- भीष्म साहनी का जीवन-परिचय और उनकी प्रमुख कृतियाँ
- संस्मरण विधा क्या है, और यह पाठ आत्मकथा ‘आज के अतीत’ से क्यों लिया गया
- सेवाग्राम में गांधी जी के साथ बिताए दिनों की हर घटना, क्रम से
- काश्मीर में नेहरू जी के साथ बिताए क्षण, और नेहरू द्वारा सुनाई गई कहानी
- ट्यूनिस में यास्सेर अराफ़ात के आतिथ्य का पूरा प्रसंग
- तीनों प्रसंगों में किसने क्या कहा: बिना गड़बड़ाए याद रखने का तरीका
1 लेखक-परिचय: भीष्म साहनी
जन्म: रावलपिंडी (अब पाकिस्तान)। जीवनकाल: 1915-2003। प्रारंभिक शिक्षा घर में हुई। गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. और पंजाब विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की।
- विभाजन से पहले व्यापार के साथ मानद (बिना वेतन) अध्यापन किया; विभाजन के बाद पत्रकारिता, इप्टा नाटक मंडली और कुछ समय मुंबई में बेरोज़गारी झेली।
- बाद में अंबाला और खालसा कॉलेज (अमृतसर) में पढ़ाया, फिर स्थायी रूप से दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन कॉलेज में साहित्य पढ़ाया।
- लगभग 7 साल विदेशी भाषा प्रकाशन गृह, मास्को में अनुवादक रहे: वहीं रूसी भाषा सीखी और लगभग दो दर्जन रूसी किताबों का अनुवाद किया। ढाई साल ‘नयी कहानियाँ’ पत्रिका का संपादन भी किया।
प्रमुख कृतियाँ: कहानी-संग्रह: भाग्यरेखा, पहला पाठ, भटकती राख, पटरियाँ, वाङ्चू, शोभायात्रा, निशाचर, पाली, डायन; उपन्यास: झरोखे, कड़ियाँ, तमस, बसंती, मय्यादास की माड़ी, कुंतो, नीलू नीलिमा नीलोफर; नाटक: माधवी, हानूश, कबिरा खड़ा बज़ार में, मुआवज़े; बालोपयोगी कहानियाँ: गुलेल का खेल। तमस उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, और साहित्यिक योगदान के लिए हिंदी अकादमी, दिल्ली का शलाका सम्मान मिला।
तमस (उपन्यास, साहित्य अकादमी पुरस्कार) और शलाका सम्मान (समग्र योगदान) को मिलाकर मत लिखिए, दोनों अलग-अलग हैं।
भाषा-शैली: उर्दू शब्दों से आत्मीयता, पंजाबी भाषा की सोंधी महक, छोटे वाक्य, संवादों से वर्णन में ताज़गी।
2 पाठ का परिचय
संस्मरण ऐसी गद्य-विधा है जिसमें लेखक अपने जीवन की किसी वास्तविक घटना या व्यक्ति से जुड़ी स्मृतियों को शब्दों में उतारता है। यह आत्मकथा का हिस्सा हो सकता है, पर पूरी जीवन-कहानी नहीं बल्कि कुछ चुने हुए क्षणों का चित्रण होता है।
यह पाठ भीष्म साहनी की आत्मकथा ‘आज के अतीत’ का एक अंश है। लेखक ने किशोरावस्था से प्रौढ़ावस्था तक के अपने अनुभवों को स्मृति के आधार पर लिखा है। इसमें तीन अलग समय, जगह और व्यक्ति से जुड़े प्रसंग हैं:

पाठ के माध्यम से लेखक के व्यक्तित्व के साथ-साथ राष्ट्रीयता, देशप्रेम और अंतरराष्ट्रीय मैत्री जैसे मुद्दे भी सामने आते हैं।
किसी उक्ति या घटना को ग़लत व्यक्ति से जोड़ना एक आम ग़लती है। हर उक्ति के आगे वक्ता का नाम ध्यान से पढ़िए।
3 गांधी जी के साथ: सेवाग्राम (सन् 1938)
3.1 पहली मुलाकात
यह घटना लगभग सन् 1938 की है, जिस साल कांग्रेस का हरिपुरा अधिवेशन हुआ था। लेखक के भाई बलराज सेवाग्राम में रहते थे, जहाँ वे ‘नयी तालीम’ पत्रिका के सह-संपादक थे। लेखक कुछ दिन उनके साथ बिताने के लिए वहाँ पहुँचे।
- रेलगाड़ी वर्धा स्टेशन पर रुकती थी; वहाँ से सेवाग्राम लगभग पाँच मील दूर, इक्के या ताँगे से जाना पड़ता था।
- लेखक देर रात पहुँचे: सड़क कच्ची थी, घुप्प अँधेरा था, उन दिनों सड़क पर रोशनी नहीं होती थी।
- भाई ने बताया कि गांधी जी रोज़ प्रातः सात बजे घूमने निकलते हैं और उनके क्वार्टर के सामने से ही गुज़रते हैं।
- अगले दिन लेखक तड़के जग गए और सड़क पर आँखें गाड़े गांधी जी का इंतज़ार करने लगे।
ऐन सात बजे गांधी जी आश्रम का फाटक लाँघकर साथियों के साथ निकले। लेखक उन्हें देखते ही पुलक उठे: गांधी जी हूबहू वैसे ही लग रहे थे जैसा उन्हें चित्रों में देखा था, यहाँ तक कि कमर से लटकती घड़ी भी जानी-पहचानी लगी।
बलराज अब तक सो रहे थे, इसलिए लेखक ने झिंझोड़कर उन्हें जगाया। जब तक दोनों बाहर निकले, गांधी जी की टोली काफ़ी आगे जा चुकी थी। कुछ ही देर में दोनों उनसे जा मिले। गांधी जी ने मुड़कर देखा, और बलराज ने आगे बढ़कर परिचय कराया: “मेरा भाई है, कल ही रात पहुँचा है।” इस पर गांधी जी हँसकर बोले:
“अच्छा। इसे भी घेर लिया।”
गांधी जी, जब बलराज ने लेखक का परिचय कराया
बलराज ने स्पष्ट किया, “नहीं बापू, यह केवल कुछ दिन के लिए मेरे पास आया है।” गांधी जी मुसकुराए और सिर हिला दिया।
टोली में चलते हुए लेखक ने दो लोगों को पहचान लिया: डॉ. सुशीला नय्यर और गांधी जी के निजी सचिव महादेव देसाई।
3.2 रावलपिंडी की याद
लेखक गांधी जी से बात करना चाहते थे पर समझ नहीं पा रहे थे कि क्या कहें। अचानक उन्हें सूझा और उन्होंने कहा, “आप बहुत साल पहले हमारे शहर रावलपिंडी में आए थे।”
“याद है। मैं कोहाट से रावलपिंडी गया था… मिस्टर जॉन कैसे हैं?”
गांधी जी, रावलपिंडी की बात सुनकर
गांधी जी रुक गए, उनकी आँखों में चमक आई और मुसकुराकर यह कहा। लेखक ने जॉन साहब का नाम सुन रखा था: वे रावलपिंडी के जाने-माने बैरिस्टर थे, मुस्लिम सज्जन थे; लेखक का अनुमान है कि गांधी जी शायद उनके यहाँ ठहरे होंगे (पाठ इसे निश्चित रूप से नहीं कहता)। फिर गांधी जी सहसा बोले, “अरे, मैं उन दिनों कितना काम कर लेता था। कभी थकता ही नहीं था।” यह सुनते ही महादेव देसाई, जो थोड़ा पीछे मोटा-सा लट्ठ उठाए चले आ रहे थे, आगे आ गए और उस पुराने दौरे की यादें आश्रम के फाटक तक सुनाते रहे। गांधी जी बीच-बीच में धीमी आवाज़ में हँसते हुए कुछ कहते, मानो अपने-आप से बातें कर रहे हों।

3.3 सेवाग्राम में जीवन
लेखक सेवाग्राम में लगभग तीन सप्ताह रहे। वे अकसर प्रातः उस टोली के साथ हो लेते और शाम को प्रार्थना सभा में जा पहुँचते, जहाँ “सभी आश्रमवासी तथा कस्तूरबा एक ओर को पालथी मारे और दोनों हाथ गोद में रखे बैठी होतीं और बिलकुल मेरी माँ जैसी लगतीं।”
जापानी भिक्षु और गाँग
एक जापानी भिक्षु चीवर वस्त्रों में आश्रम की प्रदक्षिणा करता, लगभग मीलभर घेरे में ‘गाँग’ बजाता। प्रार्थना के समय प्रदक्षिणा पूरी करके गांधी जी को आदर से प्रणाम करता और एक ओर बैठ जाता।
देशभक्तों का आना
पृथ्वीसिंह आज़ाद (हथकड़ियों समेत भागती रेलगाड़ी से कूदकर भागे, बरसों गुमनाम रहकर पढ़ाया), मीरा बेन, खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान, और कुछ दिन के लिए राजेंद्र बाबू: इन सबकी मौजूदगी से सेवाग्राम कभी दूर का कस्बा नहीं लगा।
3.4 रोगी बालक का प्रसंग
एक दोपहर लेखक आश्रम के बाहर टहल रहे थे, तभी एक खोखे से आवाज़ आई: करीब पंद्रह साल का एक ग्रामीण लड़का हाथ-पैर पटकता, हाँफता हुआ बार-बार चिल्ला रहा था, “मैं मर रहा हूँ, बापू को बुलाओ।” पास आए दो-एक आदमियों में से एक आश्रमवासी ने कहा, “बापू नहीं आ सकते। ज़रूरी मीटिंग चल रही है।” पर लड़का चिल्लाता ही रहा।
तभी गांधी जी स्वयं, नंगे बदन पर खादी की चादर ओढ़े, मैदान लाँघते चले आए। लड़के का फूला पेट देखकर हाथ फेरा और बोले:
“ईख पीता रहा है? इतनी ज़्यादा पी गया? तू तो पागल है!”
गांधी जी, रोगी बालक से
फिर सहारा देकर उठाया, कहा, “इधर नीचे उतरो और मुँह में उँगली डालकर कै कर दो। चलो।” और कहते हुए हँस पड़े, “तू तो पागल है।” लड़का नाली किनारे बैठा, गांधी जी पीठ पर हाथ रखे झुके रहे। पेट हलका होते ही उसे खोखे में लेटने को कहा, आश्रमवासी को हिदायत देकर, हँसते हुए “तू तो पागल है” कहते हुए मैदान पार कर गए।
“गांधी जी के चेहरे पर लेशमात्र भी क्षोभ का भाव नहीं था। वे हँसते हुए चले गए थे।”: प्रश्न-अभ्यास के प्रश्न 4 (रोगी बालक के प्रति गांधी जी का व्यवहार) के उत्तर में यह पंक्ति प्रमाण के रूप में दी जा सकती है।
3.5 दिक् के रोगी की रोज़ाना सेवा
रोज़ प्रातः जिस कच्ची सड़क पर गांधी जी घूमने निकलते, उसके एक सिरे पर एक कुटिया थी, जिसमें एक रुग्ण व्यक्ति रहते थे: संभवतः वे दिक् (तपेदिक) के मरीज़ थे। गांधी जी हर दिन उनके पास जाकर स्वास्थ्य के बारे में पूछते; यह बातचीत गुजराती भाषा में होती। लेखक का मानना है कि उस व्यक्ति का इलाज गांधी जी की देखरेख में चल रहा था: यह गांधी जी का रोज़ का नियम था।
गांधी जी हर दिन कुटिया में रहने वाले एक रोगी की ख़बर लेने जाते थे; लेखक के शब्दों में “यह गांधी जी का रोज़ का नियम था।” यह गांधी जी के सेवाभाव का एक उदाहरण है।
4 नेहरू जी के साथ: काश्मीर
4.1 भव्य स्वागत
लगभग उसी समय पंडित नेहरू काश्मीर यात्रा पर आए, जहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ। शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में, झेलम नदी पर, शहर के एक सिरे से दूसरे सिरे तक: सातवें पुल से अमीराकदल तक: नावों में उनकी शोभायात्रा निकाली गई, जब नदी के दोनों ओर “हज़ारों-हज़ार काश्मीर निवासी अदम्य उत्साह के साथ उनका स्वागत कर रहे थे”। लेखक इसे “अद्भुत दृश्य” कहते हैं।
नेहरू जी जिस बँगले में ठहरे, वह लेखक के फुफेरे भाई का था। भाई के आग्रह पर कि लेखक पंडित जी की देखभाल में हाथ बँटाएँ, लेखक भी उसी बँगले में पहुँच गए। दिनभर पंडित जी स्थानीय नेताओं के साथ व्यस्त रहते; शाम को खाने पर बैठते तो लेखक भी साथ बैठते: यह नेहरू जी को नज़दीक से देखने का सुनहरा मौका था।
4.2 भोज पर धर्म की बहस
एक दिन खाने की मेज़ पर बड़े प्रतिष्ठित लोग बैठे थे: शेख अब्दुल्ला, खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान, श्रीमती रामेश्वरी नेहरू, उनके पति आदि। बातों-बातों में धर्म की चर्चा चली और रामेश्वरी नेहरू और जवाहरलाल जी के बीच बहस छिड़ गई।
“मैं भी धर्म के बारे में कुछ जानता हूँ।”
जवाहरलाल नेहरू, बहस के दौरान (पाठ: “बड़ी गरमजोशी के साथ तनिक तुनककर बोले”)
रामेश्वरी चुप रहीं। जल्दी ही जवाहरलाल जी ठंडे पड़ गए और धीरे से बोले, “आप लोगों को एक किस्सा सुनाता हूँ।”
4.3 नेहरू जी की सुनाई कहानी
यह कहानी नेहरू जी ने केवल सुनाई थी, यह उनके या गांधी जी के अपने जीवन की घटना नहीं है। इसके पात्र (बाज़ीगर, पादरी, माता मरियम) काल्पनिक हैं।
नेहरू जी ने फ्रांस के प्रसिद्ध लेखक अनातोले फ्रांस की लिखी एक मार्मिक कहानी सुनाई: पेरिस में एक गरीब बाज़ीगर (नट) करतब दिखाकर अपना पेट पालता था, और अब बूढ़ा हो चला था। क्रिसमस के दिन जब सब लोग सजे-धजे फूल और उपहार लेकर माता मरियम को श्रद्धांजलि देने गिरजे जा रहे थे, बाज़ीगर हताश खड़ा था: न उसके पास कोई उपहार था, न ही किसी फटेहाल को गिरजे में जाने दिया जाता।
तभी उसे विचार आया: मैं उपहार नहीं दे सकता, पर अपने करतब दिखाकर माता मरियम की अभ्यर्थना (प्रार्थना) कर सकता हूँ। जब गिरजा खाली हो गया, बाज़ीगर चुपके से अंदर घुसा और पूरी तन्मयता से अपने करतब दिखाने लगा, यहाँ तक कि हाँफने लगा। उसकी आवाज़ सुनकर बड़ा पादरी दौड़ा आया: यह सोचकर कि कोई जानवर गिरजे को दूषित कर रहा है। बाज़ीगर को सिर के बल खड़ा देखकर पादरी क्रोधित हो गया और उसे बाहर निकालने के लिए बढ़ा। पर तभी उसने देखा कि माता मरियम की मूर्ति अपने मंच से उतर आई है और धीरे-धीरे बाज़ीगर के पास पहुँचकर अपने आँचल से उसका पसीना पोंछ रही है।
पाठ इस कहानी का कोई संदेश अलग से नहीं बताता, और न यह बताता है कि नेहरू जी ने यह किस्सा किस उद्देश्य से सुनाया। इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है: सच्ची श्रद्धा साधनों की मोहताज नहीं होती।
मेज़ पर बैठे सभी लोग यह कहानी दत्तचित (एकाग्रचित्त) होकर सुन रहे थे।
4.4 चरखा और अख़बार का प्रसंग
नेहरू जी का कमरा ऊपर की मंज़िल पर था, बगल के कमरे में लेखक और उनके फुफेरे भाई ठहरे थे। उस रात नेहरू जी देर तक चिट्ठियाँ लिखवाते रहे। सुबह जब लेखक नीचे जा रहे थे, तो नेहरू जी के कमरे के सामने से गुज़रते हुए उन्होंने देखा कि नेहरू जी फर्श पर बैठे चरखा कात रहे थे, उनकी पीठ दरवाज़े की ओर थी।
लेखक नीचे उतर आए और बरामदे में रखा अखबार उठा लिया। तभी सीढ़ियों पर आहट सुनाई दी: नेहरू जी उतर रहे थे, जिन्हें उस दिन साथियों सहित पहलगाम रवाना होना था। लेखक को एक बचकानी तरकीब सूझी: उन्होंने तय किया कि अखबार तभी देंगे जब नेहरू जी माँगेंगे, ताकि कम-से-कम इस बहाने एक छोटी-सी बातचीत हो जाए।
नेहरू जी आए, अखबार लेखक के हाथ में देखकर चुपचाप एक ओर खड़े हो गए: शायद इंतज़ार में कि लेखक स्वयं दे देंगे। लेखक की टाँगें डर से काँपने लगीं, फिर भी वे अखबार थामे रहे। कुछ देर बाद नेहरू जी ने धीरे से कहा:
“आपने देख लिया हो तो क्या मैं एक नज़र देख सकता हूँ?”
जवाहरलाल नेहरू, अखबार माँगते हुए
यह सुनते ही लेखक पानी-पानी हो गए (शर्मिंदा हुए) और तुरंत अखबार उनके हाथ में दे दिया।
“अखबार वाली घटना से नेहरू जी के व्यक्तित्व की कौन सी विशेषता स्पष्ट होती है?”: यह प्रश्न-अभ्यास का प्रश्न 6 है। उत्तर में नेहरू जी का धैर्य, विनम्रता और सहनशीलता लिखिए: वे झुँझलाए नहीं, बल्कि विनम्रता से माँग लिया।
5 यास्सेर अराफ़ात के साथ: ट्यूनिस
5.1 अफ्रो-एशियाई लेखक संघ और ट्यूनिस सम्मेलन
उन दिनों लेखक अफ्रो-एशियाई लेखक संघ के कार्यकारी महामंत्री थे। ट्यूनीसिया की राजधानी ट्यूनिस में लेखक संघ का सम्मेलन होने जा रहा था। भारत से जाने वाले प्रतिनिधि मंडल में कमलेश्वर, जोगिंदरपाल, बालू राव, अब्दुल बिस्मिल्लाह आदि थे। कार्यकारी महामंत्री होने के नाते लेखक अपनी पत्नी के साथ कुछ दिन पहले ही पहुँच गए थे।
ट्यूनिस में ही लेखक संघ की पत्रिका ‘लोटस’ का संपादकीय कार्यालय था। लगभग एक साल पहले पत्रिका के प्रधान संपादक फैज़ अहमद फैज़ का निधन हो चुका था। ट्यूनिस में ही उस समय फ़िलिस्तीनी अस्थायी सरकार का सदरमुकाम (मुख्यालय) भी था। उस समय तक फ़िलिस्तीन का मसला हल नहीं हुआ था, और यह अस्थायी सरकार यास्सेर अराफ़ात के नेतृत्व में वहीं काम कर रही थी। लेखक संघ की गतिविधि में भी फ़िलिस्तीनी लेखकों, बुद्धिजीवियों तथा अस्थायी सरकार का बड़ा योगदान था।
5.2 सदरमुकाम में आतिथ्य
‘लोटस’ के तत्कालीन संपादक एक दिन प्रातः लेखक के होटल आए और बताया कि उन्हें और उनकी पत्नी को उस दिन सदरमुकाम में आमंत्रित किया गया है: पूरा ब्यौरा नहीं दिया, बस बारह बजे लेने आने को कहा।
“वहाँ पहुँचे तो बड़ी झेंप हुई।” उनके पहुँचने पर स्वयं यास्सेर अराफ़ात अपने दो-एक साथियों के साथ बाहर आए और उन्हें अंदर लिवा ले गए। लेखक केवल अनुमान लगाते हैं: “संभव है संपादक महोदय ने सुरक्षा की दृष्टि से हमें खोलकर न बताया हो कि वास्तव में हम दोनों को दिन के भोजन पर आमंत्रित किया गया था।” अंदर सदरमुकाम के लगभग बीसेक अधिकारी तथा कुछेक फ़िलिस्तीनी लेखक तपाक से मिले।
बड़े कमरे में दाईं ओर लंबी मेज़ पर एक बड़ा भुना हुआ बकरा रखा था, जो लगभग आधी मेज़ घेरे हुए था। लेखक और उनकी पत्नी बाईं ओर बिठाए गए, जहाँ चाय-पान का प्रबंध था: और यास्सेर अराफ़ात उनके साथ ही बैठ गए।
बातचीत के विषय
फ़िलिस्तीन के प्रति साम्राज्यवादी शक्तियों के अन्यायपूर्ण रवैए की भारत के नेताओं द्वारा की गई निंदा, और फ़िलिस्तीन आंदोलन के प्रति भारतवासियों की सहानुभूति व समर्थन।
अराफ़ात का आतिथ्य
बातचीत के बीच-बीच में आतिथ्य भी चल रहा था: अराफ़ात स्वयं फल छील-छीलकर खिला रहे थे, शहद की चाय बना रहे थे। साथ ही अपनी इंजीनियरिंग की शिक्षा और अनथक हवाई यात्राओं की बातें भी होती रहीं।
5.3 “वे आपके ही नहीं, हमारे भी नेता हैं”
जब लेखक ने बातचीत में एक-दो बार गांधी जी और भारत के अन्य नेताओं का ज़िक्र किया, तो अराफ़ात बोले:
“वे आपके ही नहीं, हमारे भी नेता हैं। उतने ही आदरणीय जितने आपके लिए।”
यास्सेर अराफ़ात, गांधी जी और भारत के नेताओं के बारे में
यह उक्ति अराफ़ात की है, गांधी या नेहरू की नहीं। इसी पर आधारित “गांधी जी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए” के उत्तर में लिखिए: अराफ़ात के अनुसार गांधी जी केवल भारतवासियों के नेता नहीं थे; फ़िलिस्तीनियों के लिए भी वे उतने ही आदरणीय नेता थे जितने भारतवासियों के लिए। पाठ अराफ़ात के इस कथन का कोई अलग कारण नहीं बताता; यह बात लेखक द्वारा गांधी जी और भारत के नेताओं का ज़िक्र करने पर कही गई।
5.4 तौलिया प्रसंग
भोजन के समय लेखक अनुमान लगाकर गुसलखाने की ओर गए, अनुमान सही निकला। पर बाहर निकलते ही यास्सेर अराफ़ात स्वयं तौलिया हाथ में लिए खड़े मिले, झेंप का अंत नहीं था।
6 तीनों प्रसंगों की तुलना
| बिंदु | गांधी जी | नेहरू जी | यास्सेर अराफ़ात |
|---|---|---|---|
| स्थान | सेवाग्राम | काश्मीर | ट्यूनिस |
| वर्ष/काल | लगभग 1938 | लगभग उसी समय | पाठ में तिथि नहीं दी गई (“उन दिनों”, लेखक संघ के कार्यकारी महामंत्री रहते हुए) |
| साथ में मौजूद | बलराज, सुशीला नय्यर, महादेव देसाई, कस्तूरबा | फुफेरा भाई, शेख अब्दुल्ला, गफ़्फ़ार खान, रामेश्वरी नेहरू | पत्नी, यास्सेर अराफ़ात के दो-एक साथी, लगभग बीसेक अधिकारी, कुछेक फ़िलिस्तीनी लेखक |
| याद रहने वाली उक्ति | “अच्छा। इसे भी घेर लिया।” | “आपने देख लिया हो तो क्या मैं एक नज़र देख सकता हूँ?” | “वे आपके ही नहीं, हमारे भी नेता हैं।” |
| मुख्य प्रसंग | रोगी बालक का उपचार | अनातोले फ्रांस की कहानी | भुने बकरे का भोज और तौलिया-प्रसंग |
| लेखक पर प्रभाव | सहजता, सेवाभाव | धैर्य, विनम्रता | आत्मीय आतिथ्य, झेंप |
7 पाठ की भाषा-शैली और शिल्प
- प्रथम-पुरुष (मैं-शैली): लेखक स्वयं घटनाओं के गवाह और भागीदार हैं।
- छोटे-छोटे संवाद और सजीव ब्यौरे पाठ को रोचक बनाते हैं।
- लेखक स्वयं को एक साधारण, कभी-कभी सकुचाने वाला पात्र दिखाते हैं, यह सहजता पाठ को आत्मीय बनाती है।
- बड़े नेता यहाँ सार्वजनिक, गंभीर रूप में नहीं बल्कि रोज़मर्रा के आत्मीय क्षणों में दिखते हैं, यह इस संस्मरण की एक प्रमुख विशेषता है। पाठ का परिचय इसे “अत्यंत रोचक, सरस एवं पठनीय” कहता है।
8 शब्दार्थ और मुहावरे
| शब्द/मुहावरा | अर्थ |
|---|---|
| गाँडा | बाजू और गले में पहना जाने वाला ताबीज़ या काला धागा |
| प्रदक्षिणा | परिक्रमा |
| घुप्प | गहरा, घोर (अँधेरा) |
| झिंझोड़कर | पकड़कर ज़ोर से हिलाना |
| पालथी | बैठने का एक आसन जिसमें दाहिने और बाएँ पैरों के पंजे क्रम से बाईं और दाईं जाँघ के नीचे दबे रहते हैं |
| चीवर | वस्त्र, बौद्ध भिक्षुओं का ऊपरी पहनावा |
| क्षोभ | रोषयुक्त असंतोष, नाराज़गी |
| रुग्ण | बीमार, अस्वस्थ |
| दिक् | तपेदिक (टीबी की बीमारी) |
| लब्ध प्रतिष्ठ | प्रसिद्धि प्राप्त, यश अर्जित किया हुआ |
| अभ्यर्थना | प्रार्थना, निवेदन |
| दत्तचित | जिसका मन किसी कार्य में पूरी तरह लगा हो, एकाग्र |
| लरजना | काँपना, हिलना-डुलना |
| नज़रसानी | पुनर्विचार, नज़र डालना |
| सदरमुकाम | राजधानी, मुख्यालय |
| आँखों में चमक आना | प्रसन्न होना |
| हाथ पैर पटकना | बेचैन होना, तड़पना |
| पेट पालना | गुज़ारा करना |
| पानी-पानी होना | शर्मिंदा होना |
| आँखें गाड़ना | एक जगह नज़र टिकाना |
| पुलक उठना | प्रसन्न हो जाना |
| घेर लेना | अपनी ओर कर लेना |
| तिलमिला उठना | कष्ट या पीड़ा से विकल हो जाना |
| एक नज़र देखना | अवलोकन करना, ध्यान से देखना |
| चल बसना | दिवंगत होना, निधन होना |
- पाठ भीष्म साहनी की आत्मकथा ‘आज के अतीत’ से लिया गया एक संस्मरण है, तीन स्वतंत्र प्रसंगों में।
- सेवाग्राम (1938) में गांधी जी के साथ: पहली मुलाकात, रावलपिंडी की याद, रोगी बालक का उपचार, दिक् के रोगी की रोज़ाना सेवा।
- गांधी जी की उक्ति याद रखें: “अच्छा। इसे भी घेर लिया” और “तू तो पागल है।”
- काश्मीर में नेहरू जी के साथ: भव्य स्वागत, धर्म पर बहस, अनातोले फ्रांस की कहानी (नेहरू ने सुनाई; यह उनके या लेखक के अपने जीवन की घटना नहीं), चरखा और अखबार का प्रसंग।
- नेहरू जी की उक्ति याद रखें: “आपने देख लिया हो तो क्या मैं एक नज़र देख सकता हूँ?”
- ट्यूनिस में यास्सेर अराफ़ात के साथ: अफ्रो-एशियाई लेखक संघ सम्मेलन, भुने बकरे का भोज, आतिथ्य, तौलिया-प्रसंग।
- अराफ़ात की उक्ति याद रखें: “वे आपके ही नहीं, हमारे भी नेता हैं।”
- पाठ का उद्देश्य: लेखक का व्यक्तित्व + राष्ट्रीयता, देशप्रेम और अंतरराष्ट्रीय मैत्री।
- क्या मैं भीष्म साहनी का जीवन-परिचय बिना देखे लिख सकता हूँ?
- क्या मुझे पता है कि “इसे भी घेर लिया” किसने कहा और कब?
- क्या मैं नेहरू द्वारा सुनाई गई अनातोले फ्रांस की कहानी अपने शब्दों में लिख सकता हूँ?
- क्या मुझे पता है कि “वे आपके ही नहीं, हमारे भी नेता हैं” किसने कहा?
- क्या मैं गांधी जी और रोगी बालक वाली घटना क्रम से सुना सकता हूँ?