इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. सूरदास की झोंपड़ी किस उपन्यास का अंश है और उसके लेखक कौन हैं?
उत्तर: यह अंश प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि से लिया गया है।
प्र. भैरों ने सूरदास की झोंपड़ी में रखी थैली में से कितने रुपये निकाले थे?
उत्तर: पाँच सौ रुपये से कुछ ऊपर की रक़म।
प्र. सूरदास किस शारीरिक स्थिति से जूझ रहा था?
उत्तर: सूरदास दृष्टिहीन (अंधा) था।
प्र. सुभागी रातभर कहाँ छिपी रही?
उत्तर: मंदिर के पिछवाड़े अमरूद के बाग में।
प्र. किस बालक के एक वाक्य ने सूरदास को अपने दुख से बाहर निकाला?
उत्तर: घीसू के वाक्य ‘खेल में रोते हो’ ने।
प्र. मिठुआ के किस प्रश्न के उत्तर में सूरदास ने अपना प्रसिद्ध कथन कहा?
उत्तर: ‘और जो कोई सौ लाख बार लगा दे?’ के उत्तर में सूरदास ने कहा ‘तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे’।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. ‘चूल्हा ठंडा किया होता, तो दुश्मनों का कलेजा कैसे ठंडा होता।’ नायकराम के इस कथन का क्या भाव है?
उत्तर: जगधर के ‘क्या आज चूल्हा ठंडा नहीं किया था?’ पूछने पर नायकराम व्यंग्य करते हैं कि आग चूल्हे से नहीं लगी, बल्कि सूरदास से जलने वाले दुश्मनों ने जानबूझकर लगाई है ताकि उनका कलेजा (मन की जलन) ठंडा हो। उनका इशारा भैरों और जगधर जैसे ईर्ष्यालु लोगों की ओर है; वे कहते भी हैं, ‘मैं जानता हूँ जिसने लगाई है।’
प्र. भैरों ने सूरदास की झोंपड़ी क्यों जलाई?
उत्तर: भैरों की पत्नी सुभागी उसकी मार के डर से सूरदास की झोंपड़ी में छिप गई थी। इसके बाद सूरदास और सुभागी के संबंधों की चर्चा पूरे मुहल्ले में होने लगी, जिससे भैरों अपने अपमान और बदनामी का बदला लेने की सोच बैठा; उसे बिरादरी को भोज-भात देने की चिंता भी थी, और जगधर ने उसे उकसाया। इसी बदले के लिए भैरों ने रात में झोंपड़ी में आग लगा दी।
प्र. सूरदास जगधर से अपनी आर्थिक हानि को गुप्त क्यों रखना चाहता था?
उत्तर: पाठ के अनुसार अंधे भिखारी के लिए दरिद्रता इतनी लज्जा की बात नहीं है, जितना धन; भिखारियों के लिए धन-संचय पाप-संचय से कम अपमान की बात नहीं। सूरदास पिंडदान, मिठुआ का ब्याह और कुआँ बनवाने के काम इस ढंग से करना चाहता था कि लोग समझें भगवान दीनजनों की सहायता करते हैं। इसीलिए उसने अपनी हानि छुपाई।
प्र. सूरदास अपने बचाए हुए रुपयों से क्या-क्या करना चाहता था?
उत्तर: सूरदास इन रुपयों से तीन काम करना चाहता था: (1) गया जाकर अपने पितरों का पिंडदान करना, (2) मिठुआ का ब्याह करना, (3) एक कुआँ बनवाना।
प्र. जगधर भैरों के पास जाकर रुपये लौटाने की सलाह क्यों देता है, और यह सलाह ईमानदार क्यों नहीं है?
उत्तर: जगधर ऊपर से सलाह देता है कि रुपये लौटा दो, यह मेहनत की कमाई है। पर असल में यह सलाह ईर्ष्या से निकलती है, जगधर को दुख इस बात का है कि इतने रुपये भैरों के हाथ लगे, उसके नहीं। इसलिए यह सलाह नेकनीयती से नहीं दी गई।
प्र. भैरों के घर लौटने के बारे में सुभागी का निश्चय किस तरह बदला?
उत्तर: पहले सुभागी ने प्रण किया था कि अब भैरों के घर न जाएगी, अलग रहेगी और मेहनत-मजूरी करके जीवन-निर्वाह करेगी। पर सूरदास की दशा देखकर उसने तय किया, ‘अब चाहे वह मुझे मारे या निकाले पर रहूँगी उसी के घर’, क्योंकि वहीं रहकर वह थैली का पता लगा सकती थी; जब तक सूरदास के रुपये न दिला दे, उसे चैन न आएगा।
प्र. जगधर अपने धंधे में किस तरह बेईमानी करता है?
उत्तर: जगधर खोंचा लेकर गलियों में घूमने वाला है और स्वयं मानता है कि वह बेईमानी करता है: वह ग्राहकों को कम तौलता है (टेनी मारना), तराज़ू के बाट सही नहीं रखता, और तेल की मिठाई को घी की बताकर बेचता है। यह दिखाता है कि जो व्यक्ति दूसरों की ईमानदारी पर सवाल उठाता है, वह ख़ुद बेईमान है।
प्र. आग लगने पर सबसे पहले मुहल्लेवालों की क्या प्रतिक्रिया थी?
उत्तर: आधी रात को अचानक आग की लपटें उठते ही दम-के-दम में सैकड़ों लोग जमा हो गए। कुछ पानी लेकर आग बुझाने की कोशिश कर रहे थे, कुछ केवल शोर मचा रहे थे, और अधिकांश लोग चुपचाप निराश दृष्टि से आग को देख रहे थे।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. ‘यह फूस की राख न थी, उसकी अभिलाषाओं की राख थी।’ इस कथन का संदर्भ सहित विवेचन कीजिए।
उत्तर: आग बुझने के बाद सूरदास राख में अपनी छिपाई पोटली ढूँढ़ता है, उसे ईंट का टुकड़ा, लोटा और तवा मिलते हैं, पर पोटली नहीं मिलती। यह जानकर वह बिलख-बिलखकर रोने लगता है। यह पंक्ति बताती है कि यह राख केवल जली हुई फूस (सूखी घास) की राख नहीं थी, बल्कि सूरदास की उम्र भर की मेहनत से जुटाई गई पूँजी और उससे जुड़ी सारी आशाओं (पिंडदान, मिठुआ का ब्याह, कुआँ) की राख थी। भौतिक हानि से कहीं ज़्यादा गहरा आघात उसकी टूटी हुई इच्छाओं का था।
प्र. जगधर के मन में किस तरह का ईर्ष्या-भाव जगा और क्यों?
उत्तर: जगधर को इस बात की जलन थी कि सूरदास ग़रीब और अंधा होकर भी चैन से रहता है, खाता-पीता है, उसके चेहरे पर निराशा नहीं झलकती, जबकि जगधर को स्वयं खाने-कमाने के लाले पड़े रहते हैं। जब भैरों को अचानक पाँच सौ रुपये से ऊपर की रक़म मिल जाती है, तो जगधर का मन ईर्ष्या से भर उठता है क्योंकि यह अचानक धन उसे नहीं मिला, भैरों को मिला। कथाकार इसे ‘छाती पर साँप लोटना’ कहकर बताते हैं।
प्र. सूरदास जगधर से अपनी आर्थिक हानि को गुप्त क्यों रखना चाहता था, विस्तार से समझाइए।
उत्तर: सूरदास जानता था कि एक भिखारी के लिए दरिद्रता इतनी लज्जा की बात नहीं है, जितना धन। भिखारियों के लिए धन-संचय पाप-संचय से कम अपमान की बात नहीं है। वह अपने काम (पिंडदान, मिठुआ का ब्याह, कुआँ) इस ढंग से करना चाहता था कि लोगों को आश्चर्य हो कि रुपये कहाँ से आए और वे समझें कि भगवान दीनजनों की सहायता करते हैं। इसीलिए सूरदास जगधर के बार-बार पूछने पर भी यही कहता रहा, “मेरे पास थैली-वैली कहाँ?” और “कह दिया कि मेरे पास रुपये नहीं थे”, और अपना असली दुख किसी पर ज़ाहिर नहीं होने दिया।
प्र. ‘सूरदास उठ खड़ा हुआ, और विजय-गर्व की तरंग में राख के ढेर को दोनों हाथों से उड़ाने लगा।’ इस कथन के संदर्भ में सूरदास की मनोदशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर: जब घीसू मिठुआ को चिढ़ाते हुए कहता है ‘खेल में रोते हो’, तो यह वाक्य सुनकर सूरदास को अचानक एहसास होता है कि वह भी अपने दुख में हार मानकर ‘खेल में रोने’ जैसी ग़लती कर रहा है। सच्चा खिलाड़ी हार कर, चोट खाकर भी मैदान नहीं छोड़ता। इसी विचार से सूरदास के भीतर एक नई ताक़त और आत्मविश्वास जाग उठता है, वह निराशा को पीछे छोड़कर उठ खड़ा होता है और जैसे किसी विजय के जोश में राख उड़ाने लगता है। यह उसकी हार न मानने वाली मनोदशा को दिखाता है।
प्र. ‘तो हम सौ लाख बार बनाएँगे’ इस कथन के संदर्भ में सूरदास के चरित्र का विवेचन कीजिए।
उत्तर: मिठुआ पहले पूछता है “अब हम रहेंगे कहाँ?” तो सूरदास कहता है “दूसरा घर बनाएँगे”। फिर मिठुआ बार-बार पूछता है कि अगर कोई फिर झोंपड़ी जला दे तो, और हर बार सूरदास दृढ़ता से जवाब देता है कि वह फिर बनाएगा, चाहे फिर जलाई जाए, हज़ार बार जलाई जाए या सौ लाख बार। यह कथन सूरदास के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता दिखाता है, यानी उसकी अटूट जिजीविषा और संघर्ष-शक्ति। वह हार मानने या बदला लेने में विश्वास नहीं रखता, बल्कि हर विपत्ति के बाद फिर से खड़े होने में विश्वास रखता है। पाठ-परिचय भी कहता है कि सूरदास प्रतिशोध में नहीं, पुनर्निर्माण में विश्वास करता है।
प्र. भैरों और जगधर के चरित्र की समानता और असमानता बताइए।
उत्तर: समानता: दोनों ही सूरदास की सुखी दशा से जलते हैं और उसे नुक़सान पहुँचाने में किसी न किसी रूप से शामिल हैं। असमानता: भैरों खुलकर अपना अपराध स्वीकारता है और अपने किए को सही ठहराता है, वह प्रत्यक्ष रूप से क्रूर है। जगधर इसके विपरीत दोमुँहा है, वह ऊपर से सहानुभूति जताता है, सलाह देने का नाटक करता है, पर भीतर से वह भी ईर्ष्यालु और बेईमान है, जो अपने खोंचे के धंधे में भी लोगों को ठगता है।
प्र. सुभागी के चरित्र की मुख्य विशेषताएँ बताते हुए स्पष्ट कीजिए कि उसका चरित्र-विकास इस अंश में किस तरह होता है।
उत्तर: सुभागी शुरुआत में डर के मारे सूरदास की झोंपड़ी में छिप जाती है, जिससे पूरा झगड़ा शुरू होता है। उस पर लगे झूठे कलंक की उसे विशेष चिंता नहीं, पर सूरदास का नुक़सान होने का उसे गहरा दुख होता है। पहले वह भैरों का घर छोड़कर मेहनत-मजूरी से जीने का प्रण करती है, पर सूरदास की दशा देखकर निश्चय बदल लेती है: भैरों चाहे मारे या निकाले, वह उसी के घर रहेगी ताकि थैली का पता लगाकर सूरदास के रुपये दिला सके (“मैंने ही उजाड़ा है, मैं ही बसाऊँगी”)। इस तरह वह भय से साहस और न्याय-बोध की ओर बढ़ती है।
प्र. इस अंश के आधार पर बताइए कि प्रेमचंद ने अंधेपन और अंतर्दृष्टि के बीच किस तरह विरोधाभास दिखाया है।
उत्तर: सूरदास आँखों से पूरी तरह अंधा है, पर वह भैरों और जगधर जैसे आँखों वाले पात्रों से कहीं ज़्यादा साफ़ सोचता और समझता है। वह किसी पर बदले की भावना नहीं रखता, अपनी हानि को समझदारी से संभालता है और अंत में हार मानने से इनकार करता है। इसके विपरीत भैरों और जगधर आँखों से सक्षम होकर भी जलन, शक और स्वार्थ के अंधेरे में डूबे रहते हैं। इस अंश से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सूरदास की समझ आँखों पर निर्भर नहीं है (वह कहता है, “बिना जाने-बूझे किस पर सुभा करूँ?”); यह पाठ का सीधा कथन नहीं, एक व्याख्या है।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. सूरदास की झोंपड़ी के आधार पर सूरदास के चरित्र का सम्पूर्ण मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर: 1. सूरदास एक अंधा भिखारी है, जो अपनी शारीरिक विकलांगता के बावजूद असाधारण धैर्य और समझदारी दिखाता है।
2. वह अपनी परिस्थितियों से जितना दुखी है, उससे कहीं अधिक आहत भैरों और जगधर के अपमान और ईर्ष्या से है, फिर भी वह किसी से बदला लेने की नहीं सोचता।
3. उसकी सारी उम्र की जमा-पूँजी (पाँच सौ रुपये से ऊपर) चोरी हो जाने पर भी वह अपनी हानि को समझदारी से छुपाता है, क्योंकि अंधे भिखारी के लिए दरिद्रता इतनी लज्जा की बात नहीं, जितना धन।
4. वह क्षणिक निराशा में रोता तो है, पर घीसू के एक वाक्य से जागकर तुरंत संभल जाता है, यह उसकी असाधारण मानसिक दृढ़ता दिखाता है।
5. अंत में वह दृढ़ता से कहता है कि चाहे सौ लाख बार झोंपड़ी जलाई जाए, वह उतनी ही बार बनाएगा, यह उसकी अटूट जिजीविषा और संघर्ष-शक्ति को दर्शाता है।
6. इस तरह सूरदास मानवीय गरिमा, आत्मसम्मान और हार न मानने की भावना का प्रतीक बनकर उभरता है।
प्र. सूरदास की झोंपड़ी अंश के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि यह पाठ ग़रीबों के प्रति समाज की संकीर्णता को किस तरह उजागर करता है।
उत्तर: 1. सूरदास एक निर्धन, अंधा भिखारी है, फिर भी भैरों और जगधर जैसे लोग उसके चैन से रहने को भी बर्दाश्त नहीं कर पाते।
2. जगधर को जलन इस बात की है कि सूरदास ग़रीब होकर भी दुखी नहीं दिखता, जबकि जगधर स्वयं संघर्ष करता है।
3. सुभागी के सूरदास की झोंपड़ी में छिपने और सूरदास के हस्तक्षेप से ही मुहल्ले में सूरदास की बदनामी होने लगती है; जगधर, भैरों तथा अन्य लोग उसके चरित्र पर प्रश्न उठाते हैं।
4. भैरों अपने अपराध (आग लगाना, रुपये उठाना) को सही ठहराता है: रुपयों को ‘सुभागी को बहका ले जाने का जरीबाना’ बताकर, और यह कहकर कि ‘जिसने मेरी आबरू बिगाड़ दी, उसके साथ जो चाहे करूँ, मुझे पाप नहीं लग सकता।’ वह यह भी मानकर चलता है कि ‘सूरे पुलिस में न जाएगा।’
5. पाठ के अनुसार अंधे भिखारी के लिए दरिद्रता इतनी लज्जा की बात नहीं, जितना धन; भिखारी के धन-संचय को समाज पाप-संचय जैसा अपमानजनक मानता है।
6. इस तरह यह अंश दिखाता है कि समाज ग़रीब और असहाय व्यक्ति के प्रति कितना संकीर्ण और स्वार्थी हो सकता है।
प्र. इस अंश की भाषा-शैली की विशेषताएँ उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 1. यह अंश मुख्यतः संवादों में बुना गया है, जैसे आग बुझाते समय बजरंगी, जगधर, नायकराम और ठाकुरदीन के बीच की बातचीत; साथ में वर्णनात्मक गद्य भी है, जैसे आग का वर्णन (“ज्वालाएँ लपक-लपककर आकाश की ओर दौड़ने लगीं”)।
2. भाषा मुख्यतः सरल और बोलचाल की है, जिसमें गाँव के आम जीवन की झलक मिलती है; कुछ तत्सम शब्द (उपचेतना, अग्निदाह, नैराश्यपूर्ण) भी आए हैं।
3. उर्दू-मिश्रित शब्दों का सहज प्रयोग हुआ है, जैसे अदावत, जरीबाना, तस्कीन, मसक्कत, हसद।
4. मुहावरों का प्रभावी प्रयोग किया गया है, जैसे ‘छाती पर साँप लोटना’ (जगधर की ईर्ष्या के लिए), ‘झाँसा देना’, ‘पेट की थाह लेना’।
5. पात्रों की मनोदशा को कथाकार सीधे बताने के बजाय उनके संवादों और क्रियाओं से उभारते हैं, जैसे सूरदास का राख छानना उसकी बेचैनी दिखाता है।
6. इस तरह यह अंश आंचलिक, सजीव और यथार्थवादी भाषा-शैली का अच्छा उदाहरण है।
प्र. ‘सूरदास की झोंपड़ी’ का मूल भाव अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 1. यह अंश मानवीय जिजीविषा, यानी बार-बार गिरकर भी उठ खड़े होने की ताक़त को केंद्र में रखता है।
2. सूरदास शारीरिक रूप से अंधा होकर भी अपने आस-पास के आँखों वाले लोगों से कहीं ज़्यादा साफ़ देखता और समझता है, इससे यह व्याख्या की जा सकती है कि समझ आँखों से अधिक मन और चरित्र पर निर्भर है; यह पाठ में लेखक का सीधा कथन नहीं है।
3. पाठ के अनुसार अंधे भिखारी के लिए दरिद्रता इतनी लज्जा की बात नहीं है, जितना धन; सूरदास ग़रीबी में भी अपना आत्मसम्मान बचाए रखता है।
4. यह समाज की उस संकीर्ण मानसिकता को भी उजागर करता है, जो असहाय व्यक्ति को भी चैन से नहीं रहने देती।
5. अंत में सूरदास का कथन ‘तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे’ दिखाता है कि सूरदास प्रतिशोध में नहीं, पुनर्निर्माण में विश्वास करता है (पाठ-परिचय); इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि विपत्ति चाहे जितनी बार आए, फिर से खड़ा होना चाहिए।
6. इस तरह यह अंश आशावाद, धैर्य और मानवीय संघर्ष-शक्ति का प्रेरक संदेश देता है।