सकती है, इसलिए कुछ लोग अपने चुने क्षेत्र में ज़्यादा सफल हो जाते हैं, इससे समाज असमान नहीं हो जाता। असली सवाल यह है कि क्या सभी को शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित आवास जैसी बुनियादी चीज़ों तक बराबर पहुँच मिली या नहीं।
अवसर की समानता का मतलब है कि सभी मनुष्यों को अपनी दक्षता और प्रतिभा विकसित करने तथा अपने लक्ष्य पाने के लिए समान अधिकार और अवसर मिलें, भले ही परिणाम (सफलता) अलग-अलग हो।
प्राकृतिक और सामाजिक असमानताएँ
राजनीतिक सिद्धांत में इन दोनों में अंतर किया जाता है, हालाँकि यह अंतर हमेशा साफ़ नहीं होता।
प्राकृतिक असमानता
- लोगों की जन्मजात क्षमताओं और प्रतिभा से पैदा होती है
- माना जाता है कि इसे बदला नहीं जा सकता
- उदाहरण: कोई अच्छा संगीतकार बन जाए, कोई नहीं
सामाजिक असमानता
- समाज द्वारा बनाई/थोपी जाती है
- अवसरों की असमानता या किसी समूह के शोषण से पैदा होती है
- उदाहरण: बौद्धिक काम को शारीरिक काम से ज़्यादा महत्त्व देना
लंबे समय से चली आ रही असमानताएँ “प्राकृतिक” लगने लगती हैं, जबकि असल में वे समाज की बनाई होती हैं। जैसे महिलाओं को अनादि काल से “अबला” कहकर बराबर अधिकार से वंचित रखा गया, और अफ़्रीका में काले लोगों को उपनिवेशवादी शासकों ने “कम बुद्धि वाला” मानकर दास-प्रथा को सही ठहराया। दोनों अब ग़लत मानी जाती हैं, ये असल में सत्ता के अंतर से पैदा भेद थे, जन्मजात नहीं।
प्रसिद्ध भौतिकविद् स्टीफन हॉकिन्स शायद ही चल या बोल सकते थे, फिर भी उन्होंने विज्ञान में बड़ा योगदान दिया। किताब इसे उदाहरण के तौर पर देती है कि तकनीकी प्रगति (कंप्यूटर, पहियादार कुर्सी, कृत्रिम अंग) से कई “प्राकृतिक” मानी गई सीमाएँ अब बदली जा सकती हैं, इसलिए विकलांगता के आधार पर मदद या उचित पारिश्रमिक से इनकार करना अन्यायपूर्ण होगा।
इन्हीं जटिलताओं के कारण आज बहुत-से सिद्धांतकार प्राकृतिक/सामाजिक के बँटवारे की बजाय एक दूसरा अंतर करते हैं, अपनी पसंद से पैदा हुई असमानता और अपने जन्म या परिस्थिति से पैदा हुई असमानता के बीच। समानता के पक्षधर दूसरी तरह की असमानता को ही कम या ख़त्म करना चाहते हैं।
3.3समानता के तीन आयाम
अलग-अलग विचारकों और विचारधाराओं ने समानता के तीन मुख्य आयाम बताए हैं, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक। एक न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज के लिए तीनों को साथ संबोधित करना ज़रूरी है।

राजनीतिक समानता
लोकतांत्रिक समाजों में राजनीतिक समानता का मतलब है सभी सदस्यों को समान नागरिकता देना, मताधिकार, अभिव्यक्ति-आवागमन-संगठन की स्वतंत्रता, और धार्मिक विश्वास की आज़ादी। ये संविधान व क़ानून द्वारा दी गई क़ानूनी गारंटी हैं। लेकिन समान अधिकार देने वाले देशों में भी काफ़ी असमानता बनी रह सकती है, क्योंकि सामाजिक-आर्थिक संसाधनों तक पहुँच अलग-अलग होती है, इसीलिए “बराबरी के मैदान” की माँग उठती है। राजनीतिक समानता ज़रूरी घटक है, पर अकेले पर्याप्त नहीं।
सामाजिक समानता
राजनीतिक समानता पहला क़दम है, पर इसे अवसर की समानता से पूरा करना पड़ता है, पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधा, अच्छी शिक्षा का अवसर, उचित पोषण और न्यूनतम वेतन जैसी न्यूनतम गारंटी के बिना कोई भी बराबरी से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता। भारत में एक ख़ास समस्या सुविधाओं की कमी से नहीं, बल्कि रीति-रिवाज़ों से आती है, जैसे महिलाओं को उत्तराधिकार में समान अधिकार न मिलना, या उच्च शिक्षा से हतोत्साहित करना। ऐसे मामलों में राज्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है: औरतों को समान क़ानूनी अधिकार प्रदान करना, सार्वजनिक स्थलों या रोज़गार में भेदभाव और परेशानी से बचाने वाली नीतियाँ बनाना, और शिक्षण या कुछ अन्य पेशों में प्रवेश के लिए प्रोत्साहन देना। लोगों में जागरूकता बढ़ाकर और इन अधिकारों का प्रयोग करने वालों को समर्थन देकर भी राज्य अपनी भूमिका निभा सकता है।
| शहरी भारत में जाति/समुदाय अनुसार उच्च शिक्षा में असमानता | प्रति हज़ार लोगों में स्नातक |
|---|---|
| अनुसूचित जाति | 47 |
| मुस्लिम | 61 |
| हिंदू (अन्य पिछड़ी जातियाँ) | 86 |
| अनुसूचित जनजाति | 109 |
| ईसाई | 237 |
| सिख | 250 |
| हिंदू (उच्च जातियाँ) | 253 |
| अन्य धार्मिक समुदाय | 315 |
| अखिल भारतीय औसत | 155 |
स्रोत: नेशनल सेंपल सर्वे आर्गेनाइजेशन, 55वाँ राउंड सर्वे, 1999-2000। इन आँकड़ों को याद करने की ज़रूरत नहीं; किताब पूछती है कि क्या समुदायों के बीच इतने बड़े अंतर संयोग से हो सकते हैं, या ये जाति-व्यवस्था और दूसरे कारकों के काम करने की ओर इशारा करते हैं।
आर्थिक समानता
आर्थिक असमानता तब मानी जाती है जब व्यक्तियों या वर्गों के बीच धन, संपत्ति या आय में बड़ा अंतर हो। इसे नापने के दो तरीक़े, सबसे अमीर और सबसे ग़रीब समूहों के बीच का अनुपातिक अंतर, या ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या। धन-दौलत की पूरी समानता शायद कभी किसी समाज में नहीं रही, ज़्यादातर लोकतंत्र समान अवसर देने की कोशिश करते हैं ताकि प्रतिभा और संकल्प रखने वालों को अपनी हालत सुधारने का मौक़ा मिले।
पीढ़ियों से बनी रहने वाली, जड़ जमाई असमानता सबसे ख़तरनाक है, जब एक वर्ग पीढ़ियों से धन-सत्ता का उपभोग करता रहे और दूसरा वर्ग पीढ़ियों से ग़रीब रहे, तो समाज वर्गों में बँट जाता है और इससे आक्रोश व हिंसा पैदा हो सकती है। अमीर वर्गों की ताक़त के कारण ऐसे समाज को सुधारना मुश्किल हो जाता है।
चार विचारधाराएँ जो समानता को अलग-अलग तरह से समझती हैं
नारीवाद
स्त्री-पुरुष के समान अधिकारों का सिद्धांत। असमानता का कारण पितृसत्ता, वह व्यवस्था जो पुरुष को स्त्री से ज़्यादा महत्त्व और सत्ता देती है। नारीवादी जैविक या लिंग-भेद (प्राकृतिक और जन्मजात) और लैंगिकता (समाजजनित, स्त्री-पुरुष की सामाजिक भूमिकाएँ) में अंतर करते हैं, महिलाएँ जन्म देती हैं यह जैविक तथ्य है, पर पालन-पोषण सिर्फ़ माँ करे यह ज़रूरी नहीं। पितृसत्ता ने श्रम का ऐसा विभाजन किया है जिसमें स्त्री “निजी” और “घरेलू” कामों के लिए ज़िम्मेदार है, जबकि पुरुष की ज़िम्मेदारी “सार्वजनिक” और “बाहरी” दुनिया में है। नारीवादी कहते हैं कि अधिकतर स्त्रियाँ सार्वजनिक क्षेत्र में भी सक्रिय हैं, घर से बाहर काम करती हैं, फिर भी घरेलू कामकाज की पूरी ज़िम्मेदारी उन्हीं पर है, इसे वे “दोहरा बोझ” कहते हैं; इसके बावजूद स्त्रियों को सार्वजनिक क्षेत्र के निर्णयों में ना के बराबर महत्त्व दिया जाता है। नारीवाद का मानना है कि निजी/सार्वजनिक का यह विभेद और लैंगिक असमानता के सभी रूप मिटाए जा सकते हैं और मिटाए जाने चाहिए।
मार्क्सवाद
19वीं सदी के विचारक मार्क्स के अनुसार गहरी असमानता की जड़ है, तेल, ज़मीन, जंगल जैसे ज़रूरी आर्थिक संसाधनों का निजी स्वामित्व। यह मालिकों को सिर्फ़ अमीर नहीं बनाता, राजनीतिक ताक़त भी देता है, जो लोकतांत्रिक सरकार के लिए ख़तरा बन सकती है। मार्क्सवादी और समाजवादी मानते हैं कि आर्थिक असमानता पद या विशेषाधिकार जैसी दूसरी सामाजिक असमानताओं को सहारा देती है। समाधान: समान अवसर से आगे जाकर आवश्यक संसाधनों पर जनता का नियंत्रण।
उदारवाद
प्रतिस्पर्धा को संसाधन बाँटने का सबसे न्यायपूर्ण और कारगर तरीक़ा मानता है। राज्य न्यूनतम जीवन-स्तर और समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप कर सकता है, पर इससे अपने-आप समानता नहीं आती। जब तक प्रतिस्पर्धा खुली रहेगी, असमानताओं की खाइयाँ नहीं बनेंगी। उदाहरण के लिए, व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा है; सरकार और अदालतों ने समय-समय पर शैक्षणिक संस्थानों और प्रवेश परीक्षाओं का नियमन करने के लिए हस्तक्षेप किया है, ताकि हर प्रत्याशी को स्पर्धा का उचित और समान अवसर मिले। फिर भी कुछ को प्रवेश नहीं मिलता, लेकिन इसे सीमित सीटों के बँटवारे का निष्पक्ष तरीक़ा माना जाता है। समाजवादियों से उलट उदारवादी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को अनिवार्यतः जुड़ा नहीं मानते, हर क्षेत्र की असमानता अलग तरीक़े से सुलझानी चाहिए। उदारवादियों के लिए असमानता अपने आप में समस्या नहीं है, वे केवल ऐसी अन्यायी और गहरी असमानताओं को समस्या मानते हैं, जो लोगों को उनकी वैयक्तिक क्षमताएँ विकसित करने से रोकती हैं।
समाजवाद
औद्योगिक पूँजीवाद से पैदा असमानताओं की प्रतिक्रिया में उभरा। बाज़ार का पूर्ण विरोधी नहीं, पर शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में सरकारी नियमन का समर्थक। भारत के समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया ने 5 असमानताओं (स्त्री-पुरुष, त्वचा का रंग, जाति, उपनिवेशवाद, आर्थिक) को अलग-अलग पर साथ लड़ने योग्य बताया। लोहिया के समय में समाजवादियों के बीच आम तौर पर यही तर्क चलता था कि असमानता का एकमात्र रूप वर्गीय असमानता है; लोहिया का कहना था कि इनमें से हर असमानता की अलग जड़ें हैं, इसलिए पाँच असमानताओं के ख़िलाफ़ संघर्ष पाँच क्रांतियाँ थे। उन्होंने 2 और क्रांतियाँ (नागरिक स्वतंत्रता, अहिंसा/सत्याग्रह) जोड़ीं, कुल “सप्त क्रांति”।
पितृसत्ता एक सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्था है जो पुरुष को स्त्री से अधिक महत्त्व और शक्ति देती है, इस मान्यता पर आधारित कि स्त्री-पुरुष स्वभाव से भिन्न हैं।
लोहिया की 7 क्रांतियाँ = 5 (स्त्री-पुरुष, रंग, जाति, उपनिवेशवाद, आर्थिक) + 2 (नागरिक स्वतंत्रता, अहिंसा)
“सप्त क्रांति” शब्द ही परीक्षा में पूछा जा सकता है, पाँच असमानताओं की सूची और दो अतिरिक्त क्रांतियों को अलग-अलग याद रखें।
3.4हम समानता को कैसे बढ़ावा दें?
समानता को व्यवहार में लाने के लिए किताब तीन क़दम बताती है।
औपचारिक समानता की स्थापना
पहला क़दम है असमानता और विशेषाधिकार की औपचारिक व्यवस्था ख़त्म करना। दुनिया भर में रीति-रिवाज़ों और क़ानूनों ने ही ग़रीबों को मताधिकार से, महिलाओं को कई पेशों से, और भारत में निचली जातियों को शारीरिक श्रम के अलावा कुछ भी करने से रोका। हमारा संविधान धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है और छुआछूत को समाप्त करता है, यही औपचारिक समानता है।
विभेदक बरताव द्वारा समानता
औपचारिक समानता ज़रूरी है, पर्याप्त नहीं। कभी-कभी बराबर अधिकार का उपभोग करने देने के लिए अलग बरताव ज़रूरी होता है, जैसे विकलांगों के लिए सार्वजनिक भवनों में ढलान वाले रास्ते (रैंप), या रात में कॉल-सेंटर में काम करने वाली महिलाओं के लिए यात्रा में विशेष सुरक्षा। ये समानता को कम नहीं, बल्कि बढ़ाने वाले उपाय हैं।
सकारात्मक कार्यवाई
सकारात्मक कार्यवाई इस विचार पर आधारित है कि क़ानून द्वारा औपचारिक समानता स्थापित करना ही काफ़ी नहीं, गहरी जड़ें जमाई असमानताओं को मिटाने के लिए कुछ सकारात्मक क़दम (जैसे छात्रवृत्ति, आरक्षण/कोटा) उठाने ज़रूरी हैं।
पक्ष में तर्क
- कुछ समूह अतीत में सामाजिक पूर्वाग्रह-भेदभाव के शिकार रहे
- तुरंत बराबरी से प्रतिस्पर्धा संभव नहीं
- अस्थायी, समयबद्ध विशेष सहायता ज़रूरी
विरोध में तर्क
- यह अन्य वर्गों को समान बरताव के अधिकार से वंचित करता है
- आरक्षण भी एक तरह का भेदभाव है (“उलटा भेदभाव”)
- जाति/रंग पर आधारित भेद, जातिगत-नस्लीय पूर्वाग्रह मज़बूत कर सकता है
भारत ने वंचित समूहों को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण/कोटा की नीति अपनाई है, जो बहुत बहस का विषय रही है। बहस को सुलझाने के लिए किताब एक अंतर बताती है, व्यक्ति के समान अधिकार (प्रवेश-नौकरी में बराबर विचार पाने का हक़) और राज्य-नीति के मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में समानता (कमज़ोर तबकों को प्रतिस्पर्धा लायक़ बनाने के लिए राज्य की ज़िम्मेदारी), दोनों अलग हैं, और दोनों को साथ देखना ज़रूरी है।
किताब यह भी बताती है कि यह बहस व्यवहार में क्यों मायने रखती है। जो शिक्षार्थी अपने समुदाय में पढ़ने वालों की पहली पीढ़ी से आते हैं, यानी जिनके माता-पिता और पूर्वज अशिक्षित रहे हों, उनकी ज़रूरतें और परिस्थितियाँ पढ़े-लिखे परिवारों के छात्रों से बहुत अलग होती हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र में भारत में वंचित जनसंख्या के लिए जितना किया जाना चाहिए था, उससे बहुत कम किया गया है: ग्रामीण और शहरी झोपड़पट्टी के बहुत से ग़रीब बच्चों के स्कूल जाने की संभावना नहीं के बराबर है, उनके स्कूल अभिजातवर्गीय स्कूलों की तुलना में बहुत कम दे पाते हैं, और विशेष कोचिंग तथा व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की ऊँची फ़ीस उनकी पहुँच से बाहर रहती है। इसलिए समान अवसर के लक्ष्य से सभी सहमत हैं, विवाद नीतियों को लेकर है: क्या राज्य वंचित समुदायों के लिए स्थान आरक्षित करे, या उन्हें कम उम्र से ही विशेष सुविधाएँ दे ताकि उनकी योग्यता और प्रतिभा का विकास हो? वंचितों की पहचान आर्थिक आधार पर हो या जाति-व्यवस्था से पैदा हुई सामाजिक असमानताओं के आधार पर? चूँकि अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग बरताव जाति-व्यवस्था और रंगभेद के अंग थे, इसलिए उदारवादी “एक जैसा बरताव” के सिद्धांत से हटने में बहुत सावधान रहते हैं।
“एक जैसा बरताव” और “समान मानना” के फ़र्क़ पर आधारित प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं। एक जैसा बरताव में सबको वही चीज़ मिलती है; समान मानने में मक़सद समानता बढ़ाना होता है, भले ही इसके लिए अलग बरताव करना पड़े, पर हर बार इसका औचित्य देना ज़रूरी है।
19वीं सदी के महिला आंदोलन ने मताधिकार, डिग्री और नौकरी के बराबर अधिकार की माँग की, पुरुषों जैसे ही अधिकार। लेकिन नौकरी में आने पर एहसास हुआ कि इन अधिकारों का सचमुच उपयोग करने के लिए मातृत्व अवकाश और कार्यस्थल पर बालवाड़ी जैसी विशेष सुविधाएँ भी चाहिए, यानी पुरुषों जैसे अधिकार पाने के लिए कभी-कभी महिलाओं से अलग बरताव करना ज़रूरी होता है।
विभेदक बरताव को हमेशा जाँचना चाहिए, क्या यह वाक़ई किसी समूह को बाक़ी समाज जितने अधिकार दिलाने के लिए ज़रूरी है? यह कभी वर्चस्व/शोषण की नई संरचना बनाने या किसी दबंग समूह के विशेषाधिकार दोबारा स्थापित करने का ज़रिया नहीं बनना चाहिए। इसका इकलौता औचित्य है, एक न्यायपूर्ण, समतामूलक समाज को बढ़ावा देना।
- समानता = साझी मानवता के कारण सभी को बराबर सम्मान और महत्त्व; इसका मतलब हर हाल में एक जैसा बरताव नहीं
- प्राकृतिक असमानता जन्मजात मानी जाती है, सामाजिक असमानता समाज बनाता है, पर यह अंतर हमेशा साफ़ नहीं
- समानता के तीन आयाम: राजनीतिक (नागरिकता-अधिकार), सामाजिक (अवसर-न्यूनतम सुविधाएँ), आर्थिक (धन-आय में अंतर घटाना)
- नारीवाद-पितृसत्ता, मार्क्सवाद-निजी स्वामित्व, उदारवाद-प्रतिस्पर्धा, समाजवाद (लोहिया)-सप्त क्रांति
- समानता बढ़ाने के तीन तरीक़े: औपचारिक समानता (संविधान), विभेदक बरताव (रैंप, सुरक्षा), सकारात्मक कार्यवाई (आरक्षण)
- भारतीय संविधान: धर्म-नस्ल-जाति-लिंग-जन्मस्थान पर भेदभाव प्रतिबंधित; छुआछूत समाप्त
- क्या मैं समानता और एक जैसे बरताव में फ़र्क़ बिना देखे समझा सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं समानता के तीनों आयाम और एक-एक उदाहरण बिना देखे लिख सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं नारीवाद, मार्क्सवाद, उदारवाद और समाजवाद के मुख्य तर्क को एक-एक वाक्य में बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं सकारात्मक कार्यवाई के पक्ष और विरोध में एक-एक तर्क याद कर सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं लोहिया की सप्त क्रांति की पूरी सूची बिना देखे लिख सकता/सकती हूँ?