NCERT की पुस्तक अंतराल भाग 2 के अध्याय 1 «सूरदास की झोंपड़ी» (प्रेमचंद) की प्रश्नावली के सातों प्रश्न और योग्यता-विस्तार की दोनों गतिविधियाँ, पुस्तक के अपने शब्दों में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। पहले ख़ुद उत्तर सोचने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 नायकराम के कथन का भाव
प्र. “चूल्हा ठंडा किया होता, तो दुश्मनों का कलेजा कैसे ठंडा होता?” नायकराम के इस कथन में निहित भाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आग लगने पर जगधर पूछता है, “सूरे, क्या आज चूल्हा ठंडा नहीं किया था?”, यानी वह जताना चाहता है कि आग सूरदास की ही लापरवाही से चूल्हे से लगी होगी। इसके जवाब में नायकराम व्यंग्य से कहते हैं, “चूल्हा ठंडा किया होता, तो दुश्मनों का कलेजा कैसे ठंडा होता।” इस कथन में निहित भाव यह है कि आग चूल्हे से नहीं लगी, बल्कि सूरदास से जलने वाले दुश्मनों ने जानबूझकर लगाई है, ताकि उनके मन की जलन (कलेजे की आग) ठंडी हो। नायकराम यह भी कहते हैं, “मैं जानता हूँ जिसने लगाई है”, यानी उनका इशारा भैरों और उसे उकसाने वाले जगधर जैसे ईर्ष्यालु लोगों की ओर है।
2 झोंपड़ी जलाने का कारण
प्र. भैरों ने सूरदास की झोंपड़ी क्यों जलाई?
उत्तर:
भैरों की पत्नी सुभागी, भैरों की मार के डर से सूरदास की झोंपड़ी में छिप गई थी। इसी घटना को लेकर मुहल्ले में सूरदास और सुभागी के संबंधों को लेकर बातें होने लगीं, जिससे भैरों को अपने अपमान और बदनामी का बहुत बुरा लगा। भैरों ने ठान लिया कि जब तक वह सूरदास को रुलाएगा और तड़पाएगा नहीं, तब तक उसे चैन नहीं मिलेगा। उसे यह चिंता भी थी कि समाज में इतनी बदनामी तो हो ही गई, अब बिरादरी को भोज-भात कहाँ से देगा। उसे उकसाने और भड़काने में जगधर की प्रमुख भूमिका रही। इसी अपमान और बदले की भावना से भरकर भैरों ने रात में चुपके से सूरदास की झोंपड़ी में आग लगा दी (“हाँ, चुपके से एक दियासलाई लगा दी”), और झोंपड़े में छिपाई सूरदास की रुपयों की थैली भी उठा ले गया। वह इसे यह कहकर सही ठहराता है: “जिसने मेरी आबरू बिगाड़ दी, उसके साथ जो चाहे करूँ, मुझे पाप नहीं लग सकता।”
3 “अभिलाषाओं की राख” का अर्थ
प्र. “यह फूस की राख न थी, उसकी अभिलाषाओं की राख थी।” संदर्भ सहित विवेचन कीजिए।
उत्तर:
आग बुझने के बाद सूरदास राख छानकर अपनी छिपाई पोटली ढूँढ़ता है, जिसमें उसकी पूरी उम्र की जमा-पूँजी, पाँच सौ रुपये से कुछ ऊपर की रक़म थी। पहले एक भारी चीज़ हाथ लगती है, जो ईंट का टुकड़ा निकलती है; फिर सारी राख छान डालने पर लोटा और तवा मिलते हैं, किंतु पोटली नहीं मिलती। यह जानकर वह बिलख-बिलखकर रो पड़ता है। यहीं कथाकार कहते हैं कि यह केवल जली हुई फूस (सूखी घास-फूस) की राख नहीं थी। दरअसल यह राख सूरदास की उन सारी इच्छाओं और सपनों का प्रतीक बन गई थी, जो वह इन रुपयों से पूरा करना चाहता था, जैसे गया जाकर पिंडदान करना, मिठुआ का ब्याह करना और एक कुआँ बनवाना। रुपयों के खो जाने के साथ ही उसकी ये सारी अभिलाषाएँ भी राख होकर बिखर गईं, इसीलिए यह पंक्ति केवल भौतिक हानि नहीं, बल्कि सूरदास के सपनों के टूटने की गहरी पीड़ा को दर्शाती है।
4 जगधर के मन में ईर्ष्या-भाव
प्र. जगधर के मन में किस तरह का ईर्ष्या-भाव जगा और क्यों?
उत्तर:
जगधर को पहले से ही इस बात की जलन थी कि सूरदास, अंधा और ग़रीब होकर भी चैन से रहता है, खाता-पीता है और उसके चेहरे पर कभी निराशा नहीं झलकती, जबकि जगधर को ख़ुद खाने-कमाने के लाले पड़े रहते हैं। जब भैरों को सूरदास के झोंपड़े से उठाई गई थैली से अचानक पाँच सौ रुपये से ऊपर की रक़म मिल जाती है, तो जगधर के मन में एक नई ईर्ष्या जग उठती है, क्योंकि उसे लगता है कि यह अचानक धन उसके बजाय भैरों को मिल गया। कथाकार इस मनोभाव को “छाती पर साँप लोटना” कहकर व्यक्त करते हैं, यानी जगधर भीतर ही भीतर जलता है कि उसकी क़िस्मत ऐसी क्यों नहीं खुली, जबकि वह भी बेईमानी करने से पीछे नहीं हटता।
5 आर्थिक हानि गुप्त रखने का कारण
प्र. सूरदास जगधर से अपनी आर्थिक हानि को गुप्त क्यों रखना चाहता था?
उत्तर:
पाठ में स्पष्ट कहा गया है कि “अंधे भिखारी के लिए दरिद्रता इतनी लज्जा की बात नहीं है, जितना धन।” पाठ आगे कहता है कि भिखारियों के लिए धन-संचय पाप-संचय से कम अपमान की बात नहीं है। सूरदास इन रुपयों से गया जाकर पिंडदान करना, मिठुआ का ब्याह करना और कुआँ बनवाना चाहता था, किंतु इस ढंग से कि लोगों को आश्चर्य हो कि इसके पास रुपये कहाँ से आए, और लोग यही समझें कि भगवान दीनजनों की सहायता करते हैं। इसीलिए सूरदास ने जगधर के बार-बार पूछने पर भी यही कहा, “मेरे पास थैली-वैली कहाँ?” और “कह दिया कि मेरे पास रुपये नहीं थे”, ताकि उसकी असली आर्थिक स्थिति किसी को पता न चले।
6 सूरदास की मनोदशा (राख उड़ाते समय)
प्र. “सूरदास उठ खड़ा हुआ और विजय-गर्व की तरंग में राख के ढेर को दोनों हाथों से उड़ाने लगा।” इस कथन के संदर्भ में सूरदास की मनोदशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अपनी हानि पर अकेले बैठा सूरदास रो रहा था कि तभी आवाज़ आती है, “तुम खेल में रोते हो!” मिठुआ घीसू के घर से रोता चला आ रहा था और घीसू उसे चिढ़ा रहा था। यह वाक्य सुनते ही सूरदास को झटका लगता है और उसे एहसास होता है कि वह भी अपने दुख में हार मानकर ठीक वैसे ही रो रहा है, जैसे कोई खेल में हार मानकर रोता है। उसे लगता है कि सच्चे खिलाड़ी हार कर, चोट खाकर भी मैदान नहीं छोड़ते, उनकी हिम्मत नहीं टूटती। इसी विचार से उसके भीतर एक नई ताक़त और आत्मविश्वास जाग उठता है। वह निराशा और आत्मग्लानि को पीछे छोड़कर उठ खड़ा होता है, और मानो किसी विजय के उल्लास में राख के ढेर को उड़ाने लगता है। लेखक इसी क्षण पर टिप्पणी करते हैं: “आवेग में हम उद्दिष्ट स्थान से आगे निकल जाते हैं। वह संयम कहाँ है, जो शत्रु पर विजय पाने के बाद तलवार को म्यान में कर ले?” इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि जोश में सूरदास दुख से उबरने से भी आगे बढ़कर विजय का उत्सव मनाने लगता है। यह क्षण सूरदास के चरित्र की उस दृढ़ता को दिखाता है, जो विपत्ति के आगे झुकने से इनकार करती है।
7 “सौ लाख बार बनाएँगे” में सूरदास का चरित्र
प्र. “तो हम सौ लाख बार बनाएँगे” इस कथन के संदर्भ में सूरदास के चरित्र का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
कहानी के अंत में मिठुआ पूछता है, “दादा, अब हम रहेंगे कहाँ?” सूरदास कहता है, “दूसरा घर बनाएँगे।” फिर मिठुआ बार-बार पूछता है कि अगर झोंपड़ी को कोई फिर जला दे, या कोई हज़ार बार जला दे तो क्या होगा। हर बार सूरदास जवाब देता है कि वह उतनी ही बार फिर घर बनाएगा। अंत में मिठुआ के “और जो कोई सौ लाख बार लगा दे?” पूछने पर सूरदास उसी सहज बालोचित सरलता से कहता है, “तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे।” यह कथन सूरदास के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता को उजागर करता है, यानी उसकी अटूट जिजीविषा, धैर्य और संघर्ष-शक्ति। वह प्रतिशोध या हार मानने में विश्वास नहीं रखता, बल्कि चाहे कितनी भी बार विपत्ति आए, हर बार नए सिरे से खड़े होने और फिर से बनाने में विश्वास रखता है। पाठ-परिचय भी कहता है कि सूरदास किसी से प्रतिशोध लेने में विश्वास नहीं करता बल्कि पुनर्निर्माण में विश्वास करता है, और पुस्तक की भूमिका के अनुसार इस पाठ की सबसे बड़ी बात सूरदास की जिजीविषा और उसके संघर्ष का चित्रण है।
8 योग्यता-विस्तार
प्र. इस पाठ का नाट्य रूपांतर कर उसकी प्रस्तुति कीजिए।
उत्तर: (यह कक्षा में करने की गतिविधि है।) पाठ पहले से ही संवाद-प्रधान है, इसलिए नाट्य रूपांतर आसान है। दृश्य इस तरह बाँटे जा सकते हैं: (1) रात के दो बजे आग और बजरंगी, जगधर, नायकराम, ठाकुरदीन के संवाद; (2) सूरदास का राख में पोटली खोजना; (3) जगधर और भैरों की बातचीत, जिसमें भैरों थैली दिखाता है; (4) जगधर, सूरदास और सुभागी का संवाद; (5) घीसू का ‘खेल में रोते हो’ कहना और सूरदास का राख उड़ाना; (6) मिठुआ और सूरदास का अंतिम संवाद, ‘तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे’। पात्र बाँटकर संवाद पाठ्यपुस्तक से ही लें और कक्षा में प्रस्तुत करें।
प्र. प्रेमचंद के उपन्यास ‘रंगभूमि’ का संक्षिप्त संस्करण पढ़िए।
उत्तर: (यह पठन-गतिविधि है।) पुस्तकालय से ‘रंगभूमि’ का संक्षिप्त संस्करण लेकर पढ़ें। पढ़ते समय देखें कि पाठ में आए पात्र (सूरदास, मिठुआ, भैरों, सुभागी, जगधर, नायकराम, बजरंगी) उपन्यास में आगे किस तरह आते हैं, और सूरदास का प्रतिशोध न लेकर पुनर्निर्माण में विश्वास करने वाला स्वभाव पूरे उपन्यास में कैसे दिखता है।
प्रश्न 3, 6 और 7 में दिए गए तीनों उद्धरण पाठ की प्रमुख पंक्तियाँ हैं। इन्हें शब्दशः याद रखना अच्छा अभ्यास है।