कक्षा 12 हिंदी अंतरा भाग 2 अध्याय 1 देवसेना का गीत / कार्नेलिया का गीत NCERT समाधान

NCERT पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग 2 के अध्याय 1 देवसेना का गीत / कार्नेलिया का गीत के प्रश्न-अभ्यास के सभी 10 प्रश्नों के पूर्ण उत्तर, और साथ में पाठ के अंत में दी गई योग्यता-विस्तार की तीनों गतिविधियों के लिए मार्गदर्शन। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 देवसेना का गीत

प्रश्न 1

प्र. ‘मैंने भ्रमवश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई’ पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: देवसेना कहती है कि उसने भ्रमवश (गलतफ़हमी में) जीवन-भर संचित की हुई मधुकरियों (भिक्षा) की भीख लुटा दी, यानी जीवन की संचित पूँजी भ्रम में गँवा दी। पाठ के अनुसार वह अपने यौवन के क्रियाकलापों को “भ्रमवश किए गए कर्मों” की श्रेणी में रखती है और उस समय की नादानियों के पश्चाताप में उसकी आँखों से आँसू बहते हैं; अंत में उसके हाथ पछतावा और खोई हुई कमाई लगी।

प्रश्न 2

प्र. कवि ने आशा को बावली क्यों कहा है?

उत्तर: देवसेना अपनी आशा को बावली (पगली) कहती है, क्योंकि उसी आशा के भरोसे वह जीवन-भर स्कंदगुप्त की चाह रखती रही, पर अंत में उसी आशा ने उसकी सकल कमाई, यानी जीवन की पूँजी, खो दी। पाठ कहता है, “जो उसके जीवन की पूँजी है, सारी कमाई है, वह उसे बचा नहीं सकी, यही विडंबना है, यही वेदना है”।

प्रश्न 3

प्र. ‘मैंने निज दुर्बल —- होड़ लगाई’ इन पंक्तियों में ‘दुर्बल पद बल’ और ‘हारी होड़’ में निहित व्यंजना स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: “दुर्बल पद-बल” में व्यंजना है कि देवसेना को पहले से ही पता है कि उसके पैरों (साधनों) में इतनी शक्ति नहीं कि वह प्रलय जैसी शक्ति का सामना कर सके। “हारी-होड़” में व्यंजना है कि यह होड़ पहले से ही हारी हुई है, फिर भी देवसेना ने साहसपूर्वक उसे लगाया। पाठ के शब्दों में, वह “हारने की निश्चितता के बावजूद प्रलय से लोहा लेती रही है”। दोनों पदों से देवसेना के साहस और उसकी निश्चित हार, दोनों एक साथ व्यक्त होते हैं।

प्रश्न 4

प्र. काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए:
(क) श्रमित स्वप्न की मधुमाया —————- तान उठाई।
(ख) लौटा लो ——————————– लाज गँवाई।

उत्तर (क): भाव: थके हुए स्वप्न की मीठी माया में, घने जंगल की पेड़ों की छाया में, नींद से भरे पथिक के कान में किसने यह आधी रात में गाया जाने वाला विहाग राग छेड़ दिया? शिल्प-सौंदर्य: बिंब-योजना अत्यंत जीवंत है (घना जंगल, पेड़ों की छाया, नींद से भरा कान), शब्दावली संस्कृतनिष्ठ और कोमल है (श्रमित, विपिन, श्रुति, विहाग), गेय, तुकांत गीत-शैली, भाषा खड़ी बोली।

उत्तर (ख): भाव: देवसेना पूरे संसार को संबोधित करते हुए कहती है कि यह जीवन-रूपी थाती अब वापस ले ली जाए, क्योंकि उसकी करुणा हा-हा करके रो रही है और अब यह जीवन उससे सँभाला नहीं जाएगा। शिल्प-सौंदर्य: “लौटा लो” में अनुप्रास अलंकार है, करुणा को मनुष्य जैसा रोता हुआ दिखाने में मानवीकरण अलंकार है, भाषा में गहरी वेदना और आत्म-समर्पण का भाव है।

प्रश्न 5

प्र. देवसेना की हार या निराशा के क्या कारण हैं?

उत्तर:

• भाई बंधुवर्मा और पूरे परिवार की मृत्यु।
• जीवन में देवसेना को स्कंदगुप्त की चाह थी, किंतु स्कंदगुप्त मालवा के धनकुबेर की कन्या विजया का स्वप्न देखते थे।
• जीवन के अंतिम मोड़ पर स्कंदगुप्त देवसेना को पाना चाहता है, जब देवसेना तब तक वृद्ध पर्णदत्त के साथ आश्रम में जीवन बिता रही थी; वह स्वयं उसे लौटा देती है।
• यौवन के क्रियाकलापों को “भ्रमवश किए गए कर्म” मानकर पश्चाताप।
• अपनी ही आशा (जिसे वह “बावली” कहती है) का धोखा देना।
• प्रलय जैसी नियति के आगे अपनी दुर्बलता को पहचानना, फिर भी हारने की निश्चितता के बावजूद होड़ लगाना।

2 कार्नेलिया का गीत

प्रश्न 1

प्र. कार्नेलिया का गीत कविता में प्रसाद ने भारत की किन विशेषताओं की ओर संकेत किया है?

उत्तर:

• भारत सबको सहारा देने वाला, अनजान को भी अपनाने वाला देश है।
• यहाँ की प्रकृति (तांबे जैसी लाल आभा, हरियाली, वृक्ष) अत्यंत मनोहर है।
• पक्षी भी इसी देश को अपना प्यारा घोंसला मानते हैं।
• यह देश करुणा और उदारता से भरा है, लहरों को भी किनारा देता है।
• यहाँ की भोर (हेम कुंभ लिए उषा) और रात्रि (मदिर ऊँघते तारे) का चित्र है।

प्रश्न 2

प्र. ‘उड़ते खग’ और ‘बरसाती आँखों के बादल’ में क्या विशेष अर्थ व्यंजित होता है?

उत्तर: “उड़ते खग” में व्यंजना है कि पक्षी भी अपने प्यारे घोंसले की तलाश में जिस ओर उड़ते हैं, वही यह प्यारा भारतवर्ष है, यानी पक्षी भी इसी देश को अपना प्यारा घोंसला मानते हैं। “बरसाती आँखों के बादल” में रूपक अलंकार है, बादलों को करुणा से भरी आँखें मान लिया गया है, जो भारत की उदारता और सबको सहारा देने वाले स्वभाव को दर्शाता है।

प्रश्न 3

प्र. काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए: हेम कुंभ ले उषा सवेरे, भरती ढुलकाती सुख मेरे। मदिर ऊँघते रहते जब, जगकर रजनी भर तारा।

उत्तर: भाव: सुबह की उषा सोने के कलश में मानो सुख भरकर ढुलकाती (बिखेरती) रहती है, और जब मादक (मदिर) तारे रात-भर जागकर ऊँघते (झपकी लेते) रहते हैं। शिल्प-सौंदर्य: मानवीकरण अलंकार का सुंदर प्रयोग (उषा और तारों को मनुष्य जैसा व्यवहार करते दिखाया गया है), बिंब-योजना जीवंत और चित्रात्मक है, भाषा खड़ी बोली, गेय और तुकांत गीत-शैली।

प्रश्न 4

प्र. ‘जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा’ पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: इस पंक्ति का आशय है कि भारत इतना उदार और अपनाने वाला देश है कि यहाँ पहुँचकर अनजान क्षितिज (वह रेखा जहाँ धरती और आकाश एक साथ मिलते हुए दिखाई देते हैं) को भी एक सहारा मिल जाता है, यानी अनजान को भी यहाँ सहारा मिलता है। पाठ के शब्दों में, “अनजान को भी सहारा देना और लहरों को भी किनारा देना हमारे देश की विशेषता है”।

प्रश्न 5

प्र. कविता में व्यक्त प्रकृति-चित्रों को अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर:

• तांबे जैसी लाल आभा (तामरस) पर पेड़ों की चोटियों का नाचना।
• हरियाली पर जीवन के मंगल-कुंकुम का बिखरना।
• इंद्रधनुषी पंख फैलाए पक्षियों का अपने घोंसले की ओर उड़ना।
• करुणा से भरे बादलों का बरसना और लहरों का किनारा पाना।
• भोर में उषा का सोने के कलश से सुख ढुलकाना, रात में तारों का जागना।

3 योग्यता-विस्तार

प्रश्न-अभ्यास के बाद किताब योग्यता-विस्तार के अंतर्गत तीन गतिविधियाँ देती है। ये लिखने, पढ़ने और कक्षा में वाचन की गतिविधियाँ हैं, इसलिए इनका कोई एक तय उत्तर नहीं है। नीचे हर गतिविधि को करने का तरीका और एक नमूना दिया गया है।

योग्यता-विस्तार 1

प्र. भोर के दृश्य को देखकर अपने अनुभव काव्यात्मक शैली में लिखिए।

उत्तर: किसी दिन सूर्योदय से पहले उठकर भोर को ध्यान से देखिए, फिर जो देखा और महसूस किया उसे छोटी-छोटी लयबद्ध पंक्तियों में लिखिए। “कार्नेलिया का गीत” में प्रसाद ने उषा को सोने का कलश (हेम कुंभ) लेकर सुख ढुलकाती हुई स्त्री के रूप में दिखाया है, वैसा ही मानवीकरण और रंगों के बिंब आप भी अपनी रचना में ला सकते हैं। एक नमूना:

पूरब में लाली छाई, सोया जग जाग उठा,
ओस की हर बूँद पर, सोना-सा बिखर गया।
चिड़ियों ने गीत छेड़े, कलियाँ मुसकाने लगीं,
ठंडी-ठंडी पवन चली, मन भी खिल उठा।

योग्यता-विस्तार 2

प्र. जयशंकर प्रसाद की काव्य रचना ‘आँसू’ पढ़िए।

उत्तर: यह पढ़ने की गतिविधि है। पाठ के कवि-परिचय में ‘आँसू’ प्रसाद की कविताओं (झरना, आँसू, लहर, कामायनी, कानन कुसुम, प्रेमपथिक) में गिनाई गई है। पढ़ते समय इसे “देवसेना का गीत” से मिलाकर देखिए: देवसेना भी जीवन की संध्या-बेला में अपने वेदनामय क्षणों को याद करती है। दोनों रचनाओं में वेदना और स्मृति का भाव, कोमल शब्द-चयन और गेयता पर ध्यान दीजिए।

योग्यता-विस्तार 3

प्र. जयशंकर प्रसाद की कविता ‘हमारा प्यारा भारतवर्ष’ तथा रामधारी सिंह दिनकर की कविता ‘हिमालय के प्रति’ का कक्षा में वाचन कीजिए।

उत्तर: यह कक्षा में सस्वर वाचन (ऊँची आवाज़ में, लय के साथ पढ़ने) की गतिविधि है। पाठ में इन दोनों कविताओं के केवल नाम दिए गए हैं; इनका भाव स्वयं पढ़कर समझें और देखें कि ये “कार्नेलिया का गीत” से कैसे जुड़ती हैं, जहाँ भारत को “मधुमय देश” कहकर उसकी प्रकृति और उदारता का गुणगान किया गया है। कवि-परिचय भी बताता है कि प्रसाद-साहित्य में राष्ट्रीय जागरण का स्वर प्रमुख है। वाचन से पहले कविता को दो-तीन बार मन में पढ़कर उसका भाव समझ लीजिए, फिर सही उच्चारण, लय और उचित विराम के साथ पढ़िए, और वाचन के बाद कक्षा में चर्चा कीजिए कि दोनों कविताओं में भारत की कौन-कौन सी विशेषताएँ बताई गई हैं।