NCERT पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग 2 के अध्याय 17 कुटज (हजारी प्रसाद द्विवेदी) की प्रश्नावली (प्रश्न-अभ्यास के 10 प्रश्न और योग्यता-विस्तार) के सभी प्रश्नों के पूर्ण उत्तर, पाठ के आधार पर। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 प्रश्न-अभ्यास
प्र. कुटज को ‘गाढ़े के साथी’ क्यों कहा गया है?
उत्तर: कालिदास ने जब रामगिरि पर यक्ष से मेघ की अभ्यर्थना करवानी चाही, तो यक्ष को ताज़े कुटज पुष्पों की अंजलि देकर ही संतोष करना पड़ा: “चंपक नहीं, बकुल नहीं, नीलोत्पल नहीं, मल्लिका नहीं, अरविंद नहीं—फकत कुटज के फूल!” लेखक के अनुसार रामगिरि पर भी उस समय और कोई फूल नहीं मिला होगा, और “कुटज ने उनके संतृप्त चित्त को सहारा दिया था”। यानी कठिन, अभावग्रस्त क्षण में कुटज काम आया, इसीलिए लेखक उसे ‘गाढ़े का साथी’ (यानी बुरे वक़्त का सच्चा साथी) कहते हैं। धन्य हो कुटज, तुम गाढ़े के साथी हो, यह पंक्ति निबंध में स्वयं आती है।
प्र. ‘नाम’ क्यों बड़ा है? लेखक के विचार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: लेखक के अनुसार नाम इसलिए बड़ा नहीं होता कि वह केवल एक नाम है, बल्कि इसलिए बड़ा होता है कि उसे समाज ने स्वीकार किया है, इतिहास ने प्रमाणित किया है। रूप व्यक्ति-सत्य है, यानी वह जो आँखों के सामने है, अकेले व्यक्ति की पहचान है। पर नाम समाज-सत्य है, वह पद है जिस पर समाज की मुहर लगी होती है, आधुनिक भाषा में जिसे ‘सोशल सेक्शन’ कहा जाता है। इसीलिए लेखक कहते हैं कि जब तक किसी वस्तु का रूप पहचानने के साथ-साथ उसका सामाजिक रूप से स्वीकृत नाम भी याद न आए, तब तक पहचान अधूरी रहती है। इसी कारण लेखक कुटज का रूप पहचान लेने पर भी बेचैन रहते हैं, जब तक उन्हें उसका नाम याद नहीं आ जाता।
प्र. ‘कुट’, ‘कुटज’ और ‘कुटनी’ शब्दों का विश्लेषण कर उनमें आपसी संबंध स्थापित कीजिए।
उत्तर: ‘कुट’ शब्द के दो अर्थ हैं, घड़ा और घर। “कुटज अर्थात जो कुट से पैदा हुआ हो।” घड़े से उत्पन्न होने के कारण प्रतापी अगस्त्य मुनि भी ‘कुटज’ कहे जाते हैं, पर लेखक कहते हैं, “घड़े से तो क्या उत्पन्न हुए होंगे। कोई और बात होगी।” संस्कृत में ‘कुटिहारिका’ और ‘कुटकारिका’ दासी को कहते हैं; लेखक के अनुसार ‘कुट’ का अर्थ घर हो तो घर में काम-काज करने वाली दासी कुटकारिका और कुटहारिका कही ही जा सकती है (‘कुटिया’ या ‘कुटीर’ शब्द भी “कदाचित्” इसी से संबद्ध है)। ज़रा गलत ढंग की दासी ‘कुटनी’ भी कही जा सकती है, और संस्कृत में उसकी गलतियों को और मुखर बनाने के लिए ‘कुट्टनी’ कह दिया गया। लेखक इन शब्दों के संबंध को ‘कदाचित्’ मानते हैं, कोई पक्का निष्कर्ष नहीं देते। वे पूछते हैं, “अगस्त्य मुनि भी नारद जी की तरह दासी के पुत्र थे क्या?”; यह लेखक का प्रश्न है, उत्तर नहीं। वे कहते हैं कि “घड़े में पैदा होने का तो कोई तुक नहीं है”, और यह भी संदेह जताते हैं कि यह शब्द आर्यभाषाओं का है भी या नहीं।
प्र. कुटज किस प्रकार अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा करता है?
उत्तर: कुटज अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा दो तरह से करता है। नाम में: कुटज नाम हज़ारों वर्षों से जीवित है, जबकि कितने ही अन्य नाम आकर मिट गए, दुनिया उन्हें भूल गई, पर कुटज संस्कृत की निरंतर बढ़ती शब्दराशि में जमकर बैठा हुआ है। रूप में: कुपित यमराज के दारुण निःश्वास जैसी धधकती लू में भी यह हरा-भरा रहता है, दुर्जन के चित्त से भी अधिक कठोर पाषाण की कारा में रुद्ध अज्ञात जलस्रोत से रस खींचकर सरस बना रहता है, और मूर्ख के मस्तिष्क से भी अधिक सूने गिरि-कांतार में भी इतना मस्त रहता है कि देखकर ईर्ष्या होती है। इस तरह नाम और रूप, दोनों में उसकी जीवनी-शक्ति अपराजेय सिद्ध होती है।
प्र. ‘कुटज’ हम सभी को क्या उपदेश देता है? टिप्पणी कीजिए।
उत्तर: कुटज का उपदेश है: “जीना चाहते हो? कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य संग्रह करो; वायुमंडल को चूसकर, झंझा-तूफ़ान को रगड़कर, अपना प्राप्य वसूल लो; आकाश को चूमकर अवकाश की लहरी में झूमकर उल्लास खींच लो।” इसी भाव को यह संस्कृत श्लोक भी व्यक्त करता है: “भित्त्वा पाषाणपिठरं छित्त्वा प्राभञ्जनी व्यथाम् । पीत्वा पातालपानीयं कुटजश्चुम्बते नभः॥” अर्थात पत्थर के घड़े को भेदकर, आँधी-तूफ़ान की पीड़ा काटकर, पाताल का पानी पीकर कुटज आकाश को चूमता है। इस उपदेश का आशय यह है कि जीने के लिए कठिनाई से डरकर बैठना नहीं चाहिए। जीवन का रस अपने बलबूते, कठिन परिस्थितियों को चीरकर स्वयं निकालना चाहिए, और संघर्ष के बाद मिली ऊँचाई का उल्लास भी मनाना चाहिए। जीना केवल एक कला नहीं, एक तपस्या है।
प्र. कुटज के जीवन से हमें क्या सीख मिलती है?
उत्तर: कुटज के जीवन से हमें कई सीखें मिलती हैं: पहली, सामान्य से सामान्य वस्तु में भी विशेष गुण हो सकते हैं, कुटज में न सौंदर्य है न सुगंध, फिर भी उसमें अपराजेय जीवनशक्ति और स्वावलंबन है। दूसरी, कठिनाइयों से डरकर नहीं, बल्कि उन्हें चीरकर अपना जीवन-रस स्वयं निकालना चाहिए। तीसरी, सुख-दुख, प्रिय-अप्रिय, दोनों को समान भाव से, हृदय से अपराजित होकर स्वीकार करना चाहिए। चौथी, हमें अपने मन पर नियंत्रण रखना चाहिए, वशी और वैरागी बनकर जीना चाहिए, ताकि हम मिथ्याचारों और चाटुकारिता से मुक्त रह सकें, ठीक जैसे कुटज और राजा जनक रहे।
प्र. कुटज क्या केवल जी रहा है, लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमज़ोरियों पर टिप्पणी की है?
उत्तर: लेखक यह प्रश्न उठाकर मानवीय कमज़ोरियों पर व्यंग्य करते हैं। मनुष्य अक्सर दूसरे के द्वार पर भीख माँगता है, कोई निकट आ जाए तो भय के मारे अधमरा हो जाता है, नीति और धर्म का उपदेश देता फिरता है, अपनी उन्नति के लिए अफ़सरों की चाटुकारिता करता है, दूसरों को अवमानित करने के लिए ग्रहों की खुशामद करता है, आत्मोन्नति के लिए नीलम-अंगूठियाँ धारण करता है, दाँत निपोरता है और बगलें झाँकता है। कुटज इन सब कमज़ोरियों से मुक्त है: “जीता है और शान से जीता है”; किस उद्देश्य से, “कोई नहीं जानता। मगर कुछ बड़ी बात है।” इस तरह लेखक कुटज के माध्यम से मनुष्य की स्वार्थपरता, भय और दिखावे पर करारा व्यंग्य करते हैं।
प्र. लेखक क्यों मानता है कि स्वार्थ से भी बढ़कर जिजीविषा से भी प्रचंड कोई न कोई शक्ति अवश्य है? उदाहरण सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर: याज्ञवल्क्य ऋषि ने अपनी पत्नी को समझाया था कि सब कुछ स्वार्थ के लिए ही प्रिय होता है, “आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति!” लेखक कहते हैं, “सुना है, पश्चिम के हॉब्स और हेल्वेशियस जैसे विचारकों ने भी ऐसी ही बात कही है।” लेखक कहते हैं कि यदि भीतर की जिजीविषा, जीते रहने की प्रचंड इच्छा ही, बड़ी बात हो, तो त्याग, परार्थ, देशोद्धार के नारे और साहित्य-कला की महिमा, सब झूठ ठहरेंगे; पर फिर वे इसका प्रतिवाद करते हैं। पर लेखक कहते हैं कि “अंतरतर से कोई कह रहा है, ऐसा सोचना गलत ढंग से सोचना है।” लेखक स्पष्ट करते हैं कि याज्ञवल्क्य ने जो बात धक्कामार ढंग से कही थी, वह अंतिम नहीं थी; वे ‘आत्मनः’ का अर्थ कुछ और बड़ा करना चाहते थे। व्यक्ति की आत्मा केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं, व्यापक है: “अपने में सब और सबमें आप”, यही समष्टि-बुद्धि है। जब तक यह समष्टि-बुद्धि न आए, तब तक पूर्ण सुख नहीं मिलता, और स्वयं को “सर्व” के लिए निछावर न करने तक स्वार्थ केवल खंड-सत्य (आधा-अधूरा सच) रहता है। इसीलिए लेखक मानते हैं कि स्वार्थ और जिजीविषा से भी बड़ी, समष्टि-बुद्धि से जुड़ी कोई शक्ति अवश्य है।
प्र. ‘कुटज’ पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि ‘दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं।’
उत्तर: लेखक के अनुसार “दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं।” सुखी वह है जिसका मन उसके अपने वश में है, दुखी वह है जिसका मन परवश (दूसरों के अधीन) है। परवश होने का अर्थ है खुशामद करना, दाँत निपोरना, चाटुकारिता करना, हाँ-हुज़ूरी करना। जिसका मन अपने वश में नहीं होता, वही दूसरे के मन का छंदावर्तन करता है (दूसरे की इच्छा के पीछे चलता है), अपने को छिपाने के लिए मिथ्या आडंबर रचता है, दूसरों को फँसाने के लिए जाल बिछाता है। कुटज इन सब मिथ्याचारों से मुक्त है, वह वशी है और वैरागी भी, ठीक राजा जनक की तरह, जो संसार में रहकर, सारे भोग भोगकर भी उनसे मुक्त थे। जनक कहते हैं, “नाहमात्मार्थमिच्छामि मनोनित्यं मनोन्तरे। मनो मे निर्जितं तस्मात् वशे तिष्ठति सर्वदा॥” अर्थात “मै स्वार्थ के लिए अपने मन को सदा दूसरे के मन में घुसाता नहीं फिरता, इसलिए मैं मन को जीत सका हूँ, उसे वश में कर सका हूँ”। इस तरह कुटज भी अपने मन पर सवारी करता है, मन को अपने पर सवार नहीं होने देता, जिससे सिद्ध होता है कि सुख-दुख बाहरी परिस्थिति से नहीं, बल्कि मन के नियंत्रण से तय होते हैं।
प्र. निम्नलिखित गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
(क) “कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़ें काफ़ी गहरी पैठी रहती हैं। ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतल गह्वर से अपना भोग्य खींच लाते हैं।”
व्याख्या: यह पंक्ति हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित निबंध ‘कुटज’ से ली गई है। लेखक शिवालिक की बंजर, पथरीली भूमि पर उगने वाले उन अनजान झाड़-झंखाड़ों की बात कर रहे हैं जो देखने में “बेहया” (बेशर्म-से, निर्लज्ज) लगते हैं, पर भीषण गर्मी और भूख-प्यास सहकर भी जीवित रहते हैं। लेखक कहते हैं कि ऐसे पौधों की जड़ें बाहर से दिखने में जितनी साधारण लगती हैं, भीतर से उतनी ही गहरी और मज़बूत होती हैं, जो कठोर पत्थर को भी चीरकर, अज्ञात गहराई से अपना जीवन-रस खींच लाती हैं। यह पंक्ति निबंध के आगे आने वाले संदेश की भूमिका बाँधती है: जो बाहर से मामूली या उपेक्षित दिखता है, उसकी भीतरी शक्ति असाधारण हो सकती है, ठीक जैसे कुटज खुद है।
(ख) “रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य। नाम उस पद को कहते हैं जिस पर समाज की मुहर लगी होती है। आधुनिक शिक्षित लोग जिसे ‘सोशल सैक्शन’ कहा करते हैं। मेरा मन नाम के लिए व्याकुल है, समाज द्वारा स्वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाणित, समष्टि-मानव की चित्त-गंगा में स्नात!”
व्याख्या: यह पंक्ति उस प्रसंग से ली गई है जहाँ लेखक कुटज का रूप पहचान लेते हैं, पर उसका नाम याद नहीं आता। लेखक स्पष्ट करते हैं कि रूप और नाम दो अलग तरह के सत्य हैं। रूप वह है जो आँखों के सामने है, अकेले व्यक्ति की पहचान है, इसलिए वह व्यक्ति-सत्य है। पर नाम को समाज की स्वीकृति चाहिए, इतिहास का प्रमाण चाहिए, इसलिए वह समाज-सत्य है। आधुनिक भाषा में इसी सामाजिक स्वीकृति को ‘सोशल सेक्शन’ कहा जाता है। लेखक का मन इसीलिए किसी काल्पनिक नाम से नहीं, बल्कि समाज द्वारा स्वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाणित नाम के लिए व्याकुल है, क्योंकि तभी उस वस्तु की पहचान पूरी होती है।
(ग) “रूप की तो बात ही क्या है! बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर कुपित यमराज के दारुण निःश्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है, दुर्जन के चित्त से भी अधिक कठोर पाषाण की कारा में रुद्ध अज्ञात जलस्रोत से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है।”
व्याख्या: यह पंक्ति कुटज के रूप की अपराजेय जीवनी-शक्ति के वर्णन से ली गई है। लेखक कहते हैं कि कुटज की सुंदरता देखते ही बनती है। चारों ओर यमराज के गुस्सैल निःश्वास जैसी धधकती लू में भी कुटज हरा-भरा बना रहता है। वह दुर्जन के हृदय से भी अधिक कठोर, पत्थर की जेल में बंद, किसी अज्ञात जलस्रोत से ज़बरदस्ती रस खींचकर अपने आप को सरस बनाए रखता है। इस पंक्ति के माध्यम से लेखक कुटज की उस असाधारण जिजीविषा को दर्शाते हैं जो सबसे प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हार नहीं मानती।
(घ) “हृदयेनापराजितः! कितना विशाल वह हृदय होगा जो सुख से, दुख से, प्रिय से, अप्रिय से विचलित न होता होगा! कुटज को देखकर रोमांच हो आता है। कहाँ से मिली है यह अकुतोभया वृत्ति, अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन दृष्टि!”
व्याख्या: यह पंक्ति भीष्म पितामह के शांतिपर्व वाले श्लोक “सुखं वा यदि वा दुःखं…” की व्याख्या करते हुए आई है। ‘हृदयेनापराजितः’ का अर्थ है हृदय से अपराजित, यानी सुख-दुख और प्रिय-अप्रिय से कभी विचलित न होने वाला हृदय। लेखक कुटज को देखकर चकित होते हैं कि इतना छोटा-सा पौधा भी यह अकुतोभया वृत्ति (निर्भय स्वभाव), अपराजित स्वभाव और अविचल जीवन-दृष्टि कैसे रखता है। लेखक पूछते हैं, “कहाँ से मिली है यह अकुतोभया वृत्ति”; यह प्रश्न कुटज के प्रति उनके गहरे सम्मान और आश्चर्य को प्रकट करता है।
2 योग्यता-विस्तार
योग्यता-विस्तार के कार्य 1 और 5 गतिविधियाँ हैं, इनका कोई एक निश्चित उत्तर नहीं है, इसलिए उनके लिए संक्षिप्त दिशा-निर्देश दिया गया है। कार्य 2, 3 और 4 के उत्तर पाठ के आधार पर दिए गए हैं।
प्र. ‘कुटज’ की तर्ज पर किसी जंगली फूल पर लेख अथवा कविता लिखने का प्रयास कीजिए।
दिशा-निर्देश: अपने आसपास उगने वाला कोई जंगली फूल चुनिए (जैसे आक, धतूरा, कनेर या पलाश)। पहले उसका रूप बताइए (पत्ते, फूल, रंग), फिर यह कि वह किन कठिन परिस्थितियों में उगता है, और अंत में उससे मनुष्य के लिए कौन-सी सीख मिलती है। जैसे लेखक ने कुटज से बात की है, वैसे ही आप भी अपने फूल को सीधे संबोधित कर सकते हैं।
प्र. लेखक ने ‘कुटज’ को ही क्यों चुना? उसको अपनी रचना के लिए जंगल में पेड़-पौधे तथा फूलों-वनस्पतियों की कोई कमी नहीं थी।
उत्तर: लेखक ने कुटज को इसलिए चुना क्योंकि उसमें न विशेष सौंदर्य है, न सुगंध, फिर भी वह शिवालिक की सूखी, नीरस, पथरीली पहाड़ियों पर, धधकती लू में भी हरा-भरा और फूलों से लदा रहता है। “कठोर पाषाण की कारा में रुद्ध अज्ञात जलस्रोत से बरबस रस खींचकर” वह सरस बना रहता है। उसमें अपराजेय जीवनी-शक्ति, स्वावलंबन और आत्मविश्वास है। वह कवियों द्वारा अवमानित रहा है, फिर भी उसका नाम हज़ारों वर्ष से जीवित है। वह किसी के द्वार पर भीख नहीं माँगता, खुशामद नहीं करता, शान से जीता है। इसीलिए कुटज के माध्यम से लेखक यह जता सके कि सामान्य से सामान्य वस्तु में भी विशेष गुण हो सकते हैं। (पाठ्यपुस्तक के अनुसार यही जताना इस निबंध का अभीष्ट है; पाठ अन्य फूलों से कोई तुलना नहीं करता।)
प्र. कुटज के बारे में उसकी विशेषताओं को बताने वाले दस वाक्य पाठ से छाँटिए और उनकी मानवीय संदर्भ में विवेचना कीजिए।
उत्तर: पाठ के दस वाक्य और उनका मानवीय संदर्भ:
- “फूलों से तो ऐसा लदा है कि कुछ पूछिए नहीं।” (कठिन परिस्थिति में भी जीवन से भरपूर रहना)
- “धन्य हो कुटज, तुम ‘गाढ़े के साथी’ हो।” (संकट के समय काम आने वाला मित्र)
- “यह जो मेरे सामने कुटज का लहराता पौधा खड़ा है वह नाम और रूप दोनों में अपनी अपराजेय जीवनी शक्ति की घोषणा कर रहा है।” (हार न मानने वाला मनुष्य)
- “चारों ओर कुपित यमराज के दारुण निःश्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है।” (विपत्ति में भी प्रसन्न रहना)
- “मूर्ख के मस्तिष्क से भी अधिक सूने गिरि कांतार में भी ऐसा मस्त बना है कि ईर्ष्या होती है।” (अकेलेपन में भी मस्ती)
- “वह दूसरे के द्वार पर भीख माँगने नहीं जाता।” (स्वावलंबन)
- “कोई निकट आ गया तो भय के मारे अधमरा नहीं हो जाता।” (निर्भयता)
- “अपनी उन्नति के लिए अफ़सरों का जूता नहीं चाटता फिरता।” (स्वाभिमान, चाटुकारिता से दूर रहना)
- “जीता है और शान से जीता है।” (आत्मसम्मान से जीना)
- “कुटज अपने मन पर सवारी करता है, मन को अपने पर सवार नहीं होने देता।” (मन पर नियंत्रण, वशी होना)
इन वाक्यों से पता चलता है कि कुटज के गुण वही हैं जो एक आदर्श मनुष्य में होने चाहिए: कठिनाई में न हारना, दूसरों पर निर्भर न रहना, डर और खुशामद से दूर रहना, और अपने मन को वश में रखना।
प्र. ‘जीना भी एक कला है’, कुटज के आधार पर सिद्ध कीजिए।
उत्तर: लेखक कहते हैं, “जीना भी एक कला है। लेकिन कला ही नहीं, तपस्या है।” कुटज इस कला का सबसे अच्छा उदाहरण है। वह शिवालिक की सूखी, कठोर चट्टानों के बीच उगता है, जहाँ दूब तक सूख जाती है, फिर भी वह हरा-भरा और फूलों से लदा रहता है। उसका उपदेश है: “कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य संग्रह करो; वायुमंडल को चूसकर, झंझा-तूफान को रगड़कर, अपना प्राप्य वसूल लो; आकाश को चूमकर अवकाश की लहरी में झूमकर उल्लास खींच लो।” यानी जीने के लिए अपना हिस्सा स्वयं संघर्ष करके पाना पड़ता है। कुटज सुख-दुख, प्रिय-अप्रिय को समान भाव से, “हृदय से अपराजित होकर” ग्रहण करता है। वह किसी की खुशामद नहीं करता, मन को वश में रखता है। लेखक के शब्दों में, “जियो तो प्राण ढाल दो ज़िंदगी में, मन ढाल दो जीवनरस के उपकरणों में!” इस प्रकार कुटज सिद्ध करता है कि जीना एक कला है, जिसे साधना और तपस्या से सीखना पड़ता है।
प्र. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् द्वारा पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी पर बनाई फ़िल्म देखिए।
दिशा-निर्देश: यह फ़िल्म देखकर द्विवेदी जी के जीवन की प्रमुख घटनाओं (शांति निकेतन, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, साहित्य अकादमी पुरस्कार) और उनकी प्रमुख रचनाओं की एक छोटी सूची बनाइए, और उसे पाठ के आरंभ में दिए लेखक-परिचय से मिलाइए।