- प्रभाष जोशी का जीवन-परिचय और यह पाठ जनसत्ता के किस स्तंभ से लिया गया है
- मालवा की यात्रा का पूरा वृत्तांत: राजस्थान से मालवा, नागदा, उज्जैन, इंदौर, नर्मदा के दो दर्शन
- मालवा की नदियों, तालाबों और बावड़ियों का इतिहास, और आज उनके साथ क्या हुआ
- 128 साल के वर्षा-आँकड़ों से मालवा के मौसम को समझना
- खाऊ-उजाड़ू सभ्यता, कार्बन डाइऑक्साइड और वैश्विक पर्यावरण संकट का जुड़ाव
- पाठ का मूल भाव, भाषा-शैली और सारे शब्दार्थ, एक जगह
1 कृति और लेखक का परिचय
अपना मालवा: खाऊ-उजाड़ू सभ्यता में जनसत्ता में 1 अक्टूबर 2006 को छपे “कागद कारे”
स्तंभ से लिया गया है। लेखक अपनी मालवा-यात्रा के बहाने मिट्टी, वर्षा, नदियों
और जनजीवन का चित्रण करते हुए, आख़िर में इसे पूरी दुनिया के पर्यावरण-संकट से
जोड़ देते हैं। (पाठ-परिचय में इसकी विधा नहीं लिखी है; इसे निबंध/यात्रा-वृत्तांत के रूप में पढ़ा जा सकता है।)
प्रभाष जोशी (सन् 1937-2009), जन्म इंदौर (मध्य प्रदेश),
हिंदी पत्रकारिता के जाने-माने नाम थे। 1983 में जनसत्ता का संपादन
शुरू किया और देशज भाषा के शब्दों को मुख्यधारा में लाए।
| बिंदु | जानकारी |
|---|---|
| जन्म | इंदौर, मध्य प्रदेश (सन् 1937-2009) |
| पत्रकारिता की शुरुआत | नयी दुनिया के संपादक राजेंद्र माथुर के सान्निध्य में |
| पहले जुड़े रहे | इंडियन एक्सप्रेस (अहमदाबाद, चंडीगढ़ संस्करण), प्रजापति, सर्वोदय संदेश |
| बड़ी उपलब्धि | 1983 में अपने संपादन में जनसत्ता अख़बार का प्रकाशन |
| आदर्श | गांधी, विनोबा और जयप्रकाश के विचार |
| लेख-संग्रह | कागद कारे (इसी स्तंभ से यह पाठ लिया गया है) |
| दूसरा संकलन | हिंदू होने का धर्म (2005, जनसत्ता के लेखों-संपादकीयों का चयन) |
| विशेष योगदान | देशज भाषा के शब्दों को पत्रकारिता की मुख्यधारा में लाना; खेल, सिनेमा, संगीत, साहित्य जैसे विषयों पर गंभीर लेखन |
पाठ का स्रोत: जनसत्ता, 1 अक्टूबर 2006, “कागद कारे” स्तंभ। लेखक-परिचय के अनुसार
प्रभाष जी में मालवा की मिट्टी के संस्कार गहरे तक बसे थे और वे इसी से ताकत पाते थे।
2 मालवा की यात्रा का आरंभ
चौमासा (बारिश के चार महीने) अभी बीता नहीं था। राजस्थान की उगती धूप
वहीं रह गई, मालवा पहुँचते ही आसमान बादलों से घिरा मिला, हर छोटा-मोटा नदी-नाला
बह रहा था।
नागदा स्टेशन पर मीणा जी बिना चीनी की चाय पिलाते हैं और ज़रूरी
समाचार भी देते हैं। वे गई रात क्वालालंपुर में भारत के
हारने से दुःखी थे। मौसम-खेती पर पूछने पर बोले: “हाँ, अबकी पानी भोत
गिर्यो। किसान कै कि हमारी सोयाबीन की फ़सल तो गली गई। पण अब गेहूँ-चना अच्छा
होयगा।” यानी ज़्यादा बारिश से सोयाबीन सड़-गल गई, पर गेहूँ-चने की फ़सल
अच्छी होने की उम्मीद थी।
3 उज्जैन, शिप्रा और बदलती मानसिकता
रास्ते में शिप्रा मिली, बरसों बाद इतनी भरपूर बहती दिखी। गए महीने टीवी
पर ख़बर आई थी कि उज्जैन में शिप्रा का पानी घरों में घुस गया; भोपाल, इंदौर,
धार, देवास में झड़ी लगी थी। ख़तरा कहीं नहीं था, पर सबको पुराने दिन याद आ गए।
लेखक स्पष्ट लिखते हैं: अब मालवा में वैसा पानी नहीं गिरता जैसा पहले गिरा
करता था, इसलिए पहले का औसत पानी भी गिरे तो लोगों को लगता है कि
ज़्यादा गिर गया। इस बार भी बरसात “वही चालीस इंच” गिरी (सामान्य 35 इंच से पाँच ही इंच ज़्यादा), फिर भी लोग टीवी की समझ में “अत्ति” (बढ़ा-चढ़ाकर) की बोलने लगे हैं, यानी कम पानी की आदत के कारण सामान्य-सी बारिश भी ज़्यादा लगने लगी है।
उज्जैन से देवास होते हुए इंदौर जाना मालवा के आँगन से निकलना है: कुएँ-बावड़ी
और तालाब-तलैया लबालब भरे, नदी-नाले बहते और फ़सलें लहराती देखकर “विपुलता की
आश्वस्ति” (संपन्नता का आश्वासन) मिलती थी। लोक-भाषा में यही भाव है:
“अबकी मालवो खूब पाक्यो हे”, यानी अबकी मालवा ख़ूब समृद्ध है।
4 इंदौर में योजना और उम्र का बोध
इंदौर उतरते ही लेखक ने दव्वा से कहा कि अपने को सब नदियाँ, सारे तालाब,
ताल-तलैया और जलाशय देखने हैं, सब पहाड़ चढ़ने हैं। दव्वा ने मुसकुराते हुए कहा: “यहीं से?”
जवाब था: “नी यार पेले माता बिठायंगा।” (शब्दार्थ: पेले माता बिठायंगा = पहले
माता की मूर्ति स्थापित करूँगा) फिर उत्तर मिला: “माता तो बैठ गई, आरती भी हो गई ताऊजी, एक बजनेवाला है।”
उम्र जो ले गई, उसे ले जाने दो
बाद में एहसास होता है कि उम्र अब सत्तर की होने वाली है: पहाड़ चढ़े नहीं
जाएँगे, नदी-नाले पार नहीं होंगे; मन से किशोर भले हों, शरीर वैसा फुर्तीला,
लचीला और गर्वीला नहीं हो सकता। इसी बोध पर लेखक कहते हैं:
“उमर जो ले गई उसे ले जाने दो। उसका जो है, रखे। अपना जो है उसे जिएँ।”
5 नर्मदा के दो दर्शन
इस त्रासदायी (दुखद) प्रतीति के बावजूद लेखक ने दो जगह नर्मदा देखी, दोनों जगह
रूप एकदम अलग था।
ओंकारेश्वर की चिढ़ती नर्मदा
- सामने सीमेंट-कंक्रीट का विशाल राक्षसी बाँध बन रहा है
- “शायद इसीलिए वह चिढ़ती और तिनतिन-फिनफिन करती बह रही थी”
- मटमैली, कहीं छिछली-कहीं गहरी अथाह
- बड़ी नावें वहाँ नहीं थीं; शायद पूर में बहने से बचाकर कहीं रख दी गई थीं
- निर्माण की मशीनें और गुर्राते ट्रक, ज्योतिर्लिंग तीर्थ जैसा माहौल नहीं
नेमावर/बजवाड़ा की शांत नर्मदा
- नर्मदा शांत, गंभीर और भरी-पूरी थी
- चवथ (चतुर्थी) का चाँद उस पर लटका हुआ था
- भेन जी ने कहा: “थक गई है, देखना अब रात को बहेगी”
- रातभर किनारे सोना, सबेरे फिर नमन में बैठना
- यहीं लेखक कहते हैं: “हम नदी को नदी नहीं माँ मानते हैं”
लेखक के शब्दों में: “हम नदी को नदी नहीं माँ मानते हैं। नर्मदा मैया है।
उससे हम बने हैं। उसके किनारे बैठना माँ की गोद में डूबना है।” (इससे ठीक पहले लेखक लिखते हैं:
“अपन घाट नीचे नर्मदा किनारे के लोग।”)
लेखक ओंकारेश्वर के बाँध को “विशाल राक्षसी बाँध” कहते हैं, फिर भी लिखते हैं:
“बावजूद इतने बाँधों के नर्मदा में अब भी खूब पानी और गति है।”
6 विंध्य के घाट और मालवा की सहायक नदियाँ
ओंकारेश्वर और नेमावर जाते हुए विंध्य के दो घाट उतरने पड़े: सिमरोल और
बिजवाड़, दोनों तरफ़ सागौन के जंगल। सिमरोल में चोरल नदी ख़ूब बहती
मिली; बिजवाड़ में हर नाला और हर पहाड़ी नदी की रपट पर पानी था।
| नदी | उद्गम / पहचान | पाठ में जुड़ी जगह |
|---|---|---|
| नर्मदा | माँ मानी जाने वाली प्रमुख नदी | ओंकारेश्वर (बाँध), नेमावर-बजवाड़ा (शांत रूप) |
| शिप्रा | उद्गम: केवड़ेश्वर के पास (कालिदास की शिप्रा) | उज्जैन में महाकाल के पाँव पखारना |
| चंबल | उद्गम: जानापाव पर्वत (विंध्य) | घाटा बिलोद, इटावा के पास जमना से मिलन |
| चोरल | विंध्य के सिमरोल घाट के बीच से बहती | सिमरोल घाट में ख़ूब बहती मिली |
| पार्वती, कालीसिंध | चंबल की सहायक नदियाँ | अपने पुल पर दो दिन रास्ता रोका |
| गंभीर | बहुत बड़ी नदी नहीं | हालोद के आगे यशवंत सागर को इतना भर दिया कि पच्चीसों साइफ़न चलाने पड़े |
| खान, सरस्वती | इंदौर की नदियाँ | अब सड़े नालों में बदल दी गई हैं |
(यह एक सूचना-तालिका है, भौगोलिक रूप से सटीक मानचित्र नहीं। नदियों के सही
स्थान के लिए एटलस देखें।)
7 चंबल, गांधी सागर और सच होती कहावत
चंबल को लेखक ने घाटा बिलोद में देखा, काफ़ी पानी था, ख़ूब बह रही थी।
आगे बहुत बड़ा बाँध है: इस बार गांधी सागर के सब फाटक खोलने पड़े, “इत्ता पानी भरा”। गंभीर
नदी बड़ी नहीं है, पर हालोद के आगे यशवंत सागर को इस बार उसने इतना भर
दिया कि पच्चीसों साइफ़न चलाने पड़े, सड़सठ साल में तीसरी बार
ऐसा हुआ। पार्वती और कालीसिंध ने फिर रास्ता रोका, दो दिन उनके पुल
पर से पानी बहता रहा। इस बार मालवा के पठार की सब नदियों में पूर (बाढ़) आई। लेखक लिखते हैं:
“नदी का सदानीरा रहना जीवन के स्रोत का सदा जीवित रहना है।”
“मालव धरती गहन गंभीर, डग-डग रोटी, पग-पग नीर।”
बरसों बाद हज़ारों साल की यह कहावत सच्ची हुई। शब्दार्थ: मालवा की धरती गहन गंभीर है जहाँ डगर-डगर पर रोटी और पग-पग पर पानी मिलता है, यानी मालवा की धरती खूब समृद्ध है
8 तालाबों का इतिहास: पुराने राजा बनाम आज के इंजीनियर
लेखक का व्यंग्य: आज के इंजीनियर समझते हैं कि वे पानी का प्रबंध जानते हैं,
और पहले ज़माने के लोग कुछ नहीं जानते थे, “क्योंकि ज्ञान तो पश्चिम के रिनेसां के बाद
ही आया न!” (रिनेसां = पुनर्जागरण) पर मालवा में विक्रमादित्य और भोज और मुंज
रिनेसां के बहुत पहले हो गए। वे और मालवा के सब राजा जानते थे कि इस पठार पर पानी को रोक के रखना होगा।
पुराने राजाओं की समझ
- मालवा के सब राजाओं (जैसे विक्रमादित्य, भोज, मुंज) ने तालाब बनवाए
- बड़ी-बड़ी बावड़ियाँ बनवाईं
- बरसात का पानी रुका रहे, ऐसी व्यवस्था की
- धरती के गर्भ का पानी जीवंत बना रहे
आज के नियोजकों की भूल
- तालाबों को गाद (कूड़ा-कचरा) से भर जाने दिया
- ज़मीन का पानी पाताल से निकाल लिया
- नतीजा: नदी-नाले सूख गए
- पग-पग नीरवाला मालवा सूखा हो गया

इस बार अच्छी बरसात से बिलावली और पीपल्या पाला भर गए,
सिरपुर में लबालब पानी है और यशवंत सागर के सभी साइफ़न तो चले ही थे, फिर भी
इंदौर की खान और सरस्वती नदियों में उतना पानी नहीं जितने में कभी लेखक
ख़ुद नहाए थे और नाव पर सैर की थी।
9 हाथीपाला और सड़े नाले बनी नदियाँ
हाथीपाला का नाम इसलिए पड़ा क्योंकि कभी वहाँ नदी पार करने के लिए
हाथी पर बैठना पड़ता था; चंद्रभागा पुल के नीचे कभी उतना ही पानी रहता था
जितना महाराष्ट्र की चंद्रभागा नदी में। इंदौर के बीच से निकलने और मिलनेवाली ये नदियाँ (खान, सरस्वती) कभी उसे हरा-भरा और गुलज़ार रखती थीं; आज वे सड़े नालों में बदल दी गई हैं। शिप्रा, चंबल, गंभीर, पार्वती, कालीसिंध, चोरल, सबके यही हाल हो रहे हैं।
खान और सरस्वती के लिए पाठ के शब्द हैं: “सड़े नालों में बदल दी गई हैं”। बाक़ी नदियों
(शिप्रा, चंबल आदि) के लिए: “सबके यही हाल हो रहे हैं”, यानी वे उसी ओर जा रही हैं।
पाठ के अनुसार ये सदानीरा (हर वक़्त बहने वाली) नदियाँ अब चौमासे में चलती हैं,
बाक़ी के महीनों में बस्तियों के नालों का पानी ढोती हैं।
“नदियों ने सभ्यताओं को जन्म दिया। हमारी आज की सभ्यता इन नदियों को अपने
गंदे पानी के नाले बना रही है।”
लेखक की टिप्पणी, इंदौर की नदियों और शिप्रा, चंबल आदि के प्रसंग में
इस साल सामान्य बारिश (35 इंच) से पाँच इंच ज़्यादा पानी गिरा है, और इतने से
ही नदी, नाले, तालाब, बावड़ियाँ और कुएँ फिर “चैतन्य” हो गए।
10 128 साल के वर्षा-आँकड़े
लेखक के पहले अख़बार “नयी दुनिया” की लाइब्रेरी में सन् 1878 से
पानी के रेकार्ड मौजूद हैं। लेखक के शब्दों में, “128 साल की यह जानकारी ही आँख
खोलने के लिए काफ़ी है”।

| साल | वर्षा (इंच में) | क्या हुआ |
|---|---|---|
| 1899 | 15.75 इंच (सबसे कम) | “छप्पन का काल”, भीषण अकाल, फिर भी मालवा में कोई भूखा-प्यासा नहीं मरा |
| सामान्य वर्षा | 35 इंच | 28 इंच से कम होने पर सूखे का साल माना जाता है |
| 2006 (इस साल) | 40 इंच | सामान्य से 5 इंच ज़्यादा, पर लोग “टीवी की समझ में अत्ति की” बोलने लगे |
| 1973 | 77 इंच (सबसे ज़्यादा) | 128 साल में एक ही साल अतिवृष्टि का; तब भी जलाशय टूटकर नहीं बहे |
11 छप्पन के अकाल का सबक़
1899 के भीषण अकाल (“छप्पन का काल”) ने देशभर में हाय-हाय मचाई हो, पर मालवा में
लोग न प्यासे मरे न भूखे, क्योंकि उस साल के पहले के साल ख़ूब पानी था और बाद के साल
में भी। राजस्थान के ठेठ मारवाड़ से तब भी लोग यहीं आए थे, और कहते हैं कि तब भी
खाने और पीने को काफ़ी था।
लेखक के शब्द: “अपने नदी, नाले, तालाब सँभाल के रखो तो
दुष्काल का साल मज़े में निकल जाता है। लेकिन हम जिसे विकास की
औद्योगिक सभ्यता कहते हैं वह उजाड़ की अपसभ्यता है।” (दुष्काल = बुरा समय, अकाल)
इसे पूरे पाठ के केंद्रीय विचार के रूप में पढ़ा जा सकता है।
12 वैश्विक पर्यावरण संकट
“नयी दुनिया” की उसी लाइब्रेरी में कमलेश सेन और अशोक जोशी ने धरती को
गरम करनेवाली इस खाऊ-उजाड़ू सभ्यता की कतरनें निकाल रखी हैं:
समुद्र और ध्रुव
समुद्रों का पानी गरम हो रहा है, धरती के ध्रुवों पर जमी बर्फ़ पिघल रही है।
मौसम-चक्र
लद्दाख में बर्फ़ के बजाय पानी गिरा; बाड़मेर में गाँव डूब गए।
यूरोप-अमेरिका
यूरोप और अमेरिका में इतनी गरमी पड़ रही है।
वातावरण को गरम करनेवाली कार्बन डाइऑक्साइड गैसों ने मिलकर धरती के
तापमान को तीन डिग्री सेल्सियस बढ़ा दिया है। ये गैसें सबसे ज़्यादा
अमेरिका और फिर यूरोप के विकसित देशों से निकलती हैं।
अमेरिका इन गैसों को रोकने को तैयार नहीं, न यह मानने को कि वातावरण के गरम
होने से गड़बड़ी हो रही है। उसकी खुली घोषणा है कि वह अपनी खाऊ-उजाड़ू जीवन
पद्धति पर कोई समझौता नहीं करेगा।
लेखक अमेरिका-यूरोप को दोषी ठहराकर ख़ुद को अलग नहीं रखते, तुरंत पलटकर
कहते हैं कि हम भी अपनी गहन-गंभीर, पग-पग नीर की धरती को उजाड़ने में लगे हैं।
यानी दोष सिर्फ़ बाहर नहीं, अपने घर में भी है।
“हम अपनी जीवन पद्धति को क्या समझते हैं!”
पाठ की अंतिम पंक्ति; इसे पूरे निबंध के व्यंग्यात्मक निष्कर्ष के रूप में पढ़ा जा सकता है
13 मूल भाव और भाषा-शैली
पाठ-परिचय के अनुसार: “यह खाऊ-उजाड़ू सभ्यता यूरोप और अमेरिका की देन है
जिसके कारण विकास की औद्योगिक सभ्यता उजाड़ की अपसभ्यता बन गई है।” पाठ में लेखक
लिखते हैं: “हम जिसे विकास की औद्योगिक सभ्यता कहते हैं वह उजाड़ की अपसभ्यता है।”
| विशेषता | उदाहरण |
|---|---|
| आंचलिक/मालवी शब्दों का प्रयोग | “पण अब गेहूँ-चना अच्छा होयगा”, “अबकी मालवो खूब पाक्यो हे” |
| यात्रा-वृत्तांत शैली | राजस्थान से मालवा, नागदा, उज्जैन, इंदौर, ओंकारेश्वर, नेमावर, क्रमवार यात्रा |
| आँकड़ों का सटीक प्रयोग | 1878, 1899 (15.75 इंच), 1973 (77 इंच), यशवंत सागर के पच्चीसों साइफ़न, 3 डिग्री सेल्सियस |
| पुरानी कहावत का प्रयोग | “मालव धरती गहन गंभीर, डग-डग रोटी, पग-पग नीर” |
| स्थानीय-वैश्विक जोड़ | मालवा की नदियों-तालाबों की बात को अमेरिका-यूरोप के पर्यावरण-संकट तक ले जाना |
| व्यंग्य | आज के इंजीनियरों पर, अमेरिका की ज़िद पर, और अंत में स्वयं पर भी |
14 शब्दार्थ और टिप्पणी
किताब के अंत के सभी कठिन शब्दों के अर्थ यहाँ एक साथ दिए गए हैं।
| शब्द / मुहावरा | अर्थ |
|---|---|
| निथरी | फैली, चमकीली |
| चौमासा | बारिश के चार महीने |
| ओटले | मुख्यद्वार |
| घउँक-घउँक | बादलों के गरजने की आवाज़ |
| पानी भोत गिर्यो | पानी बहुत गिरा, बरसात बहुत हुई |
| फ़सल तो गली गई | फ़सल पानी में डूब गई और सड़-गल गई |
| पण | परंतु |
| उनने | उन्होंने |
| अत्ति | बढ़ा-चढ़ाकर, अतिशयोक्ति में |
| मालव धरती गहन गंभीर, डग-डग रोटी, पग-पग नीर | मालवा की धरती गहन गंभीर है जहाँ डगर-डगर पर रोटी और पग-पग पर पानी मिलता है, यानी मालवा की धरती ख़ूब समृद्ध है |
| पश्चिम के रिनेसां | पश्चिम का पुनर्जागरण काल |
| विपुलता की आश्वस्ति | संपन्नता, समृद्धि का आश्वासन |
| अबकी मालवो खूब पाक्यो है | अबकी मालवा ख़ूब समृद्ध है, यानी इतनी बरसात हुई है कि फ़सलें हरी-भरी हो गई हैं |
| पेले माता बिठायंगा | पहले माता की मूर्ति स्थापित करूँगा |
| रड़का | लुढ़का |
| मंदे उजाले से गमक रही थी | हलके प्रकाश में सुगंधित हो रही थी |
| चवथ का चाँद | चतुर्थी का चाँद |
| छप्पन का काल | 1899 का भीषण अकाल |
| दुष्काल का साल | बुरा समय, अकाल |
| पूर | बाढ़ |
| गाद | झाग, कूड़ा-कचरा |
| कलमल करना | सँकरे रास्ते से पानी बहने की आवाज़ |
| सदानीरा | हर वक़्त बहने वाली नदियाँ |
- अपना मालवा: खाऊ-उजाड़ू सभ्यता में, प्रभाष जोशी का निबंध है, जनसत्ता (1 अक्टूबर 2006) के “कागद कारे” स्तंभ से
- यात्रा-क्रम: राजस्थान → मालवा → नागदा → उज्जैन (शिप्रा) → इंदौर → ओंकारेश्वर व नेमावर (नर्मदा)
- ओंकारेश्वर में नर्मदा चिढ़ती हुई (“शायद इसीलिए”: सामने बाँध बन रहा है), नेमावर/बजवाड़ा में शांत, गंभीर और भरी-पूरी
- चंबल का उद्गम जानापाव पर्वत से, अंत इटावा में जमना में; शिप्रा का उद्गम केवड़ेश्वर से
- गांधी सागर के सब फाटक खुले (“इत्ता पानी भरा”), यशवंत सागर के पच्चीसों साइफ़न चले (67 साल में तीसरी बार); कहावत “मालव धरती गहन गंभीर” सच हुई
- मालवा के सब राजा (जैसे विक्रमादित्य, भोज, मुंज) तालाब-बावड़ी बनवाते थे; आज के इंजीनियरों ने तालाब गाद से भरने दिए, भूजल निकाल लिया
- इंदौर की खान और सरस्वती नदियाँ सड़े नालों में बदल दी गई हैं; शिप्रा, चंबल, गंभीर, पार्वती, कालीसिंध और चोरल के यही हाल हो रहे हैं
- 1878 से रिकॉर्ड: 1899 सबसे कम (15.75 इंच, “छप्पन का काल”), 1973 सबसे ज़्यादा (77 इंच)
- छप्पन के अकाल में भी मालवा में लोग न प्यासे मरे न भूखे, क्योंकि उसके पहले और बाद के साल ख़ूब पानी था; सीख: “अपने नदी, नाले, तालाब सँभाल के रखो तो दुष्काल का साल मज़े में निकल जाता है।”
- कार्बन डाइऑक्साइड गैसों ने धरती का तापमान 3 डिग्री सेल्सियस बढ़ाया; ये गैसें सबसे ज़्यादा अमेरिका और फिर यूरोप से निकलती हैं; रोकने से इनकार अमेरिका का
- अंतिम पंक्ति: “हम अपनी जीवन पद्धति को क्या समझते हैं!”, स्वयं पर भी व्यंग्य