परीक्षा से ठीक पहले के दोहराव के लिए इस अध्याय का निचोड़: कवि परिचय, कवितावली के तीनों छंदों का सार, लक्ष्मण-मूर्च्छा प्रसंग और पाँचों छंदों का परिचय एक जगह। विस्तार से पढ़ने के लिए पूरे नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।
1 कवि परिचय एक नज़र में
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| जन्म | सन् 1532, बाँदा (उत्तर प्रदेश) ज़िले के राजापुर गाँव में माना जाता है |
| निधन | सन् 1623, काशी में |
| प्रमुख रचनाएँ (7) | रामचरितमानस, विनयपत्रिका, गीतावली, श्रीकृष्ण गीतावली, दोहावली, कवितावली, रामाज्ञा-प्रश्न |
| काव्यधारा | भक्तिकाल की सगुण काव्य-धारा, रामभक्ति शाखा के सर्वोपरि कवि |
| भाषा-चयन | संस्कृत में क्षमता होने पर भी लोकभाषा (अवधी व ब्रजभाषा) को अपनाया |
| पहचान | जातीय कवि (अपने समय के हिंदी-क्षेत्र के भावात्मक व काव्यभाषायी तत्त्वों के प्रतिनिधि); उपमा में कालिदास तो सांगरूपक में तुलसी की पहचान |
द्वंद्व-चित्रण और समन्वय: पाठ के अनुसार तुलसी की एक अनन्य विशेषता है कि वे दार्शनिक और लौकिक स्तर के नाना द्वंद्वों (जैसे भक्त-रचनाकार, शास्त्र-लोक) के चित्रण और उनके समन्वय के कवि हैं; समन्वय ऊपरी विभिन्नता में निहित एक ही मानवीय सूत्र को उपलब्ध कराता है।
2 कवितावली (उत्तर कांड से): तीनों छंद सार-रूप में
| छंद | विषय | मुख्य पंक्ति/भाव |
|---|---|---|
| कवित्त 1, किसबी किसान… | पेट की आग | दस पेशों की सूची; “आगि बड़वागितें बड़ी है आगि पेटकी”; समाधान राम-रूपी घनश्याम की कृपा में |
| कवित्त 2, खेती न किसान… | बेकारी-दरिद्रता | “कहाँ जाई, का करी?”; दरिद्रता पर रावण का रूपक, “दारिद-दसानन”; दीनबंधु राम से प्रार्थना |
| सवैया, धूत कहौ… | भक्त-हृदय का आत्मविश्वास; जात-पाँत और धर्म के विभेदक दुराग्रहों के तिरस्कार का साहस | “तुलसी सरनाम गुलामु है राम को”; फ़कीरी जीवन: माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो |
सांगरूपक अलंकार: उपमेय पर उपमान का उसके अंगों सहित आरोप। अंगों के बिना केवल आरोप साधारण रूपक है।
साधारण रूपक के उदाहरण इस पाठ से: “दारिद-दसानन” (दरिद्रता रूपी रावण) और “राम घनस्याम” (राम रूपी मेघ)।
3 लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप: सार
→ राम का विलाप, धीरे-धीरे प्रलाप में बदलना
→ भाई के प्रेम और त्याग का स्मरण, अयोध्या-वापसी की चिंता
→ वानरों का विकल होना (सोरठा)
→ हनुमान का संजीवनी लेकर आगमन, करुण रस के बीच वीर रस का उदय
→ वैद्य का उपचार, लक्ष्मण का स्वस्थ होना
→ रावण को समाचार, कुंभकरण का जागरण, अंतिम दोहे में उलाहना
| पंक्ति | भाव |
|---|---|
| बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ | राम लक्ष्मण के कोमल स्वभाव का स्मरण करते हैं |
| मम हित लागि तजेहु पितु माता | लक्ष्मण ने राम के हित के लिए माता-पिता तक त्यागे |
| जथा पंख बिनु खग, मनि बिनु फनि, करिबर कर हीना | लक्ष्मण के बिना राम का जीवन दीन उपमानों से |
| जैहउँ अवध कवन मुहुँ लाई | अयोध्या-वापसी की चिंता |
| नारि हानि बिसेष छति नाहीं | संवेदनशील पंक्ति; अभ्यास प्रश्न 8 पूछता है कि इसमें स्त्री के प्रति कैसा सामाजिक दृष्टिकोण संभावित है |
4 पाँचों छंद एक नज़र में
| छंद | प्रकार | नियम |
|---|---|---|
| दोहा | अर्धसम मात्रिक | सम चरण 11-11, विषम चरण 13-13 मात्रा |
| चौपाई | सम मात्रिक | चार पंक्ति, प्रत्येक में 16-16 मात्रा |
| सोरठा | अर्धसम मात्रिक (दोहे का उलटा) | सम चरण 13-13, विषम चरण 11-11 मात्रा, विषम चरणों में तुक |
| कवित्त (मनहरण) | वार्णिक | प्रत्येक चरण में 31 वर्ण, 16वें-15वें वर्ण पर यति |
| सवैया | वार्णिक | प्रत्येक चरण में 22-26 वर्ण; सबसे प्रसिद्ध भेद मत्तगयंद (मालती); पाठ का सवैया कई भेदों का मिश्रण |
करुण रस / वीर रस: शोक-वियोग से उपजा भाव करुण रस (राम का विलाप); साहस-पराक्रम से उपजा भाव वीर रस (हनुमान का संजीवनी लाना)। पाठ के अनुसार शोक-परिवेश में हनुमान का आना करुण रस के बीच वीर रस का उदय है, और यह उपमा अद्भुत है।
- तुलसीदास: जन्म 1532 (राजापुर, माना जाता है), निधन 1623 (काशी); सात रचनाएँ; लोकभाषा (अवधी-ब्रज) में रचना; जातीय कवि
- कवितावली के तीनों छंद (उत्तर कांड): पेट की आग → बेकारी-दरिद्रता (दारिद-दसानन) → जात-पाँत के दुराग्रहों के तिरस्कार का साहस (“गुलामु है राम को”)
- लक्ष्मण-मूर्च्छा: लंकाकांड से; राम का विलाप → प्रलाप; हनुमान-आगमन से करुण रस के बीच वीर रस का उदय; अंत में लक्ष्मण स्वस्थ
- पाँच छंद: दोहा, चौपाई, सोरठा (मात्रिक); कवित्त, सवैया (वार्णिक), हर एक के अपने मात्रा/वर्ण-नियम
- मारे गए राक्षस-योद्धा: दुर्मुख, अतिकाय, अकंपन, महोदर; रावण विषाद करता है, कुंभकरण को जगाता है