- यह अंश किस उपन्यास से लिया गया है और प्रेमचंद के बारे में ज़रूरी जानकारी
- आग लगने से लेकर सूरदास के फिर से घर बनाने के संकल्प तक की पूरी घटना, सही क्रम में
- सूरदास, भैरों, जगधर, सुभागी, मिठुआ, घीसू और नायकराम, बजरंगी, ठाकुरदीन जैसे पात्रों का चरित्र और उनकी भूमिका
- पाठ का मूल भाव, यानी यह हमें क्या सिखाता है
- पाठ की भाषा-शैली की तीन ख़ास बातें
- किताब के सारे कठिन शब्दों के अर्थ, एक जगह
1 कृति और लेखक का परिचय
सूरदास की झोंपड़ी कोई स्वतंत्र कहानी नहीं है, यह प्रेमचंद के मशहूर उपन्यास
रंगभूमि (1925) का एक अंश है। इस उपन्यास के केंद्र में एक अंधा भिखारी
सूरदास है। इसी सूरदास से जुड़ा एक प्रसंग यहाँ पढ़ाया जा रहा है: उसकी झोंपड़ी
में आग लगती है, और वह इस विपत्ति से किस तरह उबरता है, यही इस अंश की कहानी है।
पाठ-परिचय के अनुसार झोंपड़ी जलाने का मुख्य कारण निजी है: सुभागी के सूरदास की झोंपड़ी में छिपने से मुहल्ले में जो बदनामी हुई, भैरों उसका बदला लेना चाहता था। उसने गाँठ बाँध ली कि जब तक सूरे को रुलाएगा, तड़पाएगा नहीं तब तक उसे चैन नहीं मिलेगा; साथ ही उसे बिरादरी को भोज-भात देने की चिंता थी। जगधर ने उसे उकसाने और भड़काने में प्रमुख भूमिका निभाई।
प्रेमचंद (मुंशी प्रेमचंद, असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव, 1880-1936,
गाँव लमही, वाराणसी के पास) हिंदी-उर्दू के सबसे प्रतिष्ठित कथाकार माने जाते
हैं। इन्हें “उपन्यास सम्राट” कहा जाता है। इनके प्रमुख उपन्यास हैं
गोदान, गबन, निर्मला, सेवासदन, कर्मभूमि और रंगभूमि; प्रमुख कहानियाँ हैं कफ़न,
ईदगाह और पूस की रात। इनकी लेखन-शैली को यथार्थवाद कहा जाता है, यानी
ये गाँव और ग़रीब वर्ग के जीवन को जैसा है वैसा ही, बिना सजाए-सँवारे, लिखते थे।
1.1 लेखक-परिचय (पाठ्यपुस्तक के “लेखक परिचय” से)
| बिंदु | जानकारी |
|---|---|
| जीवनकाल, जन्म | सन् 1880-1936; वाराणसी ज़िले के लमही ग्राम में; मूल नाम धनपतराय |
| शिक्षा, नौकरी | प्रारंभिक शिक्षा वाराणसी में; मैट्रिक के बाद अध्यापन; स्वाध्याय से बी.ए.; असहयोग आंदोलन के दौरान सरकारी नौकरी से त्यागपत्र देकर पूरी तरह लेखन को समर्पित |
| लेखन की शुरुआत | पहले उर्दू में “नवाबराय” नाम से, बाद में हिंदी में |
| विषय और दृष्टि | किसानों, दलितों, नारियों की वेदना और वर्ण-व्यवस्था की कुरीतियों का मार्मिक चित्रण; साहित्य को स्वांतःसुखाय नहीं, सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम मानते थे |
| भाषा | सजीव, मुहावरेदार, बोलचाल के निकट; संस्कृत के प्रचलित शब्दों के साथ उर्दू की रवानी |
| कहानी संग्रह | मानसरोवर (आठ भाग), गुप्तधन (दो भाग) |
| उपन्यास | निर्मला, सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कर्मभूमि, गबन, गोदान |
| नाटक, निबंध | कर्बला, संग्राम, प्रेम की वेदी (नाटक); विविध प्रसंग (तीन खंड), कुछ विचार (निबंध) |
| संपादित पत्रिकाएँ | माधुरी, हंस, मर्यादा, जागरण |
रंगभूमि में सूरदास की झोंपड़ी उस ज़मीन पर बनी है, जिस पर बाद में एक
सिगरेट फ़ैक्ट्री बनाने की कोशिश होती है। सूरदास इस ज़मीन को बेचने से मना कर
देता है और अहिंसा के रास्ते इसका विरोध करता है। यह पूरे उपन्यास की कहानी
है, हमारे इस अंश में यह हिस्सा नहीं आता, इसलिए इसे इस अंश के उत्तर का
हिस्सा न मानें। यह बात पृष्ठभूमि समझने के लिए है।
2 कथासार: पूरी घटना, क्रम से
पृष्ठभूमि (पाठ-परिचय से): भैरों की पत्नी सुभागी भैरों की मार के डर से सूरदास की
झोंपड़ी में छिप जाती है। सुभागी को मारने भैरों सूरदास की झोंपड़ी में घुस जाता है, किंतु
सूरदास के हस्तक्षेप से वह उसे मार नहीं पाता। इस घटना को लेकर पूरे मुहल्ले में सूरदास की
बदनामी होती है, जगधर, भैरों तथा अन्य लोग उसके चरित्र पर प्रश्न उठाते हैं, और इससे सूरदास
को इतनी आत्मग्लानि होती है कि वह फूट-फूटकर रोता है। इसी बदनामी का बदला लेने की ठानकर
भैरों आगे की घटनाएँ करता है।
यह अंश मुख्यतः संवादों पर टिका है, पर बीच-बीच में लंबे वर्णन और लेखक की टिप्पणियाँ
भी हैं, जैसे आग लगने का दृश्य और जगधर के मन की बात। घटनाएँ एक कड़ी की तरह आगे बढ़ती हैं:
3 पात्र-परिचय

सूरदास
अंधा भिखारी, इस अंश का मुख्य पात्र। अपनी परिस्थितियों से जितना दुखी है
उससे कहीं ज़्यादा आहत भैरों और जगधर के अपमान से है। किसी से बदला लेने में
विश्वास नहीं रखता, बल्कि हर बार फिर से बनाने में विश्वास रखता है। उसने
छिपाकर जो राशि जोड़ रखी थी (पाँच सौ रुपये से कुछ ऊपर), उससे वह गया जाकर
पिंडदान करना, मिठुआ का ब्याह करना और एक कुआँ बनवाना चाहता था। धैर्य,
आत्मसम्मान और दृढ़ इच्छाशक्ति उसके चरित्र की सबसे बड़ी पहचान है।
भैरों
सूरदास का पड़ोसी, सुभागी का पति। सुभागी और सूरदास के संबंधों की मुहल्ले में जो
चर्चा हुई, उससे हुए अपमान और बदनामी का बदला लेने के लिए झोंपड़ी जला देता है।
झोंपड़े से रुपयों की थैली उठा ले जाता है और कहता है, “यह सुभागी को बहका ले जाने
का जरीबाना है।” अपने किए को यह कहकर भी सही ठहराता है: “जिसने मेरी आबरू बिगाड़ दी,
उसके साथ जो चाहे करूँ, मुझे पाप नहीं लग सकता।” क्रूर, प्रतिशोधी और अपने किए को सही बताने
वाला पात्र है।
जगधर
खोंचा लेकर गलियों में घूमने वाला (खोंचेवाला), पूरी घटना में उकसाने वाला पात्र। उसे जलन इस बात की है कि सूरदास ग़रीब
होकर भी चैन से रहता है, जबकि जगधर को खाने-कमाने के लाले पड़े रहते हैं।
ख़ुद टेनी मारता है, बाट खोटे रखता है और तेल की मिठाई को घी की कहकर बेचता है, फिर भी सूरदास और सुभागी
के सामने हमदर्दी जताता है। दोमुँहा और ईर्ष्यालु स्वभाव उसकी पहचान है।
सुभागी
भैरों की पत्नी। भैरों की मार के डर से सूरदास की झोंपड़ी में छिप गई थी,
जिसके चलते ही यह पूरा झगड़ा शुरू हुआ। उस पर लगाए गए झूठे कलंक की उसे
ज़्यादा चिंता नहीं, पर सूरदास का नुक़सान होने का उसे गहरा दुख है। अंत में
वह निश्चय करती है कि भैरों चाहे मारे या निकाले, वह उसी के घर रहेगी, ताकि थैली का पता लगाकर सूरदास के रुपये दिला सके (“मैंने ही उजाड़ा है, मैं ही बसाऊँगी”), जो उसके भीतर के न्यायबोध को दिखाता है।
मिठुआ
एक छोटा बालक, सूरदास से जुड़ा हुआ। उसी के बार-बार पूछे सवालों (अब हम रहेंगे कहाँ, और कोई फिर आग लगा दे तो) से कहानी का सबसे मशहूर संवाद
“सौ लाख बार बनाएँगे” निकलकर आता है। बच्चों की जिज्ञासा को दिखाता है।
घीसू
एक और बालक, मिठुआ को चिढ़ाते हुए कहता है “तुम खेल में रोते हो”। यही
एक वाक्य सूरदास को अपने दुख से बाहर निकालने की वजह बनता है, इसलिए यह
छोटा-सा पात्र भी कहानी के मोड़ में अहम है।
नायकराम, बजरंगी, ठाकुरदीन
आग के समय जमा मुहल्लेवाले। नायकराम (पंडाजी) व्यंग्य करता है, “चूल्हा ठंडा
किया होता, तो दुश्मनों का कलेजा कैसे ठंडा होता”, और धमकी देता है, “मैं जानता हूँ
जिसने लगाई है। बिगाड़ न दूँ, तो कहना।” जगधर उससे कहता है कि वह उस पर नाहक शक करता
है। बजरंगी सूरदास को जलते झोंपड़े में जाने से रोकता है। ठाकुरदीन कहता है,
“तुम क्या बिगाड़ोगे, भगवान आप ही बिगाड़ देंगे।”
सूरदास
- आँखों से अंधा
- धैर्यवान, बदले की भावना से दूर (“तुम्हारी तरफ से मेरा दिल साफ है”)
- ग़रीबी में भी आत्मसम्मान बचाए रखता है
भैरों और जगधर
- आँखों से पूरी तरह सक्षम
- भैरों प्रतिशोधी, जगधर ईर्ष्यालु और दोमुँहा
- सूरदास का सुख और उसके रुपये दोनों की आँखों में खटकते हैं
इस तुलना को इस तरह पढ़ा जा सकता है: सूरदास आँखों से अंधा होकर भी अपने आस-पास
के लोगों से कहीं ज़्यादा साफ़ देखता और सोचता है। भैरों और जगधर आँखों से
पूरी तरह सक्षम होकर भी जलन, शक और स्वार्थ से आगे नहीं देख पाते।
4 मूल भाव और संदेश
“अंधे भिखारी के लिए दरिद्रता इतनी लज्जा की बात नहीं है, जितना धन।”
सूरदास अपनी हानि इसीलिए छुपाता है
यह पंक्ति समझाती है कि सूरदास अपने रुपये चोरी होने की बात जगधर से क्यों
छुपाता है। पाठ के अनुसार भिखारियों के लिए धन-संचय पाप-संचय से कम अपमान की बात नहीं है। सूरदास पिंडदान, मिठुआ का ब्याह और कुआँ बनवाने के काम इस ढंग से करना चाहता था कि लोग यही समझें कि भगवान दीनजनों की सहायता करते हैं। इसीलिए वह अपनी हानि पर चुप रहता है।
“तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे।”
अंश का अंतिम वाक्य, मिठुआ के प्रश्न का उत्तर
चाहे कितनी भी बार झोंपड़ी जलाई जाए, सूरदास हर बार उसे फिर से बनाने के लिए
तैयार है। पाठ-परिचय के अनुसार सूरदास किसी से प्रतिशोध लेने में विश्वास नहीं करता,
बल्कि पुनर्निर्माण में विश्वास करता है, और यह वाक्य इसी का प्रमाण है।
“यह फूस की राख न थी, उसकी अभिलाषाओं की राख थी।”
पोटली न मिलने पर लेखक की टिप्पणी (प्रश्न-अभ्यास का प्रश्न 3)
राख में पोटली न मिलने पर सूरदास बिलख-बिलखकर रोने लगता है। लेखक बताते हैं कि यह
जली हुई फूस की राख नहीं थी; उस पोटली में उसकी उम्र भर की कमाई थी, जिससे वह गया जाकर
पिंडदान, मिठुआ का ब्याह और कुआँ बनवाना चाहता था। इसलिए राख उसकी इन अभिलाषाओं की
राख थी।
“आवेग में हम उद्दिष्ट स्थान से आगे निकल जाते हैं। वह संयम कहाँ है, जो शत्रु पर विजय पाने के बाद तलवार को म्यान में कर ले?”
सूरदास के राख उड़ाने पर लेखक की टिप्पणी
“खेल में रोते हो” सुनकर सूरदास विजय-गर्व की तरंग में राख के ढेर को दोनों हाथों से
उड़ाने लगता है। लेखक की यह टिप्पणी बताती है कि आवेग (जोश) में मनुष्य निश्चित लक्ष्य
(उद्दिष्ट स्थान) से आगे निकल जाता है; विजय के बाद संयम रखना कठिन होता है।
बार-बार गिरकर भी फिर उठ खड़े होने की ताक़त। पुस्तक की भूमिका (“यह पुस्तक”)
के अनुसार इस पाठ की सबसे बड़ी बात सूरदास की जिजीविषा और उसके संघर्ष का चित्रण है।
अंधापन बनाम अंतर्दृष्टि
इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है: सूरदास अंधा होकर भी बिना जाने-बूझे किसी पर
शक नहीं करता (“बिना जाने-बूझे किस पर सुभा करूँ?”), यानी उसकी समझ आँखों पर निर्भर नहीं।
ग़रीबी में आत्मसम्मान
पाठ के अनुसार “अंधे भिखारी के लिए दरिद्रता इतनी लज्जा की बात नहीं है,
जितना धन।” सूरदास के लिए धन रखना ही लज्जा की बात है, इसलिए वह भीख माँगकर
भी अपनी जमा-पूँजी की बात किसी पर ज़ाहिर नहीं करता।
समाज की संकीर्णता
भैरों और जगधर जैसे लोग किसी ग़रीब, असहाय व्यक्ति के सुख को भी बर्दाश्त
नहीं कर पाते।
5 भाषा-शैली
संवाद-प्रधान शैली
पुस्तक की भूमिका के अनुसार ये पाठ “ठस गद्य की जगह” संवादों के इर्द-गिर्द
बुने हुए हैं। यह अंश मुख्यतः संवादों पर टिका है, पर इसमें लंबे वर्णन भी हैं
(जैसे आग का दृश्य, पोटली खोजना, जगधर के मन की बात) और लेखक की टिप्पणियाँ भी
(“आशा से ज़्यादा दीर्घजीवी और कोई वस्तु नहीं होती”)।
सरल, बोलचाल की हिंदी
भाषा मुख्यतः बोलचाल की है, जिसमें अदावत, जरीबाना, तस्कीन, मसक्कत, हसद
जैसे उर्दू-मिश्रित शब्द सहज रूप से आते हैं। साथ ही उपचेतना, अग्निदाह, नैराश्यपूर्ण,
उद्दिष्ट जैसे कुछ तत्सम शब्द भी हैं।
मुहावरों का सजीव प्रयोग
“छाती पर साँप लोटना”, “झाँसा देना”, “पेट की थाह लेना” जैसे मुहावरे
पात्रों की भावनाओं को बहुत असरदार ढंग से दिखाते हैं।
किताब में पाठ के बाद दो गतिविधियाँ दी गई हैं: (1) इस पाठ का नाट्य
रूपांतर करके प्रस्तुत करना, (2) रंगभूमि उपन्यास का संक्षिप्त संस्करण पढ़ना।
6 शब्दार्थ और टिप्पणी
किताब के अंत में दिए गए सभी कठिन शब्दों और मुहावरों के अर्थ यहाँ एक साथ
दिए गए हैं। इन्हें ध्यान से पढ़ें।
| शब्द / मुहावरा | अर्थ |
|---|---|
| उपचेतना | नींद में भी जागते रहने का एहसास |
| अग्निदाह | आग की लपटें, आग का दहन |
| चिताग्नि | चिता में लगी आग |
| खुटाई | खोट, बुराई |
| तस्कीन | तसल्ली, दिलासा |
| भूबल | ऊपर राख, नीचे आग |
| अदावत | दुश्मनी |
| जरीबाना | जुर्माना, दंड |
| नाहक | बेमतलब, अकारण |
| रुपयों की गरमी | धन का घमंड |
| बल्लमटेर | लुटेरे, गुंडे-बदमाश |
| मसक्कत | मेहनत, परिश्रम |
| हसद | ईर्ष्या, डाह |
| छाती पर साँप लोटना | ईर्ष्या करना |
| टेनी मारना | कम तौलना |
| बाट खोटे रखना | तौल सही न रखना |
| ईमान गँवाना | बेईमानी करना |
| गुनाह बेलज्जत नहीं रहना | बिना किसी लाभ के गुनाह न करना |
| झिझकी | संकोच किया |
| झाँसा देना | भ्रमित करना |
| पेट की थाह लेना | अंदर की बात जानना |
| ईमान बेचना | विवशता में झूठा या ग़लत आचरण करना |
| गोते खाना | इधर-उधर डूबना-उतराना |
| विजय-गर्व की तरंग | जीत की खुशी, उमंग |
| उद्दिष्ट | निश्चित, निर्धारित |
- क्या मैं बता सकता हूँ कि यह अंश किस उपन्यास से लिया गया है और उसके लेखक कौन हैं?
- क्या मैं आग लगने से लेकर सूरदास के फिर उठ खड़े होने तक की पूरी घटना क्रम से सुना सकता हूँ?
- क्या मैं सूरदास, भैरों और जगधर के चरित्र की तीन-तीन बातें अलग-अलग बता सकता हूँ?
- क्या मुझे “अंधे भिखारी के लिए दरिद्रता…” और “तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे” ये दोनों पंक्तियाँ शब्दशः याद हैं?
- क्या मुझे शब्दार्थ के कम से कम दस शब्द बिना देखे याद हैं?
- सूरदास की झोंपड़ी प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि का एक अंश है
- सुभागी के प्रसंग से हुई बदनामी और अपमान का बदला लेने के लिए भैरों सूरदास की झोंपड़ी जला देता है
- भैरों झोंपड़े से सूरदास के छिपाए हुए पाँच सौ रुपये से ऊपर की रक़म भी उठा ले जाता है और उसे “सुभागी को बहका ले जाने का जरीबाना” बताता है
- जगधर (खोंचेवाला) पूरी घटना में उकसाने वाला, दोमुँहा और ख़ुद बेईमान पात्र है
- सूरदास अपनी आर्थिक हानि इसलिए छुपाता है क्योंकि अंधे भिखारी के लिए दरिद्रता इतनी लज्जा की बात नहीं, जितना धन
- सुभागी सच भाँप लेती है और सूरदास के रुपये दिलाने के लिए भैरों के ही घर रहने का निश्चय करती है
- घीसू मिठुआ को चिढ़ाता है “खेल में रोते हो!”; यह सुनकर सूरदास सोचता है कि वह भी खेल में रो रहा है, और उठ खड़ा होता है
- अंत में सूरदास दृढ़ता से कहता है कि चाहे सौ लाख बार झोंपड़ी जलाई जाए, वह उतनी ही बार बनाएगा
- “यह फूस की राख न थी, उसकी अभिलाषाओं की राख थी”: पोटली के साथ सूरदास की आशाएँ भी जल गईं
- पाठ-परिचय के अनुसार सूरदास प्रतिशोध में नहीं, पुनर्निर्माण में विश्वास करता है