इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. योजना आयोग का स्थान किसने और कब लिया?
उत्तर: 1 जनवरी 2015 को नीति आयोग ने योजना आयोग का स्थान लिया।
प्र. खंडीय नियोजन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर: अर्थव्यवस्था के विभिन्न सेक्टरों, जैसे कृषि, सिंचाई, विनिर्माण, ऊर्जा, निर्माण, परिवहन, संचार, सामाजिक अवसंरचना और सेवाओं के विकास के लिए कार्यक्रम बनाना तथा उन्हें लागू करना खंडीय नियोजन कहलाता है।
प्र. लक्ष्य समूह कार्यक्रम के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर: लघु कृषक विकास संस्था (SFDA) और सीमांत किसान विकास संस्था (MFDA)।
प्र. पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम किस योजना में शुरू किया गया?
उत्तर: पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में, उत्तराखंड के सभी पर्वतीय ज़िलों, असम की मिकिर पहाड़ी व उत्तरी कछार पहाड़ियों, दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल) और नीलगिरी (तमिलनाडु) सहित कुल 15 ज़िलों के लिए।
प्र. गद्दी जनजाति किस भाषा में बात करती है?
उत्तर: गद्दीयाली भाषा में।
प्र. 2011 की जनगणना के अनुसार भरमौर उपमंडल की जनसंख्या और घनत्व कितना था?
उत्तर: जनसंख्या 39,113 और जनसंख्या घनत्व 21 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर।
प्र. ब्रंटलैंड रिपोर्ट के अनुसार सतत पोषणीय विकास को परिभाषित कीजिए।
उत्तर: वह विकास जिसमें भविष्य में आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकता-पूर्ति को प्रभावित किए बिना वर्तमान पीढ़ी द्वारा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है।
प्र. इंदिरा गांधी नहर तंत्र का पुराना नाम क्या था?
उत्तर: राजस्थान नहर।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. लक्ष्य क्षेत्र नियोजन और लक्ष्य समूह नियोजन में क्या अंतर है?
उत्तर: लक्ष्य क्षेत्र नियोजन में विशेष रूप से आर्थिक रूप से पिछड़े हुए भौगोलिक क्षेत्रों (जैसे पर्वतीय क्षेत्र, सूखा संभावी क्षेत्र) के विकास पर ध्यान दिया जाता है, जबकि लक्ष्य समूह नियोजन में समाज के विशेष वर्गों या समूहों (जैसे लघु व सीमांत किसान) के विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
प्र. सूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रम के उद्देश्य क्या थे?
उत्तर: इस कार्यक्रम के उद्देश्य थे: सूखा संभावी क्षेत्रों में लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराना, और सूखे के प्रभाव को कम करने के लिए उत्पादन के साधनों अर्थात् उत्पादक संपत्तियों को विकसित करना।
प्र. पिछड़े क्षेत्रों के विकास की राष्ट्रीय समिति ने सूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रम की समीक्षा में क्या पाया?
उत्तर: समिति ने पाया कि यह कार्यक्रम मुख्यतः कृषि तथा इससे संबद्ध सेक्टरों के विकास तक ही सीमित है, और इसमें पर्यावरणीय संतुलन की पुनःस्थापना पर विशेष बल दिया गया, जबकि जनसंख्या वृद्धि के कारण सीमांत भूमि के कृषि-उपयोग से पारिस्थितिकीय निम्नीकरण भी हो रहा है।
प्र. भरमौर क्षेत्र में गद्दी जनजाति की अर्थव्यवस्था परंपरागत रूप से किस पर आधारित थी?
उत्तर: परंपरागत रूप से गद्दियों की अर्थव्यवस्था जीविका निर्वाह कृषि और पशुचारण (भेड़ व बकरी पालन) पर आधारित थी, जिसमें खाद्यान्नों और पशुओं के उत्पादन पर बल दिया जाता था।
प्र. भरमौर में जनजातीय समन्वित विकास उपयोजना का सबसे महत्वपूर्ण योगदान क्या रहा?
उत्तर: विद्यालयों, जन स्वास्थ्य सुविधाओं, पेयजल, सड़कों, संचार और विद्युत के रूप में अवसंरचना का विकास इस उपयोजना का सबसे महत्वपूर्ण योगदान रहा।
प्र. इंदिरा गांधी नहर के प्रसार से क्षेत्र में क्या सकारात्मक पारिस्थितिकीय प्रभाव पड़े?
उत्तर: लंबी अवधि तक मृदा नमी उपलब्ध होने और कमान क्षेत्र विकास के तहत शुरू किए गए वनीकरण व चरागाह विकास कार्यक्रमों से यहाँ भूमि हरी-भरी हो गई, जिससे वायु अपरदन और नहरी तंत्र में बालू निक्षेप की प्रक्रियाएँ भी धीमी पड़ गईं।
प्र. 1972 में सिंचाई आयोग ने सूखा संभावी क्षेत्रों के परिसीमन के लिए क्या मापदंड अपनाया?
उत्तर: सिंचाई आयोग ने 30 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र का मापदंड लेकर सूखा संभावी क्षेत्रों का परिसीमन किया।
प्र. स्वतंत्रता के बाद भारत में नियोजन की प्रक्रिया में क्या बदलाव आया?
उत्तर: स्वतंत्रता के बाद भारत में केंद्रीकृत योजनाओं को अपनाया गया, लेकिन धीरे-धीरे विकेंद्रीकृत बहुस्तरीय नियोजन की ओर कदम बढ़ाए गए, जिसमें केंद्र, राज्य तथा जिला तीनों स्तर पर योजनाएँ तैयार करने की ज़िम्मेदारी बाँटी गई।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. नियोजन के दो उपागमों (खंडीय नियोजन और प्रादेशिक नियोजन) की तुलना कीजिए।
उत्तर: खंडीय नियोजन का अर्थ है अर्थव्यवस्था के विभिन्न सेक्टरों, जैसे कृषि, सिंचाई, विनिर्माण, ऊर्जा, निर्माण, परिवहन, संचार, सामाजिक अवसंरचना और सेवाओं के विकास के लिए कार्यक्रम बनाना तथा लागू करना। इसके विपरीत, किसी भी देश में सभी क्षेत्रों में एक समान आर्थिक विकास नहीं होता; कुछ क्षेत्र अधिक विकसित होते हैं तो कुछ पिछड़े रह जाते हैं। विकास का यह असमान प्रतिरूप सुनिश्चित करता है कि नियोजक एक स्थानिक परिप्रेक्ष्य अपनाएँ तथा विकास में प्रादेशिक असंतुलन कम करने के लिए योजना बनाएँ। इसी को प्रादेशिक नियोजन कहा जाता है। संक्षेप में, खंडीय नियोजन ‘क्या विकसित करें’ पर केंद्रित है जबकि प्रादेशिक नियोजन ‘कहाँ विकसित करें’ पर।
प्र. पिछड़े क्षेत्रों के विकास की राष्ट्रीय समिति ने पर्वतीय क्षेत्रों के विकास के लिए किन बातों को ध्यान में रखने का सुझाव दिया?
उत्तर: राष्ट्रीय समिति ने पहाड़ी क्षेत्रों में विकास के लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखने का सुझाव दिया: (1) सभी लोग लाभान्वित हों, केवल प्रभावशाली व्यक्ति ही नहीं; (2) स्थानीय संसाधनों और प्रतिभाओं का विकास किया जाए; (3) जीविका निर्वाह अर्थव्यवस्था को निवेश-उन्मुखी बनाया जाए; (4) अंतःप्रादेशिक व्यापार में पिछड़े क्षेत्रों का शोषण न हो; (5) पिछड़े क्षेत्रों की बाज़ार व्यवस्था में सुधार करके श्रमिकों को लाभ पहुँचाया जाए; और (6) पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखा जाए।
प्र. सूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रम के अंतर्गत अपनाई गई विकास रणनीतियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: इस कार्यक्रम में प्रारंभ में श्रम-प्रधान सिविल निर्माण कार्यों पर बल दिया गया, परंतु बाद में सिंचाई परियोजनाओं, भूमि विकास कार्यक्रमों, वनीकरण, चरागाह विकास और विद्युत, सड़कों, बाज़ार, ऋण सुविधाओं व सेवाओं जैसी आधारभूत ग्रामीण अवसंरचना पर ज़ोर दिया गया। समीक्षा में यह कार्यक्रम कृषि तक सीमित पाए जाने के बाद, वैकल्पिक रोज़गार अवसर पैदा करने और सूक्ष्म-स्तर पर समन्वित जल-संभर विकास कार्यक्रम अपनाने की रणनीति अपनाई गई, जिसमें जल, मिट्टी, पौधों तथा मानव व पशु जनसंख्या के बीच पारिस्थितिकीय संतुलन की पुनःस्थापना पर मुख्य रूप से ध्यान दिया गया।
प्र. भारत में सूखा संभावी क्षेत्र मुख्यतः किन राज्यों/क्षेत्रों में फैले हैं?
उत्तर: भारत में सूखा संभावी क्षेत्र मुख्यतः राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र, आंध्र प्रदेश के रायलसीमा और तेलंगाना पठार, कर्नाटक पठार तथा तमिलनाडु की उच्च भूमि और आंतरिक भाग के शुष्क व अर्ध-शुष्क भागों में फैले हुए हैं। इसके विपरीत, पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान के सूखा प्रभावित क्षेत्र सिंचाई के प्रसार के कारण सूखे से बच जाते हैं।
प्र. भरमौर तहसील की भौगोलिक स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर: भरमौर क्षेत्र 32°11′ उत्तर से 32°41′ उत्तर अक्षांशों तथा 76°22′ पूर्व से 76°53′ पूर्व देशांतरों के बीच स्थित है। यह लगभग 1,818 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है और इसका अधिकतर भाग समुद्र तल से 1,500 मीटर से 3,700 मीटर की औसत ऊँचाई के बीच स्थित है। यह क्षेत्र चारों दिशाओं में ऊँचे पर्वतों से घिरा है: उत्तर में पीर पंजाल तथा दक्षिण में धौलाधार पर्वत श्रेणियाँ हैं, जो पूर्व में रोहतांग दर्रे के पास आपस में मिलती हैं। रावी नदी और इसकी सहायक नदियाँ बुढ़ील व टुंडेन इस क्षेत्र में बहती हैं और गहरे महाखंड बनाती हैं, जो इस पहाड़ी प्रदेश को चार भूखंडों: होली, खणी, कुगती और तुंदाह में विभाजित करती हैं।
प्र. भरमौर जनजातीय क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास उपयोजना के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों की चर्चा कीजिए।
उत्तर: सामाजिक रूप से, इस उपयोजना से साक्षरता दर में तेज़ी से वृद्धि हुई: स्त्री साक्षरता दर 1971 में 1.88 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 65 प्रतिशत हो गई, साथ ही लिंग अनुपात में सुधार और बाल-विवाह में कमी आई। आर्थिक रूप से, परंपरागत जीविका निर्वाह कृषि-पशुचारण अर्थव्यवस्था में बदलाव आया: पिछले तीन दशकों में दालों और अन्य नकदी फ़सलों की खेती बढ़ी, यद्यपि खेती अभी भी परंपरागत तकनीकों से होती है। पशुचारण का महत्व घटा है: अब केवल दसवाँ भाग परिवार ही ऋतु-प्रवास करते हैं, फिर भी गद्दी जनजाति गतिशील बनी हुई है, क्योंकि इनकी बड़ी संख्या शरद ऋतु में मजदूरी हेतु कांगड़ा और आसपास के क्षेत्रों में प्रवास करती है। लाभ असमान भी रहा है: रावी किनारे बसे होली व खणी के गाँव सबसे अधिक लाभान्वित हुए, जबकि तुंदाह व कुगती के दूरदराज़ गाँव अभी भी विकास से बाहर हैं।
प्र. विकास की संकल्पना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से किस प्रकार बदली है?
उत्तर: द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत विकास की संकल्पना आर्थिक वृद्धि की पर्याय थी, जिसे सकल राष्ट्रीय उत्पाद, प्रति व्यक्ति आय और प्रति व्यक्ति उपभोग में समय के साथ बढ़ोतरी के रूप में मापा जाता था। परंतु अधिक आर्थिक वृद्धि वाले देशों में भी असमान वितरण के कारण गरीबी का स्तर तेज़ी से बढ़ा, इसलिए 1970 के दशक में ‘पुनर्वितरण के साथ वृद्धि’ तथा ‘वृद्धि और समानता’ जैसे वाक्यांश विकास की परिभाषा में शामिल किए गए। इससे यह अनुभव हुआ कि विकास की संकल्पना मात्र आर्थिक प्रक्षेत्र तक सीमित नहीं रखी जा सकती; इसमें कल्याण, रहने का स्तर, स्वास्थ्य, शिक्षा, समान अवसर और राजनीतिक-नागरिक अधिकार भी सम्मिलित हैं। 1980 के दशक तक विकास एक बहु-आयामी संकल्पना के रूप में उभरा, जिसमें समाज के सभी लोगों के लिए व्यापक सामाजिक व भौतिक कल्याण का समावेश है।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. इंदिरा गांधी नहर परियोजना का वर्णन कीजिए (उद्गम, लंबाई, कमान क्षेत्र तथा चरण-I और चरण-II)।
उत्तर: इंदिरा गांधी नहर, जिसे पहले राजस्थान नहर के नाम से जाना जाता था, भारत के सबसे बड़े नहर तंत्रों में से एक है। इसकी संकल्पना कँवर सेन ने 1948 में की थी और यह परियोजना 31 मार्च 1958 को प्रारंभ हुई। यह नहर पंजाब में हरिके बाँध से निकलती है और राजस्थान के थार मरुस्थल (मरुस्थली) में पाकिस्तान सीमा के समानांतर लगभग 40 किमी की औसत दूरी पर बहती है। इस नहर तंत्र की कुल नियोजित लंबाई 9,060 किमी है और यह 19.63 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य कमान क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा प्रदान करेगी; इसमें से लगभग 70 प्रतिशत क्षेत्र प्रवाह प्रणाली से और शेष लिफ़्ट प्रणाली से सिंचित होगा। निर्माण दो चरणों में पूरा हुआ: चरण-I का कमान क्षेत्र गंगानगर, हनुमानगढ़ और उत्तरी बीकानेर ज़िले में पड़ता है (कृषि योग्य क्षेत्र 5.53 लाख हेक्टेयर, भूतल थोड़ा ऊबड़-खाबड़, सिंचाई 1960 के दशक के आरंभ में शुरू); चरण-II का कमान क्षेत्र बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, नागौर और चुरू ज़िलों में फैला है (कृषि योग्य क्षेत्र 14.10 लाख हेक्टेयर, स्थानांतरित बालू टिब्बों वाला मरुस्थल, ग्रीष्म ऋतु में तापमान 50°C तक, सिंचाई 1980 के दशक के मध्य में शुरू)।
प्र. इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र में नहर सिंचाई के प्रसार से पड़े सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभावों की विवेचना कीजिए।
उत्तर: सकारात्मक प्रभाव: लंबी अवधि तक मृदा नमी उपलब्ध होने और कमान क्षेत्र विकास के तहत वनीकरण व चरागाह विकास कार्यक्रमों से भूमि हरी-भरी हो गई, जिससे वायु अपरदन और नहरी तंत्र में बालू निक्षेप की प्रक्रियाएँ धीमी पड़ीं। सिंचित क्षेत्र के विस्तार से बोए गए क्षेत्र में वृद्धि हुई और फ़सलों की सघनता बढ़ी; परंपरागत फ़सलों (चना, बाजरा, ग्वार) का स्थान गेहूँ, कपास, मूँगफली और चावल जैसी फ़सलों ने ले लिया, जिससे शुरुआत में कृषि व पशुधन उत्पादकता में भारी वृद्धि हुई। नकारात्मक प्रभाव: सघन सिंचाई और जल के अत्यधिक प्रयोग से जल भराव (जलाक्रांतता) और मृदा लवणता की दोहरी पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो गईं, जो लंबी अवधि में कृषि की सतत पोषणता पर ही प्रश्न खड़ा करती हैं। इसी कारण अनेक विद्वानों ने इस परियोजना की पारिस्थितिकीय पोषणता पर सवाल उठाए हैं, जिसे पिछले चार दशकों में हुए भौतिक पर्यावरण के निम्नीकरण ने काफ़ी हद तक सही भी ठहराया है।
प्र. इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र में सतत पोषणीय विकास को बढ़ावा देने के लिए सुझाए गए उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र में सतत पोषणीय विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सात उपाय प्रस्तावित किए गए हैं, जिनमें से पाँच पारिस्थितिकीय संतुलन बहाल करने पर बल देते हैं: (i) जल प्रबंधन नीति का कठोर कार्यान्वयन: चरण-I में फ़सल रक्षण सिंचाई और चरण-II में फ़सल व चरागाह हेतु विस्तारित सिंचाई का प्रावधान; (ii) शस्य प्रतिरूप में जल-सघन फ़सलों से बचना और खट्टे फलों जैसी बागाती फ़सलों को प्रोत्साहन; (iii) कमान क्षेत्र विकास कार्यक्रम: नालों का अस्तरीकरण, भूमि विकास व समतलन, तथा नहर के जल के समान वितरण हेतु वारबंदी पद्धति का प्रभावी क्रियान्वयन; (iv) जलाक्रांत व लवण-प्रभावित भूमि का पुनरुद्धार; (v) वनीकरण, वृक्षों की रक्षक मेखला का निर्माण और चरागाह विकास, जो विशेषकर चरण-II के भंगुर पर्यावरण में पारितंत्र-विकास हेतु आवश्यक है; (vi) सामाजिक सततपोषणता: निर्धन आर्थिक स्थिति वाले भूआवंटियों को कृषि के लिए पर्याप्त वित्तीय व संस्थागत सहायता; और (vii) आर्थिक सततपोषणता: कृषि व पशुपालन के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के अन्य सेक्टरों का विकास, जिससे मूल गाँवों, कृषि-सेवा केंद्रों और मंडी कस्बों के बीच प्रकार्यात्मक संबंध स्थापित हों।
प्र. सतत पोषणीय विकास की संकल्पना की उत्पत्ति और विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर: विकास एक बहु-आयामी संकल्पना है जो अर्थव्यवस्था, समाज तथा पर्यावरण में सकारात्मक व अनुत्क्रमीय परिवर्तन का द्योतक है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विकास आर्थिक वृद्धि का पर्याय था, परंतु 1970 के दशक में ‘पुनर्वितरण के साथ वृद्धि’ और ‘वृद्धि और समानता’ जैसे विचार शामिल हुए, और 1980 तक विकास एक बहु-आयामी सामाजिक-भौतिक कल्याण की संकल्पना बन गया। इसी दौर में, 1960 के दशक के अंत में पश्चिमी दुनिया में पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर बढ़ती जागरूकता से सतत पोषणीय धारणा का विकास हुआ, जो औद्योगिक विकास के अनापेक्षित पर्यावरणीय प्रभावों की चिंता को दर्शाती थी। एहरलिच की पुस्तक ‘द पापुलेशन बम’ (1968) और मीडोस व अन्य की पुस्तक ‘द लिमिट टू ग्रोथ’ (1972) ने इस चिंता को और गहरा किया। इसी परिपेक्ष्य में संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व पर्यावरण और विकास आयोग (WCED) की स्थापना की, जिसकी अध्यक्षता नॉर्वे की प्रधानमंत्री गरो हरलेम ब्रंटलैंड ने की। आयोग ने अपनी रिपोर्ट ‘अवर कॉमन फ़्यूचर’ (ब्रंटलैंड रिपोर्ट) 1987 में प्रस्तुत की, जिसमें सतत पोषणीय विकास को परिभाषित किया गया: एक ऐसा विकास जिसमें भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकता-पूर्ति को प्रभावित किए बिना वर्तमान पीढ़ी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करती है।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक भरमौर तहसील किस ज़िले में स्थित है?
उत्तर: हिमाचल प्रदेश के चंबा ज़िले में।
(ख) 1 अंक भरमौर किस तिथि से अधिसूचित जनजातीय क्षेत्र है?
उत्तर: 21 नवंबर, 1975 से।
(ग) 2 अंक गद्यांश के अनुसार भरमौर जनजातीय क्षेत्र की भौगोलिक व आर्थिक चुनौतियाँ क्या हैं?
उत्तर: गद्यांश के अनुसार भरमौर की जलवायु कठोर है, आधारभूत संसाधन कम हैं और पर्यावरण भंगुर है; यह हिमाचल प्रदेश के आर्थिक व सामाजिक रूप से सबसे पिछड़े इलाकों में से एक है, और ऐतिहासिक रूप से गद्दी जनजाति भौगोलिक व आर्थिक अलगाव तथा सामाजिक-आर्थिक विकास से वंचित रही है।
(क) 1 अंक गद्यांश के अनुसार विद्वानों ने इंदिरा गांधी नहर परियोजना पर किस प्रकार का प्रश्न उठाया है?
उत्तर: परियोजना की पारिस्थितिकीय पोषणता पर प्रश्न उठाए हैं।
(ख) 2 अंक गद्यांश के अनुसार विद्वानों का दृष्टिकोण किस बात से सही ठहराया गया?
उत्तर: पिछले चार दशकों में इस क्षेत्र में जिस तरह विकास हुआ और इससे जिस तरह भौतिक पर्यावरण का निम्नीकरण हुआ, उसने विद्वानों के इस दृष्टिकोण को काफ़ी हद तक सही ठहराया।
(ग) 2 अंक गद्यांश के अनुसार इस कमान क्षेत्र में सतत पोषणीय विकास का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए मुख्य रूप से किस पर बल देना होगा?
उत्तर: मुख्य रूप से पारिस्थितिकीय सतत पोषणता पर बल देना होगा।