कक्षा 12 हिंदी अंतरा भाग 2 अध्याय 10 प्रेमघन की छाया-स्मृति महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. रामचंद्र शुक्ल का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

उत्तर: रामचंद्र शुक्ल का जन्म सन् 1884 में उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले के अगोना गाँव में हुआ था।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. रामचंद्र शुक्ल सन् 1905 में किस पद पर नियुक्त हुए?

उत्तर: सन् 1905 में रामचंद्र शुक्ल काशी नागरी प्रचारिणी सभा में हिंदी शब्दसागर के निर्माण-कार्य में सहायक संपादक नियुक्त हुए।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. रामचंद्र शुक्ल की सबसे प्रसिद्ध कृति कौन-सी है?

उत्तर: रामचंद्र शुक्ल की सबसे प्रसिद्ध कृति ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ है।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. ‘प्रेमघन’ किसका उपनाम है?

उत्तर: ‘प्रेमघन’ उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी का उपनाम है।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. ‘प्रेमघन की छाया-स्मृति’ किस विधा की रचना है?

उत्तर: ‘प्रेमघन की छाया-स्मृति’ एक संस्मरणात्मक निबंध है।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. लेखक और उनके समवयस्क साथियों की मंडली का नाम क्या पड़ गया था?

उत्तर: लेखक और उनके साथियों की मंडली का नाम ‘निस्संदेह लोग’ पड़ गया था।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. रामचंद्र शुक्ल की शिक्षा के बारे में बताइए।

उत्तर: रामचंद्र शुक्ल की आरंभिक शिक्षा उर्दू-अंग्रेज़ी और फ़ारसी में हुई। उनकी विधिवत शिक्षा इंटरमीडिएट तक ही हो पाई, इसके बाद उन्होंने स्वाध्याय द्वारा संस्कृत, अंग्रेज़ी, बाँग्ला और हिंदी के साहित्य का गहरा अध्ययन किया।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. काशी हिंदू विश्वविद्यालय में रामचंद्र शुक्ल का कार्यकाल कैसा रहा?

उत्तर: रामचंद्र शुक्ल काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक बने और बाबू श्यामसुंदर दास के अवकाश-ग्रहण के बाद हिंदी विभाग के अध्यक्ष बने। इसी पद पर कार्य करते हुए काशी में ही उनका निधन हुआ।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. रामचंद्र शुक्ल की गद्य शैली की दो विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: रामचंद्र शुक्ल की गद्य शैली विवेचनात्मक है, जिसमें विचारशीलता और सूक्ष्म तर्क-योजना का मेल है। वे व्यंग्य और विनोद का प्रयोग करके अपनी शैली को जीवंत बनाते हैं, और उनके शब्द-चयन में तत्सम शब्दों से लेकर प्रचलित उर्दू शब्दों तक का प्रयोग मिलता है।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ ग्रंथ की रचना-प्रक्रिया के बारे में बताइए।

उत्तर: ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ पहले हिंदी शब्दसागर की भूमिका के रूप में लिखा गया था, बाद में इसे परिष्कृत और संशोधित करके एक स्वतंत्र पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ का परिचय दीजिए।

उत्तर: उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ भारतेंदु हरिश्चंद्र के मित्र और हिंदी के प्रसिद्ध कवि थे। वे मिर्जापुर में रहते थे और एक खासे हिंदुस्तानी रईस थे।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. बचपन में लेखक के मन में भारतेंदु जी को लेकर कैसा भ्रम था?

उत्तर: ‘सत्य हरिश्चंद्र’ नाटक के नायक राजा हरिश्चंद्र और कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र में लेखक की बाल-बुद्धि कोई भेद नहीं कर पाती थी। ‘हरिश्चंद्र’ नाम से दोनों की एक मिली-जुली मधुर भावना उनके मन में जगती थी।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. लेखक को प्रेमघन की पहली झलक कैसे मिली?

उत्तर: मिर्जापुर आने पर बालकों की एक मंडली लेखक को चौधरी साहब के मकान तक ले गई। लता से ढके ऊपर के बरामदे में एक मूर्ति जैसी आकृति, जिसके कंधों पर बाल बिखरे थे, क्षण भर के लिए दिखी और फिर ओझल हो गई।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. ‘निस्संदेह लोग’ नाम कैसे पड़ा?

उत्तर: लेखक की मंडली की बातचीत ‘लिखने-पढ़ने की हिंदी’ में होती थी, जिसमें ‘निस्संदेह’ जैसे शब्द आते थे। मुहल्ले के उर्दू-भाषी वकीलों, मुख्तारों और कचहरी के अफ़सरों को यह बोली अनोखी लगती थी, इसलिए उन्होंने मंडली का नाम ही ‘निस्संदेह लोग’ रख दिया।

प्रश्न 9 (2 अंक)

प्र. ‘भारतेंदु जी के मकान के नीचे का यह हृदय-परिचय’ किसे कहा गया है?

उत्तर: काशी में एक बारात के साथ गए लेखक ने चौखंभा की ओर एक घर से पं. केदारनाथ जी पाठक को निकलते देखा। पता चला कि वह भारतेंदु जी का घर था। लेखक भावुक होकर उस मकान को देखता रहा, जिससे प्रसन्न होकर पाठक जी बहुत दूर तक उससे बातचीत करते हुए गए। भारतेंदु जी के मकान के नीचे लेखक और पाठक जी का यही हृदय-परिचय बहुत शीघ्र गहरी मैत्री में बदल गया।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. रामचंद्र शुक्ल की प्रमुख कृतियों के नाम बताइए।

उत्तर: रामचंद्र शुक्ल की सबसे प्रसिद्ध कृति ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ है, जो पहले हिंदी शब्दसागर की भूमिका के रूप में लिखी गई थी। इसके अलावा उन्होंने ‘गोस्वामी तुलसीदास’, ‘सूरदास’, ‘चिंतामणि’ (चार खंड) और ‘रस मीमांसा’ जैसे ग्रंथ लिखे। उन्होंने ‘जायसी ग्रंथावली’ और ‘भ्रमरगीत सार’ का संपादन भी किया तथा उनकी लंबी भूमिका लिखी।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. ‘संस्मरणात्मक निबंध’ किसे कहते हैं? इस निबंध के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: संस्मरणात्मक निबंध वह निबंध है जिसमें लेखक किसी व्यक्ति या घटना से जुड़ी अपनी व्यक्तिगत यादों को सुनाता है। ‘प्रेमघन की छाया-स्मृति’ में रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी भाषा एवं साहित्य के प्रति अपने प्रारंभिक रुझानों का रोचक वर्णन किया है। बाल्यावस्था में भारतेंदु-मंडल के रचनाकारों, विशेषतः प्रेमघन के सान्निध्य में उनका साहित्यकार कैसे आकार ग्रहण करता है, इसकी “अत्यंत मनोहारी झाँकी” यहाँ प्रस्तुत हुई है। यह निबंध प्रेमघन से जुड़े अलग-अलग किस्सों के रूप में है; इसे किसी क्रमबद्ध जीवनी के बजाय यादों के रूप में पढ़ा जा सकता है।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. निबंध के शीर्षक ‘छाया-स्मृति’ की सार्थकता पर टिप्पणी कीजिए।

उत्तर: पाठ में शीर्षक की व्याख्या नहीं दी गई है, इसलिए इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है: ‘छाया-स्मृति’ यानी वह याद जो साये की तरह मन में बनी रहती है। पाठ्यपुस्तक की भूमिका के अनुसार यह निबंध “प्रेमघन की स्मृति में लिखा गया है”। निबंध प्रेमघन से जुड़े अलग-अलग किस्सों (पहली झलक, गिलास, वामनाचार्यगिरि का कवित्त, एकादशी, घनचक्कर, लैम्प) के रूप में है, जिनसे उनकी छवि उभरती है; इस दृष्टि से शीर्षक को सार्थक माना जा सकता है, मानो उनकी स्मृति छाया की तरह लेखक के साथ बनी रही हो।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. चौधरी साहब (प्रेमघन) के व्यक्तित्व की विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर: चौधरी साहब एक खासे हिंदुस्तानी रईस थे। उनकी हर अदा से रियासत और तबीयतदारी टपकती थी। वे लोगों को प्रायः बनाया करते थे (चुहलबाज़ी करते थे) और उनकी बातचीत में एक विलक्षण वक्रता थी, जो उनके लेखों की शैली से बिल्कुल अलग थी। गिलास गिरने पर उनका व्यंग्यात्मक जवाब और लैम्प की बत्ती भभकने पर भी हाथ न बढ़ाना उनकी बेपरवाही को दिखाता है।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. पाठ में आए किन्हीं दो रोचक किस्सों को अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: पहला किस्सा, वामनाचार्यगिरि नामक कवि सड़क पर चलते हुए चौधरी साहब पर एक कवित्त जोड़ रहे थे, तभी चौधरी साहब बरामदे में बाल छिटकाए, खंभे के सहारे खड़े दिख गए और वामनजी ने तुरंत उपयुक्त अंतिम पंक्ति जोड़ दी। दूसरा किस्सा, एक पंडित जी ने एकादशी के व्रत में जल खाने की बात कही, तो चौधरी साहब ने तुरंत व्यंग्य किया कि जल खाया है या फलाहार पिया है, जिससे उनकी हाज़िरजवाबी झलकती है।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. ‘इस पुरातत्व की दृष्टि में प्रेम और कुतूहल का अद्भुत मिश्रण रहता था।’ कथन को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: यह कथन चौधरी साहब के प्रति लेखक और उनकी मंडली की दृष्टि के बारे में कहा गया है। बड़े होकर, एक लेखक की हैसियत से मिलने पर, मंडली के लोग चौधरी साहब को “एक पुरानी चीज़” समझा करते थे, और लेखक इस दृष्टि को ‘पुरातत्व’ की दृष्टि कहता है। इस दृष्टि में उनके प्रति सम्मान और स्नेह (प्रेम) भी था, और साथ ही उनके पुराने ढंग तथा रोचक व्यक्तित्व को जानने की उत्सुकता (कुतूहल) भी।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. प्रेमघन की भाषा-संबंधी अपनी मान्यताओं को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: उपाध्याय जी नागरी को भाषा मानते थे और बराबर ‘नागरी भाषा’ लिखा करते थे। उनका मत था कि ‘नागर अपभ्रंश से जो शिष्ट लोगों की भाषा विकसित हुई, वही नागरी कहलाई।’ इसी तरह वे मिर्जापुर की जगह ‘मीरजापुर’ लिखते थे और इसका अर्थ ‘लक्ष्मीपुर’ करते थे, जहाँ मीर का अर्थ समुद्र, जा का अर्थ पुत्री और पुर का अर्थ नगर है, यानी समुद्र की पुत्री (लक्ष्मी) का नगर।

प्रश्न 8 (4 अंक)

प्र. लेखक का हिंदी साहित्य के प्रति झुकाव किस तरह बढ़ता गया?

उत्तर: मिर्जापुर आने पर प्रेमघन की पहली झलक मिली। ज्यों-ज्यों लेखक सयाना होता गया, हिंदी के नूतन साहित्य की ओर उसका झुकाव बढ़ता गया। स्वर्गीय बा. रामकृष्ण वर्मा पिता जी के सहपाठियों में थे और भारत जीवन प्रेस की पुस्तकें प्रायः घर आती थीं, पर पिता जी पढ़ाई से ध्यान हटने के डर से उन्हें छिपाकर रखने लगे। तब लेखक पं. केदारनाथ पाठक के हिंदी पुस्तकालय से पुस्तकें ला-लाकर पढ़ने लगा। भारतेंदु जी के मकान के नीचे पाठक जी से हुआ हृदय-परिचय गहरी मैत्री में बदला, और 16 वर्ष की अवस्था तक समवयस्क हिंदी-प्रेमियों की एक खासी मंडली मिल गई।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. रामचंद्र शुक्ल का साहित्यिक परिचय विस्तार से दीजिए।

उत्तर: जन्म और शिक्षा: रामचंद्र शुक्ल का जन्म सन् 1884 में बस्ती ज़िले के अगोना गाँव में हुआ। उनकी विधिवत शिक्षा इंटरमीडिएट तक ही हुई, आगे का ज्ञान स्वाध्याय से पाया।
कार्यक्षेत्र: सन् 1905 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा में हिंदी शब्दसागर के सहायक संपादक बने, फिर काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक और अंततः हिंदी विभाग के अध्यक्ष बने। इसी पद पर काशी में उनका निधन हुआ।
पहचान: उन्हें हिंदी के उच्चकोटि के आलोचक, इतिहासकार और साहित्य-चिंतक के रूप में जाना जाता है।
योगदान: उन्होंने भारतीय साहित्य की नयी अवधारणा प्रस्तुत की और हिंदी आलोचना का नया स्वरूप विकसित किया; हिंदी साहित्य के इतिहास को व्यवस्थित करते हुए हिंदी कवियों की सम्यक समीक्षा की तथा इतिहास में उनका स्थान निर्धारित किया; आलोचनात्मक लेखन के अलावा भाव और मनोविकार संबंधी उच्चकोटि के निबंध भी लिखे।
गद्य शैली: उनकी गद्य शैली विवेचनात्मक है, जिसमें विचारशीलता, सूक्ष्म तर्क-योजना तथा सहृदयता का योग है; व्यंग्य और विनोद उसे जीवंत बनाते हैं।
रचनाएँ: ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ सबसे प्रसिद्ध कृति है, इसके अलावा ‘गोस्वामी तुलसीदास’, ‘सूरदास’, ‘चिंतामणि’ और ‘रस मीमांसा’ उनके अन्य महत्त्वपूर्ण ग्रंथ हैं।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. ‘प्रेमघन की छाया-स्मृति’ निबंध में प्रेमघन से लेखक का परिचय कैसे बढ़ा, क्रमवार वर्णन कीजिए।

उत्तर: आरंभ: लेखक के पिताजी पुरानी हिंदी कविता के प्रेमी थे और भारतेंदु जी के नाटक पसंद करते थे, इसी माहौल में लेखक बड़ा हुआ।
पहली झलक: मिर्जापुर आने पर बालकों की मंडली के साथ चौधरी साहब के घर एक झलक भर मिली।
झुकाव बढ़ना: भारत जीवन प्रेस की किताबों और केदारनाथ पाठक के पुस्तकालय से हिंदी साहित्य में रुचि बढ़ी।
हृदय-परिचय: काशी में भारतेंदु जी के मकान के नीचे पं. केदारनाथ पाठक से हुआ हृदय-परिचय शीघ्र गहरी मैत्री में बदला, जिससे हिंदी-प्रेम और पक्का हुआ।
मंडली और परिचय: 16 वर्ष की उम्र तक समवयस्क हिंदी-प्रेमियों की मंडली बन गई, चौधरी साहब से अच्छी तरह परिचय हो गया, और लेखक एक लेखक की हैसियत से उनके यहाँ जाने लगा, जहाँ प्रेम और कुतूहल का मिश्रण था।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. चौधरी साहब के व्यक्तित्व को उजागर करने वाले किन्हीं तीन प्रसंगों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: गिलास का किस्सा: नौकर से गिलास गिरने पर चौधरी साहब का व्यंग्यात्मक जवाब ‘कारे बचा त नाहीं’ उनकी बातचीत की वक्रता दिखाता है।
एकादशी का व्यंग्य: पंडित जी के ‘कुछ जल खाया है’ कहने पर ‘जल ही खाया है कि कुछ फलाहार भी पिया है?’ जैसा पलटवार उनकी हाज़िरजवाबी का प्रमाण है।
लैम्प का किस्सा: बत्ती भभकने पर भी हाथ न बढ़ाना और ‘जब फूट जाई तबै चलत आवह’ कहना उनकी बेपरवाही और तबीयतदारी को स्पष्ट करता है। तीनों किस्से मिलकर दिखाते हैं कि उनकी बातचीत की शैली उनके लेखों की शैली से एकदम अलग, अधिक चुटीली और सहज थी।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. इस निबंध की भाषा-शैली की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तर: सरलता: पाठ्यपुस्तक की भूमिका इस रचना के बारे में कहती है, “उनकी भाषा में न कोई उलझाव है न जटिलता”।
हास्य-व्यंग्य: बीच-बीच में आने वाला हास्य और व्यंग्य (जैसे एकादशी और घनचक्कर वाले किस्से) पाठ को बार-बार पढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
संवाद-शैली: कई प्रसंग सीधे संवादों (जैसे ‘क्यों साहब’, ‘कारे बचा त नाहीं’) के माध्यम से कहे गए हैं, जिससे घटनाएँ जीवंत हो उठती हैं।
शब्द-चयन: पाठ में ‘वाकिफ़’, ‘लफ़्ज़’, ‘रियासत’ जैसे उर्दू-फ़ारसी शब्द और ‘निस्संदेह’ जैसे तत्सम प्रयोग साथ-साथ आते हैं (लेखक-परिचय भी कहता है कि उनके शब्द-चयन में तत्सम शब्दों से लेकर प्रचलित उर्दू शब्दों तक का प्रयोग दिखाई देता है)।
स्थानीय रंग: कुछ संवाद स्थानीय बोली में हैं, जो चौधरी साहब के व्यक्तित्व को और सजीव बनाते हैं। यही सब मिलकर इस संस्मरणात्मक निबंध को रोचक और सहज बनाते हैं।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
एक दिन बालकों की मंडली जोड़ी गई। जो चौधरी साहब के मकान से परिचित थे, वे अगुआ हुए। मील डेढ़ का सफर तै हुआ। पत्थर के एक बड़े मकान के सामने हम लोग जा खड़े हुए। नीचे का बरामदा खाली था। ऊपर का बरामदा सघन लताओं के जाल से आवृत था। बीच-बीच में खंभे और खुली जगह दिखाई पड़ती थी। उसी ओर देखने के लिए मुझसे कहा गया। कोई दिखाई न पड़ा। सड़क पर कई चक्कर लगे। कुछ देर पीछे एक लड़के ने उँगली से ऊपर की ओर इशारा किया। लता-प्रतान के बीच एक मूर्ति खड़ी दिखाई पड़ी। दोनों कंधों पर बाल बिखरे हुए थे। एक हाथ खंभे पर था। देखते ही देखते यह मूर्ति दृष्टि से ओझल हो गई। बस, यही पहली झाँकी थी।

(क) 1 अंक लेखक किसके मकान तक गया था?
उत्तर: लेखक चौधरी साहब (प्रेमघन) के मकान तक गया था।

(ख) 1 अंक ऊपर का बरामदा किससे ढका हुआ था?
उत्तर: ऊपर का बरामदा सघन लताओं के जाल से ढका (आवृत) हुआ था।

(ग) 2 अंक गद्यांश के आधार पर बताइए कि लेखक को प्रेमघन की पहली झलक कैसे मिली।
उत्तर: बालकों की मंडली के साथ चौधरी साहब के मकान के सामने पहुँचने पर पहले कोई दिखाई न पड़ा। सड़क पर कई चक्कर लगाने के बाद एक लड़के ने उँगली से ऊपर की ओर इशारा किया, तब लता-प्रतान के बीच एक मूर्ति खड़ी दिखाई पड़ी, जिसके दोनों कंधों पर बाल बिखरे थे और एक हाथ खंभे पर था। देखते ही देखते वह ओझल हो गई। यही लेखक की पहली झाँकी थी।

(घ) 2 अंक गद्यांश में आए ‘लता-प्रतान’ और ‘आवृत’ शब्दों के अर्थ स्पष्ट करते हुए बताइए कि यह दृश्य क्यों अस्पष्ट और क्षणिक रहा।
उत्तर: ‘लता-प्रतान’ का अर्थ है लता का फैलाव और ‘आवृत’ का अर्थ है ढका हुआ। चूँकि बरामदा घनी लताओं से ढका था, इसलिए भीतर की आकृति साफ़ और लंबे समय तक नहीं, बल्कि लताओं के बीच से क्षण भर के लिए ही दिखाई दी और जल्दी ही ओझल हो गई।

केस स्टडी
एक दिन कई लोग बैठे बातचीत कर रहे थे कि इतने में एक पंडित जी आ गए। चौधरी साहब ने पूछा, ‘कहिए क्या हाल है?’ पंडित जी बोले, ‘कुछ नहीं, आज एकादशी थी, कुछ जल खाया है और चले आ रहे हैं।’ प्रश्न हुआ, ‘जल ही खाया है कि कुछ फलाहार भी पिया है?’

(क) 1 अंक पंडित जी ने चौधरी साहब को अपने बारे में क्या बताया?
उत्तर: पंडित जी ने बताया कि आज एकादशी थी, इसलिए उन्होंने कुछ जल खाया है और वे चले आ रहे हैं।

(ख) 1 अंक चौधरी साहब ने पंडित जी की बात पर क्या प्रश्न किया?
उत्तर: चौधरी साहब ने पूछा, ‘जल ही खाया है कि कुछ फलाहार भी पिया है?’

(ग) 2 अंक गद्यांश के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि चौधरी साहब के प्रश्न में क्या व्यंग्य छिपा है।
उत्तर: आम तौर पर जल पिया जाता है और फलाहार खाया जाता है, पंडित जी ने ‘कुछ जल खाया है’ कहा, और चौधरी साहब ने तुरंत ‘खाया’ और ‘पिया’ शब्दों की अदला-बदली करके यह व्यंग्यपूर्ण प्रश्न पूछा, जो उनकी हाज़िरजवाबी और चुटीली बातचीत की शैली को दिखाता है।

(घ) 2 अंक गद्यांश से चौधरी साहब के स्वभाव की कौन-सी विशेषता उजागर होती है?
उत्तर: गद्यांश से पता चलता है कि चौधरी साहब बहुत हाज़िरजवाब और वाक्पटु थे। यहाँ उन्होंने ‘खाया’ और ‘पिया’ की अदला-बदली से तुरंत व्यंग्य किया, जो उनकी बातचीत की विलक्षण वक्रता को दिखाता है।