- असगर वजाहत का जीवन-परिचय और उनकी भाषा-शैली
- लघुकथा और व्यंग्य किसे कहते हैं, और यह कहानी से कैसे अलग है
- चारों लघुकथाओं (शेर, पहचान, चार हाथ, साझा) की पूरी कथा और उनका प्रतीकात्मक अर्थ, हर एक अलग-अलग
- चारों कहानियों का साझा व्यंग्य-लक्ष्य, और हर एक का अपना अलग निशाना
- पाठ के सभी शब्दार्थ और टिप्पणियाँ
1 लेखक-परिचय: असगर वजाहत

जन्म: सन् 1946, फतेहपुर, उत्तर प्रदेश। प्रारंभिक शिक्षा फतेहपुर में हुई; विश्वविद्यालय स्तर की पढ़ाई उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से की। सन् 1955-56 से ही उन्होंने लेखन कार्य शुरू कर दिया था, पहले विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में, बाद में वे दिल्ली के जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य करने लगे।
- कहानी, उपन्यास, नाटक और लघुकथा लिखी; फ़िल्मों और धारावाहिकों के लिए पटकथा-लेखन भी किया
- प्रमुख कहानी-संग्रह: दिल्ली पहुँचना है, स्विमिंग पूल और सब कहाँ कुछ, आधी बानी, मैं हिंदू हूँ
- प्रमुख नाटक: फिरंगी लौट आए, इन्ना की आवाज़, वीरगति, समिधा, जिस लाहौर नई देख्या, अकी; नुक्कड़-नाटक संग्रह सबसे सस्ता गोश्त
- प्रमुख उपन्यास: रात में जागने वाले, पहर दोपहर तथा सात आसमान, कैसी आगि लगाई
- अन्य कार्य: गज़ल की कहानी वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) का निर्देशन; बूँद-बूँद धारावाहिक का लेखन
असगर वजाहत की भाषा में गांभीर्य, सबल भावाभिव्यक्ति और व्यंग्यात्मकता है। मुहावरों तथा तद्भव शब्दों के प्रयोग से उसमें सहजता और सादगी आ गई है।
2 लघुकथा और व्यंग्य
लघुकथा कहानी की तरह ही गद्य-विधा है, पर आकार में बहुत छोटी और एक ही केंद्रीय भाव/व्यंग्य पर टिकी होती है। इसमें बहुत कम पात्र, कोई विस्तृत घटनाक्रम नहीं, और अंत प्रायः चौंकाने वाला या सीधा प्रहार करने वाला होता है।
व्यंग्य सीधी आलोचना नहीं करता। यह किसी बात को घुमा-फिराकर, चुटीले या हास्यास्पद ढंग से कहता है ताकि पाठक ख़ुद उस कमज़ोरी या अन्याय को पहचान ले। पाठ के अनुसार लेखक की भाषा में “गांभीर्य, सबल भावाभिव्यक्ति एवं व्यंग्यात्मकता” है, और शेर को पाठ “प्रतीकात्मक और व्यंग्यात्मक लघुकथा” कहता है।
शीर्षक में चार नाम एक साथ हैं क्योंकि पाठ में चार पूरी तरह अलग-अलग लघुकथाएँ दी गई हैं: अलग पात्र, अलग कथानक, अलग निशाना। चारों में सिर्फ़ शैली और लेखक एक जैसे हैं; एक कहानी के पात्र या घटना को दूसरी में मिलाना ग़लत होगा।
3 (क) शेर
कहानी प्रथम पुरुष (कथावाचक “मैं”) में है। कथावाचक शहर और आदमियों से डरकर जंगल भाग आया था, क्योंकि उसके सिर पर सींग निकल रहे थे और उसे डर था कि किसी दिन कसाई की नज़र उस पर पड़ जाएगी।
सींग निकलना यहाँ प्रतीक के रूप में प्रयुक्त हुआ है (गधे के सिर पर सींग निकलने की पुरानी कहावत से लिया गया)। इसका अर्थ है: व्यवस्था से अलग रहना, बनी-बनाई लीक से हटकर चलना। कथावाचक ऐसा ही एक व्यक्ति है, और वह गधे, लोमड़ी तथा उल्लू से सीधे सवाल पूछता है।
जंगल में पहले ही दिन कथावाचक ने बरगद के पेड़ के नीचे एक शेर बैठा देखा, मुँह खुला हुआ। डर के मारे वह एक झाड़ी के पीछे छिप गया। वहाँ से उसने देखा कि जंगल के छोटे-मोटे जानवर लाइन से चले आ रहे हैं और शेर के मुँह में घुसते चले जा रहे हैं। शेर बिना हिले-डुले, बिना चबाए उन्हें गटकता जा रहा है।
कथावाचक बारी-बारी से तीन जानवरों (गधा, लोमड़ी, उल्लू) से पूछता है कि वे स्वेच्छा से शेर के मुँह में क्यों जा रहे हैं। हर एक का जवाब अलग है, पर हर एक उतना ही ग़लत भरोसा है। चौथे समूह, कुत्तों के जुलूस, को वह रोकना चाहता है, पर वे उसकी बात अनसुनी कर देते हैं:
| जानवर | उसका दावा: शेर के मुँह के अंदर क्या है |
|---|---|
| गधा (लंगड़ाता हुआ) | हरी घास का बहुत बड़ा मैदान है, वहाँ आराम से रहूँगा और खूब घास मिलेगी |
| लोमड़ी | रोज़गार का दफ़्तर है, वहाँ दरख़्वास्त दूँगी तो नौकरी मिल जाएगी (“शेर ने बताया”) |
| उल्लू | स्वर्ग है, और यही निर्वाण का एकमात्र रास्ता है |
| कुत्तों का जुलूस | कोई दावा नहीं बताया गया; जुलूस “कभी हँसते-गाते थे और कभी विरोध में चीखते-चिल्लाते थे”, पर “सब दुम दबाए थे”; कथावाचक के चीखकर रोकने पर भी नहीं रुके |
जानवर और उसका दावा न मिलाएँ: गधा-घास, लोमड़ी-नौकरी, उल्लू-स्वर्ग/निर्वाण।
3.2 कथावाचक और शेर के स्टाफ़ के बीच संवाद
कथावाचक ख़ुद शेर के पास गया। शेर आँखें बंद किए पड़ा था और उसका स्टाफ़ दफ़्तर का काम निपटा रहा था। कथावाचक ने पूछा कि क्या यह सच है कि शेर के पेट के अंदर रोज़गार का दफ़्तर है, बताया गया कि यह सच है।
“प्रमाण से अधिक महत्त्वपूर्ण है विश्वास?”
शेर के स्टाफ़ का उत्तर, जब कथावाचक ने प्रमाण माँगा। कथावाचक ने बाहर के रोज़गार दफ़्तर के बारे में पूछा तो बताया गया, “मिथ्या है।” भावार्थ: यहाँ स्टाफ़ अपने दावे को साबित नहीं करता, बस भरोसा करवाता है
कथावाचक ने साफ़ इनकार कर दिया: “तुम लोग मुझे उल्लू नहीं बना सकते… मैं इसमें नहीं जाऊँगा।” यह कहते ही गौतम बुद्ध की मुद्रा में बैठा शेर दहाड़कर खड़ा हो गया और उसकी ओर झपट पड़ा। कहानी यहीं समाप्त होती है, आगे क्या हुआ यह नहीं बताया गया।
शेर “गौतम बुद्ध की मुद्रा” में बैठा है, और पाठ के परिचय के अनुसार “ऊपर से देखने पर शेर अहिंसावादी, न्यायप्रिय और बुद्ध का अवतार प्रतीत होता है”। जब तक कोई सवाल नहीं करता, शेर वैसे ही शांत, अहिंसक और न्यायप्रिय दिखता है। सवाल उठते ही वही शेर दहाड़ता हुआ झपट पड़ता है, यही सत्ता का असली चेहरा है।
कथावाचक ने यह भी सुना था कि “शेर अहिंसा और सह-अस्तित्ववाद का बड़ा ज़बरदस्त समर्थक है इसलिए जंगली जानवरों का शिकार नहीं करता”। पाठ के परिचय के अनुसार इस कहानी का व्यंग्य सिर्फ़ सत्ता पर नहीं है: “लेखक ने सुविधाभोगियों, छद्म क्रांतिकारियों, अहिंसावादियों और सह-अस्तित्ववादियों के ढोंग पर भी प्रहार किया है।”
शेर = सत्ता, मुँह = लालच से भरा जाल, गधा, लोमड़ी, उल्लू, कुत्ते = “किसी न किसी प्रलोभन के चलते” शेर के मुँह में जाने वाले; कुत्ते विरोध में चीखते-चिल्लाते हुए भी चले गए
सत्ता तभी तक ख़ामोश और अहिंसक बनी रहती है जब तक सब उसकी आज्ञा मानते रहें। जैसे ही कोई उस पर उँगली उठाता है, वह अपनी असली, हिंसक शक्ल दिखा देती है।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| निर्वाण | जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति |
| उल्लू बनाना | मूर्ख बनाना |
4 (ख) पहचान
यह कहानी तीसरे पुरुष में है, एक राजा और उसकी प्रजा की। राजा को ऐसी प्रजा पसंद है जो बहरी, गूँगी और अंधी हो, यानी बिना कुछ बोले, बिना कुछ सुने और बिना कुछ देखे उसकी आज्ञा मानती रहे। राजा एक के बाद एक हुक्म देता जाता है: पहला हुक्म “शांति” के नाम पर दिया जाता है; बाद के हर हुक्म का अपना अलग बहाना है: सुनना “जीवित रहने के लिए बिलकुल ज़रूरी नहीं है”, बोलना “उत्पादन में सदा से बाधक रहा है”, और खाना भी “काम करने के लिए बहुत आवश्यक नहीं माना गया”। इनमें केवल बोलने को उत्पादन में बाधक कहा गया है।
पाठ के परिचय के अनुसार इस छद्म प्रगति और विकास के बहाने “राजा उत्पादन के सभी साधनों पर अपनी पकड़ मज़बूत करता जाता है। वह लोगों के जीवन को स्वर्ग जैसा बनाने का झाँसा देकर अपना जीवन स्वर्गमय बनाता है। वह जनता को एकजुट होने से रोकता है और उन्हें भुलावे में रखता है।”
4.1 राजा के क्रमिक हुक्म, हर एक पहले से बड़ा त्याग माँगता है
4.2 खैराती, रामू और छिद्दू: आँखें खोलकर देखने का नतीजा
एक दिन खैराती, रामू और छिद्दू ने सोचा कि आँखें खोलकर देखें, अब तक तो राज्य स्वर्ग हो गया होगा। तीनों ने आँखें खोलीं, तो उन्हें अपने सामने राजा ही दिखाई दिया। वे एक-दूसरे को नहीं देख सके। कहानी यहीं समाप्त हो जाती है।
तीनों ने आँखें खोलीं तो उन सबको अपने सामने राजा दिखाई दिया। वे एक-दूसरे को न देख सके।
कहानी की अंतिम पंक्ति। भावार्थ: तानाशाही सत्ता जनता को न सिर्फ़ अंधा-बहरा-गूँगा बनाती है, बल्कि उनकी आपसी एकता भी तोड़ देती है: आँख खुलने पर भी हर किसी को सिर्फ़ सत्ता ही दिखती है, एक-दूसरे का साथ नहीं
यह मत लिखें कि आँखें खोलने पर उन्हें “स्वर्ग” दिखा: पाठ के अनुसार सिर्फ़ राजा दिखाई दिया।
यह पूरी कहानी रूपक (प्रतीकात्मक) है: आँख-कान-मुँह बंद कराना उस सत्ता का प्रतीक है जो असहमति, सूचना और विरोध को “प्रगति/उत्पादन” के नाम पर कुचल देती है। पाठ का परिचय भूमंडलीकरण और उदारीकरण के दौर की ओर भी संकेत करता है, जिसमें इन्हें “प्रगति और उत्पादन से जोड़कर संगत और ज़रूरी भी ठहराया जा रहा है”।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अनिवार्य | ज़रूरी, जिसके बिना काम न चले |
5 (ग) चार हाथ
एक मिल मालिक के मन में अजीब-अजीब खयाल आते रहते थे, जैसे सारा संसार मिल बन जाए, सारे लोग मज़दूर बन जाएँ और वह उनका मालिक बने, या मिल में और चीज़ों की तरह आदमी भी बनने लगें, “तब मज़दूरी भी नहीं देनी पड़ेगी, वगैरा-वगैरा”। एक दिन उसे खयाल आया: अगर मज़दूरों के चार हाथ हों तो काम कितनी तेज़ी से हो और मुनाफ़ा कितना ज़्यादा हो!
5.1 मालिक के तीन असफल प्रयोग
वैज्ञानिकों को नौकरी पर रखा
मोटी तनख्वाह पर बड़े वैज्ञानिक रखे; कई साल शोध के बाद उन्होंने कहा कि आदमी के चार हाथ होना असंभव है। मालिक नाराज़ होकर उन्हें नौकरी से निकाल देता है।
कटे और लकड़ी के हाथ
कटे हुए हाथ मंगवाकर फ़िट करवाने चाहे, नहीं हो सका। फिर लकड़ी के हाथ लगवाए, उनसे काम नहीं हो सका।
लोहे के हाथ
लोहे के हाथ फ़िट करवा दिए, इस बार मज़दूर ही मर गए।
“चार हाथ” का व्यंग्य: मज़दूरी आधी, मज़दूर दुगुने
आख़िर मालिक की समझ में बात आ गई: उसने मज़दूरी आधी कर दी और दुगुने मज़दूर नौकरी पर रख लिए। इस तरह उसे “चार हाथ” का काम मिल गया, बिना किसी वैज्ञानिक चमत्कार के, सिर्फ़ मज़दूरों का शोषण दोगुना करके।
यह लघुकथा पूँजीवादी शोषण को उजागर करती है: मज़दूर मिल के कल-पुर्ज़े बनकर रह जाते हैं और लाचारी में आधी मज़दूरी पर भी काम करने को तैयार हो जाते हैं, विरोध करने की स्थिति में नहीं रहते।
6 (घ) साझा
एक किसान को खेती की हर बारीकी मालूम थी, फिर भी डरा दिए जाने के कारण वह अकेले खेती करने का साहस नहीं जुटा पाता था। इससे पहले वह शेर, चीते और मगरमच्छ के साथ भी साझे की खेती कर चुका था; किसान के अपने कहे अनुसार, साझे में उसका कभी गुज़ारा नहीं होता।
अब हाथी ने किसान से साझे की खेती करने को कहा। किसान ने मना कर दिया: साझे में उसका गुज़ारा कभी नहीं होता, और अकेले वह खेती नहीं कर सकता। हाथी ने उसे “पट्टी पढ़ाई” और कहा कि साझे से यह लाभ होगा कि जंगल के छोटे-मोटे जानवर खेत को नुकसान नहीं पहुँचा सकेंगे और अच्छी रखवाली हो जाएगी।
पट्टी पढ़ाना = बहकाने वाली शिक्षा देना (पाठ का शब्दार्थ)।
हाथी किसान को “बहुत देर तक” पट्टी पढ़ाता है, ताकि किसान साझे की खेती के लिए राज़ी हो जाए।
किसान किसी तरह तैयार हो गया, और हाथी से मिलकर गन्ना बोया। हाथी ने पूरे जंगल में डुग्गी पीटकर घोषणा की कि गन्ने में उसका साझा है, इसलिए कोई जानवर खेत को नुकसान न पहुँचाए।
6.1 फ़सल का “बँटवारा”: कहानी का व्यंग्यात्मक अंत
फ़सल तैयार होने पर किसान हाथी को खेत पर बुला लाया। किसान चाहता था कि फ़सल आधी-आधी बाँटी जाए। हाथी काफ़ी बिगड़ा और बोला, “अपने और पराए की बात मत करो। यह छोटी बात है। हम दोनों ने मिलकर मेहनत की थी हम दोनों उसके स्वामी हैं। आओ, हम मिलकर गन्ने खाएँ।”

किसान के कुछ कहने से पहले ही हाथी ने अपनी सूँड से एक गन्ना तोड़ लिया: एक छोर हाथी की सूँड में, दूसरा आदमी के मुँह में। “गन्ने के साथ-साथ आदमी हाथी के मुँह की तरफ़ खींचने लगा तो उसने गन्ना छोड़ दिया।” फिर हाथी ने कहा, “देखो, हमने एक गन्ना खा लिया।” “इसी तरह हाथी और आदमी के बीच साझे की खेती बँट गई।” पाठ के परिचय के अनुसार किसान को पता भी नहीं चलता “और उसकी सारी कमाई हाथी के पेट में चली जाती है”।
यह मत लिखें कि फ़सल सचमुच आधी-आधी बँटी: किसान ने गन्ना छोड़ दिया और गन्ना हाथी के हिस्से गया; हाथी ने कहा, “हमने एक गन्ना खा लिया।”
पाठ के परिचय के अनुसार “उद्योगों पर कब्जा जमाने के बाद पूँजीपतियों की नज़र किसानों की ज़मीन और उत्पाद पर जमी है। गाँव का प्रभुत्वशाली वर्ग भी इसमें शामिल है।” वह साझा खेती का झाँसा देकर किसान की सारी फ़सल हड़प लेता है, और किसान को पता भी नहीं चलता। “यह कहानी आज़ादी के बाद किसानों की बदहाली का वर्णन करते हुए उसके कारणों की भी पड़ताल करती है।”
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| डुग्गी पीटना | प्रचार करना; पुराने ज़माने में डुग्गी (एक प्रकार का वाद्य) बजाकर लोगों को इकट्ठा किया जाता था और ज़रूरी सूचना सुनाई जाती थी |
7 चारों कहानियों का साझा व्यंग्य, और हर एक का अपना अलग निशाना
चारों लघुकथाएँ पशु-प्रतीकों या काल्पनिक शासकों के माध्यम से सत्ता और शोषण-तंत्र पर व्यंग्य करती हैं, पर हर एक का निशाना अलग है, इन्हें आपस में मिलाना नहीं है।
| लघुकथा | मुख्य प्रतीक | व्यंग्य का निशाना | कहानी का सार-संदेश |
|---|---|---|---|
| शेर | शेर = सत्ता | सत्ता का दोहरा चरित्र | सत्ता तब तक अहिंसक दिखती है जब तक कोई सवाल नहीं करता |
| पहचान | राजा = तानाशाह शासन | तानाशाही और झूठी “प्रगति” | प्रगति के नाम पर जनता को अंधा-बहरा-गूँगा बनाकर उनकी एकता तोड़ी जाती है |
| चार हाथ | मिल मालिक = पूँजीपति | पूँजीवादी श्रम-शोषण | मालिक का तरीक़ा: आधी मज़दूरी पर दुगुने मज़दूर रखना |
| साझा | हाथी = प्रभुत्वशाली/धनाढ्य वर्ग | किसानों की ज़मीन-उपज पर कब्ज़ा | साझेदारी के नाम पर ताक़तवर पक्ष किसान की सारी फ़सल हड़प लेता है |
- असगर वजाहत (जन्म 1946, फतेहपुर): कहानी, नाटक, उपन्यास, लघुकथा, पटकथा-लेखन; भाषा में गांभीर्य और व्यंग्यात्मकता
- चार अलग-अलग लघुकथाएँ, एक कहानी नहीं, हर एक का अपना पात्र और निशाना
- शेर: पाठ के परिचय के अनुसार सुविधाभोगियों, छद्म क्रांतिकारियों, अहिंसावादियों और सह-अस्तित्ववादियों के ढोंग पर भी प्रहार; गधा-लोमड़ी-उल्लू-कुत्ते, हर एक का अलग भरोसा; “प्रमाण से अधिक महत्त्वपूर्ण है विश्वास?”; सवाल उठाते ही शेर झपटता है
- पहचान: आँखें बंद → कान में सीसा → होंठ सिलना; राजा उत्पादन के सभी साधनों पर पकड़ मज़बूत करता है; खैराती-रामू-छिद्दू को आँख खोलने पर सिर्फ़ राजा दिखा, एक-दूसरे को नहीं
- चार हाथ: वैज्ञानिक असफल, कटे/लकड़ी/लोहे के हाथ असफल; मालिक का हल: मज़दूरी आधी, मज़दूर दुगुने
- साझा: किसान इससे पहले शेर, चीते और मगरमच्छ के साथ साझे की खेती कर चुका था, जिसमें उसका कभी गुज़ारा नहीं होता था; अब हाथी एक गन्ना तोड़कर “हमने एक गन्ना खा लिया” कहता है
- चारों कहानियाँ सत्ता, तानाशाही, पूँजीवाद और भूमि-हड़प: चार अलग रूपों पर व्यंग्य हैं