कक्षा 12 हिंदी, अंतरा भाग 2, अध्याय 17 (कुटज, हजारी प्रसाद द्विवेदी) का त्वरित पुनरीक्षण। मुख्य परिभाषाएँ, सभी 22 शब्दार्थ और प्रमुख नामित व्यक्ति एक ही जगह। पहले पूरे नोट्स पढ़ें, फिर परीक्षा से पहले यह पढ़ें।
1 लेखक-परिचय एक नज़र में
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| जन्म | सन् 1907, गाँव आरत दुबे का छपरा, ज़िला बलिया (उ.प्र.); निधन 1979 |
| शिक्षा | संस्कृत महाविद्यालय काशी से शास्त्री; 1930 में ज्योतिषाचार्य |
| शांति निकेतन | 1940-50 हिंदी भवन के निदेशक; टैगोर व क्षितिमोहन सेन का सान्निध्य |
| काशी हिंदू वि.वि. | 1950 से हिंदी विभाग अध्यक्ष; 1967 में रेक्टर |
| अन्य पद | 1955 प्रथम राजभाषा आयोग सदस्य; 1960-67 पंजाब विश्वविद्यालय विभागाध्यक्ष |
| सम्मान | साहित्य अकादमी पुरस्कार (आलोक पर्व), डी.लिट् (लखनऊ वि.), पद्मभूषण |
| निबंध-संकलन | अशोक के फूल, विचार और वितर्क, कल्पलता, कुटज, आलोक पर्व |
| उपन्यास | चारूचंद्रलेख, बाणभट्ट की आत्मकथा, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा |
| भाषा-शैली | सरल, प्रांजल; व्यक्तित्व-व्यंजकता, आत्मपरकता, व्यंग्य का पुट |
2 पाठ-परिचय
- कुटज हिमालय की सूखी शिलाओं पर उगने वाला एक जंगली, फूलदार पौधा है
- पुस्तक के अनुसार कुटज में न विशेष सौंदर्य है, न सुगंध, फिर भी उसमें अपराजेय जीवनशक्ति, स्वावलंबन, आत्मविश्वास और विषम परिस्थितियों में शान से जीने की क्षमता है
- निबंध का अभीष्ट: सामान्य से सामान्य वस्तु में भी विशेष गुण हो सकते हैं
3 परिभाषाएँ
परिभाषाएँ
रूप-नामरूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य; नाम वह पद है जिस पर समाज की मुहर लगी हो (सोशल सेक्शन)
समष्टि-बुद्धि“अपने में सब और सबमें आप”, व्यक्ति की आत्मा को केवल स्वयं तक सीमित न मानना
वशीजिसका मन उसके अपने वश में है, आत्म-नियंत्रित
परवशजिसका मन दूसरों के अधीन है, यानी खुशामद, चाटुकारिता में जीने वाला
वैरागीसंसार में रहकर भी भोगों से मुक्त, राजा जनक की तरह
खंड-सत्यस्वार्थ, जब तक स्वयं को “सर्व” के लिए निछावर न किया जाए, तब तक आधा-अधूरा सच
हृदयेनापराजितःहृदय से अपराजित, सुख-दुख और प्रिय-अप्रिय से कभी विचलित न होने वाला
4 निबंध का सार, क्रम में
भौगोलिक पृष्ठभूमिहिमालय (कालिदास के अनुसार “पृथ्वी का मानदंड”), पाद-देश में शिवालिक शृंखला, नाम शिव के जटाजूट के निचले हिस्से से जुड़ा हो सकता है (लेखक: “लगता तो ऐसा ही है”)
बंजर भूमिकाली चट्टानें, सूखी दूब, रक्ताभ रेत; “बेहया-से” पेड़ भीषण गर्मी सहकर भी “सिर्फ़ जी ही नहीं रहे हैं, हँस भी रहे हैं”
रूप-नाम बहसकुटज का रूप पहचानना पर नाम भूल जाना; काल्पनिक नाम सोचना; अचानक याद आना “यह तो कुटज है!”
व्युत्पत्तिकुटज बनाम कूटज (गिरिकूट पर उगना); कुट = घड़ा/घर; कुटिहारिका, कुटकारिका, कुटनी, कुट्टनी; ‘कुटिया’/’कुटीर’ “कदाचित्” इसी से संबद्ध; घड़े से जन्म की व्युत्पत्ति पर लेखक का संदेह (“घड़े में पैदा होने का तो कोई तुक नहीं है”)
भाषिक मूललेखक को संदेह कि ‘कुटज’ आर्यभाषाओं का शब्द है भी या नहीं; सिलवाँ लेवी: संस्कृत के फूल-वृक्ष-बागबानी के अधिकांश शब्द आग्नेय भाषा-परिवार (आस्ट्रो-एशियाटिक → आग्नेय-परिवार → कोल-परिवार) के हैं; “संस्कृत सर्वग्रासी भाषा है”
अपराजेय जीवनी-शक्तिनाम हज़ारों वर्षों से जीवित; रूप प्रचंड लू में भी हरा-भरा; कालिदास-रामगिरि-यक्ष-मेघ प्रसंग में कुटज पुष्पों की अंजलि
कुटज का उपदेश“कठोर पाषाण को भेदकर… आकाश को चूमकर उल्लास खींच लो”; श्लोक “भित्त्वा पाषाणपिठरं…”
याज्ञवल्क्य-प्रसंग“आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति” (स्वार्थ-सिद्धांत; “सुना है”, हॉब्स और हेल्वेशियस जैसे विचारकों ने भी ऐसी बात कही); लेखक का प्रतिवाद: याज्ञवल्क्य “आत्मनः” का अर्थ कुछ और बड़ा करना चाहते थे, यानी समष्टि-बुद्धि
कुटज की मुक्तिभीख नहीं माँगता, चाटुकारिता नहीं करता; भीष्म पितामह-शांतिपर्व श्लोक, हृदयेनापराजितः
वशी-वैरागीराजा जनक जैसा, श्लोक “नाहमात्मार्थम्…”; समापन: “कुटज अपने मन पर सवारी करता है”
रहीम का दोहा“वे रहीम अब बिरछ कहँ…”, कुटज को अनादर से “बिरछ” कहना; लेखक का प्रतिवाद
5 नामित तथ्य: उद्धरण और वक्ता
| व्यक्ति/स्रोत | उद्धरण/संदर्भ |
|---|---|
| कालिदास | हिमालय को “पृथ्वी का मानदंड” कहना; रामगिरि-यक्ष-मेघ प्रसंग में कुटज पुष्पों की अंजलि |
| सिलवाँ लेवी | लेखक द्वारा उद्धृत विद्वान; मत: संस्कृत में फूलों, वृक्षों और खेत-बागबानी के अधिकांश शब्द आग्नेय भाषा-परिवार के हैं |
| याज्ञवल्क्य | “आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति” (स्वार्थ-सिद्धांत) |
| हॉब्स और हेल्वेशियस | पश्चिमी विचारक; लेखक कहते हैं “सुना है” कि इन्होंने भी ऐसी ही (स्वार्थ वाली) बात कही है |
| भीष्म पितामह | “सुखं वा यदि वा दुःखं… हृदयेनापराजितः”, शांतिपर्व (महाभारत) |
| राजा जनक | “नाहमात्मार्थमिच्छामि मनोनित्यं…”, वशी होने का उदाहरण |
| रहीम | “वे रहीम अब बिरछ कहँ…”, कुटज को अनादर से बिरछ कहना |
| अगस्त्य मुनि | ‘कुटज’ कहे जाते हैं (कुट = घड़ा, घड़े से उत्पन्न होने की कथा); लेखक: “घड़े से तो क्या उत्पन्न हुए होंगे। कोई और बात होगी।” |
| नारद जी | “अगस्त्य मुनि भी नारद जी की तरह दासी के पुत्र थे क्या?” (लेखक का प्रश्न, उत्तर नहीं) |
6 शब्दार्थ (सभी 22 शब्द)
शब्दार्थ
अंतर्निरुद्धभीतरी रुकावट
गह्वरगहरा, गड्ढा
द्वंद्वातीतद्वंद्व से परे
मदोद्धतानशे या गर्व से चूर
विजितातपाधूप को दूर करने वाली
अकुतोभयजिसे कहीं या किसी से भय न हो
अवमानितअपमानित, तिरस्कृत
विरुदकीर्ति-गाथा, प्रशंसासूचक पदवी
स्तबकगुच्छा, फूलों का गुच्छा
लोलचंचल, हिलता-डोलता
फकतअकेला, केवल, एकमात्र
अनत्युच्चजो बहुत ऊँचा न हो
अविच्छेद्यविच्छेद रहित
स्फीयमानफैलता हुआ, विस्तृत, व्यापक
मूर्धामस्तक, सिर
दुरंतजिसका पार पाना कठिन हो, प्रबल
कार्पण्यकृपणता, कंजूसी
उपहतचोट खाया हुआ, घायल, नष्ट
निपोरनाखुशामद करना, दिखाना
अवधूतविरक्त, संन्यासी
नितरांबहुत अधिक
मिथ्याचारझूठा आचरण
परीक्षा से ठीक पहले दोहराएँ
- “रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य” (प्रश्न-अभ्यास 10 ख)
- कुटज का उपदेश-श्लोक: “भित्त्वा पाषाणपिठरं छित्त्वा प्राभञ्जनी व्यथाम्…”
- लेखक के अनुसार याज्ञवल्क्य “आत्मनः” का अर्थ कुछ और बड़ा करना चाहते थे: “अपने में सब और सबमें आप” (समष्टि-बुद्धि)
- भीष्म पितामह का श्लोक महाभारत के शांतिपर्व से है, “हृदयेनापराजितः” का अर्थ याद रखें
- कालिदास ने कुटज को आदर दिया, रहीम ने अनादर से “बिरछ” कहा
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