कक्षा 12 हिंदी अंतरा भाग 2 अध्याय 16 दूसरा देवदास महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. ममता कालिया का जन्म कब और कहाँ हुआ?

उत्तर: ममता कालिया का जन्म सन् 1940 में मथुरा, उत्तर प्रदेश में हुआ।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. ममता कालिया ने एम.ए. किस विषय और किस विश्वविद्यालय से किया?

उत्तर: ममता कालिया ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी विषय में एम.ए. किया।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. संभव हरिद्वार क्यों आया था?

उत्तर: संभव अपनी नानी से मिलने और घूमने के लिए चार दिनों के लिए हरिद्वार आया था; माता-पिता का यह भी विश्वास था कि गंगा-दर्शन से उसका सिविल सेवा में चयन बेखटके हो जाएगा।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. हर की पौड़ी पर संभव को चंदन तिलक किसने लगाया?

उत्तर: हर की पौड़ी पर संभव को मंगल पंडा ने चंदन तिलक लगाया।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. लड़की ने पुजारी की थाली में कितने रुपए रखे?

उत्तर: लड़की ने पुजारी की थाली में सवा पाँच रुपए रखे।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. मंसा देवी मंदिर तक पहुँचने के लिए कौन-सी रोपवे सेवा प्रयोग की गई?

उत्तर: मंसा देवी मंदिर तक पहुँचने के लिए “उषा ब्रेको सर्विस” नामक रोपवे सेवा प्रयोग की गई।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. मन्नू कहाँ से आया था और किसके साथ आया था?

उत्तर: मन्नू रोहतक से अपनी बुआ (पारो) के साथ आया था।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. कहानी के अंत में लड़की का नाम किसने और कैसे बताया?

उत्तर: कहानी के अंत में मन्नू ने अनजाने ही बुआ का परिचय कराते हुए “पारो बुआ, पारो बुआ, इनका नाम है…” कहकर पाठक को पहली बार लड़की का नाम पारो बताया।

प्रश्न 9 (1 अंक)

प्र. संभव ने केबिल कार में कौन-सा रंग चुना, और क्यों?

उत्तर: संभव ने गुलाबी रंग की केबिल कार चुनी, क्योंकि “कल से उसे गुलाबी के सिवा और कोई रंग सुहा ही नहीं रहा था।”

प्रश्न 10 (1 अंक)

प्र. “जी खोलकर देना”, “नज़रें बचाना” और “नौ दो ग्यारह होना” मुहावरों का अर्थ अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: जी खोलकर देना का अर्थ है उदारतापूर्वक खर्च करना; नज़रें बचाना का अर्थ है एक दूसरे से कतराना; नौ दो ग्यारह होना का अर्थ है भाग जाना, गायब हो जाना।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. पुजारी ने लड़की के किस वाक्य के “हम” को युगल अर्थ में लिया, और इसका दोनों पात्रों पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर: लड़की ने पुजारी से कहा था, “नहीं हम कल आरती की बेला आएँगे।” पाठ के अनुसार “जाने कैसे” पुजारी ने इस “हम” को युगल (दंपति) अर्थ में लिया और उसके मुँह से अनायास आशीष निकली: “सुखी रहो, फूलोफलो, जब भी आओ साथ ही आना, गंगा मैया मनोरथ पूरे करें।” इससे दोनों अकबका गए, लड़की छिटककर दूर खड़ी हो गई और संभव को वहाँ से तुरंत चल पड़ने की जल्दी हो गई।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. नानी ने संभव को झूलागाड़ी में न बैठने की सलाह क्यों दी थी?

उत्तर: नानी ने कहा कि झूलागाड़ी रस्सी से चलती है, “क्या पता कब टूट जाए। एक बार टूटी थी, हजारन मरे गिरे थे।” उसने कहा कि मंसा देवी जाना है तो चढ़कर जाना, क्योंकि “उसका महातम अलग है।”

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. संभव के जीवन में अब तक लड़कियों की क्या भूमिका रही थी?

उत्तर: अब तक संभव के जीवन में किसी लड़की ने कोई अहम भूमिका नहीं निभाई थी। लड़कियाँ या तो क्लास में बाईं तरफ़ की बेंचों पर बैठने वाली एक कतार थीं, या ताई-चाची की लड़कियाँ जिनके साथ खेलते-खाते वह बड़ा हुआ था।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. “एकदम अंदर के प्रकोष्ठ में चामुंडा रूप धारिणी मंसादेवी स्थापित थी। व्यापार यहाँ भी था।” इस पंक्ति से लेखिका क्या व्यंग्य करती हैं?

उत्तर: इस पंक्ति को एक सूक्ष्म व्यंग्य के रूप में पढ़ा जा सकता है: मंदिर के भीतरी प्रकोष्ठ में भी, जहाँ चामुंडा रूप धारिणी मंसादेवी स्थापित थीं, व्यापार मौजूद था; मनोकामना के हेतुक लाल-पीले धागे सवा रुपए में बिक रहे थे। आस्था और व्यापार साथ-साथ दिखते हैं।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. संभव और लड़की चप्पल लेते समय एक-दूसरे से क्या कहना चाहते थे, पर कह नहीं पाए?

उत्तर: संभव कहना चाहता था कि इसमें उसकी कोई ग़लती नहीं थी, पुजारी ने ग़लत अर्थ ले लिया। लड़की कहना चाहती थी कि संभव को इतना पास नहीं खड़ा होना चाहिए था। पर बातचीत के लायक दोनों की मनःस्थिति नहीं थी, इसलिए दोनों बिना कुछ कहे चप्पलें पहनकर अलग हो गए।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. वापसी की केबिल कार में संभव को एक साथ कौन-से दो आश्चर्य हुए?

उत्तर: वापसी की केबिल कार में संभव को एक साथ दो आश्चर्य हुए: पहला, दूर एक पीली केबिल कार में वही बच्चा (मन्नू) दिखा, जिसे उसकी लाल कमीज़ से पहचाना; दूसरा, उसी बच्चे से सटी बैठी थी वह दुबली, पतली, श्याम सलोनी आकृति, यानी कल शाम की वही लड़की।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. “मनोकामना की गाँठ भी अद्भुत, अनूठी है, इधर बाँधो उधर लग जाती है।” इस कथन का क्या अर्थ है?

उत्तर: यह पारो के मन का विचार है: मनोकामना की गाँठ इधर (मंसा देवी में) बाँधी और उधर फल तुरंत मिल गया। पाठ मनोकामना का ब्योरा नहीं देता; प्रसंग से संकेत मिलता है कि वह संभव से इस दोबारा भेंट को ही उसका फल मान रही है, इसलिए वह मंसा देवी पर एक और चुनरी चढ़ाने का संकल्प लेती है।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. मंगल पंडा ने संभव को तिलक लगाने के लिए क्यों कहा?

उत्तर: मंगल पंडा ने कहा कि चंदन तिलक के बिना स्नान अधूरा होता है, इसलिए पहले मना करने पर भी संभव ने चुपचाप तिलक लगवा लिया।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. पाठ के आधार पर हर की पौड़ी पर होने वाली गंगा जी की आरती का भावपूर्ण वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

उत्तर: हर की पौड़ी पर साँझ अलग रंग में उतरती है, यह दीया-बाती और आरती की बेला होती है। पाँच बजे एक रुपए में बिकने वाले फूलों के दोने शाम तक दो रुपए के हो जाते हैं, और कुछ भक्त ₹101 या ₹151 वाली स्पेशल आरती बुलवाते हैं। गंगा सभा के स्वयंसेवक सबको सीढ़ियों पर बैठने की प्रार्थना करते हैं। पीतल की नीलांजलि में सहस्र बत्तियाँ घी में भिगोकर जलाई जाती हैं, गंगा जी की मूर्ति के साथ चामुंडा, बालकृष्ण, राधाकृष्ण, हनुमान और सीताराम की मूर्तियाँ भी सजी रहती हैं। पुजारियों का समवेत स्वर “जय गंगे माता” गूँजता है, घंटे-घड़ियाल बजते हैं, और स्वर थकने पर लता मंगेशकर की आवाज़ लाउडस्पीकर पर “ओम जय जगदीश हरे” गुँजा देती है। मनौतियों के दिये फूलों की किश्तियों में गंगा पर तैराए जाते हैं, गंगापुत्र (गोताखोर) चढ़ावे का पैसा बटोरते हैं, भक्त खुशी-खुशी दक्षिणा देते हैं, और अंत में पंडित जी जी खोलकर प्रसाद देते हैं।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. “गंगापुत्र के लिए गंगा मैया ही जीविका और जीवन है” इस कथन के आधार पर गंगापुत्रों के जीवन-परिवेश की चर्चा कीजिए।

उत्तर: गंगापुत्र (गोताखोर) आरती के समय गंगा में तैराई गई फूलों की किश्तियों में रखा चढ़ावे का पैसा मुँह में दबाकर बटोरते हैं। पाठ के अनुसार गंगा मैया ही उनकी जीविका और जीवन है, इसी के सहारे वे बीस चक्कर लगाकर मुँह भर-भर रेज़गारी बटोरते हैं। उनकी बीवी और बहन कुशाघाट पर वही रेज़गारी बेचकर नोट कमाती हैं, “एक रुपए के पच्चासी पैसे। कभी-कभी अस्सी भी देती हैं। जैसा दिन हो।” एक गंगापुत्र का लँगोट दीये की लपट से जल भी उठता है, पर वह हतप्रभ नहीं होता, झट गंगाजी में बैठ जाता है, यह दिखाता है कि गंगापुत्र की जीविका गंगा और उसमें चढ़ाए जाने वाले चढ़ावे से जुड़ी है।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. उस छोटी सी मुलाकात ने संभव के मन में क्या हलचल उत्पन्न कर दी, इसका सूक्ष्म विवेचन कीजिए।

उत्तर: अब तक संभव के जीवन में किसी लड़की ने अहम भूमिका नहीं निभाई थी, इसलिए एक अनजान जगह पर एक अनाम लड़की का सामने आना, पुजारी का ग़लत समझना और लड़की का घबराकर चले जाना, यह सब मिलकर उसके लिए एक बिलकुल नयी अनुभूति बन गया। इसमें उसे कुछ सुख और उससे ज़्यादा बेचैनी महसूस हुई। रातभर उसकी आँखों में शाम की घटना घूमती रही, उसने नानी से कहा, “मुझे भूख नहीं है”, और उसने मन ही मन तय कर लिया कि अगले दिन शाम पाँच बजे से ही घाट पर जाकर बैठ जाएगा। दूसरे दिन भी वह मन ही मन लड़की से काल्पनिक बातचीत गढ़ता रहा, यह दिखाता है कि यह मुलाकात उसके मन में गहरी हलचल मचा गई थी।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. मंसा देवी जाने के लिए केबिल कार में बैठे हुए संभव के मन में जो कल्पनाएँ उठ रही थीं, उनका वर्णन कीजिए।

उत्तर: केबिल कार में बैठते समय संभव को अफ़सोस हुआ कि वह चढ़ावा खरीदकर नहीं लाया। रास्ते में नीचे कतारबद्ध फूल खिले देखकर उसे लगा जैसे रंग-बिरंगी वादियों से कोई हिंडोला उड़ा जा रहा हो। पहले उसे बिंदियाँ आकर्षक लगीं और उसने मन ही मन एक बिंदी उस अज्ञात लड़की के माथे पर सजा दी, माँग में तारे भरने जैसे गाने भी उसे याद आने लगे। जब उसका ध्यान चारों ओर के दृश्य में रम गया, तो उसे न फ़ौलाद के खंभे दिखे न भारी केबिल, बल्कि पूरा हरिद्वार, मंदिरों के बुर्ज, गंगा की धवल धार और सड़कों के घुमाव खुल गए। यह सब दिखाता है कि उसका मन बार-बार उसी अनजान लड़की के इर्द-गिर्द घूम रहा था।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. दिन 2 पर बैसाखी की भीड़ का वर्णन कीजिए और लेखिका इसे दिल्ली की भीड़ से किस प्रकार अलग बताती हैं?

उत्तर: बैसाखी के दिन पौड़ी पर अद्भुत भीड़ थी, भोर की आरती हो चुकी थी पर भजन ज़ोर-शोर से चल रहे थे। लेखिका इसे दिल्ली की भीड़ (दफ़्तर जाती, ख़रीद-फ़रोख़्त करती, सड़क क्रॉस करती) से अलग बताती हैं, क्योंकि यहाँ न जाति का महत्त्व था, न भाषा का, सबका उद्देश्य एक-सा, यानी कल्याण की कामना था। इस भीड़ में दौड़ नहीं थी, अतिक्रमण नहीं था, और कोई भी स्नानार्थी सैलानी आनंद में डुबकी नहीं लगा रहा था, बल्कि स्नान से ज़्यादा समय ध्यान में बिता रहा था। दूर जलधारा में एक व्यक्ति सूर्य की ओर हाथ जोड़े ध्यानमग्न खड़ा था, जिसके चेहरे पर विभोर, विनीत भाव था, मानो उसने अपना सारा अहम त्याग दिया हो।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. संभव, पारो, नानी और मन्नू के स्वभाव की तुलनात्मक विवेचना कीजिए।

उत्तर: संभव बौद्धिक स्वभाव का, कल्पनाशील और भावुक है, शारीरिक श्रम में उसका विश्वास नहीं। पारो संकोची और मर्यादित है, पर धार्मिक भी है और हल्के-फुल्के विनोद में भी सक्षम है। नानी वात्सल्यमयी और चिंतित स्वभाव की हैं, परंपरा में आस्थावान हैं और एक ही बात बार-बार दोहराने की आदत रखती हैं। मन्नू निश्छल और निडर बालक है, मिलनसार होने के कारण अजनबी संभव को भी तुरंत “दोस्त” मान लेता है। चारों पात्र मिलकर कहानी को एक स्वाभाविक, आत्मीय पारिवारिक-सामाजिक परिवेश देते हैं।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. “दूसरा देवदास” कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: शीर्षक की सार्थकता नाम के संयोग में भी है और कहानी के भाव में भी। कहानी के अंत में लड़की का नाम पारो निकलता है, और संभव हँसते हुए खुद को “संभव देवदास” कह देता है; देवदास और पारो की जोड़ी प्रसिद्ध उपन्यास “देवदास” (शरतचंद्र) से जानी जाती है, जिसकी प्रेम-कथा दुखांत मानी जाती है; यह संदर्भ पाठ से बाहर का है। पर यहाँ संभव-पारो की भेंट सुखद संयोग और हल्के-फुल्के हास-परिहास से भरी है, इसलिए इसे एक “दूसरा” देवदास कहा जा सकता है। पाठ के परिचय के अनुसार यह कहानी दिखाती है कि प्रेम के लिए किसी निश्चित व्यक्ति, समय और स्थिति का होना आवश्यक नहीं, वह कभी भी, कहीं भी उपज सकता है, और लेखिका ने प्रेम को बंबईया फ़िल्मों की परिपाटी से अलग हटाकर उसे पवित्र और स्थायी स्वरूप दिया है।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. “पारो बुआ, पारो बुआ इनका नाम है… उसे भी मनोकामना का पीला-लाल धागा और उसमें पड़ी गिठान का मधुर स्मरण हो आया।” कथन के आधार पर कहानी के संकेतपूर्ण आशय पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: यह पंक्ति कहानी का चरम बिंदु है, जहाँ मन्नू के मुँह से पहली बार पाठक को लड़की का नाम, पारो, पता चलता है। इसी क्षण संभव को मंसा देवी में बाँधे गए मनोकामना के पीले-लाल धागे और उसकी गिठान का स्मरण हो आता है, यानी मंसा देवी में की गई उसकी मौन मनोकामना, जिसका ब्योरा पाठ नहीं देता पर प्रसंग से वह लड़की से दोबारा मिलने की ओर इशारा करती है, इतनी जल्दी और अप्रत्याशित ढंग से पूरी हुई। पारो के नाम का संभव के मज़ाकिया “संभव देवदास” से जुड़ना कहानी को एक हल्के-फुल्के, आशावादी अंत तक ले जाता है, जो शीर्षक की सार्थकता को अंतिम रूप से स्पष्ट करता है।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. कहानी को दिन-वार क्रम में विस्तार से लिखिए (दिन 1 और दिन 2 दोनों)।

उत्तर: दिन 1: संध्या के समय हर की पौड़ी पर आरती चल रही थी। संभव देर से नहाकर आया, मंगल पंडा ने उसे तिलक लगाया, और वह एक छोटे मंदिर में दर्शन के लिए गया, जहाँ पुजारी ने कलावा बाँधने को हाथ बढ़ाया तो पास आ खड़ी एक अनजान लड़की की कलाई आगे आ गई और उसी को कलावा बँधा। लड़की के “हम कल आएँगे” कहने पर पुजारी ने उसे युगल अर्थ में लेकर दंपति-आशीर्वाद दे दिया, जिससे दोनों अकबका गए और बिना नाम-परिचय के अलग हो गए। संभव ने पीछा किया पर लड़की गुम हो गई, और वह रातभर बेचैन रहा। यहीं पता चलता है कि संभव सिविल सेवा की तैयारी कर रहा था और हरिद्वार अपनी नानी से मिलने आया था।
दिन 2: बैसाखी की सुबह नानी के जगाने पर भी संभव ने स्नान नहीं किया, बल्कि घाट पर बैठा रहा, जहाँ उसकी भेंट मन्नू नामक बालक से हुई, जो अपनी बुआ के साथ मंसा देवी जाने वाला था। नानी की मनाही के बावजूद संभव रोपवे से मंसा देवी गया, धागा बाँधा, मनोकामना की। वापसी की केबिल कार में उसे मन्नू और वही लड़की एक साथ दूसरी केबिल कार में दिखे। नीचे पहुँचकर उसने मन्नू को पहचाना, और मन्नू के ज़रिए उसकी बुआ से परिचय हुआ, जिसका नाम पारो निकला। संभव ने हँसते हुए वाक्य पूरा किया, “संभव देवदास”, और कहानी इस वाक्य पर समाप्त होती है: “उसे भी मनोकामना का पीला-लाल धागा और उसमें पड़ी गिठान का मधुर स्मरण हो आया।”

5 केस स्टडी

केस स्टडी
नानी ने उसे बरज दिया था, ‘ना लल्ला मंसा देवी जाना है तो क्या वह झूलागाड़ी में तो बैठियो न। रस्सी से चलती है, क्या पता कब टूट जाए। एक बार टूटी थी, हजारन मरे गिरे थे। जाना है तो चढ़कर जाना, उसका महातम अलग है।’

(क) 1 अंक नानी ने संभव को किस चीज़ से मना किया था?
उत्तर: नानी ने संभव को झूलागाड़ी (रोपवे) में बैठने से मना किया था।

(ख) 1 अंक नानी के अनुसार झूलागाड़ी को लेकर क्या ख़तरा था?
उत्तर: नानी के अनुसार रस्सी टूटने का ख़तरा था, पहले एक बार रस्सी टूट चुकी थी जिसमें हज़ारों लोग मरे-गिरे थे।

(ग) 2 अंक नानी के अनुसार मंसा देवी पैदल चढ़ने का क्या महत्व था?
उत्तर: नानी के अनुसार पैदल चढ़ने का अपना अलग “महातम” (महत्व) था: “जाना है तो चढ़कर जाना, उसका महातम अलग है।”

(घ) 2 अंक संभव ने अंततः नानी की बात मानी या नहीं, और क्यों?
उत्तर: संभव ने नानी की बात नहीं मानी और रोपवे से ही मंसा देवी गया, यह जगह उसे पहले दिन से ही अपनी ओर खींच रही थी, वह बहुत शारीरिक मेहनत में यकीन नहीं करता था, और पाठ के अनुसार “शहर के इतिहास के साथ-साथ संभव उसका भूगोल भी आत्मसात करना चाहता था। इसलिए” वह रोपवे वाली जगह पहुँच गया।

केस स्टडी
अब संभव ने गौर किया, बिलकुल वही कंठ, वही उलाहना, वही अंदाज़। पुलक से उसका रोम-रोम हिल उठा। हे ईश्वर! उसने कब सोचा था मनोकामना का मौन उद्गार इतनी शीघ्र शुभ परिणाम दिखाएगा।

(क) 1 अंक संभव ने लड़की को किस आधार पर पहचाना?
उत्तर: संभव ने लड़की को उसके कंठ, उलाहने और अंदाज़ से पहचाना।

(ख) 1 अंक “मनोकामना का मौन उद्गार” से यहाँ किस मनोकामना की ओर संकेत है?
उत्तर: यहाँ संकेत मंसा देवी में बाँधे गए धागे की मनोकामना की ओर है, पाठ में उसका ब्योरा नहीं दिया गया, पर प्रसंग से वह लड़की से दोबारा मिलने की इच्छा की ओर इशारा करती है।

(ग) 2 अंक संभव की मनःस्थिति का वर्णन “रोम-रोम हिल उठा” पंक्ति के आधार पर कीजिए।
उत्तर: यह पंक्ति संभव की अत्यंत हर्षित, रोमांचित और आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता की मनःस्थिति दर्शाती है, जो लड़की को पहचानते ही उसके भीतर उमड़ आई।

(घ) 2 अंक इस घटना का कहानी के शीर्षक “दूसरा देवदास” से क्या संबंध है?
उत्तर: इसी पहचान के तुरंत बाद कहानी में लड़की का नाम पारो के रूप में सामने आता है, जिसके बाद संभव खुद को मज़ाक में “संभव देवदास” कहता है, यही शीर्षक की सार्थकता को अंतिम रूप देता है।