परीक्षा से ठीक पहले के दोहराव के लिए इस अध्याय का निचोड़: पात्र-सूची, कथासार तालिका, याद रखने लायक़ उद्धरण और सारे शब्दार्थ एक जगह। विस्तार से पढ़ने के लिए पूरे नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।
1 कृति एक नज़र में
| बिंदु | जानकारी |
|---|---|
| पाठ | सूरदास की झोंपड़ी |
| लेखक | प्रेमचंद |
| स्रोत उपन्यास | रंगभूमि (1925) |
| पुस्तक | अंतराल भाग 2, पाठ 1 |
| छिपाई रक़म | पाँच सौ रुपये से कुछ ऊपर |
2 पात्र-सूची
| पात्र | भूमिका |
|---|---|
| सूरदास | अंधा भिखारी, झोंपड़ी का मालिक, धैर्यवान और संघर्षशील |
| भैरों | सुभागी का पति, पड़ोसी; बदनामी का बदला लेने के लिए झोंपड़ी जलाने वाला, रुपयों की थैली उठा ले जाने वाला |
| जगधर | उकसाने वाला, दोमुँहा, ख़ुद बेईमान खोंचेवाला |
| सुभागी | भैरों की पत्नी, अंत में सूरदास के रुपये दिलाने के लिए भैरों के ही घर रहने का निश्चय करती है |
| मिठुआ | बालक, बार-बार सवाल पूछकर कहानी को उसके चरम बिंदु तक ले जाता है |
| घीसू | बालक, मिठुआ को चिढ़ाते हुए कहता है “खेल में रोते हो!”; यही बात सुनकर सूरदास को झटका लगता है |
| नायकराम, बजरंगी, ठाकुरदीन | आग के समय जमा मुहल्लेवाले; नायकराम (पंडाजी) का व्यंग्य “चूल्हा ठंडा किया होता, तो दुश्मनों का कलेजा कैसे ठंडा होता” और “मैं जानता हूँ जिसने लगाई है” |
3 कथासार, दस बिंदुओं में
घटना-क्रम
- आधी रात सूरदास की झोंपड़ी में आग लगती है
- बजरंगी, जगधर, नायकराम, ठाकुरदीन की बातचीत; नायकराम का व्यंग्य और धमकी
- सूरदास राख में पोटली ढूँढ़ता है; ईंट का टुकड़ा, लोटा और तवा मिलते हैं, पोटली नहीं
- जगधर भैरों के पास पहुँचता है, भैरों आग लगाना कबूल करता है
- भैरों रुपयों को “सुभागी को बहका ले जाने का जरीबाना” बताता है
- सूरदास अपनी हानि जगधर से छुपाता है: “मेरे पास रुपये नहीं थे”
- सुभागी सूरदास के रुपये दिलाने के लिए भैरों के ही घर रहने का निश्चय करती है
- मिठुआ को चिढ़ाते घीसू का “खेल में रोते हो!” सुनकर सूरदास को झटका लगता है
- सूरदास उठकर राख उड़ाने लगता है, बच्चे भी शामिल होते हैं
- सूरदास कहता है “दूसरा घर बनाएँगे”, और अंत में “तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे”
4 याद रखने लायक़ उद्धरण
“अंधे भिखारी के लिए दरिद्रता इतनी लज्जा की बात नहीं है, जितना धन।”
सूरदास अपनी आर्थिक हानि इसीलिए छुपाता है
“तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे।”
अंश का अंतिम वाक्य; सूरदास प्रतिशोध में नहीं, पुनर्निर्माण में विश्वास करता है (पाठ-परिचय)
“यह फूस की राख न थी, उसकी अभिलाषाओं की राख थी।”
पोटली न मिलने पर; राख के साथ पिंडदान, मिठुआ का ब्याह, कुआँ जैसी आशाएँ भी जलीं
“आवेग में हम उद्दिष्ट स्थान से आगे निकल जाते हैं।”
लेखक की टिप्पणी, जब सूरदास विजय-गर्व की तरंग में राख उड़ाने लगता है
5 मूल भाव, चार बिंदुओं में
1मानवीय जिजीविषा
2अंधापन बनाम अंतर्दृष्टि
3ग़रीबी में आत्मसम्मान
4समाज की संकीर्णता
6 सारे शब्दार्थ एक जगह
सभी शब्दार्थ एक जगह
उपचेतनानींद में भी जागते रहने का एहसास
अग्निदाहआग की लपटें, आग का दहन
चिताग्निचिता में लगी आग
खुटाईखोट, बुराई
तस्कीनतसल्ली, दिलासा
भूबलऊपर राख, नीचे आग
अदावतदुश्मनी
जरीबानाजुर्माना, दंड
नाहकबेमतलब, अकारण
रुपयों की गरमीधन का घमंड
बल्लमटेरलुटेरे, गुंडे-बदमाश
मसक्कतमेहनत, परिश्रम
हसदईर्ष्या, डाह
छाती पर साँप लोटनाईर्ष्या करना
टेनी मारनाकम तौलना
बाट खोटे रखनातौल सही न रखना
ईमान गँवानाबेईमानी करना
गुनाह बेलज्जत नहीं रहनाबिना किसी लाभ के गुनाह न करना
झिझकीसंकोच किया
झाँसा देनाभ्रमित करना
पेट की थाह लेनाअंदर की बात जानना
ईमान बेचनाविवशता में झूठा या ग़लत आचरण करना
गोते खानाइधर-उधर डूबना-उतराना
विजय-गर्व की तरंगजीत की खुशी, उमंग
उद्दिष्टनिश्चित, निर्धारित
परीक्षा से एक रात पहले
- पात्र-सूची और हर पात्र की एक-एक ख़ास बात दोहरा लें
- चारों याद रखने लायक़ उद्धरण शब्दशः दोहरा लें
- घटना-क्रम को क्रम से एक बार सुना कर देखें
- शब्दार्थ में से कम से कम दस शब्द बिना देखे बताने की कोशिश करें
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