NCERT पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग 2 के अध्याय 10 प्रेमघन की छाया-स्मृति (रामचंद्र शुक्ल) की प्रश्न-अभ्यास (10 प्रश्न), भाषा-शिल्प (3 प्रश्न) और योग्यता-विस्तार (4 प्रश्न) के सभी प्रश्नों के पूर्ण उत्तर, पाठ के आधार पर। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 प्रश्न-अभ्यास
प्र. लेखक ने अपने पिता जी की किन-किन विशेषताओं का उल्लेख किया है?
उत्तर: लेखक के पिता जी फ़ारसी के अच्छे ज्ञाता और पुरानी हिंदी कविता के बड़े प्रेमी थे। उन्हें फ़ारसी कवियों की उक्तियों को हिंदी कवियों की उक्तियों के साथ मिलाने में बड़ा आनंद आता था। वे रात को अक्सर रामचरितमानस और रामचंद्रिका, घर के सब लोगों को एकत्र करके, बड़े चित्ताकर्षक ढंग से पढ़ा करते थे। आधुनिक हिंदी-साहित्य में भारतेंदु जी के नाटक उन्हें बहुत प्रिय थे, और उन्हें भी वे कभी-कभी (घर के लोगों को) सुनाया करते थे।
प्र. बचपन में लेखक के मन में भारतेंदु जी के संबंध में कैसी भावना जगी रहती थी?
उत्तर: बचपन में लेखक की बाल-बुद्धि ‘सत्य हरिश्चंद्र’ नाटक के नायक राजा हरिश्चंद्र और कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र में कोई भेद नहीं कर पाती थी। ‘हरिश्चंद्र’ शब्द से दोनों की एक मिली-जुली भावना लेखक के मन में एक अपूर्व माधुर्य का संचार करती थी। यह भावना मिर्जापुर आने (आठ वर्ष की अवस्था में हुई पिताजी की बदली) से भी पहले से उनके मन में जगी हुई थी।
प्र. उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ की पहली झलक लेखक ने किस प्रकार देखी?
उत्तर: मिर्जापुर आने पर लेखक बालकों की एक मंडली के साथ चौधरी साहब के मकान तक गया। नीचे का बरामदा खाली था, पर ऊपर का बरामदा सघन लताओं के जाल से ढका हुआ था। कुछ देर बाद एक लड़के ने ऊपर की ओर इशारा किया, और लता-प्रतान के बीच एक मूर्ति जैसी आकृति खड़ी दिखाई पड़ी, जिसके कंधों पर बाल बिखरे हुए थे और एक हाथ खंभे पर था। देखते ही देखते यह आकृति दृष्टि से ओझल हो गई। यही लेखक की पहली झाँकी थी।
प्र. लेखक का हिंदी साहित्य के प्रति झुकाव किस तरह बढ़ता गया?
उत्तर: ज्यों-ज्यों लेखक सयाना होता गया, त्यों-त्यों हिंदी के नूतन साहित्य की ओर उसका झुकाव बढ़ता गया। क्वीन्स कालेज में पढ़ते समय स्वर्गीय बा. रामकृष्ण वर्मा लेखक के पिता जी के सहपाठियों में थे। भारत जीवन प्रेस की पुस्तकें प्रायः लेखक के घर आया करती थीं, पर अब पिता जी उन्हें छिपाकर रखने लगे, क्योंकि “उन्हें डर हुआ कि कहीं मेरा चित्त स्कूल की पढ़ाई से हट न जाए”। इसी बीच पं. केदारनाथ जी पाठक ने एक हिंदी पुस्तकालय खोला, जहाँ से लेखक किताबें ला-लाकर पढ़ता था। भारतेंदु जी के मकान के नीचे पाठक जी से हुआ हृदय-परिचय शीघ्र गहरी मैत्री में बदला, और 16 वर्ष की अवस्था तक पहुँचते-पहुँचते समवयस्क हिंदी-प्रेमियों की एक खासी मंडली मिल गई।
प्र. ‘निस्संदेह’ शब्द को लेकर लेखक ने किस प्रसंग का ज़िक्र किया है?
उत्तर: लेखक की समवयस्क मंडली की बातचीत प्रायः ‘लिखने-पढ़ने की हिंदी’ में हुआ करती थी, जिसमें ‘निस्संदेह’ इत्यादि शब्द आया करते थे। जिस मुहल्ले में लेखक रहता था, वहाँ अधिकतर वकील, मुख्तार तथा कचहरी के अफ़सर-अमलों की बस्ती थी। ऐसे उर्दू-भाषी लोगों के कानों में मंडली की यह बोली कुछ अनोखी लगती थी, इसीलिए उन्होंने मंडली का नाम ही ‘निस्संदेह लोग’ रख छोड़ा था।
प्र. पाठ में कुछ रोचक घटनाओं का उल्लेख है। ऐसी तीन घटनाएँ चुनकर उन्हें अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: पहली घटना, गिलास गिरने पर चौधरी साहब का व्यंग्यात्मक उत्तर ‘कारे बचा त नाहीं’। दूसरी घटना, वामनाचार्यगिरि नामक कवि द्वारा सड़क पर कवित्त जोड़ते हुए, चौधरी साहब को बरामदे में देखकर तुरंत उपयुक्त अंतिम पंक्ति जोड़ देना, ‘खंभा टेकि खड़ी जैसे नारि मुगलाने की’। तीसरी घटना, लैम्प की बत्ती भभकने पर भी चौधरी साहब का हाथ न बढ़ाना, यहाँ तक कि चिमनी-ग्लोब चकनाचूर हो गई, फिर भी वे कहते रहे, ‘अरे! जब फूट जाई तबै चलत आवह।’
प्र. ‘इस पुरातत्व की दृष्टि में प्रेम और कुतूहल का अद्भुत मिश्रण रहता था।’ यह कथन किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: यह कथन चौधरी साहब (प्रेमघन) के प्रति लेखक और उनकी मंडली की दृष्टि के बारे में कहा गया है। बड़े होकर, एक लेखक की हैसियत से मिलने पर, मंडली के लोग चौधरी साहब को “एक पुरानी चीज़” समझा करते थे, और लेखक इसी दृष्टि को ‘पुरातत्व’ की दृष्टि कहता है (पाठ में पहले भी उन्हें ‘भारतेंदु-मंडल की किसी सजीव स्मृति’ के रूप में देखा गया है)। इस दृष्टि में उनके प्रति सम्मान और स्नेह (प्रेम) भी था, और साथ ही उनके पुराने ढंग तथा रोचक व्यक्तित्व को जानने-समझने की गहरी उत्सुकता (कुतूहल) भी, इसीलिए इसे प्रेम और कुतूहल का अद्भुत मिश्रण कहा गया है।
प्र. प्रस्तुत संस्मरण में लेखक ने चौधरी साहब के व्यक्तित्व के किन-किन पहलुओं को उजागर किया है?
उत्तर: लेखक ने चौधरी साहब को एक खासे हिंदुस्तानी रईस के रूप में दिखाया है, जिनकी हर अदा से रियासत और तबीयतदारी टपकती थी। वे लोगों को प्रायः बनाया करते थे (चुहलबाज़ी करते थे), और उनकी बातचीत में एक विलक्षण वक्रता थी, जो उनके लेखों की शैली से बिल्कुल अलग थी। नौकरों तक के साथ उनका संवाद सुनने लायक होता था। साथ ही, लैम्प वाले किस्से से उनकी बेपरवाही भी उजागर होती है, जब चिमनी-ग्लोब चकनाचूर होने पर भी उनका हाथ लैम्प की ओर नहीं बढ़ा।
प्र. समवयस्क हिंदी प्रेमियों की मंडली में कौन-कौन से लेखक मुख्य थे?
उत्तर: 16 वर्ष की अवस्था तक पहुँचते-पहुँचते लेखक को समवयस्क हिंदी-प्रेमियों की जो मंडली मिल गई थी, उसमें श्रीयुत् काशीप्रसाद जी जायसवाल, बा. भगवानदास जी हालना, पं. बदरीनाथ गौंड़ और पं. उमाशंकर द्विवेदी मुख्य थे।
प्र. ‘भारतेंदु जी के मकान के नीचे का यह हृदय-परिचय बहुत शीघ्र गहरी मैत्री में परिणत हो गया।’ कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: काशी में एक बारात में जाते समय लेखक ने चौखंभा की ओर पं. केदारनाथ जी पाठक को एक घर से निकलते देखा, और बाद में पता चला कि वह घर भारतेंदु जी का ही था। लेखक बड़ी चाह और कुतूहल की दृष्टि से उस मकान को देखता रहा, जिससे प्रसन्न होकर पाठक जी ने उससे काफ़ी देर बातचीत की। इसका आशय यह है कि भारतेंदु जी के मकान के नीचे हुआ लेखक और पं. केदारनाथ पाठक का यह भावुक परिचय (हृदय-परिचय) बहुत शीघ्र गहरी मैत्री में बदल गया।
2 भाषा-शिल्प
प्र. हिंदी-उर्दू के विषय में लेखक के विचारों को देखिए। आप इन दोनों को एक ही भाषा की दो शैलियाँ मानते हैं या भिन्न भाषाएँ?
उत्तर: पाठ में ‘निस्संदेह लोग’ वाले प्रसंग से पता चलता है कि लेखक की मंडली की ‘लिखने-पढ़ने की हिंदी’ उर्दू-भाषी पड़ोसियों को अनोखी लगती थी, यानी उस समय दोनों बोलियों की शब्दावली का अंतर लोगों को खटकता था। पाठ में प्रेमघन का मत है कि “नागर अपभ्रंश से जो शिष्ट लोगों की भाषा विकसित हुई, वही नागरी कहलाई”; और लेखक के सहपाठियों (पं. लक्ष्मीनारायण चौबे, बा. भगवानदास हालना, बा. भगवानदास मास्टर) की ‘उर्दू बेगम’ नामक विनोदपूर्ण पुस्तक में उर्दू की उत्पत्ति, प्रचार आदि का वृत्तांत कहानी के ढंग पर दिया गया था। (यह प्रश्न विद्यार्थी के अपने विचार माँगता है, इसलिए विद्यार्थी अपने तर्क सहित उत्तर लिख सकता है, जैसे कि हिंदी और उर्दू की जड़ें एक होते हुए भी, शब्दावली और लिपि में भिन्नता के कारण इन्हें एक भाषा की दो शैलियाँ भी माना जा सकता है और दो अलग भाषाएँ भी।)
प्र. चौधरी जी के व्यक्तित्व को बताने के लिए पाठ में कुछ मज़ेदार वाक्य आए हैं, उन्हें छाँटकर उनका संदर्भ लिखिए।
उत्तर: ‘कारे बचा त नाहीं’ (गिलास गिरने पर), ‘खंभा टेकि खड़ी जैसे नारि मुगलाने की’ (वामनाचार्यगिरि के कवित्त में), ‘जल ही खाया है कि कुछ फलाहार भी पिया है?’ (एकादशी वाले प्रसंग में), और ‘अरे! जब फूट जाई तबै चलत आवह’ (लैम्प वाले किस्से में)। ये सभी वाक्य चौधरी साहब की हाज़िरजवाबी, वाक्पटुता, बातचीत की वक्रता और बेपरवाही को उजागर करते हैं।
प्र. पाठ की शैली की रोचकता पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर: पाठ्यपुस्तक की भूमिका इस पाठ के बारे में कहती है: “उनकी भाषा में न कोई उलझाव है न जटिलता, बीच-बीच में हास्य और व्यंग्य की छौंक इस पाठ को बार-बार पढ़ने को प्रेरित करती है।” लेखक ने संस्मरण को सीधे संवादों (जैसे ‘क्यों साहब’, ‘कारे बचा त नाहीं’) के माध्यम से जीवंत बनाया है, और कुछ संवाद स्थानीय बोली में देकर पात्रों को और सजीव बना दिया है।
3 योग्यता-विस्तार
प्र. भारतेंदु मंडल के प्रमुख लेखकों के नाम और उनकी प्रमुख रचनाओं की सूची बनाकर स्पष्ट कीजिए कि आधुनिक हिंदी गद्य के विकास में इन लेखकों का क्या योगदान रहा?
उत्तर: (यह एक क्रियाकलाप-आधारित प्रश्न है। पाठ में स्वयं भारतेंदु हरिश्चंद्र का नाम और उनके ‘सत्य हरिश्चंद्र’ जैसे नाटकों का उल्लेख है।) विद्यार्थी पुस्तकालय या इंटरनेट की सहायता से भारतेंदु मंडल के लेखकों (जैसे भारतेंदु हरिश्चंद्र, बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’, प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट) की सूची बनाकर, उनकी प्रमुख रचनाओं के नाम नोट करें और यह स्पष्ट करें कि इन लेखकों ने आधुनिक हिंदी गद्य को नाटक, निबंध और पत्रकारिता जैसी नई विधाओं से कैसे समृद्ध किया।
प्र. आपको जिस व्यक्ति ने सर्वाधिक प्रभावित किया है, उसके व्यक्तित्व की विशेषताओं को लिखिए।
उत्तर: (यह एक व्यक्तिगत अनुभव-आधारित प्रश्न है। विद्यार्थी इसका उत्तर अपने जीवन के किसी व्यक्ति, जैसे माता-पिता, अध्यापक या किसी आदर्श व्यक्ति के बारे में, अपने शब्दों में लिखें।) मार्गदर्शन के लिए, ठीक वैसे ही जैसे लेखक ने चौधरी साहब के व्यक्तित्व की विशेषताएँ (रईसी, वाक्पटुता, तबीयतदारी) उदाहरणों सहित बताई हैं, विद्यार्थी भी अपने चुने हुए व्यक्ति के गुणों को कम-से-कम एक-दो ठोस उदाहरणों (घटनाओं) के साथ लिखें।
प्र. यदि आपको किसी साहित्यकार से मिलने का अवसर मिले तो आप उनसे क्या-क्या पूछना चाहेंगे और क्यों?
उत्तर: (यह एक व्यक्तिगत विचार-आधारित प्रश्न है, विद्यार्थी अपनी पसंद के साहित्यकार का नाम लेकर अपने सवाल लिखें।) मार्गदर्शन के लिए, विद्यार्थी उस साहित्यकार की रचना-प्रक्रिया, उनके जीवन की किसी प्रेरक घटना, या उनकी किसी रचना के पीछे की सोच के बारे में पूछ सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे यह निबंध रामचंद्र शुक्ल के अपने बचपन के अनुभवों को साझा करता है।
प्र. संस्मरण साहित्य क्या है? इसके बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए।
उत्तर: संस्मरण साहित्य वह गद्य-विधा है जिसमें लेखक किसी परिचित व्यक्ति, स्थान या घटना से जुड़ी अपनी व्यक्तिगत यादों को सहज और आत्मीय शैली में सुनाता है। इसमें जीवनी की तरह पूरा क्रमबद्ध विवरण नहीं होता, बल्कि लेखक के मन में बसी हुई चुनी हुई यादें और प्रभाव सामने आते हैं। ‘प्रेमघन की छाया-स्मृति’ इसी विधा का एक उदाहरण है, जिसमें रामचंद्र शुक्ल अपनी यादों के किस्सों के माध्यम से प्रेमघन के व्यक्तित्व को उभारते हैं।