कक्षा 12 हिंदी अंतरा भाग 2 अध्याय 16 दूसरा देवदास नोट्स

इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे
  • ममता कालिया का जीवन-परिचय और उनकी भाषा-शैली की विशेषताएँ बता पाएँगे
  • “दूसरा देवदास” कहानी को दिन-दर-दिन क्रम में, बिना किसी घटना को छोड़े, सुना पाएँगे
  • शीर्षक “दूसरा देवदास” की सार्थकता को सही ढंग से समझा पाएँगे, शरतचंद्र के मूल उपन्यास की कथा का विस्तार किए बिना
  • संभव, पारो, नानी और मन्नू का चरित्र-चित्रण कर पाएँगे
  • पाठ की महत्वपूर्ण पंक्तियों की व्याख्या लिख पाएँगे
  • पाठ के सभी 14 शब्दार्थ परीक्षा में सही ढंग से लिख पाएँगे
दूसरा देवदासममता कालियाहर की पौड़ीमंसा देवीपारोसंभव

1 लेखिका-परिचय: ममता कालिया

ममता कालिया का जन्म सन् 1940 में मथुरा (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उनकी शिक्षा के कई पड़ाव
नागपुर, पुणे, इंदौर, मुंबई जैसे शहरों में रहे। दिल्ली विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेज़ी
विषय में एम.ए. किया।

समय कार्य
1963-1965 दौलत राम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी की प्राध्यापिका
1966-1970 एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, मुंबई में अध्यापन कार्य
1973-2001 महिला सेवा सदन डिग्री कॉलेज, इलाहाबाद में प्रधानाचार्य
2003-2006 भारतीय भाषा परिषद्, कलकत्ता की निदेशक
वर्तमान नयी दिल्ली में रहकर स्वतंत्र लेखन

उनके प्रकाशित उपन्यासों में बेघर, नरक दर नरक, एक पत्नी के नोट्स, प्रेम कहानी,
लड़कियाँ, दौड़
आदि आते हैं। उनके 12 कहानी-संग्रह प्रकाशित हैं, जो “संपूर्ण कहानियाँ”
नाम से दो खंडों में संकलित हैं। हाल ही में उनके दो और कहानी-संग्रह आए हैं: पच्चीस
साल की लड़की
और थियेटर रोड के कौवे।

2004उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से साहित्य भूषण
1989उसी संस्थान से कहानी सम्मान
12प्रकाशित कहानी-संग्रह

इसके अतिरिक्त उन्हें अभिनव भारती, कलकत्ता का रचना पुरस्कार और सरस्वती प्रेस
तथा साप्ताहिक हिंदुस्तान का श्रेष्ठ कहानी पुरस्कार भी मिल चुका है।

परीक्षा संकेत

लेखिका की भाषा-शैली के बारे में पाठ्यपुस्तक के ये शब्द याद रखें:
“शब्दों की पारखी”, “उनका भाषाज्ञान अत्यंत उच्चकोटि का है”, “विषय के अनुरूप सहज भावाभिव्यक्ति उनकी खासियत है”, साधारण शब्दों में भी “जादुई प्रभाव”, “व्यंग्य की
सटीकता एवं सजीवता”
, और “अभिव्यक्ति की सरलता एवं सुबोधता”।

2 पाठ-परिचय और पृष्ठभूमि

“दूसरा देवदास” कहानी हर की पौड़ी, हरिद्वार के परिवेश में घटती है। यह किसी युवा
मन की संवेदना, कल्पना और रूमानियत की कहानी है, जो बताती है कि प्रेम का पहला
अंकुरण किसी भी अनजान, अजीब परिस्थिति में उत्पन्न हो सकता है। इसके लिए किसी
निश्चित व्यक्ति, समय और स्थिति का होना आवश्यक नहीं है; वह “कभी भी, कहीं भी” उपज सकता है। लेखिका ने इस कहानी में प्रेम को
“बंबईया फ़िल्मों की परिपाटी” से अलग हटाकर एक पवित्र और स्थायी स्वरूप दिया है।

ध्यान रखेंकहानी का ढाँचा

यह कहानी केवल दो दिनों में घटती है, हर की पौड़ी और मंसा देवी मंदिर के बीच।
इसमें केवल दो मुख्य पात्र हैं जो दो बार संयोग से मिलते हैं। कहानी के भीतर लड़की का
नाम पाठक को कहानी के अंत के ठीक पहले, मन्नू के मुँह से पता चलता है, इससे पहले
कहीं भी नहीं। कहानी का अंतिम वाक्य है: “उसे भी मनोकामना का पीला-लाल धागा और उसमें पड़ी गिठान का मधुर स्मरण हो आया।”

3 कहानी के प्रमुख पात्र

पात्र परिचय
संभव कहानी का नायक; इसी वर्ष एम.ए. पूरा करके सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी में; चार दिनों के लिए नानी के घर हरिद्वार आया है
पारो अनाम लड़की, जिसका नाम कहानी के अंत में मन्नू बताता है; मन्नू की बुआ; पहले दिन गुलाबी साड़ी में, दूसरे दिन सफ़ेद साड़ी में
नानी संभव की नानी, हरिद्वार में रहती हैं; संभव की सुरक्षा और खान-पान की चिंता करती रहती हैं
मन्नू रोहतक से बुआ (पारो) के साथ आया बालक; निडर और मिलनसार, संभव को अपना “दोस्त” मान लेता है
मंगल पंडा हर की पौड़ी पर संभव को चंदन तिलक लगाने वाले पंडा
पौड़ी के छोटे मंदिर का पुजारी अनाम; जिसने लड़की के “हम” को युगल अर्थ में लेकर दंपति-आशीर्वाद दे दिया

4 कथा-सार (घटनाक्रम अनुसार)

कहानी दो दिनों में बँटी है: पहला दिन शाम को, आरती के बाद, हर की पौड़ी पर, दूसरा
दिन बैसाखी की सुबह मंसा देवी की यात्रा पर। दोनों दिन एक ही ढाँचे पर चलते हैं:
संयोग से भेंट, फिर बिछड़ना।

4.1 दिन 1: साँझ की आरती, हर की पौड़ी

हर की पौड़ी पर साँझ अलग ही रंग में उतरती है, यह दीया-बाती और आरती की बेला
होती है। पाँच बजे तक एक-एक रुपए में बिकने वाले फूलों के दोने अब दो-दो रुपए के
हो जाते हैं, और कुछ भक्त “स्पेशल आरती” (₹101 या ₹151 वाली) बुलवाते हैं। गंगा
सभा के स्वयंसेवक खाकी वरदी में भीड़ को सीढ़ियों पर बैठने के लिए कह रहे हैं।

स्नानभक्त गंगा में डुबकी लगाते हैं
→
तिलकपंडे माथे पर चंदन/सिंदूर लगाते हैं
→
दीप प्रज्वलनपीतल की नीलांजलि में सहस्र बत्तियाँ जलतीं
→
आरतीसमवेत स्वर, घंटे-घड़ियाल, “जय गंगे माता”
→
प्रसादचढ़ावा, संकल्प-मंत्रोच्चार, उदार प्रसाद-वितरण

घाट पर गंगा जी की मूर्ति के साथ-साथ चामुंडा, बालकृष्ण, राधाकृष्ण, हनुमान और
सीताराम की मूर्तियों का भी शृंगारपूर्ण स्थापन रहता है, जो भी आराध्य हो, भक्त चुन ले।
पुजारियों का स्वर थकने पर लता मंगेशकर की आवाज़ लाउडस्पीकर पर गूँजती है, और
“ओम जय जगदीश हरे” से पूरी पौड़ी गुंजायमान हो जाती है। मनौतियों के दिये फूलों की
छोटी किश्तियों में गंगा पर तैराए जाते हैं, और गंगापुत्र (गोताखोर) दोनों में रखा
चढ़ावे का पैसा उठाकर मुँह में दबा लेते हैं। एक औरत ने इक्कीस दोने तैराए; गंगापुत्र एक दोने से पैसा उठाता है कि पहले दोने के दीपक से उसके लँगोट में आग की लपट लग जाती है; लोग हँसते हैं, पर वह हतप्रभ नहीं होता, झट गंगाजी में बैठ जाता है। पाठ के अनुसार “गंगा मैया ही उसकी जीविका और जीवन है।” इसके रहते वह बीस चक्कर मुँह भर-भर रेज़गारी बटोरता है, और उसकी बीवी और बहन कुशाघाट पर रेज़गारी बेचकर नोट कमाती हैं: “एक रुपए के पच्चासी पैसे। कभी-कभी अस्सी भी देती हैं। जैसा दिन हो।”

आरती के बाद संकल्प और मंत्रोच्चार होता है; पूरे वातावरण में अगरु-चंदन की दिव्य सुगंध है। स्पेशल भक्तों से पुजारी ब्राह्मण-भोज, दान, मिष्ठान की धनराशि कबुलवाते हैं; आरती के क्षण इतने भव्य और दिव्य रहे हैं कि भक्त हुज्जत नहीं करते, खुशी-खुशी दक्षिणा देते हैं। पंडित जी भगवान के गले से माला उतार-उतारकर यजमान के गले में डालते हैं और जी खोलकर प्रसाद देते हैं। पाठ का वाक्य: “खर्च हुआ पर भक्तों के चेहरे पर कोई मलाल नहीं। कई खर्च सुखदायी होते हैं।”

चित्र 1: हर की पौड़ी, हरिद्वार पर संध्या आरती, दिये, भीड़ और गंगा जल पर झिलमिलाते प्रतिबिंब, ठीक वैसा दृश्य जैसा कहानी के आरंभ में वर्णित है। चित्र: Ekabhishek / Wikimedia Commons / CC BY-SA 3.0
चित्र 1: हर की पौड़ी, हरिद्वार पर संध्या आरती, दिये, भीड़ और गंगा जल पर झिलमिलाते प्रतिबिंब, ठीक वैसा दृश्य जैसा कहानी के आरंभ में वर्णित है। चित्र: Ekabhishek / Wikimedia Commons / CC BY-SA 3.0

संभव आज देर से नहाकर आता है। मंगल पंडा टोकते हैं, “बड़ी देर लगाय दी।” पहले
संभव तिलक लगवाने से मना करता है, पर मंगल पंडा के “चंदन तिलक के बगैर अस्नान
अधूरा होता है बेटा” कहने पर चुपचाप तिलक लगवा लेता है। सीढ़ियाँ चढ़ते समय पौड़ी
पर बने एक छोटे मंदिर के पुजारी उसे दर्शन के लिए बुलाते हैं।

आम भ्रम

नानी ने संभव से मंदिर में “बीस आने” चढ़ाने को कहा था। सोलह आने का एक रुपया होता
है, इसलिए बीस आने यानी एक रुपया और एक चवन्नी (चार आने) मिलाकर सवा रुपया।
संभव के पास एक रुपए का नोट तो था, पर चवन्नी नहीं थी। पुजारी ने उसकी परेशानी
भाँपकर रेज़गारी देने की पेशकश की, तो संभव ने झेंपते हुए एक रुपए का नोट जेब में
रखकर दो रुपए का नोट निकाला, ताकि पुजारी को दे सके और पचहत्तर पैसे वापस ले
सके।

पुजारी संभव को चरणामृत देकर कलावा बाँधने के लिए हाथ बढ़ाते हैं। तभी ठीक बराबर
में एक और दुबली, नाज़ुक कलाई पुजारी की ओर बढ़ आती है, एक अनजान लड़की, जिसके
कपड़े नहाने से पूरी तरह भीगे हैं, आँख मूँदकर अर्चना कर रही है। संभव का ध्यान कलावे की ओर था ही नहीं; पुजारी उस लड़की की कलाई पर
कलावा बाँध देते हैं, और वह थाली में सवा पाँच रुपए रखती है।

यहीं होती है कहानी की केंद्रीय घटना, ध्यान से पढ़ें

लड़की पुजारी से कहती है, “पंडित जी, आज तो आरती हो चुकी। क्या करें हमें देर हो गई।”
पुजारी के संकल्प-आरती करा देने की पेशकश पर वह कहती है, “नहीं हम कल आरती की बेला आएँगे।”
पाठ के अनुसार “जाने कैसे” पुजारी ने लड़की के “हम” को युगल अर्थ (दंपति
के रूप में) में ले लिया (बोलचाल में “हम” प्रायः “मैं” के अर्थ में भी आता है), और उसके मुँह से अनायास आशीष निकली: “सुखी रहो, फूलोफलो, जब भी
आओ साथ ही आना, गंगा मैया मनोरथ पूरे करें।”
गलत अर्थ पुजारी ने लिया; पर लड़की स्वयं सोचती है, “भूल तो उसी की थी। बाद में तो वही आई थी”, क्योंकि अँधेरे से घबराकर वह संभव के बहुत पास खड़ी हो गई थी।

आशीर्वाद सुनते ही दोनों अकबका जाते हैं। लड़की छिटककर दूर खड़ी हो जाती है, और
संभव को वहाँ से जाने की जल्दी हो जाती है। संयोग से दोनों की चप्पलें एक ही रखवाले
के पास रखी थीं, चप्पलें लेते समय दोनों की निगाहें फिर एक बार टकराती हैं, पर बिना
कोई बात किए, बिना परिचय के दोनों अलग-अलग दिशा में चले जाते हैं। संभव लड़की का
पीछा करने की कोशिश करता है और सब्ज़ीमंडी तक पहुँच जाता है, पर हर की पौड़ी और
सब्ज़ीमंडी के बीच फैली घुमावदार गलियों में लड़की कहीं गुम हो जाती है।

घर लौटकर नानी दरवाज़ा खोलते हुए संभव को डाँटती-प्यार जताती हैं, पर संभव कुछ नहीं
बोलता, “मुझे भूख नहीं है” कहकर करवट बदल लेता है। रातभर उसकी आँखों में शाम की
पूरी घटना घूमती रहती है: लड़की का आँख मूँदकर अर्चना करना, उसका गुलाबी आँचल,
और पुजारी से कहा गया वह वाक्य, “हम कल आएँगे।”

परीक्षा संकेत

प्रश्न 1 (हर की पौड़ी की आरती का भावपूर्ण वर्णन) और प्रश्न 3 (पुजारी की गलतफ़हमी)
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास के ही प्रश्न हैं, दोनों को शब्द-दर-शब्द नहीं, अपने
शब्दों में पर पूरे विवरण के साथ लिखने का अभ्यास करें।

4.2 पृष्ठभूमि: संभव कौन है (लेखिका यहाँ फ़्लैशबैक में बताती हैं)

संभव की उम्र ज़्यादा नहीं है, उसने इसी वर्ष एम.ए. पूरा किया है, और अब वह सिविल
सेवा प्रतियोगिताओं में बैठने वाला है। उसके माता-पिता का विश्वास था कि हरिद्वार जाकर
गंगा जी के दर्शन करने से उसका चयन बेखटके हो जाएगा। संभव खुद इन टोटकों में विश्वास
नहीं करता, पर घूमना और नानी से मिलना उसे पसंद है।

अब तक उसके जीवन में किसी लड़की ने कोई अहम भूमिका नहीं निभाई थी: लड़कियाँ
या तो क्लास में बाईं तरफ़ की बेंचों पर बैठने वाली एक कतार थीं, या ताई-चाची की
लड़कियाँ जिनके साथ खेलते-खाते वह बड़ा हुआ था। इसलिए इस तरह अकेले, अनजान जगह
पर एक अनाम लड़की का सामने आना, पुजारी का ग़लत समझना, और लड़की का घबराकर
चले जाना, यह सब मिलकर संभव के लिए एक बिलकुल नयी अनुभूति बन गया, जिसमें
उसे कुछ सुख और उससे ज़्यादा बेचैनी महसूस हो रही थी। उसने मन ही मन तय कर लिया
कि अगले दिन शाम पाँच बजे से ही वह घाट पर जाकर बैठ जाएगा।

4.3 दिन 2: बैसाखी की सुबह, मंसा देवी की यात्रा

अगली सुबह नानी संभव को जगाती हैं, “लल्ला चलेगा गंगाजी, आज बैसाखी है।” संभव
मना कर देता है, कहता है, “तुम मेरे भी नाम की डुबकी लगा लेना नानी।” अकेले में वह
कल्पना में लड़की से बातचीत गढ़ता है: वह उससे नाम पूछेगा, वह कहाँ से आई है पूछेगा,
पर इन सवालों के जवाब खुद नहीं ढूँढ पाता कि नानी वापस आ जाती हैं और उसकी
कल्पना टूट जाती है।

संभव तय करता है इस बार वह नहाएगा नहीं, सिर्फ़ हाथ-मुँह धोकर प्रार्थना करेगा, घाट
पर बैठकर गंगा की जलराशि निहारेगा, और लौटते हुए मथुरा जी की दुकान से गरम जलेबी
खरीदेगा। आज पौड़ी पर बैसाखी के कारण अद्भुत भीड़ है, भोर की आरती हो चुकी है,
भजन ज़ोर-शोर से चल रहे हैं।

दिल्ली की भीड़

  • दफ़्तर जाती, ख़रीद-फ़रोख़्त करती, तमाशा देखती, सड़क क्रॉस करती भीड़

हरिद्वार की भीड़ (बैसाखी)

  • न जाति का महत्त्व, न भाषा का
  • सबका उद्देश्य एक-सा, कल्याण की कामना, दौड़-अतिक्रमण नहीं

संभव देखता है कि कोई भी स्नानार्थी सैलानी आनंद में डुबकी नहीं लगा रहा, बल्कि स्नान
से ज़्यादा समय ध्यान में बिता रहा है। दूर जलधारा में एक आदमी सूर्य की ओर हाथ जोड़े
खड़ा है, उसके चेहरे पर इतना विभोर और विनीत भाव है मानो उसने अपना सारा अहम
त्याग दिया हो और वह शुद्ध चेतनस्वरूप, आत्माराम और निर्मलानंद हो गया हो।

तभी एक छोटा बच्चा हँसते हुए संभव के पास आ बैठता है और पूछता है, “भैया आप नहीं
नहाएँगे?” बातचीत में पता चलता है कि यह बच्चा (मन्नू) रोहतक से अपनी बुआ के साथ आया है, और
अब सामने पहाड़ी पर बने मंसा देवी मंदिर जाएगा।

यह जगह संभव को पहले दिन से ही अपनी ओर खींच रही थी, पर नानी ने उसे झूलागाड़ी
(रोपवे) में जाने से मना किया था, “रस्सी से चलती है, क्या पता कब टूट जाए। एक बार
टूटी थी, हजारन मरे गिरे थे। जाना है तो चढ़कर जाना, उसका महातम अलग है।” संभव
बरसों से कुर्सी पर बैठकर पढ़ने का आदी है, शारीरिक मेहनत में उसका यक़ीन नहीं। यहाँ सुबह-सुबह नानी का झाड़ू लगाना, चक्की चलाना, पानी भरना, बरतन फिर से धो-धोकर लगाना, सब उसे कष्ट देता है, पर वह एतराज़ नहीं करता, क्योंकि महज़ चार
दिन रुककर वह नानी की दिनचर्या में हस्तक्षेप करने का अधिकारी नहीं बन सकता। संभव के “अगर गिर गए तो?” पूछने पर बच्चा हँसता है, “इतने बड़े होकर डरते हो भैया?”
शहर के इतिहास के साथ-साथ संभव उसका भूगोल भी आत्मसात करना चाहता था, इसलिए थोड़ी देर बाद वह रोपवे स्टेशन “उषा ब्रेको सर्विस” पहुँच जाता है।

वहाँ चुनरी और प्रसाद की थैलियाँ ₹5, ₹7 और ₹11 में बिक रही हैं, और कुछ बच्चे
₹3-₹3 में बिंदी-पाउडर बेच रहे हैं। बिंदियाँ देखकर संभव को अचानक बहुत आकर्षक
लगती हैं, और वह मन ही मन एक बिंदी उस अनजान लड़की के माथे पर सजा देता है।
केबिल कार में बैठते समय वह गुलाबी रंग की कार चुनता है, “कल से उसे गुलाबी
के सिवा और कोई रंग सुहा ही नहीं रहा था।” रास्ते में नीचे कतारबद्ध फूल खिले दिखते हैं, और
ऊपर से पूरा हरिद्वार खुलता है: मंदिरों के बुर्ज, गंगा की धवल धार, सड़कों के घुमाव।

चित्र 2: मंसा देवी की रोपवे केबिल कार, नीचे हरिद्वार शहर और गंगा नदी की धार। इसी तरह की एक पीली केबिल कार में संभव को वापसी में मन्नू और पारो एक साथ दिखे थे। चित्र: Dan Searle / Wikimedia Commons / CC BY-SA 2.0
चित्र 2: मंसा देवी की रोपवे केबिल कार, नीचे हरिद्वार शहर और गंगा नदी की धार। इसी तरह की एक पीली केबिल कार में संभव को वापसी में मन्नू और पारो एक साथ दिखे थे। चित्र: Dan Searle / Wikimedia Commons / CC BY-SA 2.0

मंसा देवी मंदिर के भीतरी प्रकोष्ठ में चामुंडा रूप धारिणी मंसा देवी स्थापित हैं। “व्यापार यहाँ भी था”: मनोकामना के हेतुक लाल-पीले धागे सवा रुपए में बिक रहे थे। संभव
भी पूरी श्रद्धा के साथ मनोकामना करता है, गाँठ लगाता है, सिर झुकाता है, नैवेद्य चढ़ाता है। बाहर
रुद्राक्ष मालाओं की गुमटियों पर ₹10 से लेकर ₹3,000 तक की मालाएँ बिकती हैं, और
मालाओं पर लिखा है, “असली रुद्राक्ष, नकली साबित करने वाले को पाँच सौ रुपए
इनाम।”

ध्यान दें

“एकदम अंदर के प्रकोष्ठ में चामुंडा रूप धारिणी मंसादेवी स्थापित थीं। व्यापार यहाँ भी
था।” इस पंक्ति को एक सूक्ष्म व्यंग्य के रूप में पढ़ा जा सकता है: मंदिर के भीतरी प्रकोष्ठ में भी व्यापार मौजूद है (वहाँ मनोकामना के धागे सवा रुपए में बिक रहे थे)।

4.4 दो आश्चर्य, और पहचान (कहानी का चरम)

वापसी की ढलवाँ केबिल कार में संभव के साथ तीन समवयस्क लड़के बैठे हैं। तभी एक
साथ दो आश्चर्य घटित होते हैं: दूर एक पीली केबिल कार में वही बच्चा (मन्नू) दिखता है,
उसकी लाल कमीज़ से पहचाना जाता है। और उसी बच्चे से सटी बैठी है वह दुबली, पतली,
श्याम सलोनी आकृति, कल शाम की वही लड़की!

नीचे पहुँचते ही संभव आगे जाते मन्नू को कंधे से थाम लेता है और पूछता है, “कहो
दोस्त?” मन्नू
अचकचाकर पहचान लेता है, कहता है, “हमने सोचा जब हमारा दोस्त नहीं डरता तो हो
जाए एक ट्रिप।” तभी आगे से एक महीन आवाज़ आती है, “मन्नू घर नहीं चलना है।”
संभव अस्फुट स्वर में पूछता है, “ये तुम्हारी बुआ हैं।” मन्नू आश्चर्य से “और क्या” कहता है, और संभव
खुद को उसका “दोस्त” बताकर मिलवाने को कहता है।

मन्नू हाथ खींचकर बुआ के पास ले जाता है, “बुआ, बुआ, इनसे मिलो, ये हैं हमारे नए
दोस्त…” पाठ के अनुसार “उसने प्रश्नवाचक नज़रों से संभव को देखा, ‘अपना नाम खुद बताइए।'” (पाठ यहाँ केवल “उसने” कहता है, वक्ता का नाम नहीं लेता।)
इससे पहले कि संभव कुछ कह पाए, उसी महीन मीठी आवाज़ (बुआ) ने मन्नू को टोका, “ऐसे कैसे दोस्त
हैं तुम्हारे, तुम्हें उनका नाम भी नहीं पता?” संभव उसी कंठ, उसी उलाहने, उसी अंदाज़ से
लड़की को पहचान लेता है, और उसका रोम-रोम पुलक से हिल उठता है।

लड़की ने आज गुलाबी नहीं, सफ़ेद साड़ी पहनी है, और लाज से गुलाबी हो रही है। वह
मन ही मन मंसा देवी को एक और चुनरी चढ़ाने का संकल्प लेते हुए सोचती है, “मनोकामना
की गाँठ भी अद्भुत, अनूठी है, इधर बाँधो उधर लग जाती है।” तभी मन्नू कहता है, “पारो
बुआ, पारो बुआ, इनका नाम है…” यहीं पहली बार पाठक को लड़की का नाम, पारो,
पता चलता है।
संभव हँसते हुए वाक्य पूरा करता है: “संभव देवदास।” उसे भी
मनोकामना के पीले-लाल धागे और उसकी गिठान का मधुर स्मरण हो आता है। कहानी
यहीं समाप्त हो जाती है।

दिन 1, शामहर की पौड़ी पर आरती हो चुकने के बाद संयोग से पहली भेंट, पुजारी की गलतफ़हमी, बिना नाम जाने बिछड़ना
रातसंभव की बेचैन नींद, कल्पना में लड़की का बार-बार लौटना
दिन 2, सुबहमंसा देवी की रोपवे यात्रा, मन्नू से भेंट
दिन 2, वापसीदूसरी केबिल कार में लड़की को फिर देखना, मन्नू के ज़रिए परिचय, नाम “पारो” का खुलना

5 शीर्षक “दूसरा देवदास” की सार्थकता

यहाँ ध्यान से पढ़ें

शीर्षक की सार्थकता नाम के संयोग में भी है और कहानी के भाव में भी। कहानी के अंत में
लड़की का नाम पारो निकलता है, और संभव मज़ाक में खुद को “संभव देवदास” कह देता
है। देवदास और पारो की प्रसिद्ध जोड़ी शरतचंद्र के उपन्यास “देवदास” से जानी जाती है; यह संदर्भ पाठ में नहीं है, पाठ से बाहर की जानकारी है। उत्तर में इसे एक वाक्य में, पाठ से बाहर का संदर्भ बताकर लिखा जा सकता है; मूल उपन्यास की कथा का विस्तार न लिखें। उस उपन्यास की प्रेम-कथा दुखांत मानी जाती है,
जबकि यहाँ संभव-पारो की भेंट सुखद संयोग और हास-परिहास से भरी है।

इसलिए शीर्षक को इस तरह पढ़ा जा सकता है: यह मूल देवदास की कथा को दोहराता नहीं, बल्कि उससे विनोदपूर्ण
ढंग से अलग होकर एक “दूसरे”, हल्के-फुल्के और आशावादी देवदास की बात करता है।
पाठ के परिचय में कहानी का एक केंद्रीय विचार यह है: प्रेम के लिए “किसी निश्चित व्यक्ति, समय और स्थिति का
होना आवश्यक नहीं है”, वह “कभी भी, कहीं भी” उपज सकता है।

6 कहानी का उद्देश्य और संदेश

  • प्रेम अनजाने में, किसी भी अजीब परिस्थिति में उपज सकता है, इसके लिए “किसी निश्चित व्यक्ति, समय और स्थिति का होना आवश्यक नहीं है”
  • लेखिका प्रेम को “बंबईया फ़िल्मों की परिपाटी” से अलग हटाकर पवित्र और स्थायी रूप में दिखाती हैं
  • संयोग (मनोकामना का धागा, पुजारी की गलतफ़हमी, दो बार का मिलन) कथा को गति देता है, पर हर संयोग का परिणाम सुखद नहीं होता: पुजारी की गलतफ़हमी से दोनों पहले अकबकाकर बिछड़ जाते हैं
  • तीर्थ-स्थल के धार्मिक वातावरण के भीतर भी व्यापार (“व्यापार यहाँ भी था”) और सामान्य मानवीय हास-परिहास की उपस्थिति को एक सूक्ष्म व्यंग्य के रूप में पढ़ा जा सकता है

7 चरित्र-चित्रण

1

संभव

सिविल सेवा का उम्मीदवार, बौद्धिक स्वभाव का, शारीरिक श्रम में विश्वास नहीं रखता।
कल्पनाशील और भावुक भी है, एक अनजान भेंट के बाद “सारी रात संभव की आँखों में शाम मँडराती रही”। नानी
की सलाह (झूलागाड़ी से न जाने की) को अनसुना कर देता है, पर उनसे स्नेह रखता है।

2

पारो

पहले दिन भीगे कपड़ों में, लंबे गीले बाल “पीठ पर काले चमकीले शॉल की तरह”; दीपकों के नीम उजाले में “लगभग काँस्य प्रतिमा”। संकोची और मर्यादित: पुजारी के आशीष पर छिटककर दूर खड़ी हो जाती है, और दूसरे दिन “लाज से गुलाबी” होती है। मन्नू की बुआ,
धार्मिक स्वभाव (मंसा देवी को एक और चुनरी चढ़ाने का संकल्प)। मन्नू को
“ऐसे कैसे दोस्त हैं तुम्हारे, तुम्हें उनका नाम भी नहीं पता?” कहकर हल्के में टोकती है।

3

नानी

वात्सल्यमयी और चिंतित स्वभाव की, संभव के देर से लौटने या भूख न लगने पर
परेशान हो जाती हैं। झूलागाड़ी की रस्सी टूटने के डर से उसमें न बैठने को कहती हैं और पैदल चढ़ने का
“महातम अलग” मानती हैं। एक ही बात कई बार दोहराने की आदत है।

4

मन्नू

निश्छल और निडर बालक है, झूलागाड़ी से बिलकुल नहीं डरता। मिलनसार स्वभाव के
कारण घाट पर मिले अजनबी संभव को भी तुरंत “दोस्त” मान लेता है, और कहानी के
अंत में अनजाने ही पारो का नाम खोल देता है।

8 महत्वपूर्ण पंक्तियों की व्याख्या

पंक्ति 1

“तुझे तो तैरना भी न आवे। कहीं पैर फिसल जाता तो मैं तेरी माँ को कौन मुँह
दिखाती।”

यह नानी का संवाद है, जो संभव के देर से लौटने पर कहा जाता है। इसमें
नानी की वात्सल्यमयी चिंता झलकती है: वे संभव की सुरक्षा को लेकर व्यग्र हैं, और
उसकी माँ के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को लेकर भी सचेत हैं।

पंक्ति 2

“उसके चेहरे पर इतना विभोर विनीत भाव था मानो उसने अपना सारा अहम त्याग
दिया है, उसके अंदर ‘स्व’ से जनित कोई कुंठा शेष नहीं है, वह शुद्ध रूप से चेतनस्वरूप,
आत्माराम और निर्मलानंद है।”

यह पंक्ति गंगा में ध्यानमग्न खड़े एक अनजान व्यक्ति
के विषय में है। इसका आशय है कि वह व्यक्ति “मानो” अपना सारा अहम त्याग चुका है, उसके भीतर ‘स्व’ से जनित
कोई कुंठा शेष नहीं है, और वह शुद्ध, निर्मल आनंद की अवस्था में दिखता है। “मानो” से स्पष्ट है कि यह लेखिका की उपमा है, सामान्य नियम नहीं।

पंक्ति 3

“एकदम अंदर के प्रकोष्ठ में चामुंडा रूप धारिणी मंसादेवी स्थापित थी। व्यापार यहाँ
भी था।”

यह पंक्ति मंसा देवी मंदिर के भीतर के दृश्य का वर्णन करती है; इसे एक सूक्ष्म
व्यंग्य के रूप में पढ़ा जा सकता है: मंदिर के भीतरी प्रकोष्ठ में भी आस्था के साथ-साथ
व्यापार मौजूद है (पाठ: “व्यापार यहाँ भी था”; वहाँ मनोकामना के धागे सवा रुपए में बिक रहे थे)।

पंक्ति 4

“मनोकामना की गाँठ भी अद्भुत, अनूठी है, इधर बाँधो उधर लग जाती है।”
यह पंक्ति पारो के मन में उठे विचार को दर्शाती है। पारो को लगता है कि मनोकामना की
गाँठ एक जगह (मंसा देवी में) बाँधी जाती है और फल तुरंत, अप्रत्याशित ढंग से मिल जाता है। पाठ मनोकामना का ब्योरा नहीं देता; प्रसंग (संभव से दोबारा
भेंट, उसका “लाज से गुलाबी” होना) से संकेत मिलता है कि वह इसी भेंट को अपनी मनोकामना का फल मान रही है।

9 भाषा-शैली की विशेषताएँ

यह पाठ पूरी तरह आख्याता (नैरेटर-लेखक) की ओर से, तीसरे पुरुष में लिखा गया
है: लेखिका कहीं भी “मैं” बनकर सामने नहीं आतीं, बल्कि “संभव ने गौर किया”, “लड़की ने कहा” जैसे वाक्यों से पूरी कथा बाहर से बताई गई है।

भाषा-शिल्प: पूजा-अर्चना के शब्द (प्रश्न 2 के लिए संकलन)

आरती (“आरती शुरू होने वाली है”), दीया-बाती (“दीया-बाती का समय”), नीलांजलि (“पीतल की नीलांजलि में सहस्र बत्तियाँ घी में भिगोकर रखी हुई हैं”), चंदन-सिंदूर, तिलक (“हर एक के पास चंदन और सिंदूर की कटोरी है”; “चंदन तिलक के बगैर अस्नान अधूरा होता है बेटा”), घंटे-घड़ियाल (“घंटे घड़ियाल बजते हैं”), मनौती (“मनौतियों के दिये”), अगरु-चंदन (“पूरे वातावरण में अगरु-चंदन की दिव्य सुगंध है”), संकल्प, मंत्रोच्चार (“आरती के बाद बारी है संकल्प और मंत्रोच्चार की”), चढ़ावा (“भक्त आरती लेते हैं, चढ़ावा चढ़ाते हैं”), दक्षिणा (“खुशी-खुशी दक्षिणा देते हैं”), माला (“भगवान के गले से माला उतार-उतारकर यजमान के गले में डालते हैं”), प्रसाद (“जी खोलकर देते हैं प्रसाद”), दर्शन (“अरे दर्शन तो करते जाओ”), चरणामृत, कलावा (“पुजारी जी ने चरणामृत दिया और लाल रंग का कलावा बाँधने के लिए हाथ बढ़ाया”), अर्चन (“आँख मूँदकर अर्चन कर रही थी”), नैवेद्य (“नैवेद्य चढ़ाया”), चुनरी (“मंसा देवी पर चढ़ाने वाली चुनरी”)।

10 शब्दार्थ

पाठ के सभी शब्दार्थ एक ही जगह
गोधूलि बेलासंध्या का समय
हुज्जतबहस
ब्यालूशाम का भोजन
नीलांजलिविशेष प्रकार का दीपक, जिसे प्रज्ज्वलित कर आरती के समय देवमूर्ति के सामने घुमाया जाता है
मनोरथमन की इच्छा, अरमान
बेखटकेबिना किसी रुकावट के
कलावाकलाई में बाँधी गई लाल डोरी, मौली
प्रकोष्ठकक्ष, कमरा
झुटपुटाकुछ-कुछ अँधेरा (जैसे कहानी में “झुटपुटे” में हुई पहली भेंट)
अस्फुटअस्पष्ट (पाठ में: “अस्फुट स्वर”)
आत्मसातअपने में समा लेना
जी खोलकर देनाउदारतापूर्वक खर्च करना
नज़रें बचानाएक दूसरे से कतराना
नौ दो ग्यारह होनाभाग जाना, गायब होना
याद रखने की तरकीब

दो दिन, दो भेंट, एक नाम

पूरी कहानी को इसी क्रम में याद रखें: दिन 1 में हर की पौड़ी पर बिना नाम जाने भेंट,
दिन 2 में मंसा देवी की यात्रा पर दूसरी भेंट, और अंत में मन्नू के ज़रिए नाम “पारो” का
खुलना।

त्वरित पुनरावृत्ति: परीक्षा से एक रात पहले यही पढ़ें
  • ममता कालिया: जन्म 1940, मथुरा; भाषा-शैली में शब्दों की पारखी, व्यंग्य की सटीकता
  • दिन 1: हर की पौड़ी पर संध्या-आरती हो चुकने के बाद संभव और पारो की पहली भेंट
  • पुजारी ने “जाने कैसे” पारो के “हम” को युगल अर्थ में लेकर आशीष दे दी
  • दोनों बिना नाम-परिचय के अकबकाकर बिछड़ गए, संभव पीछा करने पर भी उसे खो देता है
  • संभव की पृष्ठभूमि: एम.ए. पूरा, सिविल सेवा की तैयारी, माता-पिता का गंगा-दर्शन वाला विश्वास
  • दिन 2: बैसाखी की सुबह, मन्नू से भेंट, नानी की मनाही के बावजूद रोपवे से मंसा देवी यात्रा
  • वापसी की केबिल कार में मन्नू और पारो को एक साथ, दूसरी केबिल कार में देखना
  • मन्नू के ज़रिए परिचय, संभव का कंठ से पहचानना, अंत में “पारो” नाम का खुलना
  • संभव हँसते हुए वाक्य पूरा करता है, “संभव देवदास”; अंतिम वाक्य: उसे भी मनोकामना का पीला-लाल धागा और उसमें पड़ी गिठान का मधुर स्मरण हो आया
  • शीर्षक की सार्थकता (एक पठन): पारो नाम के संयोग से संभव “दूसरा देवदास” बनता है, पर यह कहानी दुखांत नहीं, सुखद संयोग की है
परीक्षा से पहले स्वयं जाँचें
  • क्या मैं हर की पौड़ी की आरती का वर्णन बिना किसी चरण को छोड़े लिख सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं बता सकता/सकती हूँ कि पुजारी ने लड़की के किस शब्द को युगल अर्थ में लिया?
  • क्या मैं शीर्षक की सार्थकता शरतचंद्र के उपन्यास की कथा जोड़े बिना समझा सकता/सकती हूँ?
  • क्या मुझे सभी 14 शब्दार्थ सही अर्थ के साथ याद हैं?