कक्षा 12 हिंदी अंतरा भाग 2 अध्याय 17 कुटज महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म कब और कहाँ हुआ?

उत्तर: हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म सन् 1907 में गाँव आरत दुबे का छपरा, ज़िला बलिया (उत्तर प्रदेश) में हुआ।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. द्विवेदी जी को कौन-कौन से सम्मान मिले?

उत्तर: द्विवेदी जी को ‘आलोक पर्व’ पुस्तक पर साहित्य अकादमी पुरस्कार, लखनऊ विश्वविद्यालय से डी.लिट् की मानद उपाधि और भारत सरकार से पद्मभूषण मिला।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. द्विवेदी जी के किन्हीं दो निबंध-संकलनों के नाम लिखिए।

उत्तर: अशोक के फूल और आलोक पर्व द्विवेदी जी के प्रमुख निबंध-संकलन हैं।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. पाठ के आरंभ में दिए परिचय के अनुसार कुटज में कौन-कौन से गुण हैं?

उत्तर: परिचय के अनुसार कुटज में अपराजेय जीवनशक्ति, स्वावलंबन, आत्मविश्वास, विषम परिस्थितियों में भी शान से जीने की क्षमता, और समान भाव से सभी परिस्थितियों को स्वीकारने का गुण है।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. ‘सोशल सेक्शन’ शब्द का निबंध में क्या अर्थ बताया गया है?

उत्तर: ‘सोशल सेक्शन’ का अर्थ है समाज की स्वीकृति, यानी वह पद जिस पर समाज की मुहर लगी हो।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. ‘कुट’ शब्द के दो अर्थ क्या हैं?

उत्तर: ‘कुट’ का अर्थ घड़ा भी है और घर भी।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. सिलवाँ लेवी कौन थे?

उत्तर: सिलवाँ लेवी एक विद्वान हैं जिनका मत लेखक ने उद्धृत किया है: उनके अनुसार संस्कृत में फूलों, वृक्षों और खेत-बागबानी से जुड़े अधिकांश शब्द आग्नेय भाषा-परिवार के हैं।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. ‘जीना चाहते हो?’ से शुरू होने वाले गद्य-उपदेश का अंतिम वाक्य (शब्दशः) लिखिए।

उत्तर: ‘आकाश को चूमकर अवकाश की लहरी में झूमकर उल्लास खींच लो।’

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. द्विवेदी जी की भाषा-शैली की क्या विशेषताएँ हैं?

उत्तर: द्विवेदी जी की भाषा सरल और प्रांजल है। व्यक्तित्व-व्यंजकता और आत्मपरकता उनकी शैली की विशेषता है। भाषा-शैली की दृष्टि से उन्होंने हिंदी की गद्य शैली को एक नया रूप दिया। व्यंग्य के प्रयोग ने उनके निबंधों पर पांडित्य का बोझ हावी नहीं होने दिया।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. इस निबंध का उद्देश्य क्या है?

उत्तर: निबंध का उद्देश्य यह जताना है कि सामान्य से सामान्य वस्तु में भी विशेष गुण हो सकते हैं। कुटज में न विशेष सौंदर्य है, न सुगंध, फिर भी उसमें लेखक ने अपराजेय जीवनशक्ति, स्वावलंबन और आत्मविश्वास का संदेश पाया।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. शिवालिक नाम के बारे में लेखक की क्या कल्पना है?

उत्तर: लेखक प्रश्न उठाते हैं कि ‘शिवालिक’ कहीं शिव के जटाजूट का निचला हिस्सा तो नहीं है, और कहते हैं, ‘लगता तो ऐसा ही है।’ वे कहते हैं कि शिव की लटियायी जटा ही इतनी सूखी, नीरस और कठोर हो सकती है। यह लेखक का अनुमान है, कोई निश्चित दावा नहीं।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. लेखक ने कुटज के लिए कौन-कौन से काल्पनिक नाम सोचे?

उत्तर: लेखक ने सुंदरता-सूचक नाम (जैसे सुस्मिता, गिरिकांता, वनप्रभा, शुभ्रकिरीटिनी) और पौरुष-सूचक नाम (जैसे अकुतोभय, गिरिगौरव, अपराजित, धरतीधकेल, पहाड़फोड़) दोनों तरह के काल्पनिक नाम सोचे, पर किसी से संतुष्ट नहीं हुए।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. ‘कुटनी’ शब्द की व्युत्पत्ति समझाइए।

उत्तर: ‘कुट’ का अर्थ घड़ा या घर है। घर में काम करने वाली दासी को ‘कुटिहारिका’ या ‘कुटकारिका’ कहा जाता था। लेखक के अनुसार एक ज़रा गलत ढंग की दासी ‘कुटनी’ भी कही जा सकती है, और संस्कृत में उसकी गलतियों को थोड़ा अधिक मुखर बनाने के लिए उसे ‘कुट्टनी’ कह दिया गया।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. भाषा-परिवार को समय के साथ कौन-कौन से नाम दिए गए?

उत्तर: इस भाषा-परिवार को पहले ‘आस्ट्रो-एशियाटिक’ कहा गया, फिर दक्षिण-पूर्व/अग्निकोण की भाषा होने के कारण ‘आग्नेय-परिवार’, और अब भारतीय जनता के वर्ग-विशेष को ध्यान में रखकर और पुराने साहित्य का स्मरण करके इसे ‘कोल-परिवार’ की भाषा कहा जाने लगा है। (यह भाषा संथाल, मुंडा आदि अनेक भारतीय जातियाँ बोलती हैं।)

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. कुटज नाम की अपराजेय जीवनी-शक्ति कैसे दिखाई गई है?

उत्तर: कुटज नाम हज़ारों वर्षों से जीवित है, जबकि कितने ही अन्य नाम आए और मिट गए, दुनिया उन्हें भूल गई। पर कुटज संस्कृत की निरंतर बढ़ती शब्दराशि में जमकर बैठा हुआ है, यही उसके नाम की अपराजेय जीवनी-शक्ति है।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. याज्ञवल्क्य ने अपनी पत्नी को क्या समझाया था, और लेखक इससे शुरू में क्या निष्कर्ष निकालते हैं?

उत्तर: याज्ञवल्क्य ने अपनी पत्नी को समझाया कि सब कुछ स्वार्थ के लिए ही प्रिय होता है, पुत्र के लिए पुत्र नहीं बल्कि स्वयं के लिए पुत्र प्रिय होता है। लेखक कहते हैं कि यदि भीतर की जिजीविषा, जीते रहने की प्रचंड इच्छा ही, बड़ी बात हो, तो त्याग, परार्थ, देशोद्धार और साहित्य-कला की महिमा जैसी बड़ी बातें झूठ ठहरेंगी; पर फिर “अंतरतर से कोई कह रहा है, ऐसा सोचना गलत ढंग से सोचना है”, और वे इसका प्रतिवाद करते हैं।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. ‘रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य’ पंक्ति का विस्तार से अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: लेखक के अनुसार ‘रूप’ वह है जो हमारी आँखों के सामने है, जिसे व्यक्ति स्वयं पहचान सकता है, इसलिए वह व्यक्ति-सत्य है। पर ‘नाम’ अकेले व्यक्ति की पहचान से नहीं बनता, उसे समाज की स्वीकृति चाहिए, इतिहास का प्रमाण चाहिए, इसीलिए वह समाज-सत्य है। आधुनिक शिक्षित लोग इसे ‘सोशल सेक्शन’ कहते हैं। लेखक बताते हैं कि नाम इसलिए बड़ा नहीं होता कि वह नाम है, बल्कि इसलिए बड़ा होता है कि समाज ने उसे स्वीकार किया है। इसीलिए अकेला रूप पहचानना काफ़ी नहीं, जब तक नाम याद न आए, पहचान अधूरी रहती है।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. ‘कुट’, ‘कुटज’ और ‘कुटनी’ शब्दों के आपसी संबंध को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: ‘कुटज’ अर्थात जो कुट से पैदा हुआ हो, और ‘कुट’ घड़े को भी कहते हैं, घर को भी। घड़े से उत्पन्न होने के कारण प्रतापी अगस्त्य मुनि भी ‘कुटज’ कहे जाते हैं, पर लेखक कहते हैं, “घड़े से तो क्या उत्पन्न हुए होंगे। कोई और बात होगी।” संस्कृत में ‘कुटिहारिका’ और ‘कुटकारिका’ दासी को कहते हैं; लेखक के अनुसार ‘कुट’ का अर्थ घर हो, तो घर में काम-काज करने वाली दासी कुटकारिका और कुटहारिका कही ही जा सकती है। एक ज़रा गलत ढंग की दासी ‘कुटनी’ भी कही जा सकती है, और संस्कृत में उसकी गलतियों को थोड़ा अधिक मुखर बनाने के लिए उसे ‘कुट्टनी’ कह दिया गया। लेखक ‘कुटिया’/’कुटीर’ से संबंध को केवल ‘कदाचित्’ मानते हैं, घड़े से जन्म की व्युत्पत्ति को ‘तुक’ का न मानकर उस पर संदेह करते हैं (“घड़े में पैदा होने का तो कोई तुक नहीं है”), और यह भी संदेह जताते हैं कि यह शब्द आर्यभाषाओं का है भी या नहीं। इस तरह वे इन शब्दों का संबंध विचार के रूप में रखते हैं, कोई पक्का निष्कर्ष नहीं देते।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. कुटज किस प्रकार अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा करता है?

उत्तर: कुटज अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा दो तरह से करता है, नाम में और रूप में। नाम में: कुटज नाम हज़ारों वर्षों से जीवित है, जबकि अनेक अन्य नाम आकर मिट गए। रूप में: कुपित यमराज जैसी धधकती लू में भी कुटज हरा-भरा रहता है, कठोर पाषाण से भी रस खींचकर सरस बना रहता है, और सूने पहाड़ी जंगल में भी इतना मस्त रहता है कि देखकर ईर्ष्या होती है। इस तरह नाम और रूप, दोनों में उसकी जीवनी-शक्ति अपराजेय सिद्ध होती है।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. ‘कुटज का उपदेश’ शब्दशः लिखिए। इसका क्या अर्थ है?

उत्तर: कुटज का उपदेश है: ‘जीना चाहते हो? कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य संग्रह करो; वायुमंडल को चूसकर, झंझा-तूफ़ान को रगड़कर, अपना प्राप्य वसूल लो; आकाश को चूमकर अवकाश की लहरी में झूमकर उल्लास खींच लो।’ इसका अर्थ है कि जीने के लिए कठिनाई से डरकर बैठना नहीं चाहिए। जीवन का रस स्वयं अपने बलबूते, कठिन परिस्थितियों को चीरकर निकालना चाहिए, और फिर उस संघर्ष के बाद मिली ऊँचाई का उल्लास भी मनाना चाहिए। यह एक तपस्या के समान कठिन पर आवश्यक जीवन-दृष्टि है।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. लेखक याज्ञवल्क्य के ‘आत्मनः’ शब्द का व्यापक अर्थ किस प्रकार स्पष्ट करते हैं?

उत्तर: याज्ञवल्क्य ने कहा था कि सब कुछ स्वार्थ के लिए प्रिय होता है, जो सुनने में संकुचित स्वार्थ जैसा लगता है। पर लेखक स्पष्ट करते हैं कि याज्ञवल्क्य ने जो बात धक्कामार ढंग से कही थी, वह अंतिम नहीं थी; वे ‘आत्मनः’ का अर्थ कुछ और बड़ा करना चाहते थे। व्यक्ति की आत्मा केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं, वह व्यापक है: ‘अपने में सब और सबमें आप।’ यही समष्टि-बुद्धि है, और जब तक यह समष्टि-बुद्धि न आए, तब तक पूर्ण सुख का आनंद भी नहीं मिलता। जब तक स्वयं को ‘सर्व’ के लिए निछावर न किया जाए, तब तक स्वार्थ केवल खंड-सत्य (आधा-अधूरा सच) है।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. कुटज क्या केवल जी रहा है? लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमज़ोरियों पर टिप्पणी की है?

उत्तर: लेखक यह प्रश्न उठाकर मानवीय कमज़ोरियों पर व्यंग्य करते हैं: मनुष्य अक्सर भीख माँगता है, डर के मारे अधमरा हो जाता है, नीति-धर्म का उपदेश देता फिरता है, अपनी उन्नति के लिए अफ़सरों की चाटुकारिता करता है, ग्रहों की खुशामद करता है, नीलम-अंगूठियाँ धारण करता है, दाँत निपोरता है और बगलें झाँकता है। कुटज इन सब कमज़ोरियों से मुक्त है, वह “जीता है और शान से जीता है”; किस उद्देश्य से, “कोई नहीं जानता। मगर कुछ बड़ी बात है।” इस तरह लेखक कुटज के माध्यम से मनुष्य की स्वार्थपरता और दिखावे पर टिप्पणी करते हैं।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. भीष्म पितामह के श्लोक और ‘हृदयेनापराजितः’ शब्द का निबंध में क्या महत्त्व है, विस्तार से समझाइए।

उत्तर: लेखक कहते हैं कि कुटज मानो भीष्म पितामह की तरह, एक अवधूत की भाषा में यह कह रहा है: सुख हो या दुख, प्रिय हो या अप्रिय, जो मिले उसे शान से, हृदय से अपराजित होकर ग्रहण करो, हार मत मानो। इसी भाव को शांतिपर्व (महाभारत) का श्लोक व्यक्त करता है: ‘सुखं वा यदि वा दुःखं प्रियं वा यदि वाऽप्रियम्। प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः॥’ ‘हृदयेनापराजितः’ का अर्थ है हृदय से अपराजित, यानी सुख-दुख और प्रिय-अप्रिय से कभी विचलित न होने वाला विशाल हृदय। लेखक कुटज को देखकर इसी अकुतोभया वृत्ति, अपराजित स्वभाव और अविचल जीवन-दृष्टि का अनुभव करते हैं, और रोमांचित होकर पूछते हैं कि यह वृत्ति कहाँ से मिली है। यहाँ जीवन को समभाव से जीने की सीख सीधे कुटज के आचरण से जोड़ी गई है।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. ‘कुटज’ पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि ‘दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं।’

उत्तर: लेखक बताते हैं कि “दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं।” सुखी वह है जिसका मन उसके अपने वश में है, दुखी वह है जिसका मन परवश (दूसरों के अधीन) है। परवश होने का अर्थ है खुशामद करना, दाँत निपोरना, चाटुकारिता करना। जिसका मन अपने वश में नहीं होता, वही दूसरे के मन का छंदावर्तन करता है (दूसरे की इच्छा के पीछे चलता है), अपने को छिपाने के लिए मिथ्या आडंबर रचता है, दूसरों को फँसाने के लिए जाल बिछाता है। कुटज इन सब मिथ्याचारों से मुक्त है, वह वशी है, यानी आत्म-नियंत्रित है, और वैरागी भी है, यानी विरक्त है। ठीक राजा जनक की तरह, जो संसार में रहकर, सारे भोग भोगकर भी उनसे मुक्त थे। जनक कहते हैं: ‘नाहमात्मार्थमिच्छामि मनोनित्यं मनोन्तरे। मनो मे निर्जितं तस्मात् वशे तिष्ठति सर्वदा॥’ अर्थात “मै स्वार्थ के लिए अपने मन को सदा दूसरे के मन में घुसाता नहीं फिरता, इसलिए मैं मन को जीत सका हूँ, उसे वश में कर सका हूँ”। इस तरह कुटज भी अपने मन पर सवारी करता है, मन को अपने पर सवार नहीं होने देता, जिससे सिद्ध होता है कि सुख-दुख बाहरी परिस्थिति से नहीं, बल्कि मन के नियंत्रण से तय होते हैं।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. ‘कुटज’ निबंध के माध्यम से लेखक जीवन के बारे में कौन-सी बड़ी सीख देना चाहते हैं? विस्तार से समझाइए।

उत्तर: ‘कुटज’ निबंध के माध्यम से लेखक कई परस्पर जुड़ी सीखें देते हैं। पहली, सामान्य से सामान्य वस्तु में भी विशेष गुण हो सकते हैं, कुटज में न सौंदर्य है न सुगंध, फिर भी उसमें अपराजेय जीवनशक्ति और स्वावलंबन है। दूसरी, लेखक रूप और नाम के भेद पर विचार करते हैं: रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य। तीसरी, जीना एक कला ही नहीं, एक तपस्या है, कठिनाइयों को चीरकर अपने बलबूते जीवन-रस निकालना पड़ता है, जैसा कुटज के उपदेश-श्लोक में कहा गया है। चौथी, याज्ञवल्क्य के हवाले से लेखक बताते हैं कि स्वार्थ खंड-सत्य है, बल्कि समष्टि-बुद्धि, ‘अपने में सब और सबमें आप’, ही पूर्ण सुख देती है। पाँचवीं, दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं, इसलिए हृदय से अपराजित रहकर, वशी और वैरागी बनकर जीना ही असली जीवन-दृष्टि है, जैसा राजा जनक और कुटज दोनों दिखाते हैं। इस तरह निबंध एक छोटे, उपेक्षित पौधे के बहाने आत्मनिर्भरता, समभाव और आत्म-नियंत्रण की गहरी दार्शनिक सीख देता है।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
शिवालिक की सूखी, बंजर पहाड़ियों पर काली-काली चट्टानें हैं, दूब तक सूख चुकी है, और बीच-बीच में रक्ताभ रेत फैली है। हरियाली के नाम पर सिर्फ़ कुछ अनजान झाड़-झंखाड़ और ‘बेहया-से’ पेड़ हैं, जो भीषण गर्मी और लगातार भूख-प्यास सहकर भी न सिर्फ़ जी रहे हैं, बल्कि हँस भी रहे हैं। इन्हीं में एक छोटा-सा, बहुत ही ठिगना पेड़ है, चौड़ी पत्तियों वाला, फूलों से लदा हुआ, मानो मुसकुरा रहा हो।

(क) 1 अंक शिवालिक की भूमि कैसी है?
उत्तर: शिवालिक की भूमि सूखी और बंजर है, वहाँ काली चट्टानें, सूखी दूब और रक्ताभ रेत है।

(ख) 2 अंक इस बंजर भूमि पर कौन-से पेड़ मिलते हैं, और वे कैसे जी रहे हैं?
उत्तर: यहाँ कुछ अनजान झाड़-झंखाड़ और ‘बेहया-से’ पेड़ मिलते हैं, जो भीषण गर्मी और लगातार भूख-प्यास सहकर भी न सिर्फ़ जी रहे हैं, बल्कि हँस भी रहे हैं।

(ग) 3 अंक इस दृश्य का निबंध के केंद्रीय विषय (कुटज) से क्या संबंध है?
उत्तर: यह दृश्य कुटज के परिचय की पृष्ठभूमि तैयार करता है। जिस बंजर भूमि में सामान्य पेड़ भी बड़ी कठिनाई से जीते हैं, ठीक उसी भूमि में कुटज न सिर्फ़ जीता है, बल्कि फूलों से लदा, मुसकुराता हुआ खड़ा है। इस विरोधाभास से कुटज की अपराजेय जीवनशक्ति और स्वावलंबन उभरते हैं। पाठ के परिचय के अनुसार निबंध का अभीष्ट यह जताना है कि सामान्य से सामान्य वस्तु में भी विशेष गुण हो सकते हैं।

केस स्टडी
अपने आपको दलित द्राक्षा की भाँति निचोड़कर जब तक ‘सर्व’ के लिए निछावर नहीं कर दिया जाता तब तक ‘स्वार्थ’ खंड-सत्य है, वह मोह को बढ़ावा देता है, तृष्णा को उत्पन्न करता है और मनुष्य को दयनीय-कृपण बना देता है। कार्पण्य दोष से जिसका स्वभाव उपहत हो गया है, उसकी दृष्टि म्लान हो जाती है। वह स्पष्ट नहीं देख पाता। वह स्वार्थ भी नहीं समझ पाता, परमार्थ तो दूर की बात है।

(क) 1 अंक लेखक के अनुसार स्वार्थ किस स्थिति तक ‘खंड-सत्य’ रहता है?
उत्तर: जब तक स्वयं को ‘सर्व’ (सबके) के लिए निछावर नहीं किया जाता, तब तक स्वार्थ खंड-सत्य (आधा-अधूरा सच) रहता है।

(ख) 2 अंक स्वार्थ में बने रहने के क्या दुष्परिणाम बताए गए हैं?
उत्तर: स्वार्थ मोह को बढ़ावा देता है, तृष्णा को उत्पन्न करता है, और मनुष्य को दयनीय-कृपण (तरस खाने योग्य कंजूस) बना देता है। कार्पण्य दोष से स्वभाव उपहत (नष्ट) हो जाता है और दृष्टि म्लान हो जाती है।

(ग) 3 अंक यह गद्यांश निबंध की समष्टि-बुद्धि वाली अवधारणा से किस प्रकार जुड़ा है?
उत्तर: यह गद्यांश सीधे उस तर्क को आगे बढ़ाता है जो याज्ञवल्क्य के ‘आत्मनः’ शब्द की व्याख्या से शुरू होता है: व्यक्ति की आत्मा केवल स्वयं तक सीमित नहीं, वह व्यापक (समष्टि-बुद्धि) है। जब तक कोई इस व्यापक दृष्टि तक नहीं पहुँचता और केवल संकुचित स्वार्थ में उलझा रहता है, तब तक वह न स्वार्थ को ठीक से समझ पाता है, न परमार्थ को। इस तरह यह गद्यांश स्वार्थ बनाम समष्टि-बुद्धि की बहस का एक मुख्य पड़ाव प्रस्तुत करता है।