कक्षा 12 हिंदी अंतराल भाग 2 अध्याय 3 अपना मालवा महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. यह पाठ किस अख़बार के किस स्तंभ से और कब लिया गया है?

उत्तर: यह पाठ जनसत्ता अख़बार के “कागद कारे” स्तंभ से, 1 अक्टूबर 2006 को लिया गया है।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. “छप्पन का काल” किसे कहते हैं?

उत्तर: छप्पन का काल सन् 1899 के भीषण अकाल को कहते हैं, जब मालवा में सिर्फ़ 15.75 इंच पानी गिरा था।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. यशवंत सागर के कितने साइफन चलाने पड़े और यह कब हुआ?

उत्तर: पाठ के अनुसार यशवंत सागर के पच्चीसों साइफ़न चलाने पड़े, और सड़सठ (67) साल में तीसरी बार ऐसा हुआ।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. चंबल नदी का उद्गम कहाँ से है?

उत्तर: चंबल नदी विंध्य के जानापाव पर्वत से निकलती है।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. धरती का तापमान कितना बढ़ गया है और किस गैस के कारण?

उत्तर: कार्बन डाइऑक्साइड गैसों के कारण धरती के तापमान में तीन डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. नागदा स्टेशन पर मीणा जी क्या पिलाते हैं?

उत्तर: नागदा स्टेशन पर मीणा जी बिना चीनी की चाय पिलाते हैं।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. 128 साल के रेकार्ड (1878-2006) में मालवा में सबसे कम और सबसे ज़्यादा वर्षा कब हुई?

उत्तर: 128 साल के रेकार्ड में सबसे कम वर्षा 1899 में हुई, सिर्फ़ 15.75 इंच, इसे “छप्पन का काल” कहते हैं। सबसे ज़्यादा वर्षा 1973 में हुई, 77 इंच, यह एकमात्र अतिवृष्टि का साल था।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. ओंकारेश्वर में नर्मदा का क्या हाल था और क्यों?

उत्तर: ओंकारेश्वर में नर्मदा चिढ़ती और तिनतिन-फिनफिन करती बह रही थी, मटमैली और कहीं छिछली-कहीं गहरी अथाह थी। शायद इसका कारण यह था कि सामने ही सीमेंट-कंक्रीट का विशाल बाँध बनाया जा रहा था।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. इंदौर उतरते ही लेखक और दव्वा के बीच क्या संवाद हुआ?

उत्तर: लेखक ने दव्वा से कहा कि अपने को सब नदियाँ, सारे तालाब, ताल-तलैया और जलाशय देखने हैं, सब पहाड़ चढ़ने हैं। दव्वा ने मुसकुराते हुए कहा, “यहीं से?” जवाब मिला, “नी यार पेले माता बिठायंगा।” (शब्दार्थ: पेले माता बिठायंगा = पहले माता की मूर्ति स्थापित करूँगा) इस पर उत्तर मिला, “माता तो बैठ गई, आरती भी हो गई ताऊजी, एक बजनेवाला है।”

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. लेखक ने नागदा स्टेशन पर मीणा जी से क्या बातचीत की?

उत्तर: मीणा जी बिना चीनी की चाय पिलाते हुए क्वालालंपुर में भारत के हारने से दुखी थे। मौसम-खेती पर पूछने पर उन्होंने बताया कि अबकी ज़्यादा पानी गिरने से सोयाबीन की फ़सल गल गई, पर गेहूँ-चना अच्छा होगा।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. विक्रमादित्य, भोज और मुंज ने पानी के रखरखाव के लिए क्या प्रबंध किए थे?

उत्तर: वे और मालवा के सब राजा जानते थे कि इस पठार पर पानी को रोक के रखना होगा। सबने तालाब बनवाए और बड़ी-बड़ी बावड़ियाँ बनवाईं, ताकि बरसात का पानी रुका रहे और धरती के गर्भ के पानी को जीवंत रख सकें। वे रिनेसां (पुनर्जागरण) के बहुत पहले हो गए थे, फिर भी यह जानते थे।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. छप्पन के अकाल में मालवा में क्यों कोई भूखा-प्यासा नहीं मरा?

उत्तर: क्योंकि उस साल के पहले और बाद के वर्षों में ख़ूब पानी था। पाठ यह भी कहता है कि राजस्थान के ठेठ मारवाड़ से तब भी लोग यहाँ आए थे, और कहते हैं कि तब भी खाने और पीने को काफ़ी था। इसी प्रसंग में लेखक की सीख है: “अपने नदी, नाले, तालाब सँभाल के रखो तो दुष्काल का साल मज़े में निकल जाता है।”

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. सिमरोल और बिजवाड़ के घाटों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: ओंकारेश्वर और नेमावर जाते हुए विंध्य के दोनों घाट उतरने पड़े, एक तरफ़ सिमरोल का, दूसरी तरफ़ बिजवाड़ का। दोनों तरफ़ सागौन के जंगल थे, पत्ते सूखे होते हुए भी फुनगियों पर फूल थे। सिमरोल में चोरल नदी ख़ूब बहती मिली, बिजवाड़ में हर नाला बह रहा था।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. शिप्रा नदी का उद्गम कहाँ से है और वह उज्जैन में कैसे पवित्र हुई?

उत्तर: शिप्रा केवड़ेश्वर के पास से निकलती है, यही कालिदास की शिप्रा है। बहुत बड़ी नदी नहीं है, पर उज्जैन में महाकाल के पाँव पखारकर पवित्र हो गई।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. नर्मदा के दो अलग-अलग रूपों, ओंकारेश्वर और नेमावर, की तुलना कीजिए।

उत्तर: ओंकारेश्वर में नर्मदा चिढ़ती और तिनतिन-फिनफिन करती बह रही थी; सामने सीमेंट-कंक्रीट का विशाल राक्षसी बाँध बनाया जा रहा था (लेखक: “शायद इसीलिए”)। नदी मटमैली थी, कहीं छिछली, कहीं गहरी अथाह; बड़ी नावें वहाँ नहीं थीं (शायद पूर में बहने से बचाकर कहीं रख दी गई थीं), और ज्योतिर्लिंग का तीर्थ धाम वह नहीं लग रहा था। इसके विपरीत, नेमावर के पास बजवाड़ा में नर्मदा शांत, गंभीर और भरी-पूरी थी, चवथ का चाँद उस पर लटका था, भेन जी ने उसे सहलाते हुए कहा कि वह थक गई है। यहीं लेखक, जो ख़ुद को नर्मदा किनारे के लोगों में गिनते हैं, कहते हैं: “हम नदी को नदी नहीं माँ मानते हैं। नर्मदा मैया है। उससे हम बने हैं। उसके किनारे बैठना माँ की गोद में डूबना है।”

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. आज के इंजीनियरों और पुराने राजाओं की जल-प्रबंधन की समझ में क्या अंतर है?

उत्तर: आज के इंजीनियर समझते हैं कि वे पानी का प्रबंध जानते हैं और पहले के लोग कुछ नहीं जानते थे, क्योंकि उनके अनुसार ज्ञान पश्चिम के रिनेसां के बाद ही आया। पर मालवा में विक्रमादित्य, भोज और मुंज रिनेसां के बहुत पहले हो गए, फिर भी वे और मालवा के सब राजा जानते थे कि पानी रोक के रखना होगा, इसलिए उन्होंने तालाब और बावड़ियाँ बनवाईं। इसके विपरीत, आज के नियोजकों-इंजीनियरों ने तालाबों को गाद से भर जाने दिया और ज़मीन का पानी पाताल से निकाल लिया, जिससे नदी-नाले सूख गए।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. पाठ के अनुसार इंदौर की नदियाँ सड़े नालों में कैसे बदल दी गईं, और मालवा की दूसरी नदियों का क्या हाल हो रहा है?

उत्तर: इंदौर के बीच से निकलने और मिलनेवाली नदियाँ (खान, सरस्वती) कभी उसे हरा-भरा और गुलज़ार रखती थीं; हाथीपाला में कभी नदी पार करने को हाथी पर बैठना पड़ता था और चंद्रभागा पुल के नीचे महाराष्ट्र की चंद्रभागा जितना पानी रहता था। आज वे सड़े नालों में बदल दी गई हैं, और शिप्रा, चंबल, गंभीर, पार्वती, कालीसिंध, चोरल सबके यही हाल हो रहे हैं। ये सदानीरा (हर वक़्त बहने वाली) नदियाँ अब चौमासे में चलती हैं, बाक़ी के महीनों में बस्तियों के नालों का पानी ढोती हैं। इसके साथ, आज के नियोजकों और इंजीनियरों ने तालाबों को गाद से भर जाने दिया और ज़मीन का पानी पाताल से भी निकाल लिया, जिससे नदी-नाले सूख गए। लेखक कहते हैं, ‘नदियों ने सभ्यताओं को जन्म दिया। हमारी आज की सभ्यता इन नदियों को अपने गंदे पानी के नाले बना रही है।’

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. लेखक की मालवा-यात्रा का वर्णन आरंभ से इंदौर पहुँचने तक कीजिए।

उत्तर: राजस्थान की उगती धूप वहीं रह गई, मालवा में आसमान बादलों से घिरा मिला, चौमासा अभी नहीं गया था। यह नवरात्रि की पहली सुबह थी, घट-स्थापना की तैयारी चल रही थी। नागदा स्टेशन पर मीणा जी ने बिना चीनी की चाय पिलाई और मौसम-खेती की बात की। उज्जैन के रास्ते में शिप्रा भरपूर बहती मिली। उज्जैन से देवास होते हुए इंदौर जाना “मालवा के आँगन में से निकलना” है। क्वांर की धूप नहीं मिली (लेखक लिखते हैं कि वह होती तो गदराई हरियाली से तबीयत झक हो जाती); फिर भी कुएँ-बावड़ी और तालाब-तलैया लबालब भरे थे, नदी-नाले बह रहे थे और फ़सलें लहरा रही थीं, जिससे विपुलता की आश्वस्ति मिली।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. वैश्विक पर्यावरण संकट के पीछे क्या कारण बताए गए हैं?

उत्तर: “नयी दुनिया” की लाइब्रेरी में कमलेश सेन और अशोक जोशी द्वारा निकालकर रखी गई कतरनें बताती हैं कि वातावरण को गरम करनेवाली कार्बन डाइऑक्साइड गैसों ने धरती के तापमान को तीन डिग्री सेल्सियस बढ़ा दिया है। ये गैसें सबसे ज़्यादा अमेरिका और फिर यूरोप के विकसित देशों से निकलती हैं। इसी कारण समुद्रों का पानी गरम हो रहा है, ध्रुवों पर बर्फ़ पिघल रही है, मौसम का चक्र बिगड़ रहा है, लद्दाख में बर्फ़ के बजाय पानी गिरा और बाड़मेर में गाँव डूब गए। अमेरिका इन गैसों को रोकने को तैयार नहीं है।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. ‘हम अपनी जीवन पद्धति को क्या समझते हैं!’ इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: यह पाठ की अंतिम पंक्ति है; इसे पूरे निबंध के व्यंग्यात्मक निष्कर्ष के रूप में पढ़ा जा सकता है। लेखक अमेरिका-यूरोप को उनकी खाऊ-उजाड़ू जीवन पद्धति के लिए दोषी ठहराने के बाद, ख़ुद को भी इससे अलग नहीं रखते। वे कहते हैं कि हम भी अपनी मालवा की गहन-गंभीर और पग-पग नीर की डग-डग रोटी देनेवाली धरती को उजाड़ने में लगे हुए हैं, यानी दोष सिर्फ़ बाहर नहीं, अपने घर में भी है।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. लेखक की उम्र के बोध का वर्णन कीजिए और इसका पाठ में क्या महत्व है।

उत्तर: इंदौर उतरते ही लेखक सब नदियाँ, तालाब और पहाड़ देखने की योजना बनाते हैं, पर बाद में एहसास होता है कि उनकी उम्र सत्तर की होने वाली है, पहाड़ चढ़े नहीं जाएँगे, नदी-नाले पार नहीं होंगे। मन से किशोर होने पर भी शरीर वैसा फुर्तीला नहीं रह सकता। इस बोध पर लेखक कहते हैं, “उमर जो ले गई उसे ले जाने दो। उसका जो है, रखे। अपना जो है उसे जिएँ।” इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि मन की उमंग के साथ शरीर की सीमाओं को स्वीकार करना भी इस निबंध का एक मानवीय पहलू है।

प्रश्न 8 (4 अंक)

प्र. गांधी सागर और चंबल की स्थिति का वर्णन कीजिए।

उत्तर: चंबल को लेखक ने घाटा बिलोद में देखा, काफ़ी पानी था, ख़ूब बह रही थी। आगे बहुत बड़ा बाँध है; इस बार गांधी सागर के सब फाटक खोलने पड़े, “इत्ता पानी भरा”। हालोद के आगे यशवंत सागर को गंभीर नदी ने इस बार फिर इतना भर दिया कि पच्चीसों साइफ़न चलाने पड़े; सड़सठ साल में तीसरी बार ऐसा हुआ। पार्वती और कालीसिंध ने फिर रास्ता रोका, दो दिन उनके पुल पर से पानी बहता रहा। इस बार मालवा के पठार की सब नदियों में पूर आई, और लेखक लिखते हैं कि बरसों बाद हज़ारों साल की कहावत सच्ची हुई: “मालव धरती गहन गंभीर, डग-डग रोटी, पग-पग नीर।”

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. ‘अपना मालवा: खाऊ-उजाड़ू सभ्यता में’ के आधार पर प्रभाष जोशी के निबंध-लेखन की विशेषताओं का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर: 1. लेखक अपनी मालवा-यात्रा को एक व्यक्तिगत वृत्तांत की तरह लिखते हैं, जिसमें राजस्थान से मालवा, नागदा, उज्जैन, इंदौर, ओंकारेश्वर और नेमावर तक का क्रमवार सफ़र है।
2. वे मालवी/आंचलिक शब्दों और बोलचाल का सहज प्रयोग करते हैं, जैसे मीणा जी का संवाद और “अबकी मालवो खूब पाक्यो हे”।
3. वे सटीक आँकड़ों (1878, 1899 में 15.75 इंच, 1973 में 77 इंच, पच्चीसों साइफ़न, 3 डिग्री सेल्सियस) का प्रयोग कर अपनी बात को प्रामाणिक बनाते हैं।
4. वे स्थानीय अनुभव (मालवा की नदियाँ-तालाब) को वैश्विक पर्यावरण-संकट से जोड़ते हैं, जिससे निबंध का दायरा एक क्षेत्र से पूरी दुनिया तक फैल जाता है।
5. वे व्यंग्य का प्रयोग करते हैं, आज के इंजीनियरों पर, अमेरिका की ज़िद पर, और अंत में स्वयं पर भी।
6. इस तरह यह निबंध व्यक्तिगत यात्रा-वृत्तांत, आंचलिक भाषा, आँकड़ों और वैश्विक चिंता का सुंदर मेल है।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. इस पाठ में जल-संरक्षण और पर्यावरण-संकट को किस प्रकार जोड़ा गया है, विस्तार से समझाइए।

उत्तर: 1. पाठ मालवा की जल-परंपरा बताता है: विक्रमादित्य, भोज, मुंज और मालवा के सब राजाओं ने तालाब और बड़ी-बड़ी बावड़ियाँ बनवाईं ताकि बरसात का पानी रुका रहे।
2. आज के इंजीनियरों ने इन्हीं तालाबों को गाद से भरने दिया और भूजल का दोहन किया, जिससे नदी-नाले सूख गए।
3. इस बार अच्छी बरसात में बिलावली, पीपल्या पाला और सिरपुर फिर लबालब भर गए।
4. इसके बाद लेखक इसी विषय को वैश्विक स्तर पर ले जाते हैं, कार्बन डाइऑक्साइड गैसों से धरती का तापमान 3 डिग्री सेल्सियस बढ़ना, ध्रुवों की बर्फ़ पिघलना, लद्दाख-बाड़मेर के उदाहरण।
5. ये गैसें सबसे ज़्यादा अमेरिका और फिर यूरोप के विकसित देशों से निकलती हैं; पाठ-परिचय के अनुसार यह खाऊ-उजाड़ू सभ्यता यूरोप और अमेरिका की देन है।
6. अंत में लेखक कहते हैं कि हम भी अपने मालवा की धरती को उजाड़ने में लगे हुए हैं; इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि स्थानीय (मालवा) और वैश्विक, दोनों संकट एक ही जीवन पद्धति से जुड़े हैं।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. पाठ में आए वर्षा-आँकड़ों (1878-2006) के आधार पर मालवा के मौसम-चक्र और मानव-व्यवहार पर टिप्पणी कीजिए।

उत्तर: 1. “नयी दुनिया” की लाइब्रेरी में 1878 से पानी के रेकार्ड मौजूद हैं, यानी 128 साल की जानकारी।
2. इनमें एक ही साल, 1899, सबसे कम वर्षा (15.75 इंच) का था, जिसे “छप्पन का काल” कहते हैं।
3. एक ही साल, 1973, अतिवृष्टि (77 इंच) का था।
4. 28 इंच से कम वर्षा हो तो वह सूखे का साल होता है, पर ऐसे साल ज़्यादा नहीं हैं; छप्पन के काल में भी मालवा में लोग न भूखे मरे न प्यासे, क्योंकि पहले और बाद के साल खूब पानी था।
5. फिर भी, अब मालवा में वैसा पानी नहीं गिरता जैसा गिरा करता था, तो पहले का सामान्य पानी भी लोगों को ज़्यादा लगता है, और लोग “टीवी की समझ में अत्ति की” बोलने लगे हैं।
6. पाठ की सीख: “अपने नदी, नाले, तालाब सँभाल के रखो तो दुष्काल का साल मज़े में निकल जाता है।” पर हम जिसे विकास की औद्योगिक सभ्यता कहते हैं, वह उजाड़ की अपसभ्यता है।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. खाऊ-उजाड़ू सभ्यता क्या है और यह पाठ के अनुसार वैश्विक पर्यावरण संकट से कैसे जुड़ी है?

उत्तर: 1. पाठ में इस शब्द की परिभाषा नहीं दी गई है; लेखक इसे “खाऊ-उजाड़ू जीवन पद्धति” भी कहते हैं, जिस पर अमेरिका कोई समझौता नहीं करना चाहता।
2. पाठ-परिचय के अनुसार यह खाऊ-उजाड़ू सभ्यता यूरोप और अमेरिका की देन है।
3. इसी सभ्यता के कारण विकास की औद्योगिक सभ्यता वास्तव में उजाड़ की अपसभ्यता बन गई है।
4. इसका प्रत्यक्ष असर कार्बन डाइऑक्साइड गैसों से धरती के तापमान में 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि, ध्रुवों की बर्फ़ पिघलना, और मौसम-चक्र का बिगड़ना है।
5. अमेरिका इसे रोकने को तैयार नहीं है और अपनी जीवन पद्धति पर कोई समझौता नहीं करेगा, ऐसी उसकी घोषणा है।
6. अंत में लेखक ख़ुद को भी इसका हिस्सा मानते हैं, “हम अपनी जीवन पद्धति को क्या समझते हैं!”, इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि यह संकट सामूहिक ज़िम्मेदारी का मसला है।