परीक्षा से ठीक पहले के दोहराव के लिए इस अध्याय का निचोड़: कृति-परिचय, मुख्य बिंदुओं की तालिकाएँ, याद रखने लायक़ उद्धरण और सारे शब्दार्थ एक जगह। विस्तार से पढ़ने के लिए पूरे नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।
1 कृति एक नज़र में
| बिंदु | जानकारी |
|---|---|
| पाठ | अपना मालवा: खाऊ-उजाड़ू सभ्यता में |
| लेखक | प्रभाष जोशी (सन् 1937-2009) |
| स्रोत | जनसत्ता, 1 अक्टूबर 2006, “कागद कारे” स्तंभ |
| पुस्तक | अंतराल भाग 2, पाठ 3 |
| विधा | पाठ-परिचय में नहीं लिखी; इसे निबंध/यात्रा-वृत्तांत के रूप में पढ़ा जा सकता है |
| मुख्य विषय | मालवा की मिट्टी, वर्षा, नदियाँ और वैश्विक पर्यावरण संकट |
2 मुख्य विषय, संक्षेप में
| विषय | मुख्य बिंदु |
|---|---|
| यात्रा-क्रम | राजस्थान से मालवा, नागदा, उज्जैन (शिप्रा), इंदौर, ओंकारेश्वर, नेमावर |
| नर्मदा के दो रूप | ओंकारेश्वर में चिढ़ती हुई (“शायद इसीलिए”: सामने बाँध बन रहा है); नेमावर/बजवाड़ा में शांत, गंभीर, भरी-पूरी |
| नदियाँ | नर्मदा, शिप्रा (केवड़ेश्वर से), चंबल (जानापाव से इटावा तक), चोरल, पार्वती-कालीसिंध, गंभीर-खान-सरस्वती |
| तालाब-बावड़ी | मालवा के सब राजाओं (जैसे विक्रमादित्य, भोज, मुंज) ने बनवाए; आज के इंजीनियरों ने गाद से भरने दिए |
| गांधी सागर / यशवंत सागर | गांधी सागर के सब फाटक खुले (“इत्ता पानी भरा”); यशवंत सागर के पच्चीसों साइफ़न चले, सड़सठ साल में तीसरी बार |
| वर्षा-आँकड़े | 1878 से रेकार्ड; 1899 सबसे कम (15.75 इंच); 1973 सबसे ज़्यादा (77 इंच); 2006 में 40 इंच |
| छप्पन का अकाल | 1899 का अकाल, फिर भी मालवा में लोग न प्यासे मरे न भूखे, क्योंकि उसके पहले और बाद के साल ख़ूब पानी था |
| वैश्विक संकट | कार्बन डाइऑक्साइड से तापमान 3°C बढ़ा; ये गैसें सबसे ज़्यादा अमेरिका और फिर यूरोप से; रोकने को तैयार नहीं: अमेरिका |
3 याद रखने लायक़ उद्धरण
“मालव धरती गहन गंभीर, डग-डग रोटी, पग-पग नीर।”
पुरानी कहावत, जो बरसों बाद इस साल सच हुई
“हम नदी को नदी नहीं माँ मानते हैं। नर्मदा मैया है। उससे हम बने हैं। उसके किनारे बैठना माँ की गोद में डूबना है।”
नेमावर/बजवाड़ा में नर्मदा-दर्शन के समय
“नदियों ने सभ्यताओं को जन्म दिया। हमारी आज की सभ्यता इन नदियों को अपने गंदे पानी के नाले बना रही है।”
इंदौर की खान-सरस्वती और शिप्रा, चंबल, गंभीर, पार्वती, कालीसिंध, चोरल के संदर्भ में
“उमर जो ले गई उसे ले जाने दो। उसका जो है, रखे। अपना जो है उसे जिएँ।”
इंदौर में, सत्तर की होती उम्र के बोध पर
“हम अपनी जीवन पद्धति को क्या समझते हैं!”
पाठ की अंतिम पंक्ति
4 मूल भाव, संक्षेप में
“अपने नदी, नाले, तालाब सँभाल के रखो तो दुष्काल का साल मज़े में निकल जाता है। लेकिन हम जिसे विकास की औद्योगिक सभ्यता कहते हैं वह उजाड़ की अपसभ्यता है।”
पाठ की सीख, लेखक के शब्दों में (छप्पन के काल के प्रसंग में)
5 सारे शब्दार्थ एक जगह
- कृति-परिचय (प्रभाष जोशी, जनसत्ता, कागद कारे, 1 अक्टूबर 2006) दोहरा लें
- नर्मदा के दो रूप (ओंकारेश्वर बनाम नेमावर) और सभी नदियों के नाम याद कर लें
- वर्षा-आँकड़े (1878, 1899 = 15.75 इंच, 1973 = 77 इंच) बिना देखे बता पाएँ
- पाँचों याद रखने लायक़ उद्धरण और पाठ की सीख वाली पंक्ति शब्दशः दोहरा लें
- शब्दार्थ में से कम से कम दस शब्द बिना देखे बताने की कोशिश करें