कक्षा 11 राजनीति विज्ञान बुक 2 अध्याय 3 समानता महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. समानता की धारणा किस पर आधारित है?

उत्तर: साझी मानवता के कारण सभी मनुष्यों के समान महत्त्व और सम्मान पर।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. फ्रांसीसी क्रांति का प्रसिद्ध नारा क्या था?

उत्तर: स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. पुस्तक के अनुसार इस अध्याय में असमानता से जुड़े आँकड़े क्यों दिए गए हैं?

उत्तर: केवल असमानता की प्रकृति समझने के लिए; पुस्तक कहती है कि इन्हें याद करने की आवश्यकता नहीं है।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. पितृसत्ता किसे कहते हैं, एक पंक्ति में बताइए।

उत्तर: वह सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक व्यवस्था जो पुरुष को स्त्री से अधिक महत्त्व और शक्ति देती है।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. राममनोहर लोहिया के अनुसार असमानताएँ कितनी थीं?

उत्तर: पाँच, जिनमें दो और क्रांतियाँ जोड़कर सप्त क्रांति (सात) बनी।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. मार्क्स के अनुसार गहरी असमानता की जड़ क्या है?

उत्तर: महत्त्वपूर्ण आर्थिक संसाधनों का निजी स्वामित्व।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. अध्याय किस वैज्ञानिक का उदाहरण देकर बताता है कि तकनीक “प्राकृतिक” सीमाओं को बदल सकती है?

उत्तर: स्टीफन हॉकिन्स का।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. भारतीय संविधान किन पाँच आधारों पर भेदभाव प्रतिबंधित करता है?

उत्तर: धर्म, नस्ल, जाति, लिंग और जन्म-स्थान।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. समानता और एक जैसे बरताव में क्या फ़र्क़ है?

उत्तर: समानता का मतलब बराबर सम्मान और महत्त्व देना है, यह ज़रूरी नहीं कि हमेशा एक जैसा बरताव किया जाए। कोई भी समाज सभी सदस्यों से सभी हालात में पूर्णतया एक जैसा व्यवहार नहीं करता, जैसे प्रधानमंत्री को विशेष दर्ज़ा मिलना अस्वीकार्य नहीं माना जाता। जबकि जन्म के आधार पर (धर्म, जाति, लिंग) होने वाला भेद अस्वीकार्य असमानता है।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. अवसर की समानता का क्या अर्थ है?

उत्तर: अवसर की समानता का मतलब है कि सभी मनुष्यों को अपनी दक्षता-प्रतिभा विकसित करने और अपने लक्ष्य पाने के लिए समान अधिकार व अवसर मिलें। यह ज़रूरी नहीं कि परिणाम (सफलता) भी बराबर हो, बल्कि यह महत्त्वपूर्ण है कि सभी को शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित आवास जैसी बुनियादी चीज़ों तक बराबर पहुँच मिले।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. प्राकृतिक और सामाजिक असमानता में क्या अंतर है?

उत्तर: प्राकृतिक असमानता लोगों की जन्मजात क्षमताओं और प्रतिभा के अंतर से पैदा होती मानी जाती है, जिसे बदला नहीं जा सकता। सामाजिक असमानता समाज द्वारा बनाई जाती है, जैसे अवसरों की असमानता या किसी समूह का शोषण। यह अंतर हमेशा साफ़ नहीं होता, क्योंकि लंबे समय से चली आ रही सामाजिक असमानताएँ भी प्राकृतिक जान पड़ने लगती हैं।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. नारीवाद के अनुसार “जैविक या लिंग-भेद” और “लैंगिकता” में क्या अंतर है?

उत्तर: जैविक या लिंग-भेद स्त्री-पुरुष के बीच प्राकृतिक और जन्मजात भेद है, जैसे केवल स्त्री ही बच्चे को जन्म दे सकती है। लैंगिकता समाजजनित है, यानी वह भूमिका जो समाज स्त्री-पुरुष को सौंपता है, जैसे घर के काम की ज़िम्मेदारी केवल स्त्री की मानी जाना। नारीवादी बताते हैं कि लैंगिक असमानता प्रकृति ने नहीं, समाज ने पैदा की है।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. राजनीतिक समानता पर्याप्त क्यों नहीं मानी जाती?

उत्तर: राजनीतिक समानता में सभी को समान नागरिकता, मताधिकार और अन्य क़ानूनी अधिकार मिलते हैं, पर ये केवल औपचारिक अधिकार हैं। सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में संसाधनों और अवसरों की भिन्नता के कारण समान अधिकार वाले देशों में भी काफ़ी असमानता बनी रह सकती है, इसलिए राजनीतिक समानता को सामाजिक-आर्थिक समानता से पूरा करना ज़रूरी है।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. जड़ जमाई असमानता समाज के लिए ख़तरनाक क्यों मानी जाती है?

उत्तर: जब एक वर्ग पीढ़ियों से धन और सत्ता का उपभोग करता रहे और दूसरा वर्ग पीढ़ियों से ग़रीब बना रहे, तो समाज स्थायी रूप से वर्गों में बँट जाता है। समय के साथ ऐसा वर्गभेद आक्रोश और हिंसा को जन्म दे सकता है, और अमीर वर्गों की ताक़त के कारण ऐसे समाज को सुधारना कठिन हो जाता है।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. मार्क्सवाद और उदारवाद में असमानता को लेकर मुख्य अंतर क्या है?

उत्तर: मार्क्सवाद निजी स्वामित्व को असमानता की जड़ मानता है और आवश्यक संसाधनों पर जनता के नियंत्रण की माँग करता है। उदारवाद प्रतिस्पर्धा को संसाधन बाँटने का सबसे न्यायपूर्ण तरीक़ा मानता है और राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को अनिवार्यतः जुड़ा नहीं मानता, हर क्षेत्र को अलग तरीक़े से सुलझाने पर ज़ोर देता है।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. सकारात्मक कार्यवाई को अस्थायी उपाय क्यों माना गया है?

उत्तर: सकारात्मक कार्यवाई का उद्देश्य वंचित समुदायों को अतीत की असमानताओं से उबरने में मदद करना है, ताकि वे बाद में दूसरों के साथ बराबरी के आधार पर प्रतिस्पर्धा कर सकें। इसलिए इस विशेष सहायता को एक निश्चित समय अवधि तक चलने वाला तदर्थ उपाय माना गया है, स्थायी विशेषाधिकार नहीं।

प्रश्न 9 (2 अंक)

प्र. विभेदक बरताव को कब उचित माना जाता है?

उत्तर: विभेदक बरताव तभी उचित माना जाता है जब वह किसी समूह को समान अधिकारों का वास्तव में उपभोग करने में सक्षम बनाए, जैसे विकलांगों के लिए रैंप या रात्रि-पाली में काम करने वाली महिलाओं के लिए सुरक्षा। इसका औचित्य हमेशा समानता को बढ़ावा देना ही होना चाहिए, किसी दबंग समूह का विशेषाधिकार बनाए रखना नहीं।

प्रश्न 10 (2 अंक)

प्र. महिला आंदोलन ने 19वीं सदी में समान अधिकारों की क्या माँग की?

उत्तर: 19वीं सदी में महिलाओं ने मताधिकार, कॉलेज-विश्वविद्यालय में डिग्री पाने का अधिकार और काम करने का अधिकार, यानी पुरुषों जैसे ही अधिकार, की माँग की। नौकरी में प्रवेश के बाद उन्हें एहसास हुआ कि इन अधिकारों का वास्तव में उपयोग करने के लिए मातृत्व अवकाश और बालवाड़ी जैसी विशेष सुविधाएँ भी चाहिए।

प्रश्न 11 (2 अंक)

प्र. वैश्विक असमानता का तथ्य-पत्रक क्या दिखाता है? दो बिंदु दीजिए।

उत्तर: (1) आय में भारी असमानता है: कुछ सबसे अमीर व्यक्तियों की आय करोड़ों सबसे ग़रीब लोगों की सामूहिक आय से अधिक है, और दुनिया की सबसे ग़रीब जनसंख्या को वैश्विक आय का बहुत छोटा हिस्सा मिलता है। (2) प्रथम विश्व के औद्योगिक देश, जनसंख्या का छोटा हिस्सा होते हुए भी, दुनिया के अधिकांश उद्योग के मालिक हैं, अधिकांश ऊर्जा और संसाधनों की खपत करते हैं और अधिकांश हानिकारक उत्सर्जन करते हैं। (आँकड़े याद करने की आवश्यकता नहीं।)

प्रश्न 12 (2 अंक)

प्र. शहरी भारत में उच्च शिक्षा में जाति-समुदाय असमानता की तालिका किस ओर संकेत करती है?

उत्तर: स्नातकों की संख्या जातियों और समुदायों के बीच बहुत भिन्न है; अनुसूचित जातियाँ, मुस्लिम और अन्य पिछड़ी जातियाँ उच्च जातियों और कुछ दूसरे समुदायों से बहुत पीछे हैं। पुस्तक पूछती है कि क्या इतने बड़े अंतर संयोग से हो सकते हैं; ये जाति-व्यवस्था और दूसरे कारकों के काम करने की ओर इशारा करते हैं, यानी उच्च शिक्षा तक पहुँच अब भी असमान है। (आँकड़े याद करने की आवश्यकता नहीं।)

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. समानता के तीन आयामों, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक, को उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तर: राजनीतिक समानता का मतलब है सभी नागरिकों को समान नागरिकता देना, जैसे मताधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पर यह केवल औपचारिक क़ानूनी अधिकार है। सामाजिक समानता में राजनीतिक समानता को अवसर की समानता से पूरा किया जाता है, जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा और उचित पोषण की न्यूनतम गारंटी, ताकि लोग बराबरी के आधार पर प्रतिस्पर्धा कर सकें। आर्थिक समानता का मतलब है व्यक्तियों-वर्गों के बीच धन-संपत्ति-आय के बड़े अंतर को कम करना, हालाँकि पूर्ण आर्थिक समानता व्यावहारिक रूप से कभी संभव नहीं रही। तीनों आयामों को एक साथ संबोधित किए बिना समाज में वास्तविक समानता नहीं आ सकती, क्योंकि एक आयाम में समानता होने पर भी दूसरे आयामों में असमानता बनी रह सकती है।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. नारीवाद के अनुसार पितृसत्ता समाज में असमानता कैसे पैदा करती है?

उत्तर: नारीवाद के अनुसार स्त्री-पुरुष के बीच असमानता पितृसत्ता का परिणाम है, जो पुरुष को स्त्री से अधिक महत्त्व और शक्ति देती है। पितृसत्ता इस मान्यता पर टिकी है कि स्त्री-पुरुष प्रकृति से भिन्न हैं, इसलिए नारीवादी जैविक या लिंग-भेद और लैंगिकता (सामाजिक भूमिका) में अंतर करते हैं, यह दिखाने के लिए कि केवल बच्चे को जन्म देना जैविक तथ्य है, पालन-पोषण की पूरी ज़िम्मेदारी स्त्री पर डालना समाज की रचना है। पितृसत्ता स्त्री को “निजी”-“घरेलू” काम और पुरुष को “सार्वजनिक” काम तक सीमित करती है, जबकि अधिकतर स्त्रियाँ घर के बाहर भी काम करती हैं, फिर भी घरेलू काम की पूरी ज़िम्मेदारी उन्हीं पर रहती है, इसे “दोहरा बोझ” कहा जाता है। नारीवादी मानते हैं कि यह असमानता प्रकृति ने नहीं, समाज ने पैदा की है और इसे मिटाया जा सकता है।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. मार्क्सवाद और समाजवाद के दृष्टिकोण की तुलना कीजिए।

उत्तर: मार्क्स के अनुसार जड़ जमाई असमानता की मूल जड़ महत्त्वपूर्ण आर्थिक संसाधनों (ज़मीन, तेल, जंगल) का निजी स्वामित्व है, जो मालिकों को धन के साथ-साथ राजनीतिक ताक़त भी देता है, यह ताक़त लोकतांत्रिक सरकार के लिए ख़तरा बन सकती है, इसलिए मार्क्सवादी आवश्यक संसाधनों पर जनता के नियंत्रण की माँग करते हैं। समाजवाद औद्योगिक पूँजीवाद से पैदा असमानताओं की प्रतिक्रिया में उभरा और बाज़ार का पूर्ण विरोधी नहीं है, बल्कि शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में सरकारी नियमन का समर्थक है। भारत में समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया ने पाँच असमानताओं (स्त्री-पुरुष, रंग, जाति, उपनिवेशवाद, आर्थिक) को अलग-अलग जड़ों वाली बताकर साथ लड़ने पर ज़ोर दिया, जबकि उस समय के अधिकतर समाजवादी केवल आर्थिक (वर्गीय) असमानता को ही मुख्य मानते थे।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. सकारात्मक कार्यवाई के पक्ष और विपक्ष में दिए जाने वाले तर्कों की चर्चा कीजिए।

उत्तर: पक्ष में तर्क: कुछ समूह अतीत में सामाजिक पूर्वाग्रह, बहिष्कार और भेदभाव के शिकार रहे हैं, इसलिए वे तुरंत दूसरों के साथ बराबरी के आधार पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते; अतः एक न्यायपूर्ण समाज बनाने के लिए उन्हें अस्थायी विशेष सहायता (छात्रवृत्ति, आरक्षण) देना ज़रूरी है। विपक्ष में तर्क: आलोचकों का कहना है कि यह अन्य वर्गों को समान बरताव के अधिकार से मनमाने ढंग से वंचित करता है, इसलिए यह स्वयं एक तरह का भेदभाव (“उलटा भेदभाव”) है, और जाति/रंग पर आधारित भेद जातिगत-नस्लीय पूर्वाग्रह को और मज़बूत कर सकता है। इस बहस को सुलझाने के लिए किताब व्यक्ति के समान अधिकार और राज्य-नीति के मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में समानता, दोनों को साथ देखने की सलाह देती है।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. “एक जैसा बरताव” और “समान मानना” में अंतर स्पष्ट कीजिए, उदाहरण सहित।

उत्तर: “एक जैसा बरताव” का मतलब है सभी को बिल्कुल वही चीज़ देना, चाहे उनकी परिस्थिति अलग ही क्यों न हो। “समान मानना” का मतलब है कि मूल उद्देश्य समानता को बढ़ावा देना है, भले ही इसके लिए कुछ लोगों से अलग बरताव करना पड़े। उदाहरण के लिए, विकलांगों के लिए रैंप बनाना या रात में काम करने वाली महिलाओं को विशेष सुरक्षा देना, ये सब एक जैसा बरताव नहीं हैं, पर इनका उद्देश्य इन समूहों को बाक़ी समाज जितने अधिकारों का उपभोग करने लायक़ बनाना है, इसलिए इन्हें समानता को बढ़ाने वाला माना जाता है। हर विभेदक बरताव को सावधानी से जाँचना ज़रूरी है, ताकि वह किसी दबंग समूह का विशेषाधिकार दोबारा स्थापित करने का ज़रिया न बन जाए।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. आर्थिक असमानता को नापने के तरीक़े और भारत में इसकी स्थिति को समझाइए।

उत्तर: आर्थिक असमानता तब मानी जाती है जब व्यक्तियों या वर्गों के बीच धन, संपत्ति या आय में बड़ा अंतर हो। इसे नापने के दो मुख्य तरीक़े हैं, सबसे अमीर और सबसे ग़रीब समूहों के बीच अनुपातिक अंतर मापना, या ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या का आकलन करना। जनगणना 2011 के घरेलू सुविधाओं के आँकड़े भारत में गाँव और शहर के परिवारों के बीच बड़ी खाई दिखाते हैं। धन-दौलत की पूरी समानता किसी समाज में शायद कभी नहीं रही, इसलिए अधिकतर लोकतंत्र समान अवसर देने की कोशिश करते हैं ताकि प्रतिभा और संकल्प रखने वालों को अपनी हालत सुधारने का मौक़ा मिले, भले ही असमानता पूरी तरह ख़त्म न हो।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. समानता को बढ़ावा देने के तीन तरीक़ों, औपचारिक समानता, विभेदक बरताव और सकारात्मक कार्यवाई, को उदाहरण सहित विस्तार से समझाइए।

उत्तर: पहला क़दम औपचारिक समानता की स्थापना है, जिसका मतलब है असमानता और विशेषाधिकार की परंपरागत व्यवस्था को ख़त्म करना। दुनिया भर में रीति-रिवाज़ों और क़ानूनों ने ग़रीबों को मताधिकार से, महिलाओं को कई पेशों से, और भारत में निचली जातियों को शारीरिक श्रम के अलावा कुछ भी करने से रोका। भारतीय संविधान धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म-स्थान पर भेदभाव प्रतिबंधित करता है और छुआछूत को समाप्त करता है, यह औपचारिक समानता का उदाहरण है।
दूसरा क़दम विभेदक बरताव द्वारा समानता है। औपचारिक समानता पर्याप्त नहीं, क्योंकि कभी-कभी बराबर अधिकार का वास्तव में उपभोग करने के लिए अलग बरताव ज़रूरी होता है, जैसे विकलांगों के लिए सार्वजनिक भवनों में रैंप, या रात्रि-पाली में काम करने वाली महिलाओं के लिए यात्रा में विशेष सुरक्षा। ये उपाय समानता को कम नहीं, बढ़ाते हैं।
तीसरा क़दम सकारात्मक कार्यवाई है, जो इस विचार पर आधारित है कि गहरी जड़ें जमाई असमानताओं को मिटाने के लिए सकारात्मक क़दम (जैसे छात्रवृत्ति, नौकरियों-शिक्षा में आरक्षण) ज़रूरी हैं, ताकि अतीत में वंचित रहे समुदाय अस्थायी विशेष सहायता के बाद बराबरी से प्रतिस्पर्धा कर सकें। भारत ने यह नीति अपनाई है, हालाँकि यह बहुत बहस का विषय रही है। तीनों तरीक़े मिलकर एक सचमुच समतामूलक समाज बनाने की दिशा में काम करते हैं, कोई एक अकेला पर्याप्त नहीं।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
आज समानता एक व्यापक रूप से स्वीकृत आदर्श है, जिसे अनेक देशों के संविधान और कानूनों में सम्मिलित किया गया है। फिर भी समाज में हमारे चारों ओर समानता की बजाय असमानता अधिक नज़र आती है। अपने देश में हम आलीशान आवासों के साथ-साथ झोपड़पट्टियाँ, विश्वस्तरीय सुविधाओं से लैस स्कूल और वातानुकूलित कक्षाओं के साथ-साथ पेयजल या शौचालय की सुविधा से भी विहीन स्कूल, भोजन की बर्बादी के साथ-साथ भुखमरी देख सकते हैं।

(क) 1 अंक गद्यांश के अनुसार समानता को कहाँ सम्मिलित किया गया है?
उत्तर: अनेक देशों के संविधान और क़ानूनों में।

(ख) 2 अंक गद्यांश में बताया गया विरोधाभास क्या है?
उत्तर: लगभग सभी देश समानता को स्वीकृत आदर्श मानते हैं, फिर भी समाज में हर तरफ़ समानता की जगह असमानता ज़्यादा दिखाई देती है, जैसे आलीशान मकानों के साथ झोपड़पट्टियाँ।

(ग) 3 अंक गद्यांश में दिए गए उदाहरणों (आवास, स्कूल, भोजन) के आधार पर बताइए कि ये किस आयाम की असमानता दर्शाते हैं और इन्हें कम करने के लिए कौन-सा उपाय उपयुक्त होगा।
उत्तर: आवास, स्कूल-सुविधा और भोजन से जुड़े ये उदाहरण मुख्यतः सामाजिक और आर्थिक असमानता को दर्शाते हैं, क्योंकि ये शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं तक असमान पहुँच से जुड़े हैं। अध्याय के अनुसार, इन्हें कम करने के लिए राज्य को सभी नागरिकों को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधा, अच्छी शिक्षा का अवसर और न्यूनतम वेतन जैसी न्यूनतम गारंटी सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि शुरुआती असमानता किसी बच्चे के भविष्य को स्थायी रूप से सीमित न कर दे। जहाँ यह असमानता ऐतिहासिक वंचना से जुड़ी हो (जैसे किसी वंचित समुदाय के स्कूल की सुविधाएँ), वहाँ सकारात्मक कार्यवाई जैसे विशेष उपाय भी उचित हो सकते हैं।

केस स्टडी
पितृसत्ता से आशय एक ऐसी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्था से है, जिसमें पुरुष को स्त्री से अधिक महत्त्व और शक्ति दी जाती है। पितृसत्ता इस मान्यता पर आधारित है कि पुरुष और स्त्री प्रकृति से भिन्न हैं और यही भिन्नता समाज में उनकी असमान स्थिति को न्यायोचित ठहराती है। नारीवादी इस नज़रिये पर सवाल उठाते हैं और जैविक या लिंग-भेद और लैंगिकता (सामाजिक भूमिका) के बीच अंतर करने का आग्रह करते हैं।

(क) 1 अंक पितृसत्ता किस तरह की व्यवस्था है?
उत्तर: एक सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्था जो पुरुष को स्त्री से अधिक महत्त्व और शक्ति देती है।

(ख) 2 अंक गद्यांश के अनुसार नारीवादी जैविक या लिंग-भेद और लैंगिकता में अंतर क्यों करते हैं?
उत्तर: नारीवादी यह दिखाने के लिए अंतर करते हैं कि जैविक या लिंग-भेद जन्मजात है, पर स्त्री-पुरुष की सामाजिक भूमिकाएँ, यानी लैंगिकता, समाज द्वारा गढ़ी जाती हैं, इसलिए असमानता प्रकृति की देन नहीं बल्कि समाज की रचना है और इसे बदला जा सकता है।

(ग) 3 अंक गद्यांश में बताई गई पितृसत्ता की मान्यता को नारीवादी किस तर्क से चुनौती देते हैं, और इसका समाज पर क्या असर हो सकता है, विस्तार से समझाइए।
उत्तर: पितृसत्ता की मान्यता है कि स्त्री-पुरुष प्रकृति से भिन्न हैं और यही भिन्नता उनकी असमान सामाजिक स्थिति को उचित ठहराती है। नारीवादी इसे चुनौती देते हुए कहते हैं कि जैविक या लिंग-भेद, जैसे केवल स्त्री का गर्भधारण करना, एक प्राकृतिक तथ्य है, पर इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि घर के काम, निर्णय लेने की शक्ति या सार्वजनिक जीवन में भागीदारी भी स्त्री-पुरुष के बीच असमान रूप से बँटनी चाहिए, क्योंकि ये सामाजिक भूमिकाएँ, यानी लैंगिकता, समाज द्वारा तय की जाती हैं। इस तर्क का असर यह होता है कि असमानता को अब “स्वाभाविक” या “अपरिवर्तनीय” नहीं माना जा सकता, बल्कि इसे समाज की बनाई व्यवस्था के रूप में पहचानकर बदला जा सकता है, जैसे महिलाओं की शिक्षा, रोज़गार और सार्वजनिक निर्णयों में भागीदारी बढ़ाकर।