- हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन-परिचय और भाषा-शैली बताना
- कुटज में दिखी अपराजेय जीवनशक्ति, स्वावलंबन, आत्मविश्वास को अपने शब्दों में समझाना
- रूप और नाम की दार्शनिक बहस, “रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य”, का सही अर्थ बताना
- कुटज शब्द पर लेखक का विचार (कुट, कुटज, कुटनी) और उसके मूल पर लेखक का संदेह (आग्नेय भाषा-परिवार) समझाना
- याज्ञवल्क्य के स्वार्थ-सिद्धांत और लेखक के प्रतिवाद (समष्टि-बुद्धि) को क्रम से समझाना
- निबंध के सभी संस्कृत श्लोकों-उद्धरणों (याज्ञवल्क्य, भीष्म पितामह, राजा जनक, रहीम) का आशय बताना
1 लेखक-परिचय: हजारी प्रसाद द्विवेदी
- जन्म सन् 1907, गाँव आरत दुबे का छपरा, ज़िला बलिया (उ.प्र.); निधन 1979।
- संस्कृत महाविद्यालय, काशी से शास्त्री; 1930 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से ज्योतिषाचार्य।
- 1940-50: शांति निकेतन के हिंदी भवन के निदेशक रहे, जहाँ रवींद्रनाथ टैगोर, क्षितिमोहन सेन का सान्निध्य मिला।
- 1950 वाराणसी लौटे, काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी विभागाध्यक्ष; 1952-53 काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष; 1955 प्रथम राजभाषा आयोग के सदस्य (राष्ट्रपति-नामित); 1960-67 पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में विभागाध्यक्ष; 1967 काशी हिंदू विश्वविद्यालय में रेक्टर।
- अंतिम दिनों में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष।
- ‘आलोक पर्व’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार; लखनऊ से डी.लिट् मानद उपाधि; भारत सरकार से पद्मभूषण।
द्विवेदी जी संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, बांग्ला के साथ इतिहास, दर्शन, संस्कृति, धर्म के भी गहरे जानकार थे। भाषा सरल और प्रांजल, शैली में व्यक्तित्व-व्यंजकता और आत्मपरकता (लेखक के अपने दृष्टिकोण की प्रधानता) है; व्यंग्य ने पांडित्य का बोझ हावी नहीं होने दिया। भाषा-शैली की दृष्टि से उन्होंने हिंदी की गद्य शैली को एक नया रूप दिया।
| विधा | प्रमुख रचनाएँ (पुस्तक में जैसी दी गई हैं) |
|---|---|
| निबंध-संकलन | अशोक के फूल, विचार और वितर्क, कल्पलता, कुटज, आलोक पर्व |
| उपन्यास | चारूचंद्रलेख, बाणभट्ट की आत्मकथा, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा |
| आलोचनात्मक ग्रंथ | सूर-साहित्य, कबीर, हिंदी साहित्य की भूमिका, कालिदास की लालित्य-योजना |
सभी रचनाएँ “हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली” (ग्यारह खंड) में संकलित हैं। ध्यान दें: इसी लेखक का “शिरीष के फूल” (आरोह भाग 2) अलग निबंध है, अलग तर्क-उदाहरणों के साथ; कुटज के साथ न मिलाएँ।
2 पाठ का उद्देश्य: कुटज में लेखक को क्या मिला?
कुटज हिमालय की ऊँचाई पर सूखी शिलाओं के बीच उगने वाला एक जंगली, फूलदार पौधा है। कुटज में न विशेष सौंदर्य है, न सुगंध, फिर भी लेखक ने उसमें मानव के लिए एक संदेश पाया: अपराजेय जीवनशक्ति, स्वावलंबन, आत्मविश्वास, और विषम परिस्थितियों में भी शान से जीने की क्षमता। वह समान भाव से सभी परिस्थितियों को स्वीकारता है। “सामान्य से सामान्य वस्तु में भी विशेष गुण हो सकते हैं” यही इस निबंध का अभीष्ट (उद्देश्य) है।
पाठ में कुटज एक सचमुच का पौधा है, जो सूखी शिलाओं के बीच जीता है; इसी को आधार बनाकर लेखक नाम-रूप, स्वार्थ-त्याग और समभाव पर चिंतन करते हैं।
3 हिमालय और शिवालिक: भौगोलिक पृष्ठभूमि
- निबंध पर्वतों की शोभा से शुरू होता है: “पर्वत शोभा-निकेतन होते हैं”, और हिमालय सबसे बढ़कर।
- लेखक कालिदास का स्मरण करते हैं, जिन्होंने हिमालय को दोनों समुद्रों तक फैला बताकर उसे “पृथ्वी का मानदंड” (मापने का पैमाना) कहा था।
- हिमालय के पाद-देश में दूर तक फैली पर्वत-शृंखला को लोग शिवालिक कहते हैं।
- लेखक कल्पना करते हैं (निश्चित तथ्य नहीं) कि यह नाम शिव की उलझी, सूखी जटा के निचले हिस्से से जुड़ा हो, “लगता तो ऐसा ही है” कहकर वे इसे खुला छोड़ देते हैं।

4 शिवालिक की बंजर भूमि: जहाँ कुटज उगता है
- यहाँ काली चट्टानें हैं, दूब (घास) तक सूख चुकी है, बीच-बीच रक्ताभ (लाल-सी) रेत फैली है।
- हरियाली के नाम पर सिर्फ़ कुछ अनजान नाम-गोत्र के झाड़-झंखाड़ और “बेहया-से” (बेशर्म जैसे दिखने वाले) पेड़ हैं, जो भीषण गर्मी और भूख-प्यास सहकर भी “सिर्फ़ जी ही नहीं रहे हैं, हँस भी रहे हैं”, यानी कठिन हालात में भी जीवन से भरे दिखते हैं।
“कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़ें काफ़ी गहरी, पैठी रहती हैं। ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतल गह्वर से अपना भोग्य खींच लाते हैं।”
कुटज, हजारी प्रसाद द्विवेदी, कुटज को नाम से पहचानने से पहले की टिप्पणी
यानी जो बाहर से उपेक्षित दिखे, उसकी जड़ें भीतर गहरी हो सकती हैं। इसी जंगल में लेखक को एक छोटा, ठिगना पेड़ मिलता है: चौड़ी पत्तियाँ, फूलों से लदा, मानो मुसकुरा रहा हो।

5 रूप बनाम नाम: पहली दार्शनिक बहस
पेड़ को देखकर लेखक को उसका रूप पहचाना-सा लगता है, पर नाम याद नहीं आता: नाम बड़ा है या रूप? मन व्याकुल हो जाता है। फिर वे सोचते हैं कि इसमें व्याकुल होने की क्या बात है: “नाम में क्या रखा है—ह्वाट्स देअर इन ए नेम!”
“रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य। नाम उस पद को कहते हैं जिस पर समाज की मुहर लगी होती है”। आधुनिक भाषा में इसे “सोशल सेक्शन” (समाज की स्वीकृति) कहा जाता है। नाम इसलिए बड़ा नहीं होता कि वह नाम है, बल्कि इसलिए कि समाज ने उसे स्वीकार किया, इतिहास ने प्रमाणित किया। अकेला रूप पहचान को अधूरा छोड़ देता है।
लेखक कुछ काल्पनिक नाम भी सोचते हैं: सुंदरता-सूचक सुस्मिता, गिरिकांता, वनप्रभा, या पौरुष-सूचक अकुतोभय, अपराजित, पहाड़फोड़, पर मन किसी से संतुष्ट नहीं होता, क्योंकि इनमें से किसी को भी समाज की मुहर नहीं मिली।
6 “यह तो कुटज है!”: नाम याद आना, और कुटज बनाम कूटज
- अचानक लेखक को याद आता है: यह तो कुटज है! संस्कृत साहित्य में परिचित, पर कवियों द्वारा अवमानित एक छोटा-सा वृक्ष।
- लेखक कहते हैं: “‘कूटज’ कहा गया होता तो कदाचित् ज़्यादा अच्छा होता।” गिरिकूट (पर्वत-शिखर) पर उगने वाले इस वृक्ष को ‘कूटज’ कहना उन्हें विशेष प्रिय है। पर नाम इसका ‘कुटज’ ही है।
- विरुद (कीर्ति-सूचक उपाधि) के रूप में लेखक ‘कूटज’ नाम को ही उचित मानते हैं: “गिरिकूट पर उत्पन्न होने वाले इस वृक्ष को ‘कूटज’ कहने में विशेष आनंद मिलता है।”
7 कुटज की व्युत्पत्ति: कुट, कुटज, कुटनी
लेखक शब्द की जड़ में उतरते हैं: “कुटज अर्थात जो कुट से पैदा हुआ हो”, और ‘कुट’ घड़े को भी कहते हैं, घर को भी। वे इन शब्दों के संबंध पर विचार करते हैं, पर कोई पक्का निष्कर्ष नहीं देते:
| शब्द | अर्थ (लेखक के अनुसार) |
|---|---|
| कुट | घड़ा या घर |
| कुटज (अगस्त्य मुनि) | घड़े से उत्पन्न होने के कारण अगस्त्य मुनि भी ‘कुटज’ कहे जाते हैं; पर लेखक कहते हैं, “घड़े से तो क्या उत्पन्न हुए होंगे। कोई और बात होगी।” |
| कुटिहारिका / कुटकारिका | घर में काम करने वाली दासी |
| कुटिया / कुटीर | “कदाचित् इसी शब्द से संबद्ध” (लेखक का अनुमान) |
| कुटनी / कुट्टनी | ज़रा गलत ढंग की दासी, संस्कृत में और मुखर करके ‘कुट्टनी’ |
लेखक एक आलंकारिक (अनुत्तरित) प्रश्न भी उठाते हैं कि क्या अगस्त्य मुनि भी नारद जी की तरह किसी दासी के पुत्र थे। यह लेखक का प्रश्न है, उत्तर नहीं। वे यह भी कहते हैं कि “घड़े में पैदा होने का तो कोई तुक नहीं है”, न मुनि कुटज के सिलसिले में, न फूल कुटज के।
8 कुटज की भाषिक उत्पत्ति: संस्कृत की सर्वग्रासी प्रकृति
- संस्कृत में ‘कुटज’, ‘कुटच’, कहीं ‘कूटज’ भी मिलता है। लेखक कहते हैं: “मुझे तो इसी में संदेह है कि यह आर्यभाषाओं का शब्द है भी या नहीं”, और “आर्य जाति का तो नहीं जान पड़ता”।
- सिलवाँ लेवी (Sylvain Lévi) के अनुसार संस्कृत में फूल-वृक्ष-बागबानी के अधिकांश शब्द आग्नेय भाषा-परिवार के हैं। लेखक पूछते हैं, “यह भी वहीं का तो नहीं है”, और “‘कुटज’ भी हो तो क्या आश्चर्य?” पंडितों ने बताया है इसी श्रेणी में कमल, कुड्मल, कंबु, कंबल, तांबूल भी आते हैं।
- इस भाषा-परिवार के नाम समय के साथ बदलते गए:
संस्कृत ने शब्दों के संग्रह में कभी “छूत” (भेदभाव) नहीं मानी, किसी भी मूल-नस्ल के शब्द उसमें आकर अपने बन गए। इसीलिए लेखक कहते हैं: “संस्कृत सर्वग्रासी भाषा है“, यानी हर स्रोत से शब्द अपना लेने वाली भाषा।
9 कुटज की अपराजेय जीवनी-शक्ति: नाम और रूप, दोनों में
नाम में
कुटज नाम हज़ारों वर्षों से जीवित है, जबकि कितने ही अन्य नाम आए और मिट गए, “दुनिया उनको भूल गई, वे दुनिया को भूल गए”, पर कुटज संस्कृत की शब्दराशि में जमकर बैठा हुआ है।
रूप में
प्रचंड लू (“कुपित यमराज के दारुण निःश्वास”) में भी यह हरा-भरा है; कठोर पाषाण से भी रस खींचकर सरस बना हुआ है; सूने पहाड़ी जंगल में भी इतना मस्त है कि देखकर ईर्ष्या होती है।
दृश्य: दूर हिमालय की बर्फ़ीली चोटियाँ (जहाँ महादेव समाधिस्थ कल्पित हैं), नीचे पथरीला मैदान, बीच में पर्वतनंदिनी सरिताएँ (पर्वत की पुत्री-सी नदियाँ) रास्ता खोजतीं। इसी चट्टानी “जटाभूमि” में बैठा कुटज एक बार महादेव को फूल चढ़ाता, एक बार जड़ों से सरिताओं को जल-स्रोत बताता (काव्यात्मक कल्पना, तथ्य नहीं)।
कालिदास को भी याद करते हैं: यक्ष को रामगिरि पर मेघ की अभ्यर्थना (स्वागत) के लिए ताज़े कुटज पुष्पों से ही संतोष करना पड़ा था, चंपक-बकुल-नीलोत्पल-मल्लिका-अरविंद से नहीं। लेखक को लगता है मानो कालिदास स्वयं कभी “शापेनास्तंगमितमहिमा” (शाप से महिमा-हीन यक्ष) होकर रामगिरि पहुँचे थे और अपने हाथों कुटज-पुष्प का अर्घ्य देकर मेघ की अभ्यर्थना की। लेखक के अनुसार रामगिरि पर भी उस समय और कोई फूल नहीं मिला होगा; “कुटज ने उनके संतृप्त चित्त को सहारा दिया था”, इसीलिए लेखक कहते हैं: “बड़भागी फूल है यह! धन्य हो कुटज, तुम ‘गाढ़े के साथी’ हो।”
10 कुटज का उपदेश
“जीना चाहते हो? कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य संग्रह करो; वायुमंडल को चूसकर, झंझा-तूफ़ान को रगड़कर, अपना प्राप्य वसूल लो; आकाश को चूमकर अवकाश की लहरी में झूमकर उल्लास खींच लो।”
अर्थात: कठिनाई से डरकर मत बैठो, पत्थर-तूफ़ान-सूखे को चीरकर अपने हिस्से का जीवन-रस खुद निकालो, फिर आकाश जितना ऊँचा उठकर उसका उल्लास भी मनाओ।
“भित्त्वा पाषाणपिठरं छित्त्वा प्राभञ्जनी व्यथाम् । पीत्वा पातालपानीयं कुटजश्चुम्बते नभः॥”
अर्थ: पत्थर के घड़े को भेदकर, आँधी-तूफ़ान की पीड़ा काटकर, पाताल का पानी पीकर कुटज आकाश को चूमता है, निबंध में उद्धृत
11 जीना एक कला है, तपस्या है
लेखक आगे बढ़ते हैं: “जियो तो प्राण ढाल दो ज़िंदगी में, मन ढाल दो जीवनरस के उपकरणों में!” जीना कोई हल्का काम नहीं, यह कला तो है ही, पर असल में एक तपस्या है। फिर प्रश्न: “क्या जीने के लिए जीना ही बड़ी बात है?”
- याज्ञवल्क्य, बड़े ब्रह्मवादी ऋषि, ने पत्नी को समझाया कि सब कुछ स्वार्थ के लिए ही प्रिय होता है: “आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति!” यानी पुत्र के लिए नहीं, स्वयं के लिए पुत्र प्रिय होता है।
- लेखक कहते हैं, “सुना है, पश्चिम के हॉब्स और हेल्वेशियस जैसे विचारकों ने भी ऐसी ही बात कही है।”
यदि जीते रहने की प्रचंड इच्छा (जिजीविषा) ही बड़ी बात हो, तो त्याग, परार्थ, देशोद्धार, साहित्य-कला की महिमा सब झूठ ठहरेंगे। “लेकिन अंतरतर से कोई कह रहा है, ऐसा सोचना गलत ढंग से सोचना है।” स्वार्थ से भी बड़ी, जिजीविषा से भी प्रचंड, कोई शक्ति ज़रूर है।
लेखक के अनुसार याज्ञवल्क्य ने जो बात “धक्कामार ढंग से” कही थी, वह अंतिम नहीं थी; वे “आत्मनः” (स्वयं) का अर्थ कुछ और बड़ा करना चाहते थे। व्यक्ति की आत्मा व्यक्ति तक सीमित नहीं, व्यापक है: “अपने में सब और सबमें आप”, यही समष्टि-बुद्धि है। जब तक यह न आए, पूर्ण सुख नहीं मिलता।
जब तक स्वयं को “सर्व” के लिए निछावर (समर्पित) न किया जाए, स्वार्थ सिर्फ़ खंड-सत्य (आधा-अधूरा सच) है। यह मोह-तृष्णा बढ़ाता है, मनुष्य को “दयनीय-कृपण” (तरस खाने योग्य कंजूस) बनाता है।
अब लेखक कुटज की ओर लौटते हैं: क्या वह केवल जी रहा है? इस प्रश्न से लेखक उन मानवीय कमज़ोरियों पर व्यंग्य करते हैं जिनसे कुटज मुक्त है:
✓ कुटज ऐसे जीता है
- “जीता है और शान से जीता है”; किस उद्देश्य से, “कोई नहीं जानता। मगर कुछ बड़ी बात है।”
- अपराजेय जीवनी-शक्ति और स्वावलंबन के साथ, अपने बलबूते
✗ कुटज यह कभी नहीं करता
- न किसी के द्वार पर भीख माँगता है, न डर के मारे अधमरा होता है
- न नीति-धर्म का उपदेश देता फिरता है, न अफ़सरों का जूता चाटता है
- न ग्रहों की खुशामद करता है, न नीलम-अंगूठियाँ धारण करता है, न दाँत निपोरता है, न बगलें झाँकता है
15 भीष्म पितामह का श्लोक: हृदयेनापराजितः
लेखक कहते हैं कि कुटज मानो भीष्म पितामह की तरह, एक अवधूत (विरक्त संन्यासी) की भाषा में यही कह रहा है: सुख हो या दुख, जो मिले उसे शान से, हृदय से अपराजित होकर ग्रहण करो, हार मत मानो:
“सुखं वा यदि वा दुःखं प्रियं वा यदि वाऽप्रियम्। प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः॥”
शांतिपर्व (महाभारत), निबंध में उद्धृत
हृदयेनापराजितः यानी हृदय से अपराजित। कितना विशाल हृदय होगा जो सुख-दुख से कभी विचलित न हो! “कुटज को देखकर रोमाँच हो आता है।” लेखक पूछते हैं कि यह अकुतोभया वृत्ति (निर्भय स्वभाव), अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन-दृष्टि कहाँ से मिली है।
16 उपकार-अपकार और सुख-दुख पर विचार
- जो सोचता है वह उपकार कर रहा है, वह अबोध है; जो सोचता है दूसरे अपकार कर रहे हैं, वह भी बुद्धिहीन है।
- मनुष्य अपनी इच्छा से नहीं, “इतिहास-विधाता की योजना” से जीता है। किसी को उससे सुख मिल जाए तो बहुत अच्छी बात है; न मिल सके तो कोई बात नहीं, पर सुख पहुँचाने का अभिमान नहीं होना चाहिए।
- सुख पहुँचाने का अभिमान ग़लत है, तो दुख पहुँचाने का अभिमान नितरां ग़लत है।
“दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं।” सुखी वह है जिसका मन उसके अपने वश में है; दुखी वह है जिसका मन परवश (दूसरों के अधीन) है: खुशामद, दाँत निपोरना, चाटुकारिता, हाँ-हुज़ूरी।
17 कुटज = वशी और वैरागी, राजा जनक जैसा
जिसका मन अपने वश में नहीं, वही दूसरे के मन का छंदावर्तन करता है (दूसरे की इच्छा के पीछे चलता है), अपने को छिपाने के लिए मिथ्या आडंबर रचता है, दूसरों को फँसाने के लिए जाल बिछाता है। कुटज इन मिथ्याचारों से मुक्त, वशी (आत्म-नियंत्रित) और वैरागी (विरक्त) है, ठीक राजा जनक की तरह, संसार में रहकर भोग भोगकर भी मुक्त। जनक की उक्ति के रूप में यह श्लोक:
“नाहमात्मार्थमिच्छामि मनोनित्यं मनोन्तरे। मनो मे निर्जितं तस्मात् वशे तिष्ठति सर्वदा॥”
अर्थ: मैं अपने स्वार्थ के लिए अपने मन को सदा दूसरे के मन में नहीं भेजता, इसीलिए मैंने मन को जीत लिया है, वह सदा मेरे वश में रहता है, निबंध में उद्धृत
“कुटज अपने मन पर सवारी करता है, मन को अपने पर सवार नहीं होने देता। मनस्वी मित्र, तुम धन्य हो!” लेखक अंत में कुटज को सीधे संबोधित करते हैं, मानो किसी पुराने मित्र से बात कर रहे हों।
18 रहीम का दोहा: अवमानना का दूसरा उदाहरण
उपेक्षा का एक और उदाहरण लेखक रहीम से देते हैं। लेखक अनुमान लगाते हैं कि दरियादिल रहीम का “मन खराब रहा होगा, लोगों की बेरुखी और बेकद्रदानी से मुरझा गए होंगे”, और ऐसी ही मनःस्थिति में उन्होंने कुटज को एक अदना-सा “बिरछ” (पेड़) कह दिया:
“वे रहीम अब बिरछ कहँ, जिनकर छाँह गंभीर। बागन बिच-बिच देखियत, सेंहुड़ कुटज करीर॥”
रहीम का दोहा, निबंध में उद्धृत
लेखक प्रतिवाद करते हैं: छाया न सही, फूल के लिए तो सम्मान होना चाहिए। कवियों का भी कभी “मूड” बिगड़ जाता है। कालिदास ने आदर दिया, रहीम ने अनादर: दोनों दिखाते हैं कुटज कवियों द्वारा कितने असंगत ढंग से आँका गया।
19 शब्दार्थ और टिप्पणी
प्रश्न-अभ्यास 10 में सप्रसंग व्याख्या के लिए चार गद्यांश दिए गए हैं; (ख) में “रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य” वाला अंश है। “कुटज ‘गाढ़े के साथी’ क्यों?” (प्रश्न-अभ्यास 1) का उत्तर कालिदास-मेघ प्रसंग और “कुटज ने उनके संतृप्त चित्त को सहारा दिया था” से जुड़ता है।
- §1-2 कुटज: शिवालिक की बंजर चट्टानों का जंगली फूलदार पेड़; न सौंदर्य, न सुगंध, फिर भी अपराजेय जीवनशक्ति, स्वावलंबन, आत्मविश्वास
- §5 रूप व्यक्ति-सत्य, नाम समाज-सत्य (= “सोशल सेक्शन”); §6-7 कुटज बनाम कूटज; ‘कुट’ (घड़ा/घर), पर घड़े वाली व्युत्पत्ति पर लेखक का संदेह
- §8 भाषिक मूल: लेखक का संदेह कि शब्द आर्यभाषाओं का है भी या नहीं; सिलवाँ लेवी का मत, नाम क्रम से: आस्ट्रो-एशियाटिक → आग्नेय-परिवार → कोल-परिवार
- §9-10 अपराजेय जीवनी-शक्ति (नाम में, रूप में) + कालिदास का प्रसंग (‘गाढ़े के साथी’); कुटज का उपदेश और श्लोक
- §12-13 याज्ञवल्क्य का स्वार्थ-सिद्धांत बनाम लेखक की समष्टि-बुद्धि (“अपने में सब और सबमें आप”)
- §15-17 हृदयेनापराजितः (शांतिपर्व); कुटज वशी-वैरागी, राजा जनक जैसा, मिथ्याचारों से मुक्त
- §18 कालिदास ने कुटज को आदर दिया, रहीम ने “बिरछ” कहकर अनादर, निबंध दोनों देता है