NCERT पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग 2 के अध्याय 16 दूसरा देवदास (ममता कालिया) की प्रश्नावली (प्रश्न-अभ्यास, भाषा-शिल्प और योग्यता-विस्तार) के सभी प्रश्नों के पूर्ण उत्तर, पाठ के आधार पर। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 प्रश्न-अभ्यास
प्र. पाठ के आधार पर हर की पौड़ी पर होने वाली गंगा जी की आरती का भावपूर्ण वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर: हर की पौड़ी पर साँझ अलग ही रंग में उतरती है, यह दीया-बाती और आरती की बेला होती है। पाँच बजे एक-एक रुपए में बिकने वाले फूलों के दोने शाम तक दो-दो रुपए के हो जाते हैं, और कुछ भक्त ₹101 या ₹151 वाली “स्पेशल आरती” बुलवाते हैं। गंगा सभा के स्वयंसेवक खाकी वरदी में सबसे सीढ़ियों पर बैठने की प्रार्थना करते हैं: “शांत होकर बैठिए, आरती शुरू होने वाली है।” पंडितगण पीतल की नीलांजलि में सहस्र बत्तियाँ घी में भिगोकर सजाते हैं, गंगा जी की मूर्ति के साथ-साथ चामुंडा, बालकृष्ण, राधाकृष्ण, हनुमान और सीताराम की मूर्तियाँ भी शृंगारपूर्ण ढंग से स्थापित रहती हैं। सहस्र दीप जलते ही पुजारी अपने आसन से उठकर नीलांजलि पकड़ते हैं, और समवेत स्वर में “जय गंगे माता” की आरती शुरू हो जाती है। घंटे-घड़ियाल बजते हैं, मनौतियों के दिये फूलों की किश्तियों में गंगा पर तैराए जाते हैं, और गंगापुत्र (गोताखोर) उनमें रखा चढ़ावे का पैसा बटोरते हैं। पुजारियों का स्वर थकने पर लता मंगेशकर की आवाज़ लाउडस्पीकर पर “ओम जय जगदीश हरे” गुँजा देती है। आरती के बाद संकल्प और मंत्रोच्चार होता है, भक्त चढ़ावा चढ़ाते हैं, पूरे वातावरण में अगरु-चंदन की दिव्य सुगंध होती है। भक्त खुशी-खुशी दक्षिणा देते हैं, पंडित जी भगवान के गले से माला उतार-उतारकर यजमान के गले में डालते हैं, और अंत में जी खोलकर मुरमरे, इलायचीदाना, केले और पुष्प का प्रसाद देते हैं। “कई खर्च सुखदायी होते हैं।”
प्र. ‘गंगापुत्र के लिए गंगा मैया ही जीविका और जीवन है’, इस कथन के आधार पर गंगा पुत्रों के जीवन-परिवेश की चर्चा कीजिए।
उत्तर: गंगापुत्र (गोताखोर) आरती के समय गंगा में तैराई गई फूलों की किश्तियों में रखा चढ़ावे का पैसा मुँह में दबाकर बटोरते हैं। एक बार तो एक गंगापुत्र का लँगोट दीये की लपट से जल भी उठता है, पर वह हतप्रभ नहीं होता, तुरंत गंगाजी में बैठ जाता है, क्योंकि गंगा मैया ही उसकी जीविका और जीवन है। इसी के सहारे वह बीस चक्कर लगाकर मुँह भर-भर रेज़गारी बटोरता है। उसकी बीवी और बहन कुशाघाट पर वही रेज़गारी बेचकर नोट कमाती हैं, “एक रुपए के पच्चासी पैसे। कभी-कभी अस्सी भी देती हैं। जैसा दिन हो।” यह जीवन-परिवेश दिखाता है कि गंगापुत्र की जीविका गंगा और उसमें चढ़ाए जाने वाले चढ़ावे से जुड़ी है।
प्र. पुजारी ने लड़की के ‘हम’ को युगल अर्थ में लेकर क्या आशीर्वाद दिया और पुजारी द्वारा आशीर्वाद देने के बाद लड़के और लड़की के व्यवहार में अटपटापन क्यों आया?
उत्तर: लड़की ने पुजारी से कहा था, “पंडित जी, आज तो आरती हो चुकी। क्या करें हमें देर हो गई।” फिर पुजारी की पेशकश पर उसने कहा, “नहीं हम कल आरती की बेला आएँगे।” पाठ के अनुसार “जाने कैसे” पुजारी ने लड़की के इस “हम” को युगल (दंपति) अर्थ में लिया, और उसके मुँह से अनायास आशीष निकली: “सुखी रहो, फूलोफलो, जब भी आओ साथ ही आना, गंगा मैया मनोरथ पूरे करें।” यह आशीर्वाद सुनते ही दोनों अकबका गए, क्योंकि वे एक-दूसरे को जानते तक नहीं थे। लड़की छिटककर दूर खड़ी हो गई, और लड़के को वहाँ से जल्दी चल पड़ने की जल्दी हो गई। दोनों बिना बात किए, बिना पहचान के अलग-अलग दिशा में चले गए, यही उनके व्यवहार में आया अटपटापन था।
प्र. उस छोटी सी मुलाकात ने संभव के मन में क्या हलचल उत्पन्न कर दी, इसका सूक्ष्म विवेचन कीजिए।
उत्तर: अब तक संभव के जीवन में किसी लड़की ने अहम भूमिका नहीं निभाई थी, इसलिए एक अनजान जगह पर एक अनाम लड़की का सामने आना, पुजारी का ग़लत समझना और लड़की का घबराकर चले जाना, यह सब मिलकर उसके लिए एक बिलकुल नयी अनुभूति बन गया, जिसमें उसे कुछ सुख और उससे कहीं ज़्यादा बेचैनी महसूस हुई। घर लौटकर वह चुप रहा, “मुझे भूख नहीं है” कहकर करवट बदल ली, बाद में खाते-खाते आशीर्वचन की याद आने पर विचलित स्वर में बोला, “मुझे भूख नाँय”, और रातभर उसकी आँखों में शाम की पूरी घटना घूमती रही। उसने मन ही मन तय कर लिया कि अगले दिन शाम पाँच बजे से ही घाट पर जाकर बैठ जाएगा, ताकि पुजारी के मंदिर पर उसकी सीधी नज़र पड़े। यह दिखाता है कि उस छोटी सी मुलाकात ने उसके मन में गहरी उत्सुकता और बेचैनी जगा दी थी।
प्र. मंसा देवी जाने के लिए केबिलकार में बैठे हुए संभव के मन में जो कल्पनाएँ उठ रही थीं, उनका वर्णन कीजिए।
उत्तर: केबिल कार में बैठते ही संभव को अफ़सोस हुआ कि वह चढ़ावा खरीदकर नहीं लाया, जबकि उसके सामने बैठे नवविवाहित दंपति और एक वृद्ध चढ़ावे की थैलियाँ लिए हुए थे। रास्ते में नीचे कतारबद्ध फूल खिले देखकर उसे लगा जैसे रंग-बिरंगी वादियों से कोई हिंडोला उड़ा जा रहा हो। इससे पहले रोपवे स्टेशन पर बिंदियाँ देखकर उसे अचानक बहुत आकर्षक लगी थीं, और उसने मन ही मन एक बिंदी उस अज्ञात लड़की के माथे पर सजा दी थी, माँग में तारे भरने जैसे कुछ गाने भी उसे आधे-अधूरे याद आने लगे थे। जब उसका मन चारों ओर के दृश्य में रम गया, तो उसे न मोटे फ़ौलाद के खंभे दिखे, न भारी केबिल, बल्कि पूरा हरिद्वार खुल गया: जगह-जगह मंदिरों के बुर्ज, गंगा मैया की धवल धार और सड़कों के खूबसूरत घुमाव।
प्र. ‘पारो बुआ, पारो बुआ इनका नाम है… उसे भी मनोकामना का पीला-लाल धागा और उसमें पड़ी गिठान का मधुर स्मरण हो आया।’ कथन के आधार पर कहानी के संकेतपूर्ण आशय पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर: यह पंक्ति कहानी का चरम बिंदु है, जहाँ मन्नू के मुँह से पहली बार पाठक को लड़की का नाम, पारो, पता चलता है। इसी क्षण संभव को मंसा देवी में बाँधे गए मनोकामना के पीले-लाल धागे और उसकी गिठान का स्मरण हो आता है, यानी मंसा देवी में की गई उसकी मौन मनोकामना, जिसका ब्योरा पाठ नहीं देता, पर प्रसंग से वह लड़की से दोबारा मिलने की ओर इशारा करती है, अप्रत्याशित ढंग से और जल्दी पूरी हुई। यह कहानी दिखाती है कि इच्छाओं की पूर्ति अप्रत्याशित ढंग से हो सकती है, और नाम पारो होने से जुड़ा शीर्षक “दूसरा देवदास” यहीं अर्थ पाता है।
प्र. ‘मनोकामना की गाँठ भी अद्भुत, अनूठी है, इधर बाँधो उधर लग जाती है।’ कथन के आधार पर पारो की मनोदशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर: यह विचार पारो के मन में तब उठता है जब वह मंसा देवी को एक और चुनरी चढ़ाने का संकल्प लेती है। इसका भाव है कि मनोकामना की गाँठ इधर (मंसा देवी में) बाँधी और उधर फल तुरंत मिल गया। पाठ पारो की मनोकामना का ब्योरा नहीं देता; प्रसंग से संकेत मिलता है कि वह संभव से इस दोबारा भेंट को ही उसका फल मान रही है। यह पारो के मन की उस सुखद उलझन और विस्मय को दर्शाता है, जहाँ वह संयोग से हुई इस दूसरी मुलाकात को अपनी मनोकामना की अप्रत्याशित पूर्ति मानकर सोच में पड़ जाती है, और साथ ही लाज से भी भर उठती है।
प्र. निम्नलिखित वाक्यों का आशय स्पष्ट कीजिए:
(क) ‘तुझे तो तैरना भी न आवे। कहीं पैर फिसल जाता तो मैं तेरी माँ को कौन मुँह दिखाती।’
उत्तर: यह नानी का संवाद है, जो संभव के देर से लौटने पर कहा जाता है। इसमें नानी की वात्सल्यमयी चिंता झलकती है, वे संभव की सुरक्षा को लेकर व्यग्र हैं, और उसकी माँ के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को लेकर भी सचेत हैं।
(ख) ‘उसके चेहरे पर इतना विभोर विनीत भाव था मानो उसने अपना सारा अहम त्याग दिया है, उसके अंदर स्व से जनित कोई कुंठा शेष नहीं है, वह शुद्ध रूप से चेतनस्वरूप, आत्माराम और निर्मलानंद है।’
उत्तर: यह पंक्ति गंगा में ध्यानमग्न खड़े एक अनजान व्यक्ति के विषय में है। इसका आशय है कि वह व्यक्ति मानो अपना सारा अहम त्याग चुका है, उसके भीतर ‘स्व’ से जनित कोई कुंठा शेष नहीं है, और वह शुद्ध, निर्मल आनंद की अवस्था में दिखता है। “मानो” से स्पष्ट है कि यह लेखिका की उपमा है।
(ग) ‘एकदम अंदर के प्रकोष्ठ में चामुंडा रूप धारिणी मंसादेवी स्थापित थी। व्यापार यहाँ भी था।’
उत्तर: यह पंक्ति मंसा देवी मंदिर के भीतर के दृश्य का वर्णन करती है, और इसे एक सूक्ष्म व्यंग्य के रूप में पढ़ा जा सकता है: मंदिर के भीतरी प्रकोष्ठ में भी आस्था के साथ-साथ व्यापार मौजूद है (पाठ: “व्यापार यहाँ भी था”; वहाँ मनोकामना के लाल-पीले धागे सवा रुपए में बिक रहे थे)।
प्र. ‘दूसरा देवदास’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: शीर्षक की सार्थकता नाम के संयोग में भी है और कहानी के भाव में भी। कहानी के अंत में लड़की का नाम पारो निकलता है, और संभव मज़ाक में खुद को “संभव देवदास” कह देता है, क्योंकि देवदास और पारो की जोड़ी प्रसिद्ध है (शरतचंद्र का उपन्यास “देवदास”; यह संदर्भ पाठ से बाहर का है, पाठ में इसका कोई ज़िक्र नहीं)। उस उपन्यास की प्रेम-कथा दुखांत मानी जाती है, जबकि यहाँ संभव-पारो की भेंट सुखद संयोग और हास-परिहास से भरी है। इसलिए शीर्षक को इस तरह पढ़ा जा सकता है कि यह मूल कथा को दोहराता नहीं, बल्कि उससे विनोदपूर्ण ढंग से अलग होकर एक “दूसरे”, हल्के और आशावादी देवदास की बात करता है, जो यह भी दिखाता है कि प्रेम के लिए किसी निश्चित व्यक्ति, समय या स्थिति की ज़रूरत नहीं होती। पाठ के परिचय के अनुसार लेखिका ने प्रेम को बंबईया फ़िल्मों की परिपाटी से अलग हटाकर उसे पवित्र और स्थायी स्वरूप दिया है।
प्र. ‘हे ईश्वर! उसने कब सोचा था कि मनोकामना का मौन उद्गार इतनी शीघ्र शुभ परिणाम दिखाएगा-आशय स्पष्ट कीजिए।’
उत्तर: यह पंक्ति संभव के मन के भाव को दर्शाती है, जब वह वापसी में मन्नू और उसकी बुआ (उसी अनजान लड़की) को पहचान लेता है। “मनोकामना का मौन उद्गार” से आशय है मंसा देवी में बाँधे गए धागे की चुपचाप की गई मनोकामना, जिसका ब्योरा पाठ में नहीं दिया गया; प्रसंग से वह लड़की से दोबारा मिलने की इच्छा की ओर इशारा करती है। संभव को आश्चर्य होता है कि उसकी यह मनोकामना इतनी जल्दी और इतने सुखद ढंग से पूरी हो गई, जबकि उसने इतनी शीघ्र परिणाम की उम्मीद तक नहीं की थी।
2 भाषा-शिल्प
प्र. इस पाठ का शिल्प आख्याता (नैरेटर-लेखक) की ओर से लिखते हुए बना है, पाठ से कुछ उदाहरण देकर सिद्ध कीजिए।
उत्तर: पूरी कहानी तीसरे पुरुष में, आख्याता (नैरेटर-लेखक) की ओर से लिखी गई है, लेखिका कहीं भी “मैं” बनकर सामने नहीं आतीं। उदाहरण के लिए: “संभव ने गौर किया, जाने कब पौड़ी पर उसके नज़दीक यह बच्चा आ बैठा था,” “लड़की ने कहा, ‘पंडित जी, आज तो आरती हो चुकी,'” और “अब संभव ने गौर किया, बिलकुल वही कंठ, वही उलाहना, वही अंदाज़।” इन सभी वाक्यों में पात्रों के कार्यों और संवादों को बाहर से, तीसरे व्यक्ति के रूप में बताया गया है, जो सिद्ध करता है कि यह शिल्प आख्याता की ओर से रचा गया है।
प्र. पाठ में आए पूजा-अर्चना के शब्दों तथा इनसे संबंधित वाक्यों को छाँटकर लिखिए।
उत्तर: पाठ में पूजा-अर्चना से जुड़े कई शब्द आए हैं: आरती (“आरती शुरू होने वाली है”), दीया-बाती (“दीया-बाती का समय”), नीलांजलि (“पीतल की नीलांजलि में सहस्र बत्तियाँ घी में भिगोकर रखी हुई हैं”), चंदन-सिंदूर और तिलक (“मर्दों के माथे पर चंदन तिलक… लगा देते हैं पंडे”), चरणामृत (“पुजारी जी ने चरणामृत दिया”), कलावा (“लाल रंग का कलावा बाँधने के लिए हाथ बढ़ाया”), संकल्प और मंत्रोच्चार (“आरती के बाद बारी है संकल्प और मंत्रोच्चार की”), नैवेद्य (“नैवेद्य चढ़ाया”), प्रसाद (“जी खोलकर देते हैं प्रसाद”), घंटे-घड़ियाल (“घंटे घड़ियाल बजते हैं”), अगरु-चंदन (“पूरे वातावरण में अगरु-चंदन की दिव्य सुगंध है”), दक्षिणा (“खुशी-खुशी दक्षिणा देते हैं”), माला (“भगवान के गले से माला उतार-उतारकर यजमान के गले में डालते हैं”), चढ़ावा (“भक्त आरती लेते हैं, चढ़ावा चढ़ाते हैं”), अर्चन (“आँख मूँदकर अर्चन कर रही थी”), दर्शन (“अरे दर्शन तो करते जाओ”) और चुनरी (“मंसा देवी पर चढ़ाने वाली चुनरी”)। ये शब्द पूजा-प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में पूरे पाठ में आए हैं।
3 योग्यता-विस्तार
योग्यता-विस्तार के प्रश्न प्रोजेक्ट-कार्य हैं, इनका कोई एक निश्चित उत्तर नहीं है, इसलिए यहाँ हर एक के लिए संक्षिप्त दिशा-निर्देश दिया गया है, मॉडल उत्तर नहीं।
प्र. चंद्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ कहानी पढ़िए और उस पर बनी फ़िल्म देखिए।
दिशा-निर्देश: चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ पढ़ें (यह भी एक प्रसिद्ध हिंदी प्रेम-कहानी है, जो अनजाने में बँधे बचपन के वादे और युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है) और उस पर बनी फ़िल्म देखें। दोनों में मिलती-जुलती और अलग बातों की एक सूची बनाएँ।
प्र. हरिद्वार और उसके आसपास के स्थानों की जानकारी प्राप्त कीजिए।
दिशा-निर्देश: हरिद्वार और उसके आसपास के स्थानों (जैसे ऋषिकेश, मंसा देवी, चंडी देवी, हर की पौड़ी) की जानकारी इंटरनेट या किसी यात्रा-पुस्तिका से एकत्र करके एक संक्षिप्त परिचय तैयार करें।
प्र. गंगा नदी पर एक निबंध लिखिए।
दिशा-निर्देश: गंगा नदी पर एक निबंध लिखें, जिसमें उसके उद्गम, महत्व, और वर्तमान पर्यावरणीय चुनौतियों का उल्लेख करें।
प्र. आपके नगर / गाँव में नदी-तालाब-मंदिर के आसपास जो कर्मकांड होते हैं उनका रेखाचित्र के रूप में लेखन कीजिए।
दिशा-निर्देश: अपने नगर या गाँव में किसी नदी, तालाब या मंदिर के आसपास होने वाले कर्मकांडों को रेखाचित्र (शब्द-चित्र) के रूप में लिखें, जैसे पाठ में हर की पौड़ी की आरती का वर्णन किया गया है।