कक्षा 12 हिंदी अंतराल भाग 2 अध्याय 2 बिस्कोहर की माटी (विश्वनाथ त्रिपाठी) के नोट्स हिंदी में

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इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे
  • यह अंश किस आत्मकथा से लिया गया है और विश्वनाथ त्रिपाठी के बारे में ज़रूरी जानकारी
  • बिस्कोहर गाँव के फूलों, साँपों, गर्मी-लू और वर्षा का पूरा वर्णन, क्रम से
  • चाँदनी और नारी की स्मृति, तथा माँ-बत्तख की ममता वाले दोनों प्रसंग
  • पाठ का मूल भाव और भाषा-शैली की ख़ास बातें
  • किताब के सारे कठिन शब्दों के अर्थ, एक जगह
विश्वनाथ त्रिपाठीनंगातलाई का गाँवबिस्कोहरबिसनाथप्रकृति-चित्रणसंस्मरण

1 कृति और लेखक का परिचय

बिस्कोहर की माटी विश्वनाथ त्रिपाठी की आत्मकथा नंगातलाई का गाँव का
एक अंश है, कोई स्वतंत्र रचना नहीं। यह किसी एक घटना की कहानी नहीं, बल्कि
लेखक के अपने गाँव बिस्कोहर और वहाँ की प्रकृति का संस्मरण है, जिसमें
लेखक स्वयं को तीसरे पुरुष में “बिसनाथ” कहकर बुलाते हैं, बचपन की यादों में भी और बड़े होने के बाद की बातों में भी (पाठ-परिचय: “एक पात्र ‘बिसनाथ’ जो लेखक स्वयं (विश्वनाथ) है”)।

कंठस्थ करेंपरिभाषा 1

विश्वनाथ त्रिपाठी हिंदी के जाने-माने आलोचक और लेखक हैं। इस अंश में
वे अपने गाँव की प्रकृति, फूलों-साँपों, ऋतुओं और बचपन की दो गहरी यादों को
आत्मकथात्मक शैली में सजीव ढंग से बयान करते हैं।

1.1 लेखक-परिचय (पाठ्यपुस्तक के “लेखक परिचय” से)

बिंदु जानकारी
जन्म सन् 1931; बिस्कोहर गाँव, ज़िला बस्ती (सिद्धार्थ नगर), उत्तर प्रदेश
शिक्षा प्रारंभिक शिक्षा गाँव में, फिर बलरामपुर कस्बे में; उच्च शिक्षा पहले कानपुर, बाद में वाराणसी; पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से पीएच.डी.
कार्य दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कालेज में, फिर मुख्य परिसर में अध्यापन; सेवानिवृत्त होकर स्वतंत्र लेखन
आलोचना-इतिहास ग्रंथ प्रारंभिक अवधी, हिंदी आलोचना, हिंदी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास, लोकवादी तुलसीदास, मीरा का काव्य, देश के इस दौर में, कुछ कहानियाँ-कुछ विचार
कविता-संग्रह पेड़ का हाथ, जैसा कह सका
संपादन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के साथ अद्दहमाण (अब्दुल रहमान) के अपभ्रंश काव्य “संदेश रासक” का संपादन; कविताएँ 1963, 1964, 1965 (अजित कुमार के साथ); हिंदी के प्रहरी रामविलास शर्मा (अरुण प्रकाश के साथ)
हाल की पुस्तक व्योमकेश दरवेश (आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी पर केंद्रित)
सम्मान गोकुलचंद्र शुक्ल आलोचना पुरस्कार, डॉ. रामविलास शर्मा सम्मान, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, हिंदी अकादमी दिल्ली का साहित्यकार सम्मान
परीक्षा संकेत

यह अंश अलग-अलग विषयों (फूल, साँप, गर्मी, वर्षा, स्मृतियाँ) पर घूमता है,
इसलिए हर विषय के तथ्य अलग-अलग दोहराएँ।

2 गाँव के फूल: कमल, कोइयाँ और हरसिंगार

चित्र 1: कमल (Nelumbo nucifera), वही फूल जिससे पाठ का वर्णन शुरू होता है। चित्र: J.M.Garg / Wikimedia Commons / CC BY 3.0
चित्र 1: कमल (Nelumbo nucifera), वही फूल जिससे पाठ का वर्णन शुरू होता है। चित्र: J.M.Garg / Wikimedia Commons / CC BY 3.0

पूरब टोले के पोखर में कमल फूलते थे। भोज में हिंदुओं के यहाँ भोजन कमल-पत्र (पुरइन) पर परोसा
जाता; कमल का नाल भसीण कहलाता। पास का बड़ा कमल-तालाब लेंवडी का
ताल
था, जहाँ से अकाल में भसीण (कमल-ककड़ी) खोदकर खाया जाता। गाँव में कमल-ककड़ी
अभी भी सामान्यतः नहीं खाई जाती, पर कमल का बीज कमल गट्टा आज भी खाया
जाता है।

चित्र 2: कमल के तीन नामी अंग जिनका पाठ में अलग-अलग उल्लेख है
चित्र 2: कमल के तीन नामी अंग जिनका पाठ में अलग-अलग उल्लेख है

कमल से भी ज़्यादा बहार कोइयाँ की थी, यही जलपुष्प कुमुद या
कोका-बेली कहलाता है। शरद में जहाँ भी गड्ढे में पानी हो, कोइयाँ फूल
उठती है; रेलवे-लाइन के दोनों ओर प्रायः गड्ढों में पानी भरा रहता है, और उत्तर भारत में यह प्रायः सर्वत्र मिलती है। बिसनाथ बहुत दिनों
समझते थे कि कोइयाँ सिर्फ़ “हमारे यहाँ का फूल” है, पर वैष्णो देवी दर्शन के दौरान इसे पंजाब
में भी खिला देखा।

जानने लायक़ बात

शरद की चाँदनी में सरोवरों में चाँदनी का प्रतिबिंब खिली हुई
कोइयाँ की पत्तियों से एक हो जाता है। इन्हीं दिनों तालाबों में
सिंघाड़ा आता है (उजले फूल, अपनी गंध भी)। शरद में ही हरसिंगार
फूलता है। पितर-पक्ख (पितृपक्ष) में मालिन दाई घर के दरवाज़े पर हरसिंगार की राशि रख जाती थीं।
“रख जाती थीं” खड़ी बोली है; गाँव की बोली में इसे “कुरइ जात रहीं” कहते हैं (यह फूल का नाम नहीं,
क्रिया का बोली-रूप है)। पाठ के अनुसार “‘कुरइ देना’ है तो सकर्मक लेकिन सहजता अकर्मक की है”।

3 असली फूल जो “फूल” नहीं कहलाते

पाठ कहता है कि कमल, कोइयाँ, हरसिंगार “तो फूल हैं और फूल कहे जाते हैं”; पर “ऐसे कितने फूल थे
जिनकी चर्चा फूलों के रूप में नहीं होती, और हैं वे असली फूल”, जैसे तोरी, लौकी, भिंडी, भटकटैया, इमली,
अमरूद, कदंब, बैंगन, कोंहड़ा (काशीफल), शरीफ़ा, आम के बौर, कटहल, बेल, अरहर, उड़द, चना, मसूर, मटर के फूल,
सेमल के फूल। नीचे का वर्गीकरण नोट्स का अपना है, याद रखने की सुविधा के लिए; पाठ फूलों को इस तरह नहीं बाँटता।

बिस्कोहर के फूल
“फूल” कहे जाने वालेकमल, कोइयाँ, हरसिंगार
सब्ज़ी/फल के फूलतोरी, लौकी, भिंडी, बैंगन, कोंहड़ा, भटकटैया, अमरूद, शरीफ़ा, बेल
पेड़ों के फूलकदंब, सेमल, इमली, आम के बौर, कटहल
दलहन के फूलअरहर, उड़द, चना, मसूर, मटर
अनाज और तिलहनधान, गेहूँ, जौ, भुट्टा (अनाज); सरसों, पीला सागर (तिलहन)

कदंब (कदम) के फूलों से पेड़ लदबदा जाता, इसी पर कृष्ण झूला झूलते थे
(“झूला पड़ा कदम की डाली”, “नंदक नंद कदंबक तरुतर”)। लेखक कहते हैं, “मुझे तो
लगता है कदंब का दुनियाभर में एक ही पेड़ है”, बिस्कोहर के पच्छूँ टोला में ताल के पास।
सरसों के फूल का पीला सागर खेतों में लहराता। गाँव में एक फल भरभंडा
भी इफ़रात (अधिकता) में होता था; “उसे ही शायद सत्यानाशी कहते हैं”। उसका फूल पीली तितली जैसा होता है, और आँखें आने पर
माँ उसका दूध आँख में लगातीं। दूबों के अनेक वर्णी छोटे-छोटे फूल भी थे, और धान, गेहूँ, जौ के भी फूल होते हैं, “ज़ीरे की शक्ल में”।

कविता उद्धरण

“फूल खिले, खिले फूल / धान फूल, कोदो फूल / कुटकी फूल खिले।”

कवि नवल शुक्ल की इस कविता में गोभी, परवल, करेला, खेक्सा, खीरा,
तोरई, महुआ के फूलों के नाम भी आते हैं, हर पौधे का अपना फूल होता है, चाहे
उसे “फूल” न कहा जाए।

4 साँप: गाँव की एक और पहचान

घास-पात से भरे मेड़ों, मैदानों, तालाब के भीटों (टीलों) पर नाना प्रकार के
साँप मिलते थे। “साँप से डर तो लगता था लेकिन वे प्रायः मिलते-दिखते थे”:

1

डोंड़हा

विषहीन। डोंड़हा को मारा नहीं जाता था; उसे साँपों में “वामन जाति” का मानते थे।

2

मजगिदवा

विषहीन साँप (पाठ में डोंड़हा के साथ इसका उल्लेख है: “डोंड़हा और मजगिदवा विषहीन थे”)।

3

धामिन

विषहीन है लेकिन लंबी होती है। मुँह से कुश पकड़कर पूँछ से मार दे तो
अंग सड़ जाए।

4

गोंहुअन (फेंटारा)

सबसे ख़तरनाक साँप; लेखक के गाँव में इसे “फेंटारा” कहते थे।

5

घोर कड़ाइच

उतना ही ख़तरनाक, जिसके काट लेने पर आदमी घोड़े की तरह हिनहिनाकर मरे।

6

भटिहा

जिसके दो मुँह होते हैं। आम, पीपल, केवड़े की झाड़ी में रहने वाले साँप
बहुत ख़तरनाक माने जाते।

साँप: डर भी, प्रतीक्षा भी

“अजीब बात है साँपों से भय भी लगता था और हर जगह अवचेतन में डर से ही सही उनकी
प्रतीक्षा
भी करते थे।” पाठ आगे कहता है, “छोटे-छोटे पौधों के बीच में सरसराते हुए साँप को देखना भी
भयानक रस हो सकता है।” इसी तरह बिच्छू भी: साँप के काटे लोग बहुत कम बचते थे; बिच्छू काटने से
दर्द बहुत होता था, कोई मरता नहीं था। (पाठ-परिचय के अनुसार साँपों-बिच्छुओं के वर्णन से
“भयमिश्रित वातावरण” बनता है।)

5 फूल-पत्तों से जुड़े लोक-विश्वास और घरेलू इलाज

फूलों की गंधों से साँप, महामारी, देवी, चुड़ैल आदि का संबंध जोड़ा जाता था।
गाँव में शहरी दवाइयों की जगह प्रकृति से मिले फूल-पत्तों का प्रयोग आम था:

फूल/पत्ता मान्यता / प्रयोग
गुड़हल का फूल देवी का फूल माना जाता था
नीम के फूल और पत्ते चेचक के रोगी के पास रखे जाते
बेर का फूल सूँघने से बर्रे-ततैया का डंक झड़ जाता
भरभंडा का दूध आँखें आने पर माँ आँख में लगातीं
कच्चे आम का पन्ना लू लगने की दवा

6 गर्मी, लू और वर्षा का चित्रण

खूब गर्मी चिलचिलाती पड़ती, कभी-कभी लू लगने की घटनाएँ सुनाई पड़तीं। माँ
लू से बचाव के लिए धोती/कमीज़ में गाँठ लगाकर प्याज़ बाँध देतीं। लू लगने की दवा
थी कच्चे आम का पन्ना: भूनकर गुड़ या चीनी में उसका शरबत पीना, देह में लेपना, नहाना; कच्चे आम को
भून या उबालकर उससे सिर धोते थे। कच्चे आमों के झौंर के झौंर पेड़ पर लगे देखना, कच्चे आम की हरी गंध, पकने से पहले जामुन खाना, यह गर्मी की
बहार थी। कटहल गर्मी का फल भी है, तरकारी भी।

वर्षा एकाएक नहीं आती, पहले बादल घिरते, गड़गड़ाहट होती, दिन में रात हो
जाती। वर्षा ऐसी ऋतु है जिसमें संगीत सबसे ज़्यादा होता है, तबला, मृदंग और सितार का; शायर जोश ने लिखा है,
“बजा रहा है सितार पानी।” पहली वर्षा में नहाने से दाद-खाज, फोड़ा-फुँसी ठीक हो
जाते हैं, पर मछलियाँ कभी-कभी “उबस के माँजा (फेन)” लगने से मर भी जातीं, राजा दशरथ
के राम-वियोग की तुलना इससे की गई है: “माँजा मनहु मीन कहँ व्यापा।”
जोंक, केंचुआ, ग्वालिन-जुगनू, अगनिहवा, बोका, करकच्ची, गोंजर, मच्छर, डाँसा
जैसे कीड़े-मकोड़े भी बढ़ जाते।

गर्मी और लूबचाव: प्याज़ बाँधना; दवा: आम का पन्ना
→
वर्षाबादल-गड़गड़ाहट, संगीत जैसी बारिश
→
बाढ़कीचड़, बदबू, गीली लकड़ी का धुआँ
→
प्रकृति का निखारधान-भुट्टे लहराना, तालाब में शैवाल

बाढ़ आने पर सिवान-खेत-खलिहान पानी से भर जाते, गंदगी-कीचड़-बदबू और गीली
लकड़ी के धुएँ की तकलीफ़ होती। पर बरसात के बाद बिस्कोहर की धरती, सिवान,
आकाश, तालाब निखर उठते, धान-भुट्टे-चरी-सनई-करेले-खीरे-भिंडी-तोरी के पौधे
लहलहा उठते। शरद में तालाब में शैवाल (सेवार) उगता, नीला जल आकाश का
प्रतिबिंब देता, जल अगाध (भरपूर) लगता। सिंचाई की नालियों को बरहा
कहते थे, उनमें जल चाँदी की धारा जैसा शान से बहता।

7 चाँदनी और एक स्मृति

बिसनाथ ने पहली बार बढ़नी में एक रिश्तेदार के यहाँ एक स्त्री को
देखा, जो उम्र में उनसे काफ़ी बड़ी थी; लेखक का अनुमान है, “ताज्जुब नहीं दस बरस कम हो”
(बिसनाथ तब दस से ज़्यादा के नहीं थे)। बिस्कोहर में बिसनाथ संतोषी भइया के घर
बहुत जाते थे। उनके आँगन में जूही लगी थी; “उसकी खुशबू प्राणों में बसी रहती थी”।

“प्रकृति सजीव नारी बन गई थी और बिसनाथ उसमें आकाश, चाँदनी, सुगंधि सब
देख रहे थे।”

चाँदनी, फूल, ख़ुशबू और वह स्त्री सब एक-दूसरे में घुलमिल गए

वह स्त्री बिसनाथ को स्त्री के रूप में नहीं, जूही की लता बनकर, चाँदनी के
रूप में लगी, इस तरह प्रकृति सजीव नारी बन गई। सौंदर्य क्या होता है, जीवन की
सार्थकता क्या होती है, यह सब बिसनाथ ने बाद में उसी के संदर्भ में सुना, समझा,
सीखा। वह नारी मिली भी, पर बिसनाथ आजीवन उससे शरमाते रहे। उसकी शादी बिस्कोहर में
ही हुई। कई बार मिलने के बाद, बहुत हिम्मत बाँधकर बिसनाथ ने उससे अपनी भावना व्यक्त
की: “जे तुम्हैं पाइ जाइ ते जरूरै बौराय जाइ”, यानी जो तुम्हें पा जाएगा वह
ज़रूर ही पागल हो जाएगा। उसका उत्तर था: “जाइ देव बिसनाथ बाबू, उनसे तौ हमार कब्बों
ठीक से भेंटौ नाहीं भई।” बिसनाथ मान ही नहीं सकते कि बिस्कोहर से अच्छा कोई गाँव हो
सकता है और बिस्कोहर से ज़्यादा सुंदर कहीं की औरत हो सकती है।

7.1 गंध, संगीत और मृत्यु-बोध वाली स्मृति (पाठ का अंतिम अंश)

  • बिसनाथ को अपनी माँ के पेट का रंग हल्दी मिलाकर बनाई गई पूड़ी का रंग लगता, गंध दूध की; पिता के कुर्ते को वे ज़रूर सूँघते, उसमें पसीने की बू उन्हें बहुत अच्छी लगती।
  • नारी शरीर से उन्हें बिस्कोहर की ही फसलों, वनस्पतियों की उत्कट गंध आती है; पर फूले हुए नीम की गंध को वे नारी-शरीर या शृंगार से कभी नहीं जोड़ सकते, वह गंध मादक, गंभीर और असीमित की ओर ले जानेवाली होती है।
  • संगीत, गंध और बच्चे, बिसनाथ के लिए काल और इतिहास को पार करने के सबसे बड़े सेतु हैं।
  • बड़े गुलाम अली खाँ साहब की पहाड़ी ठुमरी “अब तो आओ साजन” अकेले में सुनें या याद करें तो रुलाई आती है, और वही औरत इसमें व्याकुल नज़र आती है: सफ़ेद रंग की साड़ी, घने काले केश सँवारे हुए, आँखों में आर्द्र व्यथा; वह सिर्फ़ इंतज़ार करती है।
  • “अप्राप्ति की कितनी और कैसी प्राप्तियाँ होती हैं!” संगीत, नृत्य, मूर्ति, कविता, स्थापत्य, चित्र, हर कला-रूप के आस्वाद में वह मौजूद है; बिसनाथ के लिए वह हर दुःख-सुख से जोड़ने का सेतु है।
  • पाठ की अंतिम पंक्ति इसी स्मृति पर है: “इस स्मृति के साथ मृत्यु का बोध अजीब तौर पर जुड़ा हुआ है।” (NCERT का प्रश्न 9 इसी के बारे में है।)

8 माँ और बत्तख की ममता

माँ आँचल में छिपाकर दूध पिलाती थी। चाँदनी रात में खटिया पर लेटी माँ बच्चे को दूध पिला रही है;
“बच्चा दूध ही नहीं, चाँदनी भी पी रहा है”। “माँ के अंक से लिपटकर माँ का दूध पीना, जड़ के चेतन होने यानी
मानव-जन्म लेने की सार्थकता है।”

परीक्षा संकेत

गुरुवर हज़ारीप्रसाद द्विवेदी प्रायः कहते हैं, “क्या यह सब बिना
किसी प्रयोजन के है? बिना किसी उद्देश्य के है?”
लेखक टिप्पणी करते हैं कि
कोई महान उद्देश्य ज़रूर होगा, लेकिन अभी तो “‘बुश-ब्लेयर’ ने इराक फ़तह
किया है।”
और फिर: “कहाँ माँ का बच्चे को दूध पिलाना कहाँ बत्तख का अंडा सेना!” इसे युद्ध पर
लेखक के व्यंग्य के रूप में पढ़ा जा सकता है। (पाठ में वर्ष नहीं दिया गया; “बुश-ब्लेयर” से अमेरिकी राष्ट्रपति
जॉर्ज बुश और ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के इराक हमले का संकेत है।) लेखक के अनुसार जैसे पानी बहता है, हवा चलती है, वैसे ही माँ में बच्चे की ममता है, प्रकृति में ही सब कुछ है।

दिलशाद गार्डन के डियर पार्क में बत्तखें होती थीं। अंडा देने को होती तो
पानी छोड़कर ज़मीन पर, एक सुरक्षित काँटेदार बाड़े में आ जाती; बड़ी सतर्कता
और कोमलता से डैनों के अंदर अंडों को छुपाकर कौवे से भी बचाती। कभी-कभी अंडे
बाहर छिटक जाते, तो वह फिर उतनी ही सतर्कता से समेट लेती।

बिसनाथ की माँ

  • दूध पिलाकर ममता जताती है
  • बच्चे के हर सुख-दुख से जुड़ी
  • पानी बहने, हवा चलने जैसी स्वाभाविक ममता

बत्तख की माँ

  • चोंच से अंडों को सतर्कता से छुपाती है
  • कौवे जैसे ख़तरों से रक्षा करती है
  • वही प्राकृतिक ममता
माँ के दूध का जीवन-चरित

बच्चे का माँ का दूध पीना सिर्फ़ दूध पीना नहीं, माँ से बच्चे के सारे
संबंधों का जीवन-चरित होता है; पशु-माताएँ भी यह सुख देती-पाती होंगी, और
पक्षी-अंडज भी। यही बात लेखक ने बाद में दिलशाद गार्डन की बत्तख में देखी-समझी।
(ध्यान दें: पाठ की अंतिम पंक्ति वाला मृत्यु-बोध इस प्रसंग से नहीं, खंड 7.1 में
दी गई उस स्त्री की स्मृति से जुड़ा है।)

8.1 बिसनाथ पर “अत्याचार”: दूध कटहा (प्रश्न-अभ्यास 3)

  • “बिसनाथ पर अत्याचार हो गया।” जब वे दूध पीनेवाले ही थे कि छोटा भाई आ गया।
  • बिसनाथ “दूध कटहा” हो गए, यानी उनका दूध कट गया; माँ के दूध पर छोटे भाई का कब्ज़ा हो गया।
  • छोटा भाई हुमक-हुमककर अम्माँ का दूध पीता और बिसनाथ गाय का बेस्वाद दूध।
  • पड़ोस में रहने वाली कसेरिन दाई ने ही बिसनाथ को पाला-पोसा।
  • साफ़-सफ़्फ़ाक सुजनी (सूई की डोरी से बनी कथरी) पर कसेरिन दाई के साथ लेटे तीन बरस के बिसनाथ
    चाँद को देखते रहते; लगता उसे हाथ से छू रहे हैं, खा रहे हैं, उससे बातें कर रहे हैं। इमली के छतनार पेड़ से
    छनकर चाँदनी के टुकड़े बिखरते।

9 मूल भाव और भाषा-शैली

1

प्रकृति-मनुष्य का गहरा नाता

गाँव शहर जैसा सुविधायुक्त नहीं, प्रकृति पर अधिक निर्भर रहता है,
यही निर्भरता प्राकृतिक सौंदर्य भी है।

2

ममता का सार्वभौमिक रूप

“जैसे पानी बहता है, हवा चलती है, वैसे ही माँ में बच्चे की ममता”;
माँ और बत्तख की ममता को लेखक प्रकृति का स्वाभाविक रूप मानते हैं।

3

आंचलिक शब्दावली

पुरइन, भसीण, भरभंडा, बरहा जैसे गाँव-बोली के शब्दों और “कुरइ जात रहीं” (= रख जाती थीं)
जैसे बोली के प्रयोगों का सहज प्रयोग हुआ है।

4

आत्मकथात्मक शैली

पाठ-परिचय के अनुसार यह पाठ “आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया” है। लेखक ख़ुद को “बिसनाथ”
नाम से बताते हैं; इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि इससे यादें थोड़ी दूरी से, ठहराव से बयान होती हैं।

योग्यता-विस्तार (पाठ्यपुस्तक के योग्यता-विस्तार से)

तीन कक्षा-गतिविधियाँ: (1) फूलों-साँपों के नाम छाँटकर उनकी
विशेषताएँ लिखना, (2) पाठ से गाँव की जानकारियाँ लिखना, (3) आज माताओं के
दूध न पिलाने की प्रवृत्ति पर विचार लिखना।

10 शब्दार्थ और टिप्पणी

किताब के अंत में दिए गए सभी कठिन शब्दों के अर्थ यहाँ एक साथ दिए गए हैं।
ये शब्दार्थ पाठ के अंत में “शब्दार्थ और टिप्पणी” में दिए गए हैं।

शब्द / मुहावरा अर्थ
भसीण कमलनाल, कमल का तना
कुमुद जलपुष्प, कुइयाँ, कोकाबेली
सिंघाड़ा जलफल, काँटेदार फल जो पानी में होता है
बतिया फल का अविकसित रूप
प्रयोजन उद्देश्य
कथरी बिछौना
साफ़-सफ़्फ़ाक साफ़ और स्वच्छ
इफ़रात अधिकता
भीटों टीले, ढूह
बरहा खेतों की सिंचाई के लिए बनाई गई नाली
सुबुकना धीमे स्वर में रोना
आँख आना गरमियों के मौसम में आँख का रोग होना
थिरकना नाचना
अगाध भरपूर
आर्द्र नमी
3पाठ अंतराल भाग 2 में
6साँपों के नाम पाठ में
9प्रश्न-अभ्यास इस पाठ के बाद
15शब्द/मुहावरे शब्दार्थ में
त्वरित पुनरीक्षण: परीक्षा से एक रात पहले यही पढ़ें
  • बिस्कोहर की माटी विश्वनाथ त्रिपाठी की आत्मकथा नंगातलाई का गाँव का एक अंश है
  • पाठ में लेखक ख़ुद को “बिसनाथ” नाम से बताते हैं, बचपन की यादों में भी और बड़े होने के बाद की बातों में भी
  • कमल के तीन अंग: पुरइन (पत्र), भसीण (नाल), कमल गट्टा (बीज)
  • कोइयाँ (कुमुद) कमल से भी ज़्यादा बहार वाला जलपुष्प है, पंजाब में भी मिलता है
  • गाँव के छह साँप: डोंड़हा, मजगिदवा, धामिन (विषहीन), गोंहुअन (फेंटारा), घोर कड़ाइच, भटिहा (ख़तरनाक); साँपों से भय भी और “डर से ही सही उनकी प्रतीक्षा” भी
  • गर्मी में लू से बचाव के लिए प्याज़ बाँधा जाता था; लू लगने की दवा कच्चे आम का पन्ना थी
  • वर्षा में संगीत सबसे ज़्यादा होता है, “बजा रहा है सितार पानी” (जोश)
  • चाँदनी और उम्र में काफ़ी बड़ी एक स्त्री (“ताज्जुब नहीं दस बरस कम हो”) की स्मृति में प्रकृति सजीव नारी बन गई; “वह नारी मिली भी”
  • छोटा भाई आने पर बिसनाथ “दूध कटहा” हो गए; कसेरिन दाई ने उन्हें पाला-पोसा
  • माँ और बत्तख की ममता एक जैसी है, हज़ारीप्रसाद द्विवेदी का उद्धरण इसी संदर्भ में है
  • अंतिम पंक्ति में उस स्त्री (सफ़ेद साड़ी, इंतज़ार करती, “अब तो आओ साजन” ठुमरी में व्याकुल) की स्मृति के साथ मृत्यु का बोध जुड़ा हुआ बताया गया है