इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. गोस्वामी तुलसीदास का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर: तुलसीदास का जन्म सन् 1532 में बाँदा (उत्तर प्रदेश) ज़िले के राजापुर गाँव में माना जाता है।
प्र. गोस्वामी तुलसीदास का निधन कब और कहाँ हुआ?
उत्तर: तुलसीदास का निधन सन् 1623 में काशी में हुआ।
प्र. तुलसीदास की किन्हीं चार रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर: रामचरितमानस, विनयपत्रिका, गीतावली और कवितावली (अथवा श्रीकृष्ण गीतावली, दोहावली, रामाज्ञा-प्रश्न में से कोई)।
प्र. तुलसीदास किस काव्यधारा और किस शाखा के कवि हैं?
उत्तर: तुलसीदास भक्तिकाल की सगुण काव्य-धारा में रामभक्ति शाखा के सर्वोपरि कवि हैं।
प्र. प्रस्तुत तीनों छंद (दो कवित्त, एक सवैया) कवितावली के किस कांड से लिए गए हैं?
उत्तर: ये तीनों छंद कवितावली के ‘उत्तर कांड’ से लिए गए हैं।
प्र. पहले कवित्त के अनुसार पेट की आग किससे भी बड़ी बताई गई है?
उत्तर: पेट की आग बड़वाग्नि (समुद्र की आग) से भी बड़ी बताई गई है: ‘आगि बड़वागितें बड़ी है आगि पेटकी’।
प्र. दूसरे कवित्त में दरिद्रता की तुलना किससे की गई है?
उत्तर: दरिद्रता की तुलना दशानन अर्थात रावण से की गई है, ‘दारिद-दसानन’ कहकर।
प्र. सवैया में तुलसी अपनी पहचान क्या बताते हैं?
उत्तर: तुलसी कहते हैं ‘तुलसी सरनाम गुलामु है राम को’ अर्थात वे राम के दास (गुलाम) के रूप में प्रसिद्ध हैं; जिसे जो रुचे, कुछ भी कहे (‘जाको रुचै सो कहै कछु ओऊ’)।
प्र. लक्ष्मण-मूर्च्छा प्रसंग रामचरितमानस के किस कांड से लिया गया है?
उत्तर: यह प्रसंग रामचरितमानस के लंका कांड से लिया गया है।
प्र. हनुमान के आगमन को किस रस के उदय के रूप में देखा गया है?
उत्तर: शोक-भरे (करुण रस से भरे) परिवेश में हनुमान के संजीवनी लेकर आगमन को करुण रस के बीच वीर रस के उदय के रूप में देखा गया है।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. तुलसीदास में भक्त और रचनाकार का द्वंद्व तथा शास्त्र और लोक का द्वंद्व किस तरह दिखता है?
उत्तर: तुलसी में भक्त और रचनाकार का द्वंद्व है, वे भक्त होते हुए भी एक कुशल रचनाकार हैं। इसी तरह शास्त्र और लोक का द्वंद्व भी है, संवेदना की दृष्टि से वे लोक की ओर झुके हैं तो शिल्पगत मर्यादा की दृष्टि से शास्त्र की ओर। शास्त्रीयता को लोकग्राह्य और लोकगृहीत को शास्त्रीय बनाने की उभयमुखी प्रक्रिया उनके काव्य में लगातार चलती है।
प्र. तुलसीदास को हिंदी का ‘जातीय कवि’ क्यों कहा गया है?
उत्तर: तुलसीदास अपने समय में हिंदी-क्षेत्र में प्रचलित सभी भावात्मक व काव्यभाषायी तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे तत्कालीन दोनों काव्य-भाषाओं, अवधी और ब्रजभाषा, तथा दोनों संस्कृति-कथाओं, सीताराम और राधाकृष्ण, को साधिकार अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाते हैं, इसीलिए उन्हें जातीय कवि कहा गया है।
प्र. पहले कवित्त में गिनाए गए दस पेशों के लोगों की सूची से तुलसी क्या दिखाना चाहते हैं?
उत्तर: किसबी, किसान, बनिक, भिखारी, भाट, चाकर, नट, चोर, चार और चेटकी, इन दस अलग-अलग पेशों के लोगों की सूची देकर तुलसी दिखाना चाहते हैं कि ‘पेट की आग’ कोई एक वर्ग-विशेष की समस्या नहीं, बल्कि अनेक पेशों के लोगों की समस्या है; पाठ के अनुसार संसार के अच्छे-बुरे समस्त लीला-प्रपंचों का आधार ‘पेट की आग’ है, जिसका समाधान वे राम-रूपी घनश्याम के कृपा-जल में देखते हैं।
प्र. दूसरे कवित्त में तुलसी अपने युग की किस समस्या का यथार्थपरक चित्रण करते हैं?
उत्तर: दूसरे कवित्त में तुलसी प्रकृति और शासन की विषमता से उपजी बेकारी और गरीबी की पीड़ा का यथार्थपरक चित्रण करते हैं। खेती न होना, भीख न मिलना, व्यापार न चलना और नौकरी न मिलना, चारों ओर से घिरे लोग एक-दूसरे से पूछते हैं ‘कहाँ जाई, का करी?’, यह असहायता की पराकाष्ठा है।
प्र. ‘दारिद-दसानन’ में कौन-सा अलंकार है? इसका अर्थ बताइए और यह भी बताइए कि यह कितना सटीक है।
उत्तर: ‘दारिद-दसानन’ में रूपक अलंकार है, क्योंकि दरिद्रता (उपमेय) पर रावण (उपमान) का आरोप किया गया है, अर्थात दरिद्रता रूपी रावण। जिस तरह रावण ने पूरी दुनिया को त्रस्त कर रखा था, उसी तरह दरिद्रता ने भी समूची दुनिया को दबा रखा है (‘दारिद-दसानन दबाई दुनी’)। यह रूपक इसलिए सटीक लगता है क्योंकि दोनों दुनिया को दबाने वाले और विनाशकारी हैं, और इस दारिद-दसानन से मुक्ति के लिए तुलसी “दीनबंधु!” को पुकारते हैं।
प्र. सवैया में तुलसी अपनी फ़कीरी जीवन-शैली का वर्णन किस तरह करते हैं?
उत्तर: सवैया की अंतिम पंक्ति में तुलसी कहते हैं ‘माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबको दोऊ’ अर्थात वे माँगकर खाते हैं, मस्जिद में सोते हैं, न किसी से कुछ लेते हैं न किसी को कुछ देते हैं। इसे उनकी अत्यंत सरल, निस्पृह और फ़कीरी जीवन-शैली के रूप में पढ़ा जा सकता है।
प्र. राम लक्ष्मण को उठाने का प्रयास करते हुए उनके किस स्वभाव का स्मरण करते हैं?
उत्तर: राम लक्ष्मण के सदा ‘मृदुल’ (कोमल) स्वभाव का स्मरण करते हैं: ‘बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ’। वे कहते हैं कि लक्ष्मण ने उन्हें कभी दुखी देखकर सहन नहीं किया, इसलिए अब उनके बुलाने पर उठकर प्रतिक्रिया न देना उनके स्वभाव के विपरीत लगता है, यही सोचकर राम व्याकुल हैं।
प्र. राम ‘जैहउँ अवध कवन मुहुँ लाई’ कहकर किस चिंता को व्यक्त करते हैं?
उत्तर: राम कहते हैं कि अगर लक्ष्मण को खोकर वे अयोध्या लौटे तो किस मुँह से लौटेंगे। यह पंक्ति उनकी इस गहरी चिंता को व्यक्त करती है कि एक स्त्री (सीता) के लिए अपने प्रिय भाई को गँवाने के बाद अयोध्यावासियों और परिवार को क्या जवाब देंगे, यह उनके प्रलाप का एक अत्यंत मानवीय पक्ष है।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. तुलसीदास की काव्य-दृष्टि (भाषा-चयन और द्वंद्व-समन्वय) की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर: तुलसीदास की भक्ति इतनी लोकोन्मुख है कि वे लोकमंगल की साधना के कवि माने जाते हैं। संस्कृत में सर्जन-क्षमता होने के बावजूद उन्होंने रचना के लिए लोकभाषा (अवधी व ब्रजभाषा) को चुना। उनमें भक्त और रचनाकार का द्वंद्व है, उसी तरह शास्त्र और लोक का भी द्वंद्व है, संवेदना की दृष्टि से वे लोक की ओर झुके हैं तो शिल्पगत मर्यादा की दृष्टि से शास्त्र की ओर। शास्त्रीयता को लोकग्राह्य और लोकगृहीत को शास्त्रीय बनाने की उभयमुखी प्रक्रिया भी उनके यहाँ चलती है, जो उन्हें विद्वानों और जनसामान्य दोनों में समान रूप से लोकप्रिय बनाती है। पाठ के अनुसार उनकी एक अनन्य विशेषता है कि वे दार्शनिक और लौकिक स्तर के नाना द्वंद्वों के चित्रण और उनके समन्वय के कवि हैं।
प्र. तुलसीदास को हिंदी का ‘जातीय कवि’ क्यों कहा गया है, और सांगरूपक अलंकार के क्षेत्र में उनकी पहचान की तुलना कालिदास से किस प्रकार की गई है?
उत्तर: तुलसीदास अपने समय के हिंदी-क्षेत्र में प्रचलित सभी भावात्मक और काव्यभाषायी तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसीलिए वे जातीय कवि कहलाते हैं। वे तत्कालीन दोनों काव्य-भाषाओं (अवधी, ब्रजभाषा) और दोनों संस्कृति-कथाओं (सीताराम, राधाकृष्ण) को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाते हैं। इसके अतिरिक्त, जिस तरह उपमा अलंकार के क्षेत्र में कालिदास की एक विशिष्ट पहचान है, उसी तरह सांगरूपक अलंकार (उपमेय पर उपमान का उसके अंगों सहित आरोप) के क्षेत्र में तुलसीदास की पहचान है।
प्र. पहले कवित्त ‘किसबी किसान…’ की व्याख्या करते हुए इसका केंद्रीय भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस कवित्त में तुलसी दस अलग-अलग पेशों, किसबी, किसान, बनिक, भिखारी, भाट, चाकर, नट, चोर, चार और चेटकी, के लोगों की सूची देते हैं, जो पेट भरने के लिए ऊँचे-नीचे और धर्म-अधर्म दोनों तरह के कर्म करते हैं, यहाँ तक कि बेटा-बेटी तक बेच देते हैं। इसका केंद्रीय भाव है कि संसार के सभी अच्छे-बुरे लीला-प्रपंचों का मूल कारण ‘पेट की आग’ है, जो बड़वाग्नि से भी बड़ी है। तुलसी इसका समाधान राम-रूपी घनश्याम (मेघ) की कृपा में देखते हैं, अर्थात राम-भक्ति ही इस दारुण यथार्थ से मुक्ति का मार्ग है।
प्र. दूसरे कवित्त ‘खेती न किसान…’ में चित्रित बेकारी और दरिद्रता की व्याख्या कीजिए।
उत्तर: इस कवित्त में तुलसी बताते हैं कि न किसान के पास खेती है, न भिखारी को भीख मिलती है, न व्यापारी का व्यापार चलता है और न नौकर को नौकरी मिलती है। रोज़ी-रोटी से वंचित लोग चिंता में डूबे एक-दूसरे से पूछते हैं ‘कहाँ जाई, का करी?’ तुलसी कहते हैं कि वेद-पुराणों में कहा गया है और लोक में भी देखा जाता है कि संकट के समय, हे राम, सब पर आपने कृपा की है (‘साँकरे सबैं पै, राम! रावरें कृपा करी’)। दरिद्रता पर रावण (दसानन) का रूपक बाँधकर, वे राम को ‘दीनबंधु’ कहकर इस दारिद-दसानन के नाश की प्रार्थना करते हैं।
प्र. सवैया ‘धूत कहौ…’ में तुलसी के आत्मविश्वासी भक्त-हृदय का विवेचन कीजिए।
उत्तर: इस सवैया में तुलसी कहते हैं कि कोई उन्हें धूर्त कहे, अवधूत कहे, राजपूत कहे या जुलाहा कहे, इससे उन्हें कोई अंतर नहीं पड़ता, क्योंकि तुलसी स्वयं कहते हैं “काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ”, अर्थात न वे किसी परिवार से वैवाहिक संबंध जोड़ेंगे, न किसी की जाति बिगाड़ेंगे। वे कहते हैं ‘तुलसी सरनाम गुलामु है राम को’: वे राम के दास के रूप में प्रसिद्ध हैं, जिसे जो रुचे कहे। वे माँगकर खाने और मस्जिद में सोने जैसी अत्यंत सामान्य फ़कीरी ज़िंदगी बिताते हैं, न किसी से कुछ लेते हैं न देते हैं। पाठ के अनुसार भक्ति की गहनता और सघनता में उपजे इसी आत्मविश्वास से समाज में व्याप्त जात-पाँत और धर्म के विभेदक दुराग्रहों के तिरस्कार का साहस पैदा होता है।
प्र. राम के विलाप में लक्ष्मण के प्रति उनके प्रेम के कौन-कौन से पहलू उजागर होते हैं?
उत्तर: राम के विलाप में लक्ष्मण के प्रति प्रेम के कई पहलू उजागर होते हैं। पहला, वे लक्ष्मण के मृदुल स्वभाव और अपने प्रति उनके सदा के त्याग को याद करते हैं, ‘मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता।’ दूसरा, वे कहते हैं कि यदि उन्हें बन में भाई से बिछड़ने का पता होता तो वे पिता की आज्ञा भी न मानते। तीसरा, वे लक्ष्मण के बिना अपने को पंख-रहित पक्षी, मणि-रहित सर्प और सूँड़-रहित हाथी जैसा दीन बताते हैं। चौथा, वे लक्ष्मण को सहोदर से भी बढ़कर मानते हैं, यद्यपि वे सहोदर नहीं थे। यह सब मिलकर ईश्वर राम का पूरी तरह मानवीकरण कर देता है।
प्र. लक्ष्मण-मूर्च्छा प्रसंग में हनुमान के आगमन और उसके बाद की घटनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर: जब वानर-दल राम के प्रलाप को सुनकर विकल हो उठता है, ठीक उसी समय हनुमान संजीवनी बूटी लेकर आ जाते हैं, जिसे कवि करुण रस के बीच वीर रस के उदय की तरह देखता है। राम हर्षित होकर हनुमान से मिलते हैं; परम सुजान प्रभु हनुमान के प्रति अत्यंत कृतज्ञ हैं (‘अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना’)। तुरंत वैद्य (सुषेण) उपाय करते हैं और लक्ष्मण हर्षित होकर उठ बैठते हैं। राम हृदय से लगाकर भाई से मिलते हैं और सारा वानर-भालू समूह हर्षित होता है। हनुमान वैद्य को जिस तरह लाए थे, उसी तरह वापस पहुँचा आते हैं। यह समाचार सुनकर रावण अत्यंत विषाद में बार-बार सिर धुनता है, और व्याकुल होकर कुंभकरण को जगाने का प्रयत्न करता है।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. गोस्वामी तुलसीदास के जीवन-परिचय और उनकी काव्य-विशेषताओं का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर: गोस्वामी तुलसीदास का जन्म सन् 1532 में बाँदा (उत्तर प्रदेश) ज़िले के राजापुर गाँव में माना जाता है, और उनका निधन सन् 1623 में काशी में हुआ। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं: रामचरितमानस, विनयपत्रिका, गीतावली, श्रीकृष्ण गीतावली, दोहावली, कवितावली और रामाज्ञा-प्रश्न। वे भक्तिकाल की सगुण काव्य-धारा में रामभक्ति शाखा के सर्वोपरि कवि हैं, जिनकी भक्ति इतनी लोकोन्मुख है कि वे लोकमंगल की साधना के कवि माने जाते हैं। संस्कृत में सर्जन-क्षमता होने के बावजूद उन्होंने लोकभाषा (अवधी-ब्रजभाषा) को अपनाया। उनमें भक्त-रचनाकार और शास्त्र-लोक का द्वंद्व है, जिसका वे अद्भुत समन्वय करते हैं। वे हिंदी के जातीय कवि हैं, जो अपने समय की दोनों काव्य-भाषाओं और दोनों संस्कृति-कथाओं (सीताराम, राधाकृष्ण) को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाते हैं। उपमा में कालिदास तो सांगरूपक में तुलसी की पहचान अद्वितीय है।
प्र. कवितावली के तीनों प्रस्तुत छंदों (दोनों कवित्त और सवैया) का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: पहले कवित्त ‘किसबी किसान…’ में तुलसी दस अलग-अलग पेशों के लोगों की सूची देकर दिखाते हैं कि सभी वर्गों के लोग पेट की आग बुझाने के लिए ऊँचे-नीचे कर्म करते हैं, यह आग बड़वाग्नि से भी बड़ी है, और इसका समाधान वे राम-रूपी घनश्याम की कृपा में देखते हैं। दूसरे कवित्त ‘खेती न किसान…’ में वे प्रकृति और शासन की विषमता से उपजी बेकारी-गरीबी का यथार्थपरक चित्रण करते हैं, दरिद्रता को रावण से उपमित करके दीनबंधु राम से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। तीसरे छंद, सवैया ‘धूत कहौ…’ में तुलसी जाति-भेद और समाज के दिए किसी भी नाम को सहजता से स्वीकार करते हुए, और जात-पाँत व धर्म के विभेदक दुराग्रहों का तिरस्कार करते हुए, कहते हैं कि वे राम के दास के रूप में प्रसिद्ध हैं (‘तुलसी सरनाम गुलामु है राम को’), और वे अत्यंत सादा फ़कीरी जीवन जीते हैं। तीनों छंद मिलकर तुलसी की सामाजिक-आर्थिक यथार्थ की गहरी समझ और उनकी अटूट राम-भक्ति को दर्शाते हैं।
प्र. लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम के विलाप के प्रसंग का विस्तार से वर्णन करते हुए बताइए कि यह प्रसंग राम के मानवीकरण में कैसे सहायक है।
उत्तर: यह प्रसंग रामचरितमानस के लंका कांड से लिया गया है, जब लक्ष्मण को शक्ति-बाण लगता है। भाई के शोक में विगलित राम का विलाप धीरे-धीरे प्रलाप में बदल जाता है। वे लक्ष्मण को उठाने का प्रयास करते हुए उनके मृदुल स्वभाव और अपने प्रति उनके त्याग को याद करते हैं, अपने को पंख-रहित पक्षी, मणि-रहित सर्प और सूँड़-रहित हाथी जैसा दीन बताते हैं, और भावुक होकर कहते हैं कि लक्ष्मण जैसा सहोदर भाई संसार में कहीं नहीं मिलता, यद्यपि वे वास्तव में सहोदर नहीं थे। वे अयोध्या लौटने की चिंता भी व्यक्त करते हैं। इस घने शोक-परिवेश में हनुमान का संजीवनी लेकर आना करुण रस के बीच वीर रस के उदय जैसा है। वैद्य के उपचार से लक्ष्मण स्वस्थ होते हैं, और यह समाचार सुनकर रावण विषाद करता है तथा कुंभकरण को जगाने का प्रयत्न करता है। यह पूरा प्रसंग ईश्वरीय राम का पूर्ण मानवीकरण कर देता है, जिससे पाठक भक्त तुलसी के भीतर से कवि तुलसी के उभर आने की अनुभूति करता है, और राम की पीड़ा अत्यंत वास्तविक, मानवीय अनुभूति के रूप में सामने आती है।
5 केस स्टडी
बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी।
जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस,
कहैं एक एकन सों ‘कहाँ जाई, का करी?’
बेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत,
साँकरे सबैं पै, राम! रावरें कृपा करी।
दारिद-दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु!
दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी।।
(क) 1 अंक इस पद्यांश में किन-किन की जीविका छिन जाने की बात कही गई है? (क) केवल किसान की (ख) किसान, भिखारी, व्यापारी और नौकर, सभी की (ग) केवल भिखारी की (घ) केवल व्यापारी की
उत्तर: सही उत्तर (ख) है: किसान, भिखारी, व्यापारी और नौकर, सभी की। पंक्ति में चारों वर्गों, किसान (खेती), भिखारी (भीख), व्यापारी (बनिज) और नौकर (चाकरी) का उल्लेख है, सभी की जीविका छिन गई है।
(ख) 1 अंक ‘कहाँ जाई, का करी?’ पंक्ति किस भाव को दर्शाती है? (क) उत्साह और खुशी को (ख) पूर्ण असहायता और चिंता को (ग) क्रोध और विद्रोह को (घ) उदासीनता को
उत्तर: सही उत्तर (ख) है: पूर्ण असहायता और चिंता को। यह पंक्ति जीविका-विहीन लोगों की गहरी असहायता और चिंता को दर्शाती है, जो नहीं जानते कि क्या करें, कहाँ जाएँ।
(ग) 2 अंक इस पद्यांश में दरिद्रता को ‘दारिद-दसानन’ (दरिद्रता रूपी रावण) क्यों कहा गया है?
उत्तर: जिस तरह रावण ने अपने अत्याचार से पूरी दुनिया को त्रस्त कर रखा था, उसी तरह दरिद्रता ने भी पूरे समाज (‘दुनी’) को दबा रखा है। यह रूपक दरिद्रता की व्यापकता और विनाशकारी शक्ति को उतनी ही भयावह बताती है जितनी रावण की शक्ति थी, और इसीलिए तुलसी इस ‘दारिद-दसानन’ से मुक्ति के लिए “दीनबंधु!” (राम) को पुकारते हैं।
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही।।
जैहउँ अवध कवन मुहुँ लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई।।
(क) 1 अंक राम अपने जीवन की तुलना लक्ष्मण के बिना किन-किन से करते हैं? (क) सूरज और चंद्रमा से (ख) पंख-रहित पक्षी, मणि-रहित सर्प और सूँड़-रहित हाथी से (ग) नदी और सागर से (घ) फूल और काँटे से
उत्तर: सही उत्तर (ख) है: पंख-रहित पक्षी, मणि-रहित सर्प और सूँड़-रहित हाथी से। राम कहते हैं ‘जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।’ अर्थात लक्ष्मण के बिना उनका जीवन ऐसा ही दीन होगा।
(ख) 1 अंक ‘जैहउँ अवध कवन मुहुँ लाई’ पंक्ति में राम किस चिंता को व्यक्त करते हैं? (क) राज्याभिषेक की चिंता (ख) अयोध्या लौटकर किस मुँह से जाएँगे, इसकी चिंता (ग) युद्ध जीतने की चिंता (घ) सीता की चिंता
उत्तर: सही उत्तर (ख) है: अयोध्या लौटकर किस मुँह से जाएँगे, इसकी चिंता। राम चिंतित हैं कि प्रिय भाई को स्त्री (सीता) के कारण गँवाकर वे किस मुँह से अयोध्या लौटेंगे।
(ग) 2 अंक इस पद्यांश के आधार पर बताइए कि राम का यह विलाप उन्हें एक सामान्य मनुष्य की तरह कैसे प्रस्तुत करता है।
उत्तर: इस पद्यांश में राम अपने को ईश्वर के रूप में नहीं, बल्कि एक असहाय, भावुक भाई के रूप में प्रस्तुत करते हैं जो अपने प्रिय भाई को खोने की आशंका से अत्यंत विचलित है। पंख-रहित पक्षी, मणि-रहित सर्प और सूँड़-रहित हाथी जैसी दीनता की तुलना, तथा अयोध्या लौटने पर लोगों को क्या जवाब देंगे, यह सांसारिक चिंता, दोनों ही एक सामान्य मनुष्य की स्वाभाविक भावनाएँ हैं। यही तत्व इस प्रसंग में ईश्वरीय राम का पूर्ण मानवीकरण कर देता है।