कवितावली (उत्तर कांड से) व लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप — तुलसीदास

इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • गोस्वामी तुलसीदास का जीवन-परिचय और उनकी सात प्रमुख रचनाएँ
  • तुलसी ने संस्कृत छोड़कर लोकभाषा (अवधी-ब्रज) क्यों चुनी, और वे “जातीय कवि” क्यों कहलाते हैं
  • ‘कवितावली’ के तीनों छंदों (दो कवित्त, एक सवैया) का पूरा पाठ, शब्दार्थ और सरल भावार्थ
  • ‘लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप’ प्रसंग की पूरी कथा, रामचरितमानस, लंकाकांड से
  • दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त और सवैया, पाँचों छंदों के मात्रा/वर्ण-नियम
  • अध्याय के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर स्वयं लिखने की तैयारी
तुलसीदासकवितावलीरामचरितमानसलंकाकांडअवधी-ब्रजकरुण रसवीर रससांगरूपक अलंकार

1 कवि परिचय: गोस्वामी तुलसीदास

भक्तिकाल की सगुण काव्य-धारा में रामभक्ति शाखा के सर्वोपरि कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं। पाठ के अनुसार उनकी भक्ति इस हद तक लोकोन्मुख है कि वे लोकमंगल (सबकी भलाई) की साधना के कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं; यह उनकी काव्य-संवेदना ही नहीं, काव्यभाषा के घटकों की दृष्टि से भी सत्य है।

  • पाठ के अनुसार ‘रामचरितमानस’ की विश्वप्रसिद्ध लोकप्रियता के पीछे सीताराम कथा से अधिक लोक-संवेदना और समाज की नैतिक बनावट की समझ है।
  • उनके सीता-राम ईश्वर की अपेक्षा तुलसी के देश-काल के आदर्शों के अनुरूप मानवीय धरातल पर पुनः सृष्ट चरित्र हैं।
  • गोस्वामी जी ग्रामीण व कृषक संस्कृति तथा रक्त संबंध की मर्यादा पर आदर्शीकृत गृहस्थ जीवन के चितेरे कवि हैं।

1.1 जीवन-परिचय

बिंदु विवरण
जन्म सन् 1532 ई. में, बाँदा (उत्तर प्रदेश) ज़िले के राजापुर गाँव में माना जाता है
निधन सन् 1623 ई. में, काशी में
भक्ति-शाखा सगुण भक्ति काव्यधारा, रामभक्ति शाखा के सर्वोपरि कवि
भाषा अवधी और ब्रजभाषा (लोकभाषा), संस्कृत में रचना-क्षमता रखते हुए भी

1.2 प्रमुख रचनाएँ (सात)

1

रामचरितमानस

हिंदी का अद्वितीय महाकाव्य, अवधी में

2

विनयपत्रिका

ब्रजभाषा में विनय-भक्ति के पद

3

गीतावली

गीत-शैली में राम-कथा

4

श्रीकृष्ण गीतावली

कृष्ण-भक्ति के गीत

5

दोहावली

दोहों का संग्रह

6

कवितावली

कवित्त-सवैया शैली में राम-कथा (इसी अध्याय के छंद यहीं से)

7

रामाज्ञा-प्रश्न

पाठ की रचना-सूची में सातवाँ नाम

कवि-परिचय में दी गई चौपाई

हृदय-सिंधु मति सीप समाना। स्वाती सारद कहहिं सुजाना।।
जौं बरषै बर बारि विचारू। होहिं कबित मुकुतामनी चारू।।
कीरति भनिति भूति भल सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई।।

भावार्थ: हृदय समुद्र के समान, बुद्धि सीप के समान; विद्वान शारदा (वाणी) को स्वाती नक्षत्र की बूँद कहते हैं। विचार की अच्छी वर्षा हो तो कविता मोतियों-सी सुंदर बनती है, जैसे गंगा सबका हित करती है, वैसे ही अच्छी कीर्ति-रचना-ऐश्वर्य भी सबका कल्याण करने वाला होना चाहिए।

परीक्षा संकेत

तुलसीदास का जन्म-वर्ष, जन्म-स्थान और सातों रचनाओं के नाम (पाठ में दी गई सूची के अनुसार) याद रखिए।

2 तुलसी की काव्य-दृष्टि: भाषा, द्वंद्व और समन्वय

संस्कृत में रचना-क्षमता रखते हुए भी तुलसीदास ने लोकभाषा (अवधी व ब्रजभाषा) चुनी, इसी से वे विद्वानों और आम जनता दोनों में समान रूप से लोकप्रिय हैं।

भक्त और रचनाकार का द्वंद्व

  • एक ओर राम के भक्त
  • दूसरी ओर कुशल काव्य-रचनाकार

शास्त्र और लोक का द्वंद्व

  • संवेदना की दृष्टि से लोक की ओर झुकाव
  • शिल्पगत मर्यादा की दृष्टि से शास्त्र की ओर झुकाव
  • शास्त्रीयता को लोकग्राह्य और लोकगृहीत को शास्त्रीय बनाने की उभयमुखी प्रक्रिया
कंठस्थ करेंपरिभाषा 1

द्वंद्व-चित्रण और समन्वय: तुलसीदास दार्शनिक और लौकिक स्तर के अनेक द्वंद्वों (विरोधों) का चित्रण करते हैं, और उन्हीं में छिपे एक मानवीय सूत्र को खोजकर समन्वय (मेल) भी बिठा देते हैं, इसी से हर विचारधारा के लोगों को तुलसी-काव्य में अपनी उपस्थिति का संतोष मिलता है।

पाठ के अनुसार तुलसीदास इस अर्थ में हिंदी के जातीय कवि हैं कि अपने समय में हिंदी-क्षेत्र में प्रचलित सारे भावात्मक व काव्यभाषायी तत्त्वों का प्रतिनिधित्व वे करते हैं। इसके दो उदाहरण:

तुलसी की जातीय पहचान
दो काव्यभाषाएँअवधी और ब्रजभाषा, दोनों में साधिकार रचना
दो संस्कृति-कथाएँसीताराम-कथा और राधाकृष्ण-कथा, दोनों को माध्यम बनाना
क्या आप जानते हैं?

उपमा अलंकार में जो पहचान कालिदास की है, वही पहचान सांगरूपक अलंकार में तुलसीदास की है (सांगरूपक: उपमेय पर उपमान का उसके अंगों सहित आरोप)।

3 कवितावली (उत्तर कांड से): परिचय

यहाँ पाठ में ‘कवितावली’ के उत्तर कांड से दो कवित्त और एक सवैया दिए गए हैं, तुलसी को अपने युग की सच्चाई और अपने जीवन दोनों का गहरा बोध है, ये तीनों छंद इसी के प्रमाण हैं। पाठ के अनुसार “विविध विषमताओं से ग्रस्त कलिकाल तुलसी का युगीन यथार्थ है, जिसमें वे कृपालु प्रभु राम व रामराज्य का स्वप्न रचते हैं।”

  • पहला छंद (कवित्त 1, किसबी किसान…): संसार के सभी अच्छे-बुरे कामों का आधार “पेट की आग” का गहरा और कठोर यथार्थ है, जिसका समाधान तुलसी राम-रूपी घनश्याम (मेघ) के कृपा-जल में देखते हैं। पाठ के अनुसार उनकी राम-भक्ति पेट की आग बुझाने वाली, यानी जीवन के यथार्थ संकटों का समाधान करने वाली है, और साथ ही आध्यात्मिक मुक्ति देने वाली भी।
  • दूसरा छंद (कवित्त 2, खेती न किसान…): प्रकृति और शासन दोनों की विषमता से उपजी बेकारी व गरीबी की पीड़ा का यथार्थ चित्रण, जिसे तुलसी दशानन (रावण) से उपमित करते हैं।
  • तीसरा छंद (सवैया, धूत कहौ…): भक्ति की गहनता से उपजे भक्त-हृदय के आत्मविश्वास का जीवंत चित्रण, जिससे समाज में फैले जात-पाँत और धर्म के विभेदक दुराग्रहों के तिरस्कार का साहस पैदा होता है। पाठ के अनुसार इस प्रकार भक्ति की रचनात्मक भूमिका का संकेत यहाँ है, जो आज के भेदभावमूलक सामाजिक-राजनीतिक माहौल में अधिक प्रासंगिक है।

3.1 कवित्त 1: किसबी, किसान-कुल…

मूल पाठ

किसबी, किसान-कुल, बनिक, भिखारी, भाट,
चाकर, चपल नट, चोर, चार, चेटकी।
पेटको पढ़त, गुन गढ़त, चढ़त गिरि,
अटत गहन-गन अहन अखेटकी।।
ऊँचे-नीचे करम, धरम-अधरम करि,
पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी।
‘तुलसी’ बुझाइ एक राम घनस्याम ही तें,
आगि बड़वागितें बड़ी है आगि पेटकी।।

कठिन शब्दों के अर्थ
किसबीधंधा करने वाला
बनिकव्यापारी
भाटप्रशंसा गाने वाला
चपल नटचंचल/फुर्तीला नट, करतब दिखाने वाला
चारजासूस, गुप्तचर
चेटकीबाज़ीगर (पाठ की अपनी शब्द-छवि सूची के अनुसार)
अटत गहन-गन अहन अखेटकीघने जंगलों में दिन भर शिकार खेलते फिरना
बड़वागिबड़वाग्नि, समुद्र के भीतर की पौराणिक आग

भावार्थ: तुलसी एक ही छंद में समाज के अनेक वर्गों को गिनाते हैं, धंधा करने वाले, किसान, व्यापारी, भिखारी, भाट, नौकर, फुर्तीला नट, चोर, जासूस और बाज़ीगर (चेटकी)। कोई पेट भरने के लिए पढ़ता है, कोई गुण-विद्या सीखता है, कोई पहाड़ों पर चढ़ता है, तो कोई घने जंगलों में दिन-भर शिकार खेलता फिरता है। ऊँचे-नीचे कैसे भी काम करके, धर्म-अधर्म दोनों करके, हर कोई अंततः सिर्फ़ अपना पेट ही भरता है, कोई तो बेटा-बेटी तक बेच देता है। तुलसी कहते हैं कि यह “पेट की आग” राम-रूपी घनश्याम (काले बादल) की कृपा-वर्षा से ही बुझ सकती है, क्योंकि यह आग समुद्र की पौराणिक बड़वाग्नि से भी बड़ी है।

ध्यान दें

इसे केवल “भूख” का वर्णन मत समझिए, तुलसी समाज के अनेक वर्ग (विविध पेशे) गिनाकर दिखाते हैं कि पेट की भूख किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं, सार्वभौमिक यथार्थ है।

3.2 कवित्त 2: खेती न किसान को…

मूल पाठ

खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि,
बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी।
जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस,
कहैं एक एकन सों ‘कहाँ जाई, का करी?’
बेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत,
साँकरे सबैं पै, राम! रावरें कृपा करी।
दारिद-दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु!
दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी।।

कठिन शब्दों के अर्थ
बलिभीख माँगने पर मिलने वाला अन्न-दान
जीविका बिहीनजीविका (रोज़ी-रोटी) से रहित
सीद्यमानदुःखी होते हुए, कष्ट पाते हुए
साँकरे सबैं पैसंकट (साँकरे) के समय सब पर
दारिद-दसाननदरिद्रता रूपी रावण (दस सिरों वाला)
दीनबंधुदीनों (ग़रीबों) के हितैषी, राम के लिए संबोधन
दुरित-दहनपापों को जलाने वाला (राम)

भावार्थ: न किसान के पास खेती बची, न भिखारी को भीख, न व्यापारी को व्यापार, न नौकर को नौकरी। जीविका-हीन लोग दुःखी होकर पूछते हैं, “कहाँ जाएँ, क्या करें?” वेद-पुराणों में भी कहा गया है और लोक में भी देखा जाता है कि संकट के समय, हे राम, सब पर आपने कृपा की है। तुलसी राम को पुकारते हैं, दरिद्रता रूपी रावण (“दारिद-दसानन”) ने पूरी दुनिया दबा रखी है, हे दीनबंधु, हे पापों को जलाने वाले! यह हाल देखकर तुलसी “हहाकार” कर उठते हैं।

अलंकार-बिंदु
दारिद-दसानन: रूपक अलंकार का उदाहरण, दरिद्रता (उपमेय) पर रावण (उपमान) का आरोप (परिभाषा 4, खंड 8 देखें)

3.3 सवैया: धूत कहौ, अवधूत कहौ…

मूल पाठ

धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ।
काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ।।
तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको रुचै सो कहै कछु ओऊ।
माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबको दोऊ।

कठिन शब्दों के अर्थ
धूतधूर्त, ठग
अवधूतसंन्यासी, सांसारिक बंधनों से मुक्त साधु
जोलहाजुलाहा (कपड़ा बुनने वाला, तत्कालीन समाज में निम्न मानी जाने वाली जाति)
सरनामप्रसिद्ध, विख्यात
जाको रुचै सो कहै कछु ओऊजिसे जो कहना हो, कुछ भी कह ले
मसीत को सोइबोमस्जिद में सो जाना

भावार्थ: कोई तुलसी को धूर्त कहे, कोई संन्यासी, राजपूत या जुलाहा, फ़र्क़ नहीं पड़ता। न वे किसी की बेटी से बेटे का विवाह करेंगे, न किसी की जाति बिगाड़ेंगे। तुलसी राम के दास (गुलाम) के रूप में प्रसिद्ध (सरनाम) हैं, जिसे जो कहना हो, कह ले। वे माँगकर खा लेते हैं, मस्जिद में सो जाते हैं, न किसी से एक लेना है न दो देना; इसे फ़कीर-जैसे निस्पृह (इच्छा-रहित) जीवन के रूप में पढ़ा जा सकता है।

कंठस्थ करेंपरिभाषा 2

तुलसी सरनाम गुलामु है राम को: तुलसी राम के दास (गुलाम) के रूप में प्रसिद्ध हैं; समाज चाहे जो नाम दे (“जाको रुचै सो कहै कछु ओऊ”), उनका उत्तर यही है। पाठ के अनुसार इस छंद में भक्ति की गहनता और सघनता में उपजे भक्त-हृदय के आत्मविश्वास का सजीव चित्रण है।

याद रखने की तरकीब

धू-अ-र-जो = चार नाम, एक जवाब: “राम का गुलाम”

धूत, अवधूत, रजपूत, जोलहा, समाज चाहे जो नाम दे, तुलसी का उत्तर है: “तुलसी सरनाम गुलामु है राम को”।

4 कवितावली अंश का काव्य-सौंदर्य

तीनों छंद यथार्थवादी चित्रण और भक्ति-भावना का मेल हैं, समाज की कड़वी सच्चाई (भूख, बेकारी, जाति-भेद) दिखाकर समाधान राम-भक्ति में खोजते हैं। भाषा अवधी-मिश्रित ब्रज है।

3छंद: 2 कवित्त + 1 सवैया
31वर्ण प्रति चरण (कवित्त में)
2प्रमुख रूपक: राम घनस्याम, दारिद-दसानन

5 लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप: प्रसंग परिचय

यह प्रसंग तुलसी के महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ के लंका कांड से है। युद्ध में मेघनाद की शक्ति (अस्त्र) लगने से लक्ष्मण मूर्च्छित हो जाते हैं, भाई के शोक में डूबे राम का विलाप धीरे-धीरे प्रलाप (तर्कहीन विलाप) में बदल जाता है, जिसमें लक्ष्मण के प्रति छिपे प्रेम के कई पहलू खुल जाते हैं।

परीक्षा संकेत

यह प्रसंग ईश्वरीय राम को पूरी तरह मानवीय रूप में दिखाता है, भक्त तुलसी के भीतर से “कवि तुलसी” उभर आता है (उपमा का पूरा ब्योरा 5.3 में)।

5.1 मूल पाठ: दोहा, चौपाई और सोरठा

दोहा (हनुमान की विदाई)

तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत।
अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत।।
भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार।
मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार।।

चौपाई (राम का विलाप)

उहाँ राम लछिमनहि निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी।।
अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायऊ।।
सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ। बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ।।
मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता।।
सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई।।
जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पितु बचन मनतेउँ नहिं ओहू।।
सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा।।
अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता।।
जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।।
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही।।
जैहउँ अवध कवन मुहुँ लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई।।
बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं।।
अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा।।
निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम्ह प्रान अधारा।
सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी। सब बिधि सुखद परम हित जानी।।
उतरु काह दैहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई।।
बहु बिधि सोचत सोच बिमोचन। स्रवत सलिल राजिव दल लोचन।।
उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई।।

सोरठा

प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर
आइ गयउ हनुमान जिमि करुना मँह बीर रस।।

चौपाई (हनुमान का आगमन और परिणाम)

हरषि राम भेटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना।।
तुरत बैद तब कीन्हि उपाई। उठि बैठे लछिमन हरषाई।।
हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता। हरषे सकल भालु कपि ब्राता।।
कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा। जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा।।
यह बृतांत दसानन सुनेऊ। अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ।।
ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि जगावा।।
जागा निसिचर देखिअ कैसा। मानहुँ कालु देह धरि बैसा।।
कुंभकरन बूझा कहु भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई।।
कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी।।
तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महा महा जोधा संघारे।।
दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी।।
अपर महोदर आदिक बीरा। परे समर महि सब रनधीरा।।

दोहा (अंतिम)

सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान।
जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान।।

5.2 भावार्थ: राम का विलाप, चरण दर चरण

नीचे राम के विलाप को नौ भागों में क्रम से समझाया गया है, ताकि पूरा प्रवाह याद रखना आसान रहे:

1हनुमान संजीवनी लाने प्रस्थान करते हैं (“तव प्रताप उर राखि”), मार्ग में भरत के बल-शील-प्रीति की सराहना करते जाते हैं।
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2आधी रात बीत जाने पर भी हनुमान न लौटें, तो राम व्याकुल होकर मनुष्य की भाँति बोलने लगते हैं (“बोले बचन मनुज अनुसारी”), यहीं से राम के मानवीय रूप का चित्रण शुरू होता है; पाठ के अनुसार पूरा प्रसंग ईश्वरीय राम का पूरी तरह मानवीकरण कर देता है।
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3तुम मुझे कभी दुःखी देखकर सहन नहीं कर पाते थे, स्वभाव सदा कोमल (मृदुल) रहा है, मेरे लिए ही माता-पिता त्यागे और वन में सर्दी-गर्मी-आँधी सब सहे (“मम हित लागि तजेहु पितु माता”)।
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4पहले पता होता कि वन में भाई का वियोग सहना पड़ेगा, तो पिता का वचन (14 वर्ष वनवास) कभी न मानते, गहरे भ्रातृ-प्रेम का प्रमाण।
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5पुत्र, धन, पत्नी और घर-परिवार संसार में बार-बार आते-जाते रहते हैं (“होहिं जाहिं जग बारहिं बारा”), पर सहोदर भाई फिर कभी नहीं मिलता (“मिलइ न जगत सहोदर भ्राता”), इसी विचार से जागने को पुकारते हैं।
↓
6तीन उपमान, पंख बिना पक्षी दीन, मणि (नागमणि) बिना साँप शक्तिहीन और सूँड़ बिना श्रेष्ठ हाथी (करिबर) हीन, वैसे ही लक्ष्मण बिना राम का जीवन होगा, यदि जड़ (निर्दय) दैव उन्हें जीवित रखे।
↓
7अयोध्या लौटकर किस मुँह जाएँगे, पत्नी (सीता) के कारण प्रिय भाई खोया (“नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई”), जग में अपयश सह लेते, “नारि हानि बिसेष छति नाहीं”; यह पंक्ति चर्चा का विषय है, नीचे अलग चर्चा देखें।
↓
8लक्ष्मण की अपनी माता सुमित्रा को उत्तर देने की चिंता सताती है, जिन्होंने लक्ष्मण को राम के हाथ सौंपा था हितकारी मानकर (सुमित्रा, कौशल्या नहीं)। शोक-विमोचन राम स्वयं इतना सोचते हैं कि आँखों से आँसू बहने लगते हैं।
↓
9कथा कहने वाले शिव उमा (पार्वती) से कहते हैं, रघुनाथ एक और अखंड (पूर्ण ईश्वर) हैं, भक्तों पर कृपा करने वाले प्रभु ने यहाँ मनुष्य जैसी दशा (नर गति) दिखाई है।
संवेदनशील पंक्ति, तटस्थ चर्चा

“बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं।।”, शोक में डूबे राम का यह प्रलाप-वचन स्त्री के प्रति किस सामाजिक दृष्टिकोण की ओर संकेत करता है, इस पर पाठ्यपुस्तक का अभ्यास प्रश्न 8 विचार करने को कहता है; प्रश्न 8 इसी संभावित दृष्टिकोण पर विचार माँगता है। इसे तुलसी का व्यक्तिगत विचार मानने के बजाय एक अत्यंत शोक-विह्वल प्रलाप-वचन के रूप में देखना उचित है।

5.3 आगे की कथा: हनुमान का आगमन और परिणाम

वानर-सेना विकलराम का प्रलाप सुनकर विकल हो उठती है
→
हनुमान आगमनठीक उसी क्षण संजीवनी लेकर आ जाते हैं, राम हर्षित होकर उनसे गले मिलते हैं, परम सुजान प्रभु हनुमान के प्रति अत्यंत कृतज्ञ हैं
→
वैद्य-उपचारवैद्य तुरंत उपाय करते हैं, लक्ष्मण हर्षित होकर उठ बैठते हैं, समस्त भालु-वानर सेना हर्षित; हनुमान वैद्य को उसी तरह वापस पहुँचा आते हैं
→
रावण-कुंभकर्णसमाचार सुनकर रावण विषाद में सिर धुनता है, अनेक यत्नों से कुंभकर्ण को जगाता है

जागा हुआ कुंभकर्ण मानो साक्षात काल जैसा दिखता है, मुख सूखने का कारण पूछने पर घमंडी रावण सीता-हरण से लेकर अब तक की कथा सुनाता है, कैसे वानरों ने दुर्मुख, अतिकाय, अकंपन, महोदर आदि बड़े-बड़े रणधीर योद्धाओं को मार गिराया। यह सुनकर कुंभकर्ण कहता है, जगदंबा (सीता) का हरण करके यह मूर्ख (रावण) अब कल्याण चाहता है।

परीक्षा संकेत

“करुण रस के बीच वीर रस का उदय”, यह ठीक उस क्षण होता है जब वानर-सेना राम के प्रलाप से विकल है (करुण रस चरम पर) और ठीक उसी पल हनुमान संजीवनी लेकर आ जाते हैं (वीर रस का उदय)। पाठ इस उपमा (“जिमि करुना मँह बीर रस”) को अद्भुत कहता है, क्योंकि यह काव्यगत करुण-प्रसंग को जीवन के मंगल-विकास की ओर ले जाती है।

6 छंद-परिचय: पाँच छंद एक नज़र में

पाँच छंद प्रयुक्त हुए हैं, दोहा-चौपाई-सोरठा ‘लक्ष्मण-मूर्च्छा’ में, कवित्त-सवैया ‘कवितावली’ में।

छंद प्रकार नियम
चौपाई सम मात्रिक छंद 4 पंक्तियाँ, हर पंक्ति में 16-16 मात्राएँ; 40 चौपाइयों की रचना को “चालीसा” कहते हैं
दोहा अर्धसम मात्रिक छंद सम चरण (2, 4) में 11-11 मात्राएँ, विषम चरण (1, 3) में 13-13 मात्राएँ; अंत में लघु वर्ण
सोरठा अर्धसम मात्रिक छंद दोहे को उलटने से बनता है, सम चरण में 13-13, विषम चरण में 11-11 मात्राएँ; दोहे के विपरीत सम चरणों में तुक नहीं, विषम चरणों में तुक होती है
कवित्त (मनहरण) वार्णिक छंद हर चरण में 31 वर्ण; 16वें और फिर 15वें वर्ण पर यति (ठहराव); हर चरण का अंतिम वर्ण गुरु
सवैया वार्णिक छंद गणों के संयोजन से कई भेद; सबसे प्रसिद्ध मत्तगयंद (मालती) सवैया; हर चरण में 22-26 वर्ण; यहाँ का सवैया कई भेदों का मिश्रण है
कंठस्थ करेंपरिभाषा 3

मात्रिक छंद और वार्णिक छंद: जिस छंद में पंक्तियों की मात्राएँ (ध्वनि की मात्रा) गिनी जाती हैं, वह मात्रिक छंद कहलाता है (जैसे दोहा, चौपाई, सोरठा)। जिस छंद में पंक्तियों के वर्णों (अक्षरों) की संख्या गिनी जाती है, वह वार्णिक छंद कहलाता है (जैसे कवित्त, सवैया)।

7 शब्द-छवि: प्रमुख शब्दार्थ

अवधी के कठिन शब्दों के अर्थ पाठ की शब्द-छवि सूची से लिए गए हैं।

शब्द अर्थ
तव तुम्हारा, आपका
राखि रखकर
जैहउँ जाऊँगा
अस इस तरह
आयसु आज्ञा
महुँ में
कपि बंदर (यहाँ हनुमान के लिए)
सराहत बड़ाई कर रहे हैं
मनुज अनुसारी मनुष्य के समान, मानवोचित
काऊ किसी प्रकार
लागि के लिए
तजेहु त्यागते हो
बिपिन जंगल
आतप धूप
बाता हवा, तूफ़ान
जनतेउँ / मनतेउँ (यदि) जानता / (तो) मानता
बित धन
नारि स्त्री, पत्नी
बारहिं बारा बार-बार ही
जियँ मन में
बिचारि विचार कर
सहोदर एक ही माँ की कोख से जन्मे
ताता भाई के लिए संबोधन
जथा जैसे
दीना दरिद्र, दीन
मनि नागमणि
फनि साँप (यहाँ मणिधारी सर्प)
करिवर / कर हाथी / सूँड़
मम मेरा
बिनु तोही तुम्हारे बिना
तासु उसके
मोहि मुझे
पानी हाथ (यहाँ “जल” नहीं)
बरु चाहे
अपजस अपयश, कलंक
छति क्षति, हानि
निठुर निष्ठुर, हृदयहीन
उतरु काह दैहउँ क्या उत्तर दूँगा
सोच-बिमोचन शोक दूर करने वाला
स्रवत चूता/बहता है
प्रलाप तर्कहीन, व्याकुल वचन-प्रवाह
निकर समूह
हरषि / हरषाई प्रसन्न होकर / हर्षित
भेंटेउ भेंट की, मिले
कृतग्य कृतज्ञ
सुजाना अच्छा ज्ञानी, समझदार
कीन्हि किया
हृदयँ हृदय में
ब्राता समूह, झुंड
लइ आया ले आए
पहि (के) पास
सिर धुनेऊ सिर धुनने (पीटने) लगा
निसिचर राक्षस (रात में विचरने वाला)
हरि आनी हरण करके लाए
जोधा / संघारे योद्धा / मार डाले
दुर्मुख कड़वी ज़बान वाला
दसकंधर दशानन, रावण
महोदर बड़े पेट वाला (एक राक्षस-योद्धा का नाम)
अपर दूसरा
भट योद्धा
सठ दुष्ट
रनधीरा युद्ध में अविचल रहने वाला

8 काव्य-सौंदर्य और अलंकार (समग्र)

कंठस्थ करेंपरिभाषा 4

सांगरूपक अलंकार: जब उपमेय पर उपमान का उसके अंगों (हिस्सों) सहित आरोप किया जाए, तब सांगरूपक अलंकार होता है। अंगों के बिना केवल उपमेय पर उपमान का आरोप साधारण रूपक है। पाठ के अनुसार उपमा अलंकार में जो पहचान कालिदास की है, वही सांगरूपक में तुलसीदास की है।

साधारण रूपक के उदाहरण इस पाठ से: “दारिद-दसानन” (दरिद्रता रूपी रावण) और “राम घनस्याम” (राम रूपी मेघ)।

कंठस्थ करेंपरिभाषा 5

करुण रस और वीर रस: शोक-वियोग-रुदन से उपजा भाव करुण रस (राम का विलाप), युद्ध-साहस-पराक्रम से उपजा भाव वीर रस (हनुमान का संजीवनी लाना)। पाठ के अनुसार घने शोक-परिवेश में हनुमान का संजीवनी लेकर आ जाना कवि को करुण रस के बीच वीर रस के उदय के रूप में दिखता है; पाठ इस उपमा को अद्भुत कहता है।

9 अभ्यास प्रश्नों के विषय: एक नज़र में

पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के विषय नीचे सूचीबद्ध हैं; पूरे उत्तर “NCERT समाधान” पोस्ट में हैं। यह विषय-सूची इसलिए है ताकि कोई विषय दोहराने से न छूटे।

“पाठ के साथ” के आठ प्रश्नों के विषय
  • आर्थिक विषमता की तुलसी की समझ (कवितावली के छंदों के आधार पर)
  • पेट की आग और राम-भक्ति का युग-सत्य
  • “धूत कहौ…” में जाति-नाम कहने की ज़रूरत, “बेटी न ब्याहब” का बदलता सामाजिक अर्थ
  • “धूत कहौ…” में तुलसी के स्वाभिमानी भक्त-हृदय से सहमति पर विचार
  • व्याख्या-आधारित प्रश्न: भाई-प्रेम की पंक्ति (चरण 3), पक्षी-सर्प-हाथी उपमा (चरण 6), फ़कीरी जीवन (3.3), हर वर्ग की सूची (3.1)
  • राम की दशा, नर-लीला की बजाय सच्ची मानवीय अनुभूति के रूप में चित्रण
  • हनुमान-अवतरण को करुण रस के बीच वीर रस का आविर्भाव कहने का कारण
  • “नारि हानि बिसेष छति नाहीं” में स्त्री के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण
“पाठ के आसपास” की पाँच गतिविधियाँ
  • अज (रघुवंश), निराला (सरोज-स्मृति) के शोक-प्रसंगों से राम के विलाप की तुलना
  • “पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी” की आज की भुखमरी-घटनाओं से तुलना
  • तुलसी युग की बेकारी और आज की बेरोज़गारी के कारणों पर परिचर्चा
  • राम-लक्ष्मण के सहोदर न होते हुए भी “सहोदर भ्राता” कहे जाने पर विचार
  • दोहा-चौपाई-सोरठा-कवित्त-सवैया के अतिरिक्त तुलसी के अन्य छंदों/काव्य-रूपों की सूची
इस अध्याय की सभी परिभाषाएँ एक जगह
द्वंद्व-चित्रण और समन्वयअनेक विरोधों का चित्रण करके भी उनमें छिपा एक मानवीय सूत्र खोज लेना
तुलसी सरनाम गुलामु है राम कोतुलसी राम के दास के रूप में प्रसिद्ध हैं, समाज चाहे जो नाम दे
मात्रिक छंद / वार्णिक छंदमात्राएँ गिनने वाला छंद / वर्णों की संख्या गिनने वाला छंद
सांगरूपक अलंकारउपमेय पर उपमान का उसके अंगों सहित आरोप
करुण रस / वीर रसशोक-वियोग से उपजा भाव / साहस-पराक्रम से उपजा भाव
परीक्षा से पहले स्वयं जाँचें
  • क्या मैं तुलसीदास की सातों रचनाओं के नाम बता सकता हूँ?
  • क्या मैं तीनों छंद (दो कवित्त, एक सवैया) का सार अपने शब्दों में लिख सकता हूँ?
  • क्या मैं समझा सकता हूँ कि “दारिद-दसानन” में कौन-सा अलंकार है?
  • क्या मैं राम के विलाप का क्रम (लक्ष्मण को उठाना → भाई-प्रेम याद करना → अयोध्या की चिंता) बता सकता हूँ?
  • क्या मैं बता सकता हूँ कि “करुण रस के बीच वीर रस” किस क्षण में आता है?
  • क्या मैं पाँचों छंदों (दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त, सवैया) के मात्रा/वर्ण-नियम बता सकता हूँ?
त्वरित पुनरीक्षण: परीक्षा से पहले यही पढ़ें
  • तुलसीदास: जन्म सन् 1532 (बाँदा, राजापुर गाँव में माना जाता है), निधन सन् 1623 (काशी); सात प्रमुख रचनाएँ; लोकभाषा (अवधी-ब्रज) में रचना
  • जातीय कवि (अपने समय के हिंदी-क्षेत्र के भावात्मक व काव्यभाषायी तत्त्वों के प्रतिनिधि), अवधी-ब्रज दोनों भाषाएँ, सीताराम-राधाकृष्ण दोनों कथाएँ; उपमा में कालिदास तो सांगरूपक में तुलसी की पहचान
  • कवित्त 1 (किसबी किसान…): “पेट की आग” सबसे बड़ी, समाधान राम-रूपी घनश्याम की कृपा में
  • कवित्त 2 (खेती न किसान…): बेकारी-गरीबी की पीड़ा, दरिद्रता पर रावण का रूपक, “दारिद-दसानन”
  • सवैया (धूत कहौ…): भक्त-हृदय का आत्मविश्वास, जात-पाँत और धर्म के विभेदक दुराग्रहों के तिरस्कार का साहस; “तुलसी सरनाम गुलामु है राम को”
  • लक्ष्मण-मूर्च्छा: रामचरितमानस, लंकाकांड से; राम का विलाप → प्रलाप; करुण रस के बीच हनुमान-आगमन से वीर रस का उदय
  • पाँच छंद: दोहा, चौपाई, सोरठा (मात्रिक); कवित्त, सवैया (वार्णिक), हर एक के अपने मात्रा/वर्ण-नियम