कक्षा 12 हिंदी, अंतरा भाग 2, अध्याय 1 का त्वरित पुनरीक्षण। मुख्य शब्दार्थ और नामित तथ्य एक ही जगह। पहले पूरे नोट्स पढ़ें, यह परीक्षा की सुबह पढ़ें।
1 कवि-परिचय एक नज़र में
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| नाम | जयशंकर प्रसाद |
| जन्म | काशी |
| जीवनकाल | सन् 1889 – 1937 |
| विद्यालयी शिक्षा | केवल आठवीं कक्षा तक; बाकी स्वाध्याय से |
| कविताएँ (पाठ के अनुसार) | झरना, आँसू, लहर, कामायनी, कानन कुसुम, प्रेमपथिक |
| साहित्य का प्रमुख स्वर | राष्ट्रीय जागरण, प्राचीन भारतीय संस्कृति का गौरव |
2 रचनाएँ, विधा-अनुसार
| विधा | रचनाएँ |
|---|---|
| नाटक | अजातशत्रु, स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, राजश्री, ध्रुवस्वामिनी |
| उपन्यास | कंकाल, तितली, इरावती (अपूर्ण) |
| कहानी संग्रह | आँधी, इंद्रजाल, छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप |
| निबंध संग्रह | काव्य और कला तथा अन्य निबंध |
| कविताएँ | झरना, आँसू, लहर, कामायनी, कानन कुसुम, प्रेमपथिक |
3 दोनों गीतों की मूल जानकारी
| देवसेना का गीत | कार्नेलिया का गीत | |
|---|---|---|
| स्रोत नाटक | स्कंदगुप्त | चंद्रगुप्त |
| वक्ता | देवसेना (मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन) | कार्नेलिया (सिकंदर के सेनापति सिल्यूकस की पुत्री) |
| स्थान | आश्रम (पर्णदत्त के साथ) | सिंधु-तट, ग्रीक शिविर के पास |
| भाव | वेदना, निराशा, भ्रमवश किए कर्मों का पश्चाताप; मनुष्य और प्रकृति के संबंध | प्रशंसा, उल्लास, देश-प्रेम |
| रस | पाठ में रस का नाम नहीं; करुण रस कहा जा सकता है (कुछ लोग वियोग शृंगार भी मानते हैं) | पाठ में रस का नाम नहीं; भाव: देश-गौरव और प्रकृति-सौंदर्य की प्रशंसा |
| भाषा व रूप | खड़ी बोली; “गीत के शिल्प में” रचा गेय, तुकांत गीत (पाठ में छंद का नाम नहीं) | खड़ी बोली; गेय, तुकांत गीत (पाठ में छंद का नाम नहीं) |
| प्रमुख अलंकार | मानवीकरण, रूपक, उपमा (“आँसू-से गिरते थे”) | अनुप्रास, रूपक, मानवीकरण, उपमा (“लघु सुरधनु से पंख”) |
4 प्रसंग एक-नज़र (क्रम में)
देवसेनाहूणों के आक्रमण में भाई बंधुवर्मा व परिवार की वीरगति
देवसेनाराष्ट्रसेवा व भाई के स्वप्न पूरे करने का व्रत
देवसेनादेवसेना को स्कंदगुप्त की चाह; स्कंदगुप्त का विजया का स्वप्न देखना
देवसेनाजीवन के अंतिम मोड़ पर स्कंदगुप्त का अनुनय, देवसेना (तब आश्रम में पर्णदत्त के साथ) का इनकार; स्कंदगुप्त का आजीवन कुँवारा रहने का व्रत; विदा-गीत
कार्नेलियासिंधु-तट पर ग्रीक शिविर के पास वृक्ष के नीचे बैठना, प्रकृति-सौंदर्य से प्रभावित होना
कार्नेलियाभारतीय संगीत भूलने की आशंका, फिर गीत गाना आरंभ
5 सभी शब्दार्थ एक जगह
देवसेना का गीत
संचितएकत्रित
मधुकरियोंभिक्षा
नीरवताखामोशी
अनंतअंतहीन, न रुकने वाली
श्रमितपरिश्रम करके थका हुआ
विपिनजंगल, वन
उनींदीनींद से भरी हुई
श्रुतिसुनने की क्रिया
विहागअर्धरात्रि में गाया जाने वाला राग
सतृष्णतृष्णा के साथ
दीठदृष्टि
कार्नेलिया का गीत
अरुणलालिमा युक्त
मधुमयमिठास से भरा हुआ
क्षितिजजहाँ धरती और आकाश एक साथ मिलते हुए दिखाई देते हैं
तामरसतांबे जैसा लाल रंग
नीड़घोंसला
मदिरमस्ती पैदा करने वाला
रजनीरात्रि
मलय समीरदक्षिणी वायु, मलय पर्वत की ओर से आने वाली सुगंधित हवा
6 पात्र-सूची
| पात्र | किस नाटक से | परिचय |
|---|---|---|
| देवसेना | स्कंदगुप्त | मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन |
| बंधुवर्मा | स्कंदगुप्त | मालवा का राजा, देवसेना का भाई |
| विजया | स्कंदगुप्त | मालवा के धनकुबेर की पुत्री |
| पर्णदत्त | स्कंदगुप्त | वृद्ध, जिसके साथ देवसेना आश्रम में रहती है |
| महादेवी (समाधि का उल्लेख) | स्कंदगुप्त | जिनकी समाधि देवसेना परिष्कृत करती है |
| कार्नेलिया | चंद्रगुप्त | सिल्यूकस की पुत्री |
| सिल्यूकस | चंद्रगुप्त | सिकंदर का सेनापति, कार्नेलिया का पिता |
Quick Revision: परीक्षा से पहले यही पढ़ें
- जयशंकर प्रसाद (1889-1937), जन्म काशी में, शिक्षा केवल आठवीं तक
- देवसेना का गीत: स्कंदगुप्त नाटक से; कार्नेलिया का गीत: चंद्रगुप्त नाटक से
- देवसेना मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन; कार्नेलिया सिल्यूकस (सिकंदर के सेनापति) की पुत्री
- देवसेना के गीत में वेदना और पश्चाताप (करुण रस कहा जा सकता है); कार्नेलिया के गीत में देश-प्रेम का भाव
- दोनों गीत खड़ी बोली में, गेय और तुकांत; मानवीकरण, रूपक और उपमा अलंकार
- देवसेना का दुःख: परिवार की मृत्यु, स्कंदगुप्त की चाह अधूरी रहना, भ्रमवश किए कर्मों का पश्चाताप; फिर भी हारने की निश्चितता के बावजूद वह प्रलय से लोहा लेती रही
- कार्नेलिया का गीत भारत की उदारता (अनजान को भी सहारा, लहरों को भी किनारा) और प्राकृतिक सौंदर्य की प्रशंसा करता है
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